मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

चाँद तारों की महफ़िल-- कविता

 तेरे  लिये चाँद तारों की महफिल सजा दूँ,

 तू मेरे लिए क्या है यह तुझे बता दूँ ।

मुझे तो बस एक धूमकेतु की जिंदगी मिल जाये,

 दुनियां की सारी खुशियाँ तेरी झोली में भर जाये।


दुष्ट बादल तारों  को ढक  लेता है,

 तो सच में चाँद का  नूर हर लेता है।

 गम का बादल तेरी ओर न आये,

 किसी भी रूप में आकर न सताये।


 दुआ है मेरी ऊपर वाले से,

  दूर रखे तुझे दुनियां की हर बला से।

राह के कांटों को नदिया में बहा दूं,

तेरे लिये चाँद तारों की 

महफ़िल सजा दूं।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

मोहे रंग दे पिया - कविता

  मेरी रग रग में तुम ही समाओ,

जब भी गाओ प्रेम गीत ही गाओ।

मोहे रंग दे पिया ऐसे रंग में, 

सिहरन सी दौड़ पड़े अंग अंग में ।

पनघट पर राह निहारती सखियां,

 बात बना बनाकर करती बतियां।

     घूर घूर कर मोहे देख रही,

     खूब नचाती अपनी अखियां।

     रात रात भर राह निहारुं,

नयनों में सपने सजाऊं।

दिल में जो बीत रही है,

तुम ही बताओ कैसे सुनाऊं।

इतना सम्मान और कहां--कविता

 #मानसरोवर साहित्य अकादमी 

#दैनिक प्रतियोगिता 

#मानसरोवर साहित्य अकादमी के प्रति - - 

#दिनांक : 25/2/23


यूं तो कहने को अपना है सारा जहां,

 पर ऐसा प्यार और सम्मान और कहां। 


हमारी है यह मानसरोवर काव्य अकादमी, 

 यहीं मिलती है हमें लिखने की ज़मीं।


 होती हैं यहां पर नई नई प्रतियोगिताएं, 

  पूरी होती है नित्य लिखने की तमन्नाएं।


 यहीं पर होती हैं काव्य गोष्ठियां और सम्मेलन,

 दूर से ही चाहे पर हो पाता है आपसी मिलन।


 खूब फले फूले हमारी खुशियों का संसार, 

 जब मिले यहां से सम्मान अथाह अपार ।


स्वरचित 'सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

जलधारा सा बहे जा रहे हैं-- कविता


छुपा कर रखी थीं जो बातें जमाने से,

वो सब अब कहे जा रहे हैं।

विपरीत दिशा में तो खूब चल लिये,

अब जलधारा सा बहे जा रहे हैं ।


दर्दे दिल सीने में छुपाये जा रहे थे ,

उनके ही ढर्रे में ढले जा रहे थे ।

उनकी ही परवाह करते रहे ज़िंदगी भर,

 जो हमारे प्रति बेपरवाह हुए जा रहे थे।


सब कुछ तो दे चुके थे हम उन्हें ,

अब क्या अपनी जिंदगी भी उन पर लुटा देते ।

जो भी राज़ था उनके मन में ,

काश एक बार तो हमको बता देते ।


अब रहे न नासमझ,समझ गए हम ,

कि हम गलत राह पर जा रहे हैं।

अब नहीं चल रहे हम विपरित दिशा में,

अब जलधारा सा बहे जा रहे हैं ।


स्वरचित-सतीश गुप्ता'पोरवाल"

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023

डगमगाये नहीं कदम -- कविता

 निडर और अडिग हो जूझ रहा,

सीना तान कर जो अड़ा रहा ।

कोशिश की जिसने भी डिगाने की, 

वो धरती पर आकर पड़ा रहा ।


हर सांस में यथार्थ भरा हुआ ,         

मैं सत्य अहिंसा का वादी हूं ।

सीना ही नहीं दिल भी है फौलादी,

मैं तूफानों में चलने का आदी हूं ।


दीन दुखियों का दुख न समझे, 

उन लोगों की मैं बरबादी हूं l

अवरोधों की मुझे चिंता ही नहीं, 

मैं मात्र हवा नहीं आंधी हूं।


कोरी कल्पनाओं पर विश्वास नहीं 

प्रकृति से मैं यथार्थवादी हूं 

डगमगाये नहीं कदम कभी,

मैं हौसलों से बढ़ने का आदी हूं।


स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल'

बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

तूफानों में- - - कविता

 हर सांस में यथार्थ भरा हुआ ,         

मैं सत्य अहिंसा का वादी हूं ।

सीना ही नहीं दिल भी है फौलादी,

  मैं तूफानों में चलने का आदी हूं ।


 दीन दुखियों का दुख न समझे, 

 उन लोगों की मैं बरबादी हूं l

 अवरोधों की मुझे चिंता ही नहीं, 

 मैं तूफानों में चलने का आदी हूं।


 कोरी कल्पनाओं पर विश्वास नहीं 

 प्रकृति से मैं यथार्थवादी हूं 

 डगमगा न सके कोई मुझे,

 मैं तूफानों में चलने का आदी हूं।


स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल'

सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

बाल मन और ईश्वर- लघुकथा

 शंकर लाल पुरोहित का एक छोटा सा परिवार था,पति पत्नी और एक 4 साल का बच्चा। ये सब हंसी-खुशी जीवन बिता रहे थे। शंकर लाल जी का नित्य का नियम मंदिर जाने का था। एक दिन उन्होंने अपने बच्चे को कहा - ले भाई आज तू  भी चल । बच्चा भी उस दिन साथ में मंदिर चला गया।वहां जाकर उसको अजीब सा सुकून महसूस हुआ। जब वह शिव जी की मूर्ति के सामने जाकर खड़ा हुआ तो उसे लगा जैसे कोई आकर्षण है जो उसे अपनी ओर खींच रहा है । उसके मन में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता उत्पन्न हुई और वह एकटक शिव जी की मूर्ति को   नि हारता रहा। पास ही एक बड़ा सा शिवलिंग स्थापित था   , वहां जाकर उसने शिवलिंग को सिर झुका कर भक्ति भाव का प्रदर्शन किया ।उसने अपने पिता को बताया कि मुझे यहां मुझे अजीब सी अनुभूति हुई है। मुझे लगता है कि इस दुनिया को चलाने वाली शक्ति यही है, मुझे नित्य इन्हें प्रणाम करना है। बेटे की बात से शंकर लाल जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने मकान के बाहर ही खुली जगह पर शिवलिंग की स्थापना कर दी। अब वह छोटा बच्चा पुरोहित की भांति वेश धारण करता  और जाकर शिवलिंग पर पूजा अर्चना करता। उसका यह भक्ति भाव देख माता-पिता बड़े प्रसन्न हुए और धीरे-धीरे परिवार के खुशियों में दिनों दिन बढ़ोत्तरी होती चली गई। इस बच्चे के हृदय में ईश्वर का वास हो चुका था।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

