शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

 लड़का लड़की को देखने का चलन था,

आखिर एक दिन वह दिन आ ही गया।

 लड़की वाले सोफे पर जमकर बैठे थे,

ओर लड़के को चाय लेकर बुलाया गया।

 लड़के को देख लड़की मुस्कुराई मंद मंद,

  पकवानों पर हाथ साफ कर चाय सुड़क कर 

अहसान करती बोली मुझे लड़का है पसंद।

 फिर बोली लड़के को पिक्चर लेकर जाऊंगी

 थोड़ा घूमाऊंगी ज्यादा फिराऊंगी साथ में ,

 तभी तो उसको ठीक से समझ पाऊंगी। 

लड़के को यूं लगा जैसे उसकी लग रही हो मंडी,

 उससे बेचारे से तो किसी ने पूछा ही नहीं,

 लेकिन मजबूरन उसने भी भी दे दी हरी झंडी।

सोमवार, 27 नवंबर 2023

मस्ती का संदेश- कविता

 मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूं,

मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूं,

जिसे सुनकर जग झूमे, झुके,लहराये,

   मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं।

 हिमालय से ऊंची मेरी आशाएं,

 समंदर से गहरी मेरी कल्पनाएं ,

मैं नित नए सपने संजोता हूं,

 मैं मस्ती का संदेश लिए  फिरता हूं।

 दुख का सागर न लहराए,

कष्ट का कांटा न चुभ जाए,

बातों से अपनी सबके दुख हरता हूं, 

 मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं।

 किंचित भी लगे आघात क्यों,

 कुंठित हो किसी के जज्बात क्यों,

 अरमानों के फूल खिलाता हूं 

 मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं। 

न समझो कि तुम चुक गए हो, 

न वो दिया हो जो बुझ गए हो,

 सबके दिलों में प्रकाश फैलाता हूं,

मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं।

 सीने में जलन,आंखों में चुभन,

 दिल में हो अगन पर रहूं मगन,

अमावस से बादल जब छा जाएं,

घुप्प अंधेरे में दीपक जलाए रहता हूं।

 मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं।

मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं।

Ckkk  - हरिवंश राय बच्चन 

सात और सात फेरे- लघु कथा

 एक से एक लड़कियों की कुंडलियां आने लगी थीं पर उन्होंने अपने विलायती पुत्र के लिए एकदम ही देसी कन्या ढूंढ कर वाग्दान कर दिया।दरअसल एक घटनाक्रम के अंतर्गत ऐसा हुआ

 कांतानाथ जी का बेटा मधुर विलायत में एक अच्छी नौकरी कर रहा था। मधुर के पिताजी कांतानाथ जी एवं माताजी को उसके विवाह की चिंता थी तो उन्होंने समाचार पत्रों में विज्ञापन दिया और कन्याओं के प्रस्ताव और कुंडलियों के ढ़ेर लग गए। जब मधुर कुछ छुट्टियां लेकर भारत आया तो ये सब प्रस्ताव उसे दिखाए गए उनमें से मधुर को वही लड़की पसंद आई जो उसके माता-पिता को भी पसंद आई थी, कद-काठी अच्छी थी सुंदरता में कोई कमी नहीं और पहने लिबास से उसे लगा कि वह विलायत में उसके साथ बराबरी की रहेगी । रात्रि को वह मोबाइल देखते हुए अकेले ही कल्पना में उसके साथ  फेरे लगाने लगा। सातवां फेर पूरा हुआ ही था कि उसको एक रील नजर आई जिसमें वह अश्लील दृश्य प्रस्तुत कर रही थी।  उसकी कुछ और रील देखकर उसका सिर चकरा गया। सुबह पिताजी को यह बात बताई तो उन्होंने सोचा कि पढ़ाई लिखाई रहन-सहन और लिबास पर जाने के बजाय सुसंस्कृत लड़की ही ठीक रहेगी।पड़ोस में ही ऐसी लड़की पर उनकी निगाह गई और बातचीत कर संबंध पक्का कर दिया गया।आनन-फानन में तीसरे दिन पंडित जी को बुलाकर शगुन करवा दिया गया।मधुर मन ही मन सोचने लगा ,सात फेरे उसने मन ही मन ले लिए थे लेकिन यथार्थ में तो अब होने वाले सात फेरे ही महत्वपूर्ण होंगे। 

