रविवार, 28 अगस्त 2022

जिस सफर में हो खो न जाना


# जिस सफर में हो खो न जाना

 स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'


जिस सफर में हो खो न जाना ,

 रास्ता हो चाहे कितना भी अनजाना।

 यों तो इंसान सोचता बहुत है,

 सोचते सोचते खो जाता है।

  मंजिल कहीं और रास्ता कोई और,

 लेकिन किसी और ही निकल जाता है।

  जरूरी है जब सफर पर निकले तो,

   मंजिल का पता तो हो।

  तभी तो तुम्हें तुम्हारे सफर की,

  अवश्य ही सफलता हो ।

 राह में भटक कर कहीं ,

 असफलता के बीज कभी न बोना।

  ऐसा कभी भी साथ ना होने देना, 

 जागते ही रहना है ना कि सोना।

 सफर में निश्चय कर लेना है जरूरी,

  फिर ना आएगी मध्य में कोई भी मजबूरी।

    राह में आती हुई बाधाओं को, 

एक के बाद  लांघते जाओगे । 

  न भटकोगे और न खोओगे,

 तो निश्चित तौर पर मंजिल पा जाओगे।

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

राह मुश्किल है या हमारे कदम

 

#राह मुश्किल है या हमारे कदम #

 रचयिता:सतीश गुप्ता'पोरवाल'

हम तो चले थे अपनी ही राह पर

 मंजिल का तो पता ही नहीं था। 

कोई तो मंजिल मिलेगी भी या नहीं

 इस बात का डर सता रहा था।

  सहमे सहमे से उठ रहे थे कदम

  हम बढ़ते जा रहे थे राह में।

  हां उठ रहे थे कदम 

 मंजिल तक पहुंचने की चाह में।

  चल रहे थे हम अपनी ही धुन में

   दिलो-दिमाग में विचार था तुम्हारा।

  हम क्या अधर में ही रह जाएंगे

 या लक्ष्य पूरा होगा हमारा ।

 कदम तो थे बढ़ने को बेताब 

 राह में अवरोध थे तुम्हारे ख्वाब।

 लेकिन क्या लक्ष्य पूरा होगा

 यह डर पल-पल सता रहा था।

यही डर तो कोशिश में था

  रोकने को हमारे कदम।

 अब तुम ही बताओ सनम 

राह मुश्किल है या हमारे कदम।

जिंदगी


 रचयिता- सतीश गुप्ता' पोरवाल' 

  स्वरचित 


आज मन से दिल का झगड़ा हो गया,

 और जिंदगी अधर में झूलती रही।

  वाकये होते रहे दिन-ब-दिन ,

 कुछ याद रहे कुछ जिंदगी भूलती रही।

  कशमकश हमेशा होती रही,

  एकमत कभी ना हुए ।

 कभी दिल हंसे तो कभी हंसे मन,

  कभी दिल तो कभी मन गमगीन हुए।

 मन तो है चंचल मचल भी जाता है,

  मगर दिल है कि संभल जाता है।

 समझाता हूं मन को न माने तो क्या करूं,

 दिल कहीं साथ ना छोड़े यही सोचकर मैं डरूं।

  इच्छा है जो उमड़ घुमड़ कर,

  मन और दिल को तौलती रही।

  आज मन से दिल का झगड़ा हो गया,

   और जिंदगी अधर में झूलती रही।

जिंदगी को सुनिए


जिंदगी को सुनिए क्या कहती है जरा पूछिए 


स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'