विवेकशीलता -- कविता


विवेक का इस्तेमाल करना प्रवत्ति में नहीं,

विवेक शीलता कहीं खो रही है।

मानव में मानवता की नितान्त कमी है,

मानवता तो कहीं सो रही है।


आ तो गये हैं इस दुनियां में,

मालूम नहीं आकर करना क्या है।

पोथियों के तो ढेर कर लिये

मालूम नहीं पढना और लिखना क्या है।


विवेक और धैर्य की नितान्त है कमी,

अल्प बुद्धी से समझता अपने को महान है।

दिखावा कितना भी करले जीवन में, 

पर वास्तविकता में वह कितना नादान है।


सफलता की चाह आखिर किसे नहीं होती,

सफलता का सूत्र कोई आसमान से नहीं टपकता।

विवेक अपनाकर विवेकशील गर हो गये,

वही व्यक्ति दुनिया में समझदार बनता।



गुरुवार, 9 फ़रवरी 2023

रूह से रूह में-- कविता


 हर राह तुम्हारी इधर ही  मुड़ती रही,

 प्रेम की कड़ी से कड़ी जुड़ती रही।

 राहें थी अनेक तुम इधर न उधर गए, 

 सच तो यह है कि तुम रूह से रूह में उतर गए।


खयाल तुम्हारा रात भर आता रहा,

 नींद न आई सपने ही दिखाता रहा।

 तुम इतने बेमुरव्वत कैसे हो गए,

 बादलों में छिपते हुए चांद जैसे हो गए।


साथ थे तो रुत सुहानी आई थी,

 मेरे सूने से दिल में बहार आई थी।

 दिल तो जैसे सावन के झूले में झूल रहा था,

 मन जैसे सारे दुख-दर्द भूल रहा था।


मैं कब से तुम्हारी राह निहार रही हूं, 

 बन रही हूं पतझड़ पहले बहार रही हूं। 

 न मालूम तुम किस गली गांव शहर गए ,

 मानो न मानो  तुम रूह से रूह में उतर गए।


स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल

आरंभ लिखूं या अंत- कविता

मानव जीवन शून्य से ही शुरु होता है,

 शून्य से पहले अधर में ही होता है। 

 कोई बताये इस स्तिथि के लिए क्या कहूं, 

 अब इसे आरंभ लिखूं या अंत लिखूं। 


  पत्तों से आच्छादित हरे हरे वृक्ष,

 तज देते हैं एक समय पर अपने वस्त्र।

  नव कोमल वस्त्रों का होता है इंतजार, 

 अब इसे पतझड़ कहूं या बसंत कहूं।


प्रकृति मानव की भिन्न भिन्न होती है,

सोच कभी कभी छिन्न भिन्न होती है।  

 अपनों को पराया,परायों को अपना करता है ,

अब मानव को दानव कहूं या संत कहूं।

 

जन्म के साथ ही मृत्यु निश्चित है,

जीवन मे जो करता है किंचित है। 

 जीवन के अंत में जहां चला जाता है,

 उसे शून्य कहूं या अनंत कहूं।


स्वरचित 

सतीश गुप्ता पोरवाल

बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

तारे तोड़ लाऊँ-- कविता

 अक्सर इस जहां में यही होता है,

दो प्राणियों के बीच वार्तालाप होता है।

 एक कहती है तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो 

 दूसरा कहता है कहो जो तुम कह सकती हो।

मुझमें जोश और जुनून भरपूर था,

 प्यार के नशे में चूर चूर था।

  मैंने फिर कहा अजी कुछ तो फरमा दो,

  उसने कहा तुम से नहीं होगा जाने दो।

  मैंने कहा तुम कहो तो आसमान से तारे तोड़ लाऊं,

 उसने कहा यदि ऐसा करो तो तुम्हें मान जाऊं।

  लेकिन ठहरो ऐसा ना हो कि तुम आसमान में खो जाओ,

 और जगह पसंद आ गई तो कहीं  वहीं के हो जाओ।

इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ ही चलूंगी, 

 और अच्छे-अच्छे तारे देख कर चुनूंगी। 

मुझे लगा जैसे बनता हुआ मकान धंस गया हो,

 जैसे शिकारी खुद अपने जाल में फस गया हो।

 मेरे शैतानी दिमाग में एक युक्ति आई,

उसी युक्ति के सहारे मुश्किल से मुक्ति पाई।

 मैंने उसे बड़े प्यार से गोद में उठाया,

 उठा कर बाहर खुले में लेकर आया।

 मैंने कहा देखो चांद में तो कितने हैं दाग,

 लेकिन तुम्हारा चेहरा तो है कितना बेदाग।

 चांद तुम्हारी सुंदरता का क्या 

 मुकाबला करेगा,

 मुकाबले में तो निश्चित ही वह हारेगा। 

 यह सुनकर वह इतनी खुश हो गई,

  कि तारे तोड़ने वाले बात ही भूल गई।

 अब तो जान बची और हजारों पाए,

   समझदार होकर हम घर को आए।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

उदास न हो - कविता

 राह में कांटे बिछे हजार हों,

कोई भी हमदर्द आसपास न हों,

 बात पते की एक मान लो, 

 कभी उदास न हो।


 मानव जीवन जीने को मिला,

  कभी न हो जीवन से गिला,

  कर्त्तव्य पथ पर जो चलते चले,

कभी तो इसका मिलेगा सिला। 


 एक एक दिन का हिसाब न हो,

  हर दिन चाहे खास न हो,

  उम्मीदों का दामन थाम लो,

  कभी उदास न हो।

मुक्तक

तू महफ़ूज़ है जब तक मैं हूँ,

अपनी मुश्किलों का न कर जिक्र।

मैं जिल्द बन कर तुझे सुरक्षित रखूँगा,

अब न कर तू किसी बात की फिक्र। (1) 

शफक़त समाये दिल में जैसे सागर में जल,

 दुआ मिलेगी हजारों आज नहीं तो कल।

 जरूरत मंद लोगों की ओर बढ़ाये जो हाथ,

  तो सही माने में तभी जिंदगी है सफ़ल। (2)

