सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

ना आंखें नम बनाती है -- कविता

 न बातें निराधार बनाती है,

 नाराजगी न दिल में बसाती है।

  जो भी कहते हैं करती रहती है,

   मकान को घर वही बनाती है।

  न जाने इतनी ऊर्जा कहां से लाती है,

  कभी कोई बहाना नहीं बनाती है।

  कितना भी काम हो घर का   

 हंसी खुशी से निपटा देती है। 

 छोटों को प्यार बड़ों को सम्मान देती है,

 बदले में इसके न कुछ लेती है।

 यदि कुछ अधिक भी करने को कहा जाए,

 तो अभी करती हूं यही कहती है।

  कभी गम खाती और आंसू पीती है,

  कभी भी ना आंखें नम बनाती है।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

भागदौड़ वाली जिंदगी - कविता

 भागदौड़ वाली जिंदगी आखिर किसे सुहाती है,

  लेकिन यही भागदौड़ तो जिंदगी बनाती है।

 इंसान जब भी इस दुनिया में आता है,

 बिना समझ के नासमझ ही रहता है।  

 उसे किसी से कोई मतलब नहीं रहता,

  बस  अपने में ही रमता रहता है।

  कुछ बड़ा होने पर उसे लगता है, 

 दुनिया में आए हैं तो कुछ तो करना ही पड़ेगा।

 कुछ पढ़ना पड़ेगा कुछ करना पड़ेगा, 

 यानी भागना दौड़ना तो करना ही पड़ेगा।

भागदौड़ से ही किसी  की जिंदगी  बनती है,

 भागदौड़ ही सफलता की सीढ़ी बनती है।

मुझे भी दो मेरा अधिकार--कविता


#मुझे भी दो मेरा अधिकार 

स्वरचित--

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


 मुझे नहीं है तुम्हारी हर बात स्वीकार,

 तुम समझ नहीं पाते हो कहा बारम्बार।

 मैं भी कुछ कहना चाहता हूं तुमसे,

  कहने का मुझे भी दो मेरा अधिकार ।


 मैं नहीं चाहता आसमां की ऊंचाई नापना, 

 न चाहता हूं सागर की गहराई जांचना।

  लेकिन समझ लो जो मैं जानता हूं,

  दुनिया के दिलों में क्या है भावना।


तुम कहां हो और जमाना कहां है ,

तुम वहीं हो तुम जहां थे ।

 बीमार मानसिकता से ग्रस्त हो इतना,

  समझते हो जैसे खुद शहंशाह हो।


अब तो मेरा मौसम खुशगवार कर दो, 

 प्यार से प्यार का व्यापार कर दो।

 मेरा दिल जो सूना सूना सा है,

 उसमें अपना भरपूर प्यार भर दो।


 अब मेरे विपरीत विचारों को करो निराधार,

  जो नहीं किया अब तक कर दो इस बार।

 तुम्हें तुम्हारा अधिकार हो मुबारक,

 मुझे भी दो मेरा अधिकार ।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

अंतरात्मा से जो आवाज -- कविता

 अंतरात्मा से जो आवाज उठती है सुनता हूं मैं भी।

 स्वरचित-

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


 अपनी सोच विशाल रखता हूं मैं।