जिंदगी को सुनिए क्या कहती है जरा पूछिए,

 जवाब मिलेगा जरूर जरा सवाल तो पूछिए।

  हम तो जिंदगी में जिंदगी जी रहे थे,

  दुखों के चिथड़े  को सिल रहे थे।

  तो फिर जिंदगी हमारी जिंदगी में क्यों आई, 

 आकर जिंदगी में क्यों कहर बरपाई।

  हम तो बादलों की आस लगाये बैठे थे, 

 जिंदगी की वर्षा के आसपास बैठे थे।

  फिर तूफान और आंधी क्यों आई है,

 अपने साथ ओलों की चादर क्यों लाई है।

  हम तो दुखों को दामन में समेटे बैठे थे,

  ख्वाबों  में जीने को ही जीना समझ बैठे थे।

  अगर जिंदगी बरसात लाती तो ठीक था,

  बहता पानी रहता तो ठीक था।

  यही दुखों के ओले जिंदगी को सुन्न किए जाते हैं,

 हम इन्हें असहज भाव से सहे जाते हैं।

 सुख और दुख साथ साथ चलते हैं,

  पर किसी को सिर्फ दुख ही क्यों मिलते हैं।

  आखिर कब तक यही सिलसिला चलता रहेगा,

 थोड़ा तो समझिए बूझिये।

  जिंदगी को सुनिये क्या कहती है जरा पूछिए,

  जवाब मिलेगा जरूर जरा सवाल तो पूछिए।

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

जगाया न करो--गज़ल

 बमुश्किल समाये थे नींद के आगोश में,

  यूं बेवक्त आकर हमें जगाया न करो।


  हमारी तो फितरत है गुमसुम रहने की, 

यूं बेवजह आकर हमें हंसाया ना करो।


  राहों में चलते हैं मंजिल का पता नहीं, 

 यूँ आकर अपनी मंजिल बताया न करो।


हम तो अकेले ही मस्त थे जिंदगी के सफर में,

 यूं ख्वाबों में आकर मुश्किल में फसाया न करो।

 

 हमें तो कब से इंतजार था तुम्हारे आने का,

  यूं न आकर हमें रुलाया ना करो।


  अब तो जिद है हमारी अकेले रहने की,

 यूं दिल में समा कर हराया ना करो।


  जिंदगी हमारी है हम जी लेंगे कैसे भी, 

 यूं हमें समझा कर वक्त जाया ना करो।


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल' ,जयपुर।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

लघुकथा-कविता की राखी

 दिनेश चंद्र जी के पास खेती की कुछ जमीन थी, जिसकी पैदावार से इतना पैसा आ जाता था कि परिवार का खर्चा आराम से चल जाए और कुछ बचत भी हो जाए।

  समय के साथ बेटा संतोष और बेटी कविता बड़े हो गए , दोनों की शादी हो गई । संतोष ने खेती-बाड़ी संभाली और अपनी सूझबूझ और योग्यता से फसल से अच्छी कमाई प्राप्त करने लगा।कविता की शादी एक इंजीनियर राजेश से हो गई।कालांतर में उनका खेत एक सरकारी योजना में अवाप्ति में आ गया और उसका अच्छा खासा मुआवजा, सरकार की तरफ से तय हुआ। 

 जब राजेश को मालूम हुआ कि पुश्तैनी खेती की जमीन का अच्छा खासा मुआवजा मिलने वाला है तो उसके मन में लालच आ गया।राजेश ने अपनी पत्नी कविता से कहा कि करोड़ों में मुआवजा मिलने वाला है, इसमें तुम्हारा भी आधा हिस्सा होना चाहिए ,तो कविता ने कहा कि यह सब भैया पर छोड़ दो ,जो उचित होगा वे अवश्य ही करेंगे । राजेश ने कहा कि तुम्हारे भैया 'स्टांप पेपर, पर लिख कर दें कि जितना मुआवजा मिलेगा उसमें से आधा हिस्सा मेरी बहिन कविता का रहेगा ।  जब तक ऐसा नहीं होता तुम किसी भी पेपर पर साइन नहीं करोगी। यह बात जब उसने अपने भाई को बताई तो वह खिन्न हो गया और उसने कहा कि मुझ पर विश्वास नहीं है क्या? जब मैं कह रहा हूं तो स्टांप पेपर की क्या जरूरत है ? लेकिन राजेश इस अपनी बात पर अड़ गया और कविता को सख्त ताकीद कर दी कि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तुम अपने भाई से न फोन पर बात करोगी और न ही मिलोगी। 

  समय गुजरता गया और रक्षाबंधन का त्यौहार आ गया।दोनों के ही दिमाग में पुरानी यादों का समय चक्र घूमने लगा - किस तरह से पूरे धूम-धाम से रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते थे और कविता जितने प्रेम से भाई को राखी बांधती थी,उतने ही प्रेम-भाव से उसे तोहफा मिलता था। लेकिन आज संतोष बहुत उदास था।  

