किसानों की व्यथा
आज किसान, अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि देश में जितनी भी सरकारें आई हैं ,सभी ने किसानों की हित की बात की है। देश में जितने भी राजनीतिक दल हैं ,जितनी भी,स्वयंसेवी संस्थाएं हैं, किसानों के नाम पर भी अनेक संस्थाएं हैं ,ये सब किसानों को हितैषी हैं ,और इनकी आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते हैं। यहाँ तक है कि जिस भी नेता के पास भीड़ कम हो जाती है ,या पार्टी में हाशिये पर डाल दिया जाता है (जैसे -अन्ना हजारे व योगेन्द्र यादव ),वे भी किसानों का दामन थाम लेते हैं।बेचारा किसान , जो भी आवाज़ लगाता है ,सिर पर पोटली रख कर ,उस के पीछे हो लेता है। इतना सब होने के बावजूद ,किसान की स्थिति वहीं की वहीं है.आज भी अनेक किसान,आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं। बेचारा किसान ,समझ नहीं पा रहा है कि ,आखिर कौन है उसका वास्तविक हितैषी और वह करे तो, करे क्या ?