अपने प्रश्नों को संभाल रखता हूं मैं। 

 मेरी सोच से कोई सहमत हो या ना हो।

  अपनी सोच कमाल रखता हूं मैं। 


 किसी की आशाएं तार तार हो जाती हैं।

 यूं समझिए कि बेकार हो जाती हैं। 

 नहीं हो सकती हैं कभी भी पूरी।

 जब आशाएं बेशुमार हो जाती हैं। 


 खोजता हूं मैं कभी ऊंचे पहाड़ों में।

  कभी जमीन पर भी तलाशता हूं मैं भी। 

  कभी समंदर में गोते लगाकर।

  बहुमूल्य मोती चुनता हूं मैं भी।


  व्यर्थ की बातों में  कभी नहीं उलझता।

  सही-सही के लिए सिर को धुनता  हूं मैं भी।

 जीवन के रंगीन धागों से ख्वाबों की चादर बुनता हूं मैं भी। 

 अंतरात्मा से जो आवाज उठती  है सुनता हूं मैं भी।

बुधवार, 26 अक्टूबर 2022

खुशियां संभाल कर रखना- कविता


 स्वरचित-

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


सागर की गहराई जैसा दुखों का अंबार है।

 या कहिए कि हिमालय जैसा दुखों का पहाड़ है।

 बड़ी मुश्किल से मिलती है खुशियां इस जमाने में।

 खोना नहीं , खुशियां संभाल कर रखना। 


 मानव मन की आशाएं आसमां तक पहुंचती हैं ।

 मन ही मन बड़े बड़े ख्वाब बुनती हैं।

 ये ख्वाब कभी तो पूरे हो सकते हैं। 

  इन ख्वाबों को संभाल कर रखना। 


  बड़े महीन और नाजुक होते हैं रिश्ते।

  जरा जरा सी बात पर बिगड़ जाते हैं रिश्ते।

 थोड़ा गम खा लो थोड़े आंसू पी लो।

  लेकिन इन रिश्तों को संभाल कर रखना।


 आपस ही आपस में बातें हजार होंगी।

 कुछ अच्छी और कुछ नागवार होंगी।

  यह जबान ही तो है जो मिठास घोल सकती है।

  इस जबान को संभाल कर रखना।

रविवार, 23 अक्टूबर 2022

आओ सजाएं दीपमाला प्रिये-कविता


 स्वरचित--

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल' ,जयपुर। 


प्रफुल्लित हैं सब हर्षित समाया है सबके हिये, 

आ गया है आज पावन त्यौहार सबके लिये। 

 किसी का न अपना घर रहे सूना,

आओ सजाएं दीपमाला प्रिये ।


अमावस का चांद  कितना ही करना चाहे अंधियारा,

 पर जनमानस कर दे उतना ही उजियारा।

 चांद को अंगूठा दिखाएं हजारों दीये,

   आओ सजाएं दीपमाला प्रिये ।


  प्रेम के धागों से एक दूसरे से जुड़े रहें ,

  एक दूसरे की मुसीबत में साथ खड़े रहें। 

  हमेशा बने रहें हम एक दूजे के लिये, 

     आओ सजाएं दीपमाला प्रिये ।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

खुशियों का दीप जलाएं --कविता


# खुशियों का दीप जलाएं 

 स्वरचित 

सतीश गुप्ता 'पोरवाल',जयपुर।


दुखती रग को सहलायें,

 मलिन चेहरों पर मुस्कान लायें,।

भूखे पेट को भोजन दिलाएं 