  अचानक सामने से मुख्य द्वार खुला और कविता आती हुई नजर आई। संतोष के चेहरे पर खुशी छा गई, और उसने कहा कि क्या जीजाजी ने तुम्हे यहां आने की इजाजत दे दी?तो कविता ने कहा कि मैं तो बिना बताये ही आई हूं ।भैया ऐसा है ना कि पति के साथ तो ,कहते हैं कि, सात जन्मों का रिश्ता होता है लेकिन मैं मानती हूं कि भाई-भाई या भाई-बहिन का रिश्ता तो जनम-जनम का होता है।अब जो होगा देखा जाएगा, आप तो हाथ आगे करो। संतोष ने अपनी कलाई आगे कर दी और कविता ने तिलक और अक्षत लगाकर राखी बांधी। दोनों, भाई-बहिन की आंखों से अश्रु धार बह निकली और टप-टप आंसू फर्श पर गिरकर एक हो गए। कहना मुश्किल था कि कौनसे आंसू भाई के थे और कौन से बहिन के।

 भोजन करने के पश्चात जब कविता वापस घर की ओर लौट रही थी तो उसे महसूस हुआ कि आते समय उसके पैरों में भारीपन था, लेकिन जाते समय कदम ऐसे उठ रहे थे जैसे वह हवा में उड़ रही हो।

कहानी--कविता की राखी

 यूं तो दिनेश चंद्र जी के पास किसी बात की कमी नहीं थी।ऐसा भी नहीं था कि पैसा बाढ़ के पानी की तरह आ रहा हो। खेती की कुछ जमीन थी, जिसकी पैदावार से इतना पैसा आ जाता था कि परिवार का खर्चा आराम से चल जाए और कुछ बचत भी हो जाए।बचत भी जरूरी ही थी।एक बेटा और बेटी , दो ही संतान थीं। बेटे का नाम संतोष और बेटी का कविता। उनकी पढ़ाई और शादी में भी तो खर्च होना था।

  समय के साथ बच्चे बड़े हो गए , दोनों की शादी हो गई । बेटे को दिनेश चंद्र जी ने समझाया कि अपने पुरखों की जमीन है अच्छी खासी आमदनी हो जाती है,तो वह भी खेती-बाड़ी ही संभाल ले । संतोष ने भी यही उचित समझा और अपनी सूझबूझ और योग्यता से फसल से अच्छी कमाई प्राप्त करने लगा।कविता की शादी एक इंजीनियर राजेश से हो गई। कविता एक सभ्य ,सुशील और समझदार ग्रहणी की तरह अपना परिवार संभाल रही थी ।

 कालांतर में उनका खेत एक सरकारी योजना में अवाप्ति में आ गया और उसका अच्छा खासा मुआवजा, सरकार की तरफ से तय हुआ। 

 यूं तो राजेश काफी सरल प्रवृत्ति का था लेकिन जब उसे मालूम हुआ कि पुश्तैनी खेती की जमीन का अच्छा खासा मुआवजा मिलने वाला है तो उसके मन में लालच आ गया।राजेश ने अपनी पत्नी कविता से कहा कि पुश्तेनी खेती की जमीन का करोड़ों में मुआवजा मिलने वाला है, इसमें तुम्हारा भी आधा हिस्सा होना चाहिए ,तो कविता ने कहा कि यह सब भैया पर छोड़ दो ,जो उचित होगा वे अवश्य ही करेंगे । लेकिन राजेश ने कहा कि बात लाखों की नहीं,करोड़ों की है इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हारे भैया 'स्टांप पेपर, पर लिख कर दें कि जितना मुआवजा मिलेगा उसमें से आधा हिस्सा मेरी बहिन कविता का रहेगा ।  जब तक ऐसा नहीं होता तुम किसी भी पेपर पर साइन नहीं करोगी। यह बात जब उसने अपने भाई को बताई तो वह खिन्न हो गया और उसने कहा कि मुझ पर विश्वास नहीं है क्या? जब मैं कह रहा हूं तो स्टांप पेपर की क्या जरूरत है ? लेकिन राजेश इस अपनी बात पर अड़ गया और कविता को सख्त ताकीद कर दी कि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तुम अपने भाई से न फोन पर बात करोगी और न ही मिलोगी। यदा-कदा राजेश कविता का फोन भी देख लिया करता था कि कहीं वह अपने भाई से बात तो नहीं कर रही हो।