चमन न उजड़े कुछ बहारें मांग लूं ,

कश्ती को विराम दे वो किनारे मांग लूं ,

जिंदगी तो हिचकोले खा रही, 

बेसहारा हूं  कुछ सहारे मांग लूं .(3)

आसमाँ से कुछ सितारे मांग लूं, 

दिल को सुकून दे वो नजारे मांग लूं, 

लहरों का उफान मुझे मंजूर नहीं, 

रोक दे इन्हें वो किनारे मांग लूं. (4)

दर्द-ए-ग़म को यूं हवा न दीजिए जनाब ।

मेरे घर को अपना घर बना ले वह मेहमान न आए ।(5)

तेरी याद में कब तक तड़पता रहूंगा मैं ।

अब तो जिसकी सुबह न हो वह शाम न आए ।(6)

गम क्यों करें जब दुनियां में खुशियाँ हैं हजार,

 यह जीवन नहीं मिलता हर हमें बार-बार।

 जी लो जिंदगी को खुशियों के संग-संग,

 फिर तो आ जायेगी जीवन में बहार।(7)

होली का माहौल है और चढा ली भंग,

 मस्ती सब पर चढ गई मचा रहे हुड़दंग।

 भोले भाले हम जैसे जोड़ रहे हैं हाथ,

  अरे दूर भी हटो मत करो हमें तंग।(8)

तू न मानेगी ,मैं ना मानूंगा ,

 तू आगे आगे मैं पीछे भागूंगा।

 केवल लाल गुलाबी पीला नहीं ,

  मैं तुझ पर मिक्स रंग डालूंगा ।(9)

न समझो कि बेरूखियां हमारी तरफ से हैं,

दरअसल कुछ मजबूरियां दोनों तरफ से हैं।(10)

  यूं ही नहीं खुश नजर आते हम दोनों,

  देखिए कुछ खूबियां दोनों तरफ से हैं।(11) 

और न पिलाओ हमें यूं ही मदहोश हैं, 

मदहोशी में हो न जाये कोई ख़राबी। 

इश्क की खुमारी चढ़ गई थी हमें, 

 खुमारी उतर गई इश्क है बाकी (12)

 चेहरे पर मुस्कान आंखों में शरारत,

 कहानी  कहती है जवानी आपकी।(13)

गहन चिंतन मनन से ही, 

सही निष्कर्ष पर पहुंच सकता हूं।

 जा सागर के पूर्ण गर्त में,

 मोती चुन-चुन ला सकता हूं।(14) 

गमगीन रहकर गम क्यों करें,

 आखिर हम आंखें नम क्यों करें।

 हमें तो खुशियों के सैलाब में बहने दो,

 गम करके खुशियां कम क्यों करें। (15)

जिद्द और मैं एक दूसरे के हैं पर्यायवाची,

 दोनों में है यारी-दोस्ती अच्छी खासी।

 लेकिन कभी-कभी जब ठन जाती है,

 तो एक होता है वादी और दूसरा परिवादी।(16)

कांटों सा जीवन जिसका फूलों की सेज नसीब नहीं,

 मंज़िल बस दिखती है उसको लेकिन करीब नहीं। 

दुनियां की प्रतिस्पर्धा में विजय पताका वो फहराता,

धार लिया जिसने मन में या जिसका कोई रकीब नहीं।(17) 





मुश्किलों से लड़ना होगा- कविता

 प्रगति पथ पर जो बढ़ना हो आगे,

तो मुश्किलों से लड़ना होगा।

 बाधाएं तो राहों में आएंगी अनेक,

 हौसले से बाधाओं को पार करना होगा।

 मुश्किलों में जो डालना चाहें हमें,

  उन्हें सबक सिखाना होगा।

मंज़िल तक पहुंच गए ग़र,

 तो ध्येय पूर्ण हमारा होगा।

 सपना देखना भला किसे बुरा लगे,

 बुरे सपने से नहीं डरना है,

मन में उत्साह भरा ग़र,

सपना पूरा अपना होगा।

रुह में बसने लगे हो- कविता



सुनो ओ जाने जां,रूह में तुम बसने लगे हो,

  नींद न आए रात भर,भोर के सपने लगे हो।

 

 दुनिया नहीं किसी की, बस पराई है,

  एक तुम ही हो जो अपने लगे हो। 


 नहीं कहा किसी ने प्यार करना गुनाह है,

  फिर क्यों जमाने से डरने लगे हो।

 