Ckkk

रविवार, 12 नवंबर 2023

भजन - तेरे चरणों में

 तेरे चरणों में मां मेरा धाम है,

 हृदय में बसा तेरा नाम है।

 हम तो थे माटी के पुतले,

 तूने ही डाली इसमें जान है,

तेरे चरणों में मां मेरा धाम है।

दुनिया में आकर के और क्या करना,

अब तो हरदम जपना तेरा नाम है,

तेरे चरणों में मां मेरा धाम है।

समय के फेरे में मुझे नहीं पड़ना,

अब तो तू ही सुबह तू ही शाम है,

तेरे चरणों में मां मेरा धाम है।

तेरी करूं मैं सुबह शाम पूजा,

अब तो मेरा बस यही काम है,

 तेरे चरणों में मां मेरा धाम है।

 मेरी आंखों को तू ही नजर आए,

तू ही जमीं तू ही आसमान है,

तेरे चरणों में मां मेरा धाम है।

सोमवार, 30 अक्टूबर 2023

 गुमसुम सी खड़ी थी मैं अपने दर पर 

अचानक से ये मुझे क्या हो गया 

होश हवास खो बैठी मैं 

जब मुझे वो चांद कह के गया। 


खफा हैं कुछ लोग - ग़ज़ल

 यूं ही कुछ लोग खफा हैं, हमसे भी इस शहर में 

क्योंकि हर एक से अपनी, तबीयत नहीं मिलती । 

 ढाया है ज़फाओं ने कुछ ऐसा सितम,

 किसी दिल में हमें वफा नहीं दिखती ।

 जमाने की धारा में बहना है कबूल 

 किनारो पर हमें खुशी नहीं मिलती।

 आखिरी वक्त जब आएगा तो फिर,

 सांसों की कहीं से सौगात नहीं मिलती।

 आशिकी कर ली है मैंने हवाओं से, 

 क्योंकि उसके बिना कोई चीज नहीं जलती।

 होने को तो है लाखों दिलदार यहां,

 किसी दिल से मेरे दिल की कली नहीं खिलती।

 ए चांद तू ही कुछ करम कर मुझ पर,

इन सितारों से तो चांदनी नहीं मिलती।

 हाले दिल तो लिखा है खत में,

 कैसे भेजूं कभी फुर्सत  ही नहीं मिलती।

 वादा किया है तो खिलाफी तो न कर,

  माना कि वादों से जिंदगी नहीं चलती। 


Ckkk

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

ए चांद तू जल्दी आना-- कविता

 तुझ बिन नहीं कोई भी मौसम सुहाना,
  ए चांद तू जल्दी आना। 

 सकल जग घिरा अंधेरे में,
 घूम रहा संदेहों के घेरे में।
 मेरे मन में उजियारा भर जाना,
 ए चांद तू जल्दी आना।

 व्याकुल मन से बाट जोह रही कब से,
 मैं पल-पल को जोड़ रही तब से।
  अनंत को शून्य तू कर जाना,
 ए चांद तू जल्दी आना। 

 कह कर गए थे जल्दी आऊंगा,
 चांद जब पूरा निकलेगा उस दिन आऊंगा ।
  न शरमा मुख पूरा दिखला जाना,
  ए चांद तू जल्दी आना। 

उनके बिन सूनी है नगरिया,
 पथरीली सी लगे सभी डगरिया।
 यह बात उन्हें बता जाना,
 ए चांद तू जल्दी आना। 

तू ओढ़े तारों की चुनरिया,
  सूना पड़ा है मेरा हिया।
 मेरे दिल को भी हर्षित कर जाना,
 ए चांद तू जल्दी आना।
 
  आ जायेंगे जब मेरे साजन,
तेरी चांदनी उतरेगी मेरे आंगन।
तब मेरा व्रत पूरा कर जाना,
ए चांद तू जल्दी आना।

Mssa

मौसम कुछ उदास है- कविता

 शून्य में खड़ी हो तुम, 

बहती हुई हवाएं ना देखीं। 

जफ़ाओं को दिल से लगाया,

 मेरी वफाएं ना देखीं।

 मौसम कुछ उदास है,

 कोई न आसपास है।

 यह मौसम कभी तो बदलेगा,

 मेरे मन में यही आस है।

बिजलियां सी कौंध जाती थी कभी,

घेर  कर बैठते थे आसपास सभी। 

 ऐसा क्या हो गया कुछ तो बताओ,

 आखिर क्यों हो गए सभी अजनबी।

 क्यों जख्म देती हो मेरे जज्बातों को, 

 भूल जाओ जो हुआ उन बातों को।

देखो ना मुझे न दिन को चैन, 

 और न  नींद है रातों को।

 सोचता हूं तुम्हें कविता लिखूं,

 नहीं नहीं कोई ग़ज़ल लिखूं।

 देखे जब तू उस ग़ज़ल को,

 तो ग़ज़ल में बस मैं ही दिखूं।

तड़पता दिल मेरा क्या देखा जाएगा,

 तुम्हारा दिल मेरे ही सुर में गाएगा

 मैं जानता हूं इतना कठोर तो नहीं,

 यह दिल क्या तुम्हें रोक पाएगा।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

दहलीज के उस पार- कविता

 चलो एक बार फिर वहीं लौट चलें,

 जिस दहलीज को पार कर के,  

 नए जीवन में प्रवेश करते हुए ,

   रंगीन सपने संजोये थे।

 कहते हैं प्यार में कोई शर्त नहीं होती,

पर  याद करो उन सात वचनों को, 

 जिन्हें निभाने का सिर्फ मैंने ही नहीं,

    तुमने भी किया था वादा । 

मिलने को तो गुण मिल गए थे,

 लेकिन यथार्थ में नहीं मिल पाए।

 तुमने बस अपने गीत गाए, 

और मैंने भी अपने ही गीत गाए। 

इस तरह कैसे जिंदगी बसर होगी,

 न तो तुम्हें संतोष मिलेगा,

ना ही मुझे खुशी होगी।

चलो एक बार फिर,

 हम दोनों अजनबी बन जाएं।

 जो हो गया हो उसे भूल जाएं।

 तुम्हारी कमियों को,

 मैं नजर अंदाज करूं,

 और मेरी कमियों को तुम।

 चलो एक बार फिर,

 दहलीज के उस पार चलें,

 और नए सिरे से फिर,

 नए जीवन में प्रवेश करें।

 


शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

हिंदी राष्ट्र की भाषा- गीत (साभार)

 हिंदी भाषा राष्ट्र की भाषा , प्रजा-तंत्र के शाश्त्र की भाषा 

 देवनागरी लिपि में बसा, जन जन के मन की अभिलाषा 

 भारत की सारी भाषाए इस भाषा की बहने हैं 

 मुकुट राष्ट्र भाषा का सर पर शोभित इसके गहने हैं 

पढ़े वही जो दिखे, सुने वही जो लिखे 

 ये विशेषता हिंदी ने पायी है,

 सम्पूर्ण राष्ट्र के जन मन में

 हिंदी से एकता आई है ।

 विश्व के सारे ज्ञान है इस में 

जन जन के मन यही रमी 

 मृदुल प्रतिक संगीत भरी 

मन भावन पावन प्रीत भरी 

 भारत की अक्शुन्य एकता को

 हिंदी से मिली महत्ता

 सच है एकता की प्रतिक हिंदी है (हिंदी है) 

आधुनिक भारत की शक्ति हिंदी है

 हम धन्य हुए हम धन्य हुए

  है बयार हिंदी की चली पुष्प सुगंध सी फैली

 हिंदी घर आँगन और गली गली

 हिंदी से हम सब को देखो 

है विकास की दिशा मिली

 (हिंदी भाषा राष्ट्र की भाषा प्रजा-तंत्र के शाश्त्र की भाषा) 


फिल्म- योग और योवन , h.n. singh,alka yagnik + , pawan


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सोमवार, 28 अगस्त 2023

टूटा तारा- कविता

 कहीं दूर जब तारा टूटता है,   

एक रोशनी सी नजर आती है।

तेरा दंभ भी शायद टूट जाए, 

ऐसा विचार मन में उभरता है।

देखता रहता हूं टूटते तारे को, 

शायद मन की मुराद पूरी हो। 

मन्नत मांगता हूं मैं उससे, 

मेरी चाहत न अधूरी हो। 

तूने भी शायद देखा होगा,

तुझे भी तो नजर आया होगा। 

जब से तूने दूरी बना ली है, 

मैंने कितना दुख झेला होगा।

अब जो तू नजरें इनायत कर दे, 

तो मेरी जिन्दगी बन जाएगी।

 मेरी ख्वाबों की झोली,

खुशियों से भर जाएगी।

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

कान्हा लियो अवतार- कविता

मथुरा में छाई बहार,
कान्हा लियो अवतार।
ऐसी मनभावन छवि पर,
मैं बलिहारी जाऊं बारंबार।
चहुं और छाई ऐसी खुशहाली,
 धरती पर छाई ज्यों हरियाली। 
 बाट  जोहते हर नर-नारी,
  कब आएंगे कृष्ण मुरारी।
 बागों में चिड़ियाँ चहचहाती,
  कोयल भी मीठी कूक लगाती।
मेघ गरज गरज कर बरसने लागे,
सोये मन प्रफुल्लित हो जागे। 
 दुख दर्द सब अपने भूले,
 बगिया में सखियां झूला झूले।
 मुरझाए फ़ूलों पर आई बहार,
जब कान्हा लियो अवतार। 