 खुशियों का दीप जलाएं।


 सबके मन में  हो समता का भाव,

 स्वच्छ सरल हो सभी का स्वभाव।

  आओ हाथ से हाथ मिलाएं ,

   खुशियों का दीप जलाएं।


  हर घर की देहरी हो खुशहाल, 

  कोई न हो देश में फटे हाल।

   माली हालत सबकी सुधारें, 

   खुशियों का दीप जलाएं।


  स्वस्थ तन और स्वस्थ मन हो,

  सभी के हृदय में खुशियां भरी हों।

   सभी दिवाली भरपूर मनाएं  

   खुशियों का दीप जलाएं।

कुछ टूट रहा हो जैसे--कविता


#कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो 


स्वरचित--

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल',जयपुर। 


मन में आते भावों को कोई रोक रहा, 

 सुषुप्त से दिल को कोई झकझोर रहा। 

 जीवन की खुशियों को जैसे कोई लूट रहा हो,

 कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।


  जीवन में खुशियां ही खुशियां मांगी,

  फिर यह गम कहां से आन पड़ा।

  कौन मेरी खुशियों में अवरोध बना है, 

  अभी तक यह न जान पड़ा।

  लगता है जैसे दिल के धन को कोई लूट रहा हो,

   कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।


 सरोवर में कमल कुंज देख मन खिलता था,

 मन मयूर तो जैसे नाच उठता था।

 अब तो जीवन में ऐसा ही लगता है,

 जीने को अब कुछ भी नहीं बचता है।    

 लगता है हर शख्स जैसे हम को लूट रहा हो , 

 कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।

सबसे बड़ा कारीगर -'कविता

 ऊपर वाले ने यह दुनिया बनाई,

 वह है सबसे बड़ा कारीगर ।

 तरह-तरह के करतब करवाता इंसानों से,

 वह तो है सबसे बड़ा बाजीगर।


कभी-कभी तो अचरज हो जाता,

 न होता विश्वास किंचित भी।

  देखने वाले हतप्रभ हो जाते 

   ऐसा जादू दिखाता जादूगर।


  कभी-कभी जब हम घिर जाते,

 सांसारिक दुखों में पड़ जाते।

  तो वही हमें राह दिखाता,

  सोचो क्या होता सर्व शक्तिमान नहीं होता अगर।

साथ निभाना मीत --कविता

 साथ  है अपना जनम जनम का ,

यह जनम यूं ही न जाए बीत।

संग संग जीना है हमको ,

 साथ निभाना मीत।


 सपने हमने संग संग देखे,

 एक दूजे से वादा करके।

 जग से हटके हमारी प्रीत, 

  साथ निभाना मीत।


 दिल से दिल की बात हुई,

 फिर शुरू मुलाकात हुई ।

 यही जगत की रीत,

 साथ निभाना में मीत। 


 जग चाहे दुश्मन हो जाए,

 पर अपने तो साथ निभाए।

 फिर होती प्यार की जीत,

  साथ निभाना मीत।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

इश्क में वादे तो हजार किए



 स्वरचित --

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल'  