  समय गुजरता गया और रक्षाबंधन का त्यौहार आ गया।दोनों , भाई-बहिन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।दोनों के ही दिमाग में पुरानी यादों का समय चक्र घूमने लगा - किस तरह से पूरे धूम-धाम से रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते थे और कविता जितने प्रेम से भाई को राखी बांधती थी,उतने ही प्रेम-भाव से उसे तोहफा मिलता था। लेकिन आज संतोष बहुत उदास था। उसे ,पूरी तरह से,लग रहा था कि आज उसकी बहिन नहीं आएगी और कविता को भी लग रहा था कि वह भाई को राखी बांधने नहीं जा पाएगी। दोनों ही उदास हो चले थे।

  इसी सोच- विचार में संतोष बैठा हुआ था कि अचानक सामने से मुख्य द्वार खुला और कविता आती हुई नजर आई। संतोष के चेहरे पर खुशी छा गई, और उसने कहा कि क्या जीजाजी ने तुम्हे यहां आने की इजाजत दे दी?तो कविता ने कहा कि मैं तो बिना बताये ही आई हूं ।भैया ऐसा है ना कि पति के साथ तो ,कहते हैं कि, सात जन्मों का रिश्ता होता है लेकिन मैं मानती हूं कि भाई-भाई या भाई-बहिन का रिश्ता तो जनम-जनम का होता है।अब जो होगा देखा जाएगा, आप तो हाथ आगे करो। संतोष ने अपनी कलाई आगे कर दी और कविता ने तिलक और अक्षत लगाकर राखी बांधी। दोनों, भाई-बहिन की आंखों से अश्रु धार बह निकली और टप-टप आंसू फर्श पर गिरकर एक हो गए। कहना मुश्किल था कि कौनसे आंसू भाई के थे और कौन से बहिन के।

 भोजन करने के पश्चात जब कविता वापस घर की ओर लौट रही थी तो उसे महसूस हुआ कि आते समय उसके पैरों में भारीपन था, लेकिन जाते समय कदम ऐसे उठ रहे थे जैसे वह हवा में उड़ रही हो।