शनिवार, 19 अगस्त 2023

दूर जा रहे- ग़ज़ल

 दूर जा रहे रुक जाओ ना कुछ पल और,

अभी तो रात गहरा रही,नहीं हुई है भोर।

ऐसी भी क्या बेरुखी क्या हुई हमसे कोई खता,

 तुम्हारी यह चुप्पी बना रही है हमें कमजोर।

 हर ओर उदासी का मंजर दिखाई दे रहा,

 छा गई ई ज्यों आसमां पर घटा घनघोर।

हम तो थेअपने आप में ही मस्त रहने वाले,

क्यों चुरा लिया दिल हमारा,क्यों बनी चितचोर।

थोड़ी मोहलत तो दो,समझा लूं अपने दिल को,

 अब तो यही फरियाद करते हैं तुमसे पुरजोर।  

 उदासी की मझधार में गोते लगा रहा दिल,

 तू ही बता कैसे जाऊं मैं किनारे की ओर।


Mssa



राखी नहीं एक धागा- कविता

 राखी नहीं मात्र धागों का त्यौहार,

इसमें परिलक्षित होता भाई बहन का प्यार।

 कहने को तो है यह मात्र एक धागा,

लेकिन इसमें दुनिया भर का प्यार समाता।

  भाई बहन जब एक दूसरे से होते हैं दूर, 

  तो इंतजार होता है इस त्यौहार का भरपूर।

  कैसे भूल जाए कोई बहन राखी भेजना,

 दिल में भरी हो चाहे कितनी ही वेदना।

 बेशक कभी-कभी हो जाती है कुछ गलतफहमियां,

  लेकिन राखी का त्योहार मिटा देता है सब दूरियां।

 बरसों से चली आ रही , बन गई है यह एक रीत,

  राखी का यह धागा बन गया है भाई बहन के प्यार का प्रतीक।


Mssa

रविवार, 13 अगस्त 2023

 *विजयी रचना --*


 जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे,

मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा।

नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा,


 एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर,

 कुछ तेरूंगा और डूब जाऊंगा।

मैं तो ठहरा एक ठहरा हुआ पानी,

नदी के जल को कहां है फुर्सत रुकने की।

वह तो अविरल बहता ही रहता है,

कल कल मधुर संगीत सुनाता रहता है।


 यदि मैं ऐसे ठहरा ही रहा तो,

 जल जैसा मन प्रदूषित हो जाएगा।

 ग़र नदिया से जो जा मिलूंगा, 

 तो मन स्वच्छ पारदर्शी हो जाएगा। 


 एक उफनती नदी को कहां है फुर्सत, 

 कि वह कुछ पल भी ठहर जाए,

 वह तो अविरल चलने की आदी है,

 अपने जल को यहां से वहां पहुंचाती है। 


  अपने मन के भावों को अपने में ही न सिमटा लूं,

उदार दिलों से मिलकर अपने भावों को विस्तार दिला दूँ। 

वे न आएं मेरे पास तो न आएं, 

मैं तो किंचित भी नहीं सकुचाऊंगा।

मैं उनसे मिलने की खातिर,

उनके पास चला जाऊंगा। 



*दूसरी रचना--*

जिंदगी यह कैसी है जिंदगी,

 कभी लगती है उलझी हुई पहेली।

 और कभी मेरे संग संग चलती,

 मेरी अतरंग सी सहेली।


 कभी सपाट राहों पर सरपट दौड़ती,

 कभी गड्ढों भरी राहों पर उछलती कूदती।

 चिंघाड़ती अनवरत चलती ही रहती,

 कभी अचानक मौन हो ठहरती।


 कभी लगता है यहां अपनों का मेला है,

कभी लगता हर इंसान यहां तो अकेला है।

 कभी जलेबी सी उलझी पर मीठी लगती,

 और कभी लगता यह तो झमेला है।


 एक उम्र तक करते रहे बन्दगी,

 झुकती कमर सी लगती है जिंदगी।

 कभी नित नई आशाएं लिये हुए,

 दुल्हन नवेली सी लगती है जिंदगी।


 जिंदगी जीते जीते निकल गई हैजिंदगी

उमंग है दिल में फिर से मिलेगी नई जिंदगी।

ना मिली चाही गई ठंडक न मिली उष्णता,

 कभी तो दाल जैसी गलेगी जिंदगी।


*चार पंक्तियां--*


कर्म करें ऐसा ना किसी की हानि हो,

 हर्षित हो, मन में ना कोई ग्लानि हो।

 सर्व हित ही कार्य करेंगे हम,

 न किसी भी रुप में मनमानी हो।


सतीश गुप्ता 'पोरवाल', जयपुर।

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

गगरी -- कविता

 छलक न जाए गगरी जरा संभालना, 

कुछ उलीचना है यह बात जरा समझना।

 क्या करना है कितना करना है यह जानना जरूरी है,

 सयानों की कही हुई बात को मानना जरूरी है।

कुछ बातें एक सीमा तक ही अच्छी लगती हैं,

 बिना सोचे समझे कही बातें कच्ची लगती हैं।

जरूरत से ज्यादा हर चीज बुरी होती है,

 उसके साथ कुछ न कुछ कमी जुड़ी होती है।

 न इतराओ कभी भी अपनी उपलब्धि पर,

 आहिस्ता करो जो करना है न जाओ जल्दी पर। 

 जो हमें कहना था वह तुम्हें कह दिया,

 यह भी सही है कि तुमने सब कुछ सुन लिया। 

 तुम चाहो तो जैसा हमने कहा वैसा करो,

 या फिर जैसी तुम्हारी प्रवृत्ति है वैसा ही करो।

सोमवार, 7 अगस्त 2023

तेरे दिल में रहूं -- गज़ल

 न मेरा कोई ठिकाना रहूं तो कहा रहूं,

बस थोड़ी जगह दे दे रहूं तो तेरे दिल में रहूं।