इश्क में वादे तो हजार किए ,

मेरे दिल के गुल गुलजार किए, 

पर मेरी चाहत नजरअंदाज करके,

 वादे  नीलाम सरे बाजार किए।


तुझसे मिलने को तरसता था मैं,

 जार जार इंतजार करता था मैं।

 ए बेवफा तुम्हारा सितम तो देखो, 

 वादाखिलाफी के दौर बार-बार किए। 


आसमा की ओर टकटकी लगाए रहता, 

 अब अक्सर नहीं होश में मैं  रहता।

 पर तूने मेरे दिन पतझड़ जैसे 

  और खुद के तो बहार किए ।


मेरी तो जो हालत होनी थी हो ली, 

 लगता हूं जैसे बिना कहार के हो डोली।

 तूने तो अपने दिन खुशगवार किए,

 मेरे ही दिन क्यों सूने त्यौहार किए।

बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

तारीख खुद को फिर दोहराती है

 तारीख खुद को फिर दोहराती है। 


सीने में तूफान और आंखों में आंसुओं का सैलाब,

तुम्हारे उत्पीड़न की कहानी सुनाती है। 

 जो करेगा ऐसा उसे मिलेगा वैसा ही 

 नियति तो हमें यही बताती है।


 पूनम की रात में चांदनी में नहाते हो, 

  फिर अमावस्या तक मलीन हो जाते हो।

  ना सताओ किसी को किसी भी तरह,

 क्या तुम्हें खुद इस तरह करनी सुहाती है।


 समय का चक्र चलता ही रहता है,

  नियति किसी के रोके कहां रुकती है।

 घड़ी की सुई हो या कर्मों की सजा,

  तारीख खुद को फिर दोहराती है।

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

पिंजरे का पंछी- कविता



 जब भी देखता हूं सामने खुला आसमान,

 मेरे भी दिल में उठता है एक तूफान।

 मिलेगी मुझे भी एक दिन तो मंजिल,  

 या धरे रहेंगे मेरे यूं ही अरमान।


  मेरे पंखों में भी है भरपूर जान,

 भर सकता हूं मैं भी ऊंची उड़ान।

 पर क्या करूं मुझे पिंजरे में कैद कर लिया,

  इंसानों ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया।


  ए दुनिया के लोगों कुछ तो सोचो, 

   यूं ही मेरे पंखों को न नोचो ।

 अब  तुमने सुनकर मेरी फरियाद  

  मुझे कर ही दिया है आजाद।


  अब मैं खुले आसमान में भरुंगा उड़ान, 

 मेरा भी जीवन होगा उन्मुक्त और आसान।

दीपक जलाओ--कविता

 दीपक जलाओ , दीपक जलाओ,

 एक नहीं अनेक जलाओ।

 पूर्ण नहीं तो कुछ तो,

 आसपास उजियारा फैलाओ।

 बेशक दीपक तले अंधेरा होता है,

 लेकिन यह औरों के लिए ही तो जलता है।

 जलता  तो है खुद ही 

 रोशनी औरों को देता है ।

 मानव मात्र को भी,

 ऐसा ही समझना होगा।

 जैसे दिए से दिल में,

  प्रेम की है बाती है, 

 वैसे ही लोगों को प्रेम की बात 

  क्यों नहीं सुहाती है। 

  कर लें हम भी यही निश्चय,

  स्वयं को आलोकित करके, 

 अन्य को आलोकित करेंगे।

  सारी दुनियां को प्रेम से भरेंगे।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

जिंदगी और आईना -- कविता


 #स्वरचित --

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल' ,जयपुर। 


सोच समझ कर कोई नहीं आता इस दुनिया में,

 लाया जाता है या कहें कि बुलाया जाता है।

 क्या है और क्यों है इस दुनिया में, 

 सोचे तो भी समझ नहीं पाता है।


 जो कुछ उसे सिखाया जाता है ,

  वह वही सीखता जाता है।

 सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ता जाता है, 

    उम्र की राह में कदम आगे बढ़ाता है।


  कुछ अजीब सी कहानी कहती है, 

 यह दुनिया वैसे भी नहीं जैसी लगती है। 

  नाजुक से मसले सामने आ जाते हैं, 

 दिल और दिमाग को उलझा जाते हैं। 


 रिश्ते नाते एक धुरी पर टिके हुए हैं, 

कुछ कम कुछ ज्यादा तुले हुए हैं। 

 कहीं-कहीं उलझन में उलझ जाता है, 

उलझ कर मन को उलझा जाता है। 


अब तो बस एक ही विचार मन में आता है, 

 आकर बार-बार वही दोहराता है।

 अपना पराया होकर कहीं रुठ न जाए, 

 जिंदगी आईने की तरह टूट न जाए।

वेदना-कविता

 स्थितियां ऐसी हो जाती है कभी-कभी,

  दिल को नहीं भाती कोई भी खुशी।

  वेदना से त्रस्त हो जाता है दिल,

  हर आंख नजर आती है झुकी झुकी।

  कभी-कभी अपना ही कष्ट होता है, 

   जो अपनी आंखों में आंसू ला देता है। 

 हां कभी दूसरों का  भी कष्ट देखा नहीं जाता,

 और वेदना से दिल भर जाता है।

  कभी ख़ुशी कभी ग़म का चक्र चलता रहता है,

 इसी उहापोह में वक्त गुजरता जाता है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

अकेले ही सफर करना है- कविता

 