 खुलकर आओ दिल में समाओ,

 क्यों बर्फ की मानिंद जमने लगे हो।


 कुछ हो गई हो हमसे खता तो  शिकायत करो ना 

 क्यों सर्प बन डसने लगे हो।


  प्यार में कंजूसी तो कतई बर्दाश्त नहीं,

 ऐसा लगे कि मेघ की भांति बरसने लगे हो।


  प्रेम संदेसा पाकर पक्षी बन उड़ने लगी थी 

 क्यों तुम मेरे पंख कतरने लगे हो। 


 पहले तो आंखें झुका शर्माने लगते थे,

  अब क्यों गुस्ताखियां करने लगे हो।


स्वरचित एवं मौलिक

सतीश गुप्ता पोरवाल

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

यकीन--कविता

 वार न करना भूल कर भी 

 यकीन की दीवारों पे।

 शक होना स्वाभाविक है,

  छिपे हुए हथियारों पे । 

 आखिर यकीन करें तो किस पर,

 यहां घात करने को तैयार बैठे हैं

  अपने स्वार्थ लोलुपता के चलते,

 अपनों पर ही वार करने को तैयार बैठे हैं।

  यकीन की दीवारें तड़क न जाएं कभी,

 इनको हम मजबूती प्रदान करें।

 यकीन शब्द पर यकीन करें सब,

 अब तो ऐसा कोई समाधान करें।

तुम बिन-- कविता

 कहने को तो कह दें कि हम पूरे हैं,

 लेकिन सच है कि तुम बिन हम अधूरे से हैं।

 आस जगाई थी तुमने इस सूने मन में,

 बहार आने की ललक थी  निर्जन वन

  में।

  हमने तो तुम्हें चाहा जी भर के, 

  तुम को क्या मिला वादे से मुकर के।

 कोशिश तो बहुत की हमने अपने दम पर जीने की,

  पर कोशिश बेकार रही बिखरे टुकड़े

   सीने की। 

 तुम्हें किसी हाल में मैं खो नहीं सकता,

  खो कर चैन से कभी सो नहीं सकता।

  अब तो आजा कि तुम बिन रहा न जाए,

 दिल का दुख तो अब सहा न जाए।

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

पुनर्जन्म-- कविता

 कहने को तो जनम जनम का साथ है,  

 यह भी कि सात जन्मों का साथ है।

 क्या इनमें कोई सच्चाई भी है,

 या फिर बस कहने की ही बात है।

  कुछ चाहें अगले जनम में यही साथी मिले,

 कुछ तो चाहें किसी भी हाल में ना मिले।

 तो क्या चाहने से ही सब कुछ हो जाता है,

 अगले जनम में जो चाहें मिल जाता है।

 हमारे शास्त्रों में पुनर्जन्म का विधान है,

 कभी-कभी इसका मिलता प्रमाण है।  

 मैं तो चाहूं हम दोनों के ऐसे सत्कर्म हों,

हम दोनों फिर साथ हों जब पुनर्जन्म हो।

वो शब्द-- कविता

 कुछ वो शब्द ,

जो जुबान पर आये।

कुछ वो शब्द,

जो जुबान पर नहीं छाये।

 शब्दों का माया जाल,

 बड़ा जटिल है,

 कोई बनता सज्जन,

तो कोई कुटिल है। 

शब्दों से चाहो तो,

 पतझड़ मे बहार ला दो,

शब्दों से ही चाहो तो,

 तकरार करा दो।

कुछ वो शब्द,

 जो कहना चाहा,

पर कभी कह नहीं पाया।

कहने से पहले ही अनजाना सा,

 डर मेरे मन में समाया।

शब्दों को माला मे पिरो कर,

 कविता बना दो।

या फिर कहानी की,

 सरिता बहा दो।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

चाँद भी फीका पड जाए- कविता

न बिंदु न अल्प न पूर्ण विराम,

न थी सरल,वह तो थी वक्र रेखा।

चांद भी फीका पड़ जाए,

 ऐसा रूप है मैंने देखा।


सिर पर बालों की काली घटा,

चेहरे पर ना था एक भी 'पिंपल'।

 मुस्कराई थी जब वह एक पल को,

‌ गोरे गालों पर पड़ गए थे 'डिंपल'। 


हाथों में चूड़ियां और कंगन,

कानों में लटकती सुनहरी बालियां।

 सुराही जैसी गर्दन तो यूं लगी,

 जैसे फूलों से लदी हो डालियां।


गर्दन जो घुमाई इधर उसने,

तो जैसे बादलों से चांद निकला। 