दिल में है तूफान और आंखों में सूनापन, 

अपना दर्द कहूं तो आखिर किसे कहूं। 

 नहीं रहता आजकल मुझे कुछ भी याद,

बस एक ही हसरत है कि तेरी यादों में रमूं।

 खोलते पानी के जैसा है दिल और दिमाग, 

  अब  तो हसरत है कि मैं बर्फ की तरह जमूं। 

  रहता हूं गुमसुम एक अरसे से,

   तू हां कर दे तो जमकर हंसूं।

 हसरतों के महल तो बहुत बनाए थे मैंने,

अब तो लगता है कि बस खंडहर की तरह ढ़हूं।


Mssa

रविवार, 30 जुलाई 2023

कविता

 माटी कहे कुम्हार से, 

 तू ही है सच्चा कलाकार।

 जो भी जैसा चाहता,

 देता मेरे तन को आकर।

 यूं तो कहते हैं दुनियाँ के लोग,

कि माटी का क्या है मोल,

 एक पलड़े में रख दो कुछ भी,

 दूसरे में माटी से न तोल।

  अच्छे- अच्छों की नकली इज़्ज़त, 

  मिट्टी में ही मिल जाती है।

 दम्भ करें कितना भी अपनी काया पर, 

  लेकिन एक दिन मिट्टी में ही दफन हो जाती है। 

सुन ले  ऐ मेरे मालिक 

 मेरी भावनाओं को समझ ।

मुझे विभिन्न रूपों में ढाल दे, 

इस दुनियाँ के फरेबी इंसान को, 

मेरी एक मिसाल दे। 

नदी से मिलने-- कविता

 जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे,

मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा।

नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा,

 एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर,

  कुछ तेरूंगा और डूब जाऊंगा।

 मैं तो ठहरा एक ठहरा हुआ पानी,

 नदी के जल को कहां है फुर्सत रुकने की।

 वह तो अविरल बहता ही रहता है,

 कल कल मधुर संगीत सुनाता  रहता है।

 यदि मैं ऐसे ठहरा ही रहा तो,

 जल जैसा मन प्रदूषित हो जाएगा।

 ग़र नदिया से जो जा मिलूंगा, 

  तो मन स्वच्छ पारदर्शी हो जाएगा। 

 एक उफनती नदी को कहां है फुर्सत, 

  कि वह कुछ पल भी ठहर जाए,

 वह तो अविरल चलने की आदी है,

 अपने जल को यहां से वहां पहुंचाती है। 

  अपने मन के भावों को अपने में ही न सिमटा लूं,

 उदार दिलों से मिलकर अपने भावों को विस्तार दिला दूँ। 

वे न आएं मेरे पास तो न आएं, 

मैं तो किंचित भी नहीं सकुचाऊंगा।

मैं उनसे मिलने की खातिर,

 उनके पास चला जाऊंगा।

Ckkk- मासिक 

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

ठिकाना-- कविता

 मेरा कोई ठिकाना नहीं तेरे सिवा, 

 दुनियाँ ने तो मेरा वज़ूद ही मिटा दिया।

क्या क्या ख़ाब देखे थे इस दुनियाँ में,

फूलों की तरह महकूँगा इस बगिया में।

 लेकिन सारे ख्वाब सूखे पत्तों की तरह बिखर गये,

 महल जो बनाये थे सपनों के वे सब ढ़ह गये।

 अब हम जाएं तो जाएं कहां,

छोटा पड़ गया मेरे लिए यह जहां।

कभी यहां कभी वहां डोलता रहता हूं,  

असमंजस के झूले में झूलता रहता हूं।

ए दुनियाँ वालों मुझे और न सताओ,

हो ग़र कोई ठिकाना तो मुझे बताओ।

रविवार, 23 जुलाई 2023

https://streamyard.com/p59dyxb84x

 *सभी नए संचालकों का अभिनंदन*

  प्रसन्नता की बात है कि सभी नए मनोनीत संचालकों ने "स्ट्रीमयार्ड"  पर 'लाइव' करना सीख लिया है।

 *लेकिन संचालक बनने के लिए इतना ही काफी नहीं है कि 'स्क्रीन'  पर 'लाइव' आकर बस थोड़ी बहुत बातचीत कर ली। कार्यक्रम का संचालक एक जहाज के कप्तान की तरह होता है जिसे जहाज को,  गंतव्य तक , राह में आई किसी भी तरह की बाधाओं को पार करते हुए / यात्रियों को व्यस्त रखते हुए और सभी की सुविधाओं ख्याल रखते हुए , पहुंचाना होता है।

 *कार्यक्रम के दौरान कभी-कभी प्रतिभागी का 'internet' बाधित हो जाता है , संचालक को चाहिए कि वह इस दौरान प्रतिभागी की कही हुई बातों का विश्लेषण करे , कोई शेर /मुक्तक / कविता सुना दे।साथ ही यही बात प्रतिभागी को भी समझा दें कि वह भी , ऐसे समय में, ऐसा ही करे।

* कार्यक्रम के दौरान संचालक द्वारा सिर्फ इतना कहना ही काफी नहीं है कि आपका स्वागत है /आप कुछ सुनाइए / अपने बारे में कुछ बताइए आदि, बल्कि प्रतिभागी की बात में से बात निकाल कर उसका विश्लेषण करना /अगला संबंधित प्रश्न कर देना चाहिए। 

*निर्बाध रूप से, बिना अटके हुए, बोलने का अभ्यास होना चाहिए।  अपने घर पर ही यह मानकर कि आपके सामने एक दो या तीन प्रतिभागी ,अदृश्य रूप से , बैठे हुए हैं ,सवाल जवाब करते रहें । 

* पूरी तरह अभ्यास हो जाने के उपरांत , फिर से 'स्ट्रीमयार्ड' पर 'लाइव' आकर अपने आपको निपुण संचालक  सिद्ध कर दें। 