स्वरचित -सतीश गुप्ता 'पोरवाल' जयपुर। 


 दुनिया में चाहे कोई साथ दे ना दे, 

 किसी भी स्थिति में नहीं घबराना है। 

 अकेले थे अकेले हैं और ,

 अकेले ही सफर करना है ।

  कोई सोचता है कोई नहीं सोचता, 

  सोच सोच में फर्क होता है।

   पूछ लो गर किसी से कैसा है,

  किसी को अच्छा और किसी को बुरा लगता है।

  जमाने की बातें है जैसे भूल भुलय्यां,

  अच्छा भला इंसान भी घूम जाता है। 

   दिमाग हो जाता है घनचक्कर , 

    करना क्या है समझ नहीं पाता है। 

 सोच समझकर यदि फैसला किया है,

 चल चला चल यही मंत्र काम आएगा।

 सही समय पर सही दिशा में चलने वाला, 

 निश्चित ही दुनिया में नाम कमाएगा। 

 सोच समझकर जो फैसले पर चल दिया है,

  तो तुमने सही में सही जीवन जिया है। 

 अब तो बस आनंदित हो मौज करना है,

 अकेले थे अकेले हैं और अकेले ही सफर करना है।

करवा चौथ --हास्य कविता



  स्वरचित--

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


सच बताएं आज तो मेरे भाग्य ही खुल गए, 

 नित्य कर्म तो जैसे आज हिल डुल गए।

 श्रीमती ने कहा उठोजी भोर हो गई,

  नहीं उठे तो हमें झकझोर गई।

 हम हड़बड़ाकर उठे जाने लगे बनाने को चाय,

 वह बोली आज तो मैं बनाऊँगी नहीं तो लगेगी हाय।

 हमारी उनिंदी आंख तब झपकने लगी,

जब वह पैर छूने के लिए झुकने लगी।

 हमने कहा श्रीमती जी आज सूरज कहीं और से उगा है,

 जो तुम्हारा सर मेरे कदमों में झुका है।

 वह सीरियल की बहू की तरह से मुस्कुराई,

 आज करवा चौथ है यह बात धीरे से बोलकर बताई।

 हाथ झुके तो उसका कंगना खनका,

 उसका बताना था कि हमारा माथा ठनका।

 मतलब आज मैं राजा एक दिन का,

 और फिर गुलाम रहूंगा हर दिन का।

  लेकिन खुशी भी कम नहीं थी मन में 

  साल में एक दिन तो आता है जीवन में।

 आज तो फरमाइशें करेगी सजेगी धजेगी 

 और हमारी जेब की तो पुंगी बजेगी।

 वह बोली पत्नी क्योंकि करवा चौथ का व्रत रखती है,

 इसीलिए तो पति की उम्र साल दर साल बढ़ती है।

 यह व्रत मैं तुम्हारे लिए ही तो करती हूं,  

 तुम्हे तो लगता होगा अहसान ही करती हूं। 

 मुझे मालूम है पुरुष सभी पत्नी का सम्मान करते हैं,

 लेकिन फिर भी मजाक मजाक में तो वही कहते हैं।

 करवा चौथ रखकर एहसान  करती हैं,

  उम्र भर फिर हमको परेशान करती हैं।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

चतुराई- कविता

 कपट भरा है मन में लाख करे चतुराई,

  दुनिया सब जानत है सुन ले मेरे भाई।

सुन ले मेरे भाई भली नहीं ये चालें ,

यह बात अभी तक तुझे समझ न आई।


चाल चले तू टेढ़ी-टेढ़ी हम चले हैं सीधी,

 हम दोनों के बीच रेखा तुमने ही खींची।

 अब तो तू बदल ले अपनी आदत, 

 वरना हमारी मुट्ठी हो जाएगी भीची भीची।


सच्चे मन से काम करें जो सच्चा-सच्चा,

 खुश हो जाए उससे घर का बच्चा-बच्चा।

  इसे ही कहते हैं सच में चतुराई,

  अब तो यह बात तुझे समझ में आई।

मुर्दों के शहर में रहता हूं-कविता


स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'