संभाला हुआ था जिस दिल को हमने, 

यूं लगा कि अब फिसला अब फिसला।


 ललाट पर लटकती जुल्फें,

 चोटी तो छू रही थी उसकी कमर। 

 इधर-उधर तो कहां देखते हम,

 उस पर ही टिक गई थी हमारी नजर।


आंखों में समाया हो जैसे पूरा ही समंदर,

 सीप और मोती बिखरे पड़े हों उसके अंदर।

 कितने ही दिलों में मचा दे जो हलचल,

 कितने ही बन जाएं देखकर मस्त कलंदर।


पलकें जो उठे तो सुबह हो,

और जो झुके तो शाम हो ।

दिल हमारा आ गया सब्जपरी पर,

 अब चाहे य़ह बात आम हो।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

हाथों का तकिया लगाकर- कविता

 हाथों का तकिया लगा कर,

 माटी का बिछौना बिछाकर,

 तुझे निंदिया लोक में ले जाऊं,

 मेरा क्या बेठी-बेठी ही सो जाऊं।


मैं तो चाहूं नर्म सा ग़द्दा हो,

 रुई से भरा तकिया हो,

 और एक महीन सा  चद्दर,

ताकि न काटे तुझे मक्खी या मच्छर।


किस्मत सबकी एक सी नहीं होती,

 किसी की होती बहुत ऊंची,

 कुछ दुनियां में हम जैसे हैं,

 जिनकी किस्मत होती है फूटी।


 दुनियां में ही हमने देखा है,

 मखमली गद्दा भी नींद नहीं लाता,

 लेकिन हमारा राजा बेटा,

 मिट्टी में ही गहरे सो जाता।

शान्ति की अशान्ति- कहानी

 नाम तो उसका शांति था लेकिन उसके जीवन में अशांति ही अशांति फैल चुकी थी।  उसका पति आलसी किस्म का इंसान था , नौकरी करता था लेकिन मन नहीं लगता था। एक जगह नौकरी छोड़ता, दूसरी जगह करता। फिर छोड़ता तीसरी जगह करता। जैसे तैसे घर का खर्च चल रहा था ।गृहस्थी के खर्चे पूरे नहीं हो पा रहे थे। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई , घर के खर्चों से  परेशान होकर एक दिन वह घर छोड़ कर चुपचाप कहीं चला गया। बस उसी दिन से शांति के जीवन में अशांति का पैमाना बढ़ता चला गया। एक तो पति के चले जाने का गम और दूसरा गृहस्थी का खर्चा। ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी , अतः उसने लोगों के घर का काम ही करना उचित समझा।आसपास के कुछ घरों में उसे काम मिल गया और घर की सफाई कपड़ों की धुलाई आदि का काम उसे मिला , जिससे जैसे-तैसे गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ने लगी।लेकिन बच्चों की पढ़ाई, कपड़ों की मांग और घर के  रोजमर्रा के खर्चों से वह परेशान रहने लगी। 

 रात को सब कामों से मुक्त होने के बाद वह अपने हाथों को देखती , उसे लगता है कि उसके हाथों की चमड़ी घिसती जा रही है । कहीं-कहीं से कटती भी जा रही है। कभी वह अपने हाथों को देखती , कभी अपने बच्चों को। उसको रोना आ जाता और आंखों से आंसू बहने लगते। ऐसा अक्सर होता और ऐसे ही दिनचर्या चलती रही। 

  एक दिन सूर्योदय भी नहीं हुआ था कि दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई। उसे आश्चर्य हुआ कि सुबह-सुबह कौन आ गया। जाकर दरवाजा खोला तो आश्चर्य से मुंह खुला का खुला रह गया। सामने उसका गुमशुदा पति खड़ा हुआ था। पति की आंखों में आंसू थे,उसने कहा मुझे माफ कर देना जो गलती मुझसे हुई है वह माफी के काबिल तो नहीं है फिर भी मैं आशा करता हूं कि तुम मुझे माफ कर दोगी।अब मैं एक जगह रह कर मन लगाकर काम करूंगा और तुम्हें कोई काम नहीं करने दूंगा ।

 शांति की आंखों से बहते आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे , लग रहा था जैसे आज तो आंसुओं से एक नया समंदर बन जाएगा।