(अभी बस इतना ही)https://streamyard.com/p59dyxb84x

बुधवार, 19 जुलाई 2023

परेशान निगाहें-- कविता

 परेशान निगाहें आखिर ढूंढ रही किसको,

अंतर्मन से दिल ने चाहा बस उसी को।

 प्यार मोहब्बत सिर्फ जुमला ही नहीं है,

 बात सच ही कही है जिसने भी कही है।

देखा था उसको हमने बस एक नजर ही तो,

बेताब हैं दीदार को उसके उसे खबर कर दो। 

इतनी भी क्यों बेरुखी हमसे हमें बता दो,

 सजा दे दो हमको गर हमारी कोई खता हो।

तमन्ना तो यही कि उसकी बाहों में आसरा मिल जाए,

 फिर तो बस डूबते को तिनके का सहारा मिल जाए। 

सुनकर फरियाद हमारी गर जवाब आ जाए,

तो इस उजड़े गुलशन में फिर से बहार आ जाए। 

मन मयूरा -- कविता

 राह निहारे थक गई अखियां

 बात बनावे सखी सहेलियां

मेरा आंगन सूना लागे,

 कुछ भी अब तो नहीं सुहावे।

 जो तू लिख दे बस इक पाती,

 चांदनी मन मा भर भर जाती।

 चांद को जैसे देखे चकोरा,

  मन मोरा नाचे जैसे मयूरा।



Kalkkj

सोमवार, 10 जुलाई 2023

सुख के सब साथी -- कविता

 यह भी एक अजब पहेली है,

 सुख आता नहीं दुख जाता नहीं।

 जो चाहते हैं वह मिलता नहीं,

जो मिलता है  वह भाता नहीं। 

 जो ना हो सके रूहानी है, 

जो न बन सके वह कहानी है। 

जिंदगी है कभी कष्टों भरा  सफर,

 और कभी जिंदगी सुहानी है। 

सुख-दुख के इस सफर में,

सुख के सब साथी हुए।

 दुख में चलता चले अकेला,

 सुख में सब बाराती हुए। 

जिंदगी सुनसान सा सफर नहीं, 

   समझो जिंदगी एक मेला है। 

 इस मेले में कोई मौत का कुआं,

  तो कोई बन गया झूला है।

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

दो लफ़्ज़ों में-' कविता

 ऐसे कैसे "दो लफ्जों" में बयां कर दे कोई अपनी कहानी, 

 जबकि झंझावातों गुजरते  गुजारी हो अपनी जवानी। 

 वह गुजारिश करता रहा कहता  रहा तुम्हारी राह निहारूंगा,

 उसने बस दो लफ्जो में दो टूक कह दिया "नहीं आऊंगा"। 

  बहुत कहा कि तुम ऐसा करो नहीं तो मैं मर जाऊँगा,

    बड़ा ही निष्ठुर था कह दिया कि "नहीं करूंगा"। 

  बड़ी शिद्दत से समझाया ऐसा करो न हो मगरूर,

  बड़ा ही शरीफ था दो लफ्जो में कह दिया "जी जरूर"। 

सच्चे आशिक ने प्यार का इजहार किया और पूछा "एंड यू"