जो कहते हैं वह करते नहीं,

 जो करते हैं वह कहते नहीं।

 सुनते भी नहीं जो मैं कहता हूं,

  मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं।

  दुनिया की धारा नदिया जैसी बहती है,

 कल कल की धुन के साथ कुछ कहती है।

 कुछ भले लोग हैं जो धारा के साथ बहते हैं ,

 पर यहां ऐसी प्रजाति है जो किसी की नहीं सुनते हैं। 


 ना संवेदना है ना दिल में दया है,

 जाने इनके मन में क्या भरा है।

  पाला जिसका भी पड़ जाता है इनसे 

   वही आदमी डरा डरा है ।


 दूसरों का बुरा इनको अच्छा लगता है,

  इनका अच्छा ही इनको अच्छा लगता है।

  अपने आप को भरपूर वयस्क समझते हैं,

 और सामने वाले को तो बच्चा ही समझते हैं। 


 अब तो नहीं मुझे किंचित भी संकोच, 

 नहीं मिलती इनकी किसी भले से सोच। 

 अब तो मैं स्पष्ट शब्दों में यही कहता हूं ,

  मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं।

आहट - कविता

 जरा सी आहट होती है,

 तो दिल सोचता है कि,

 करूं तो क्या करूं।

 जो भी सामने आता है,

 उसका सामना करूं या

 फिर उससे डरूं। 

 कभी-कभी तो अच्छा लगता है 

  आहट का ही इंतजार रहता है,

 कहीं वही तो नहीं आ गया 

 जिसका इंतजार है।

 कभी शुभ की आशा में, 

 दिल की कली खिलने लगती है,

 लेकिन कभी अंदेशा भी होता है,

 कहीं कुछ ऐसा तो नजर नहीं आएगा,

  कि दिल धक से रह जाएगा।

 कुछ भी हो आहट होती है,

और होती रहेगी।

देस में निकला होगा चांद-- कविता



हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद

मैं भी व्याकुल वह भी व्याकुल सुन ले सब के चांद।


 चांद की चांदनी सबको भाई   

 मुझको तो किंचित भी न भाई ।

 हर पल तेरी याद सताये ,

  चमक चांदनी मुझको न भाये।

  जब है दूर अपने से ही अपना,

  बन गया यह दुखदाई सपना ।

 मेरी यह सदा तो सुन ले सब के चांद,

 हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद ।


  तुम तो गए परदेस में हम यहां रह गये ,

 हम तो  तुम्हारी राह तकते रह गये। 

 तुम्हारे बिना विरह गीत गाते रहेंगे,

 कैसे अपना व्रत पूरा कर पाएंगे।

 दिल छलनी सा हो रहा सुन ले सब के चांद,

 वह तो है परदेस में देस में निकला है चांद।


  सुन सजनी चांदनी हमें लगे घनघोर अंधेरा,

  तुम्हारे बिना रात रहेगी न होगा सवेरा।

  सजना तुम भी सुन लो मन कैसे लगाऊं,

  दिल में जो दर्द है कैसे तुम्हें बताऊं।

  कितना भी मनभावन हो मुझ को नहीं सुहाता यह चांद,

  तुम तो हो परदेस में देस में निकला है चांद।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

आंसुओं की बरसात न हुई-कविता

 #मानसरोवरकाव्यमंच 

#दैनिककार्य 


स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल,जयपुर। 


कमी एक रह गई फिर कभी मुलाकात न हुई,

 कहनी थी जो आखिरी वह बात न हुई। 

 हम तो बनाना चाहते थे उसीको सब कुछ,

 लेकिन वह हमारी कायनात न हुई। 


 बागों में फूल खिले आसमाँ में बिजली चमकी,

  हमने उस के आगमन का अंदेशा हुआ।

 जो कुछ भी बिखरा बिखरा था हमारे बीच,

 उसके जुड़ने की शुरुआत न हुई।


 अब तो सांसे  भी उखड़ने लगी हैं 

 आशायें सब उजड़ने लगी हैं 

 सूनी सी इन आखों में 

आंसुओं की बरसात न हुई।

याद जाती क्यों नहीं है-कविता

 याद जाती क्यों नहीं है  

फरियाद आती क्यों नहीं है।

राह निहारते मेरे इन चक्षुओं से,

अश्रुओं की बरसात होती क्यों नहीं है।


  दिन ढला और रात की ओर बढ़ा,

  समय का चक्र फिर दिन की ओर चला।

  मैंने तो अपने को ढाला है तुम्हारे ही सांचे में,

  फिर अब मुलाकात होती क्यों नहीं है। 


अब हम कितनी फ़रियाद करें तुमसे ,

आंसुओं का सैलाब सहा नहीं जाता हमसे।

तुम तो हमें याद करो या ना करो,

 पर मेरे दिल से तुम्हारी याद जाती क्यों नहीं है।  

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

ठूंठ (संशोधित)

