स्वरचित--
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
सच बताएं आज तो मेरे भाग्य ही खुल गए,
नित्य कर्म तो जैसे आज हिल डुल गए।
श्रीमती ने कहा उठोजी भोर हो गई,
नहीं उठे तो हमें झकझोर गई।
हम हड़बड़ाकर उठे जाने लगे बनाने को चाय,
वह बोली आज तो मैं बनाऊँगी नहीं तो लगेगी हाय।
हमारी उनिंदी आंख तब झपकने लगी,
जब वह पैर छूने के लिए झुकने लगी।
हमने कहा श्रीमती जी आज सूरज कहीं और से उगा है,
जो तुम्हारा सर मेरे कदमों में झुका है।
वह सीरियल की बहू की तरह से मुस्कुराई,
आज करवा चौथ है यह बात धीरे से बोलकर बताई।
हाथ झुके तो उसका कंगना खनका,
उसका बताना था कि हमारा माथा ठनका।
मतलब आज मैं राजा एक दिन का,
और फिर गुलाम रहूंगा हर दिन का।
लेकिन खुशी भी कम नहीं थी मन में
साल में एक दिन तो आता है जीवन में।
आज तो फरमाइशें करेगी सजेगी धजेगी
और हमारी जेब की तो पुंगी बजेगी।
वह बोली पत्नी क्योंकि करवा चौथ का व्रत रखती है,
इसीलिए तो पति की उम्र साल दर साल बढ़ती है।
यह व्रत मैं तुम्हारे लिए ही तो करती हूं,
तुम्हे तो लगता होगा अहसान ही करती हूं।
मुझे मालूम है पुरुष सभी पत्नी का सम्मान करते हैं,
लेकिन फिर भी मजाक मजाक में तो वही कहते हैं।
करवा चौथ रखकर एहसान करती हैं,
उम्र भर फिर हमको परेशान करती हैं।