 उसका प्यार भी सच्चा था और कह दिया "आइ टू"। 


Mssa/ dainik

शनिवार, 1 जुलाई 2023

राज ए मोहब्बत-- कविता

 राज ए मोहब्बत को राज ही रहने दो,

 दुनिया चाहे कुछ भी कहे, कहने दो।

दिल कुछ कहे ना कहे , छोड़ो भी ,

मोहब्बत आंखों से ही कर लेने दो।

 क्या होती है मोहब्बत हमें तो पता नहीं,

 कहां मिलती है यह उसका पता नहीं ।

कब होती है ,कैसे होती है यह भी पता नहीं।

 किसे होती है किसे नहीं यह भी पता नहीं। 

  कहते हैं कि मोहब्बत खुद चली आती है,

  इसे कोई करता नहीं, बस हो जाती है।

  किसी से बेशर्म होकर लिपट जाती है 

  लेकिन  किसी से कुछ-कुछ शर्माती है।

  हम तो बड़े बेपरवाह हैं इस जमाने में ,

 हमें तो नहीं उलझना किसी भी फसाने में।

 हम जैसे संगदिल भी हैं यहां पर, 

मोहब्बत को मजा आएगा इन्हें हराने में। 

गुरुवार, 22 जून 2023

जिंदगी -- कविता


 जिंदगी यह कैसी है जिंदगी,

 कभी लगती है उलझी हुई पहेली।

और कभी मेरे संग संग चलती,

 मेरी अतरंग सी सहेली।

 कभी सपाट राहों पर सरपट दौड़ती,

  कभी गड्ढों भरी राहों पर उछलती कूदती।

  चिंघाड़ती अनवरत चलती ही रहती,

  कभी अचानक मौन हो ठहरती।

 कभी लगता है यहां अपनों का मेला है,

  कभी लगता हर इंसान यहां तो अकेला है।

 कभी जलेबी सी उलझी पर मीठी लगती,

और कभी लगता यह तो झमेला है।

 एक उम्र तक करते रहे बन्दगी,

 झुकती कमर सी लगती है जिंदगी।

 कभी नित नई आशाएं  लिये हुए,

   दुल्हन नवेली सी लगती है जिंदगी।

 जिंदगी जीते जीते निकल गई है जिंदगी,

 उमंग है दिल में फिर से मिलेगी नई जिंदगी।

 ना मिली चाही गई ठंडक न मिली उष्णता,

  कभी तो दाल जैसी गलेगी जिंदगी।

मंगलवार, 20 जून 2023

सुकून-- कविता

 दो पल भी सुकून के ना मिल सके,

जिंदगी बस यूं ही गुजर गई।

 जिंदगी से मेरी और,

  मेरी , जिंदगी से ठन गई। 

मकसद तो कोई नजर आता नहीं

 क्या बताएं बस,जिये जा रहे हैं,

   फटे हाल अपने पलों को 

  बस यूं ही,सिये जा रहे हैं। 

खुशियों का उपवन मांगा तो,

 गमों का सागर लहराता मिला।

यहां कोई नहीं दिखता अपना,

 किससे करें शिकवा,किससे करें गिला।

जिंदगी चाहे कितनी ही बची हो, 

सुकून के पल कभी तो मिलेंगे।

उजड़े  हुए इस गुलशन में,

सुवासित पुष्प कभी तो खिलेंगे।


Mssa/दैनिक 



बुधवार, 14 जून 2023

कभी तुम नहीं - कविता

 कभी तुम नहीं कभी हम नहीं कहते,

 बस हौले से मुस्कुराते और चुप रहते।

 परिस्तिथिय कुछ ऐसी आ ही जाती हैं,

 लेकिन कुछ तुम सहते कुछ हम सहते। 

लोग उलझायेंगे हम तो आपस में ही समझ लेंगे,

 दुनिया थक जाएगी कोशिश करते करते। 

कौन कहता है कि दूरियां हैं हम दोनों के बीच 

 हम तो दोनों ही एक दूसरे के दिलों में बसते।

भूल जाएं जो भी गम अब तक सहे हैं हमने, 

 चलो मिलकर अब नई दुनियां हैं रचते। 

एक ऐसा दौर आ ही जाता है जिंदगी में,

 इसमें तुम न उलझो हम भी नहीं उलझते।


Mssa/ dainik

मंगलवार, 13 जून 2023

हमराह या हमसफर- कविता

 क्या हो हमराह या हमसफर

वादे तो तुमने कर दिए अब तक हजार, 

 लेकिन वह नहीं कहा जो कहना है सिर्फ एक बार।

जानती हूं मैं, कब से मेरे हमराही हो,

 मैं तो सिर्फ एक फूल और तुम फूलों की डाली हो।

 जब भी कोई मुसीबत हुई तुमने ही सहारा दिया,

कभी भी परायापन नहीं अपनापन दिखा दिया।

 सोचती हूं कैसी होगी वह जिंदगी जब हम तुम एक होंगे,

 तुम औरों की तरह नहीं तुम्हारे तो इरादे नेक होंगे।

कब तक यूं अकेले अकेले चलते रहेंगे, 

सिर्फ बातें करेंगे और मिलते रहेंगे।

 क्या हम ऐसे ही अलग-अलग जिंदगी करेंगे बसर,

 सच-सच बताओ तुम मेरे क्या हो, हमराह या हमसफर।


Mssa/दैनिक 

सोमवार, 12 जून 2023

ख़ुद की तलाश में हूं- कविता

 

मुझे कुछ खबर नहीं मैं कहां हूं 

अभी तो मैं खुद की तलाश में हूं।

विचरण कर रहा था ब्रह्मांड में

 अनंत में था या शून्य में

 किसी पर्वत शिखर पर ध्यान मग्न

 या फिर सागर की गहराई में डूबा हुआ

 मालूम नहीं क्यों कहीं गया 

अकेला ही हूं या अपनों के साथ में हूं

 अभी तो मैं ख़ुद की तलाश में हूं 

कोई कहता मैं ईश्वर का भक्त हूं 

कोई कहता कि ठहरा हुआ वक्त हूं

 ना मालूम किस खोज में चलता रहा

 ना जाने किस-किस की सुनता रहा

 कोई कहता कि मैं एक साधारण इंसान हूं

 कोई कहता कि ईश्वर की संतान हूं 

बागों में अनेकों किस्म के हैं फूल

 भंवरे मुझे ढूंढते हैं कहां-कहां

  मैं तो छिपा फूल पलाश में हूं। 

मुझे मालूम है तो सिर्फ इतना कि

 मैं अभी तक जिंदा अपनी लाश में हूं। 

रविवार, 11 जून 2023

प्यार में जान- कविता

 जान है तो जहान है इसे खो नहीं सकता,

यह जान तुझे दे देंगे ऐसा हो नहीं सकता।

 यह जान तो ऋणी है मेरे मां-बाप का,

  लेश मात्र भी ऋण नहीं किसी और का।

बड़े जतन से संभाला है मुझे मेरे अपनों ने,

 बालक से युवा बना दिया मुझे मेरे सपनों ने।

 मैंने तुमसे प्यार किया कभी भी न इनकार किया,

 तुम करो या न करो मैंने तो स्वीकार किया।

सुनो प्रिये प्यार में कोई शर्त नहीं हुआ करती है, 

 प्यार में दिल से दिल भावना से भावना जुड़ती है।

 हर किसी को प्यार के बदले प्यार नहीं मिलता,

बिन मौसम किसी बाग में फूल नहीं खिलता। 

 मेरे  प्यार को यदि तुम्हारी मंजूरी नहीं, 

 जानता हूं स्वीकार करो यह जरूरी नहीं।

 तुम्हारे प्यार के बदले तुम्हें प्यार ही दे सकता हूं,

 जान तो सिर्फ मेरी है,किसी को भी नहीं दे सकता हूं।


Mskm

शनिवार, 10 जून 2023

मुस्कराकर.... मिला करो.... 