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

हर कदम को जमीन कहां मिलती है


#हर कदम को जमीन कहाँ मिलती है


हर कदम को जमीन कहां मिलती है,

 हर किसी को जिंदगी हसीन कहां मिलती है।

  चाहता हूं मैं भी आसमान में उड़ना,

   उड़कर फिर तारों तक पहुंचना।

 बेजार हूं मैं अपने मुकद्दर से ,

ढूंढ रहा हूं उस सितारे को,

जिसे होना था मेरे मुकद्दर का, 

जिसे बनाना था मुझे सिकंदर सा।

 पकड़ लूं सितारे को मुट्ठी में कभी न छोडू

 दिल के पाटों के बीच उसे मसल दूं। 

 लेकिन वास्तविकता से मुह नहीं मोड़ा जा सकता, 

जो होना है उसे तोड़ा नहीं जा सकता।

 किसी कदम को जमीन नहीं मिलती,

 तो किसी जमीन को कदम नहीं मिलता।


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल',

  मानसरोवर, जयपुर।

चौपाल

*चौपाल*


 मैंने गांव में चौपाल को कल सपने में देखा,

राम,हरी और गोपाल को वहां सदमे में देखा।

बैठे थे तीनों वहां गुमसुम से,

मुझे भी सदमा लगा कसम से।

खिलखिलाते थे जो किसी बात पर,

निराश नहीं होते थे किसी हाल पर।

 मैंने पूछा तुम्हारे चेहरे पर यह उदासी क्यों छाई,

वे बोले तुम्हें बहुत दिनों बाद हमारी याद आई।

 तुम तो पहुंच गए दूर यहां से शहर 

इतने दिनों तक नहीं ली हमारी खबर।

  हम तो बस रह गए इसी गांव में,

 बैठे रहते हैं हर शाम यहां नीम की छांव में ।

क्या तुम्हें याद नहीं आता खेतों से चने के पौधे उखाड़ना ,

फिर पकड़े जाने पर अपने अपने कान पकड़ना ।

 स्कूल में फर्नीचर को उठाकर फेंकना,

  फिर मार पड़ी तो हाथों को सेंकना ।

वो पतंगों का आसमान में उड़ाना ,

फिर वो काटा-वो काटा चिल्लाना।

 कभी गिल्ली डंडा कभी सिथोलिया ,

 यह सब तो तुमने भुला ही दिया ।

हम शाम को इसी चौपाल पर बैठते थे,

 फिर घंटों जाने क्या-क्या बातें करते थे।

 सपना पूरा भी न हुआ था कि बेटी ने जगाया ,

मैंने चौपाल को कल सपने में देखा तो

बचपन याद आया।


स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल',

 मानसरोवर,जयपुर ।

सोमवार, 1 अगस्त 2022

बहती हवाएं


मंद मंद बहती हवाएं 

संग लिए नन्ही फुहारें,

 समां बन गया इतना सुहाना 

  अपने प्रियों को बुलाएं ।

 तरस रही थी यह जमीं

 उष्णता में आये कमी,

 सोच रही बादल हो जहां

  वही जाऊं कहीं। 

कागज की कश्ती ज्यों 

बहते पानी में डोल रही, 

मंद मंद मुस्कान यों 

 अधरों से बोल रही। 

कोयल कुहू कुहू बोल रही 

 पपीहा पीहू पीहू बोल रहा,

  मन मयूर नाच उठा

 होले होले डोल रहा।


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल',मानसरोवर,जयपुर।

मुक्तक


नसीब ही तो नहीं है वरना हम क्या होते,

  फेसबुक के हर पेज पर हम बयां होते,

 कलम उठाते हैं लिखने को पर लिख नहीं पाते,

  वरना हम उम्र से बुजुर्ग और दिल से जवां होते।

             ************

  न जाने क्यों हमें तुम्हारी याद आती है,

  जमीं से आसमांं तक यही फरियाद आती है,

  चले आओ अब तो सभी फासले मिटा कर,

   अब तो रोज कयामत की रात आती है।

               **********

फूल चमन में खिल गये,

   पर ख्वाब अधूरे रह गये,

   उसने कहा था आने को,

   पर हम राह तकते रह गये।

             *************

यह दिल तो ,

हरदम न रोता ,

जो हमदम न होता,

तो गम भी न होता।

        ***********

सिर्फ वादा करना ही काफी नहीं प्यार में,

  वादा करके न मुकरना जरूरी है।

   *****************

चोटिल तो मुझे भी करते हैं लोग,

 पर मैं आह नहीं भरता ।

चोट पर नश्तर घुमाने से,

 घाव नहीं भरता।

         ***********

मजा नहीं आता लोगों को,

 अपने को आबाद करने में ।

 मजा तो आता है उन्हे,

  दूसरों को बर्बाद करने में । 

**********************(

 मुझे जगा कर खुद सो रही हो ,

 जाने किन सपनों में खो रही हो,  

मैं तो बढ़ रहा था बड़े ही जोश से,

  क्यों राह में कांटे बो रही हो ।

 *****************

कर्ज़ दूध का मां के तुम चुका न पाओगे,

 मिली है रोशनी मां से बुझा न पाओगे।

 बहुत कुछ पाकर जीवन में चाहे तुम तन जाओ,

  सामने अपने कभी मां को झुका न पाओगे।

**********************

खुशी खुशी , खुशी का इंतजार करो ,

 आएगी जरूर  न अपने को  बेजार करो ।

 दुखी रहने को अपनी फितरत न बनाओ,

  खुशी को अपनी जिंदगी में शुमार करो। 


मेरी दुआ दवा से भी ज्यादा असर करती है,

और बद्दुआ जिसे लगे,समझो जहर बनती है।

 वैसे तो मैं हूं एक अदद इंसान ही,

 लेकिन मेरे अंदर पवित्र आत्मा बसर करती है।


आओ आज हम तुम मिलें, 

और एक कप कॉफी पी लें, 

गिले शिकवे जो भी हों,

 भूल जाएं चैन से जी लें।