 ठूंठ ,क्यों कर रहा तू मौन तपस्या

  हो ध्यान में लीन ,

लगता है कर रहा इस जग में 

शांति की खोजबीन।

  शांति जिसे चाह रहा 

हर प्राणी हर इंसान ,

मगर पा न सका कोई,

 इसका कभी निदान।

 पुकार रहा यह जग है

 हर पल हर क्षण,

 हर समय समय से जूझ रहा 

सदियों से कर रहा काल से घर्षण।

 राष्ट्र राष्ट्र से टकरा रहा 

मानव मानव से जूझ रहा 

क्यों? केवल एक ही है प्रश्न,

 राष्ट्र औ मानव देख रहे 

शांति का चिर स्वप्न ।

देख रहा तीक्ष्ण दृष्टि से 

बिजली की चमचम में,

गंगा की पवित्र धार में 

यमुना की कलकल में।

मैं बताऊं शांति तो है 

क्षितिज के उस पार,

इसलिये मानव कर न सकेगा 

स्वप्न अपना साकार।

 तो सुन है मौन व्रत सन्यासी 

न रह निर्वस्त्र ,

कर दे बंद शांति की खोज

 क्योंकि रहेगी यहां तो अशांति ही सर्वत्र।

 किंतु फिर भी है तू अडिग

 करने को अपनी पुरातन खोज,

 तो फिर रह अडिग ही

शायद क्षितिज के उस पार

 शांति तू पाकर 

दिखा सके दुनिया को

 अपना ओज ।

द्रढ़वत हो होजा ध्यान में लीन

 ताकि न रहे तपस्या तेरी निराधार ,

निर्विकार हो इस जग में

 कर दे मानव का स्वप्न साकार ।

 किंतु कहते हैं कि एक क्षितिज

  हर कोई बनाए बैठा है। 

 उस घेरे को ही संसार समझ बैठा है। चाहता है गर शांति तो,घर से बाहर निकलना होगा, 

   उदारवादी बन,सर्वव्यापी क्षितिज की ओर देखना होगा।

खाली दिमाग--कविता



स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल',मानसरोवर,जयपुर।


इधर उधर की बात न कर सुन ले मेरी बात,

 दिमाग तेरा तो उड़ गया ऊपरी माला खाली है।


 अब दिमाग लड़ा मत बात मेरी तो सुन ले,

  जो भी बात करेगा तू समझ ले वह जाली है।


   जिसको तू समझ रहा भरा भरा,

   वहां घास फूस की हरियाली है।


  सोच समझ कर बात पते की करता हूं 

  जो तू कहता है वह बस खयाली है।


 आज न कोई फायदा समझदारी दिखाने का,

   जो भी सही बात है वह कल वाली है। 


  जीवन के रंग बिरंगे फूल मैं ही सहेजूगा,  

  तुझसे ना होगा तू उजड़े बाग का माली है।

पति मिल गया गंजा--हास्य कविता



सुन सुन दीदी तेरे लिए रिश्ता आया है,

 छोटी बहिन कहते हुए चहक रही थी।

  दीदी यह सुन खुश हो रही थी और

   सच तो यह है कि थोड़ी सी महक रही थी। 

अच्छा छुटकी  बता कौन है कैसा है,

  और उसके बैंक में कितना पैसा है। 

 छुटकी बोली पैसे का तो पता नहीं 

 लेकिन देखने में चांद के जैसा है।

  दीदी ने मुंह बनाया और बोली 

  लड़की तो चांद जैसी होती है

  लेकिन क्या लड़के की शक्ल भी ऐसी होती है।

 छुटकी बोली दीदी वह कवि है और गंजा है,

दीदी बोली कवि है तो धंधा भी मंदा है।

  कविता लिखने में रोज रात से भोर करेगा,

  खुद गुनगुनायेगा और मुझे सुनाकर बोर करेगा।

 जब मुझे गुस्सा आयेगा तो कैसे बाल खींचूगी, 

 सोचा था मिले हैंडसम बंदा पति मिल गया गंजा।

  छुटकी बोली दीदी गंजा है तो क्या हुआ,

 वह तो है खुले आसमान का चंदा।

 यदि उसे तेरा भरपूर साथ मिल जायेगा ,

वह कवियों की दुनिया का सुरेन्द्र शर्मा बन जायेगा।

सत्य-असत्य---कविता

 कसम गीता की खाकर झूठी गवाही दे रहे

सत्य असत्य के सामने शर्मिंदा हो रहे।


  कर लें कितनी हीअपने कथन में असत्य की भरत,

 हल्का होगा असत्य ही जब खुलेगी हर एक परत।


 असत्य कितना ही पर्वत पर चढ़कर इतराये, 

सत्य तो सागर की गहराई से मोती चुनकर लाये।


 सत्य वचन बोलकर हरिश्चंद्र बन जाये,

 असत्य वचन बोलकर झूठा ही  कहलाये।


  मान सदा ही बढ़े जो सच बोलता जाये,

 झूठा तो सदा ही अपमानित होता जाये।