यह क्या आते ही चल दिए, कुछ देर तो रुका करो यारों,

 कुछ देर रुक कर,मुस्कुराकर, दिल से मिला करो यारों।

कुछ तो बात थी तुममें जो हर किसी में नहीं,

 हमें आकृष्ट कर ले यह बात हर किसी में नहीं।

हम तो थे अपने आप में ही मस्त रहने वाले 

 अपने काम से काम और काम में व्यस्त रहने वाले।

 दोस्ती क्या है यह हम कल तक नहीं जानते थे,

 खून के रिश्ते के अलावा और किसी को नहीं मानते थे। 

क्या मालूम था एक दिन कोई ऐसा मिल जाएगा,

 यह निर्मोही दिल मेरा तुमसे मिलकर खिल जाएगा।

 जब भी मिलो,सिर्फ हाय-हेलो ना किया करो,

 थोड़ा रुको और फिर मुस्कुरा कर मिला करो।


Mssa/dainik

शुक्रवार, 9 जून 2023

काला धन- कविता

 काला काला काला काला 
 काला रंग सब से मतवाला 
काला हो या गोरा हो
 काले ने सबको रंग डाला 
गोरे गोरे गाल हों 
सिर पर हों काले केश, 
 काले धन वाले का तो भैया,
 सबसे ज्यादा है ऐश। 
काले कपड़े काला चश्मा 
और काली हो कार
 ऐसे लोगों को तो 
 बाकी रंग लगे बेकार
 सांवली सूरत लगे प्यारी 
सांवली मूरत पर जाएं बलिहारी 
सीधे सीधे जो आ जाता 
वह पत्नी जैसा लगता
 ऊपर से जो आता 
वह तो प्रेयसी जैसा भाता 
मन हो जाये जब काला
 काला धन लगे सुरा का प्याला
 काला धन पाने को जाल बुनते 
आ जाये तब दीवारों में चुनते
 काला धन जब हद से ज्यादा बढ़ जाता
 देश में नहीं स्विस बैंक में खाता खुल जाता
 एक दिन तो ऐसा आता
 जब छापा पड़ जाता
 मुँह छिपाते फिरते 
 तब गोरा मुँह भी काला हो जाता। 


बुधवार, 7 जून 2023

किसी नजर में- कविता

 किसी नजर में वह प्यार नजर नहीं आता,

कोई भी पल सुकून की खबर नहीं लाता।

 इंसान बनने की बहुत कोशिश की मैंने,

 पर मेरा इंसान बनना किसी को नहीं भाता। 

दुनियादारी क्या है यह मैं नहीं जानता, 

 इंसानियत के अलावा मैं और कुछ नहीं जानता।

 अब कोई तो मुझे बताएं कि,

 इंसान और मुझ में क्या नहीं कोई समानता।

 आस है मुझे कोई तो मुझे समझेगा,

 मेरे दिल में प्यार का मंजर नजर आयेगा।

 नजर से नजर और दिल से दिल जब मिलेंगे, 

 प्यार का समंदर लहराता नजर आयेगा।


Mssa

मंगलवार, 6 जून 2023

दर्द ऐसा था- कविता

  दर्द ऐसा था जो लिखा न जा सका, 

 बेदर्दी  दुनिया को बताया न जा सका।

 दर्द हमारा था हमें ही झेलना था, 

 दुनिया को बताते तो उसे तो खेलना था।

 जाने क्या सोच रखा था ऊपर वाले ने,

 तकदीर ही ऐसी बनाई थी उस रखवाले ने।

खुशी तो दे दी थी हजारों नहीं लाखों को, 

 दर्द भरे आंसू ही दे दिए मेरी आंखों को। 

अब तो तकदीर से भी संघर्ष करना होगा,

 दर्द के गम को खुशी में बदलना होगा।

 तभी मेरा दिल खुशी में झूम कर मगन होगा,

 यह समझ लो कि बादलों से घिरा हुआ गगन होगा।


Kalkkj

दुखती रग का सहारा- कविता

 *दुखती रग का कोई सहारा नहीं होता*

 सुख का उपवन हर किसी को सुहाता है, 

पर दुखती रग का कोई सहारा नहीं होता। 

 कहने को तो सभी अपने हैं यहां,

लेकिन वक्त पर कोई हमारा नहीं होता।

 किसी को किसी के सुख-दुख से कोई सरोकार नहीं होता,

 किसी का दुख देखकर किसी का दिल पिघलता है।

  एक नहीं बहुत हैं दुनिया में ऐसे बेदर्दी, 

 लेकिन फिर भी किसी का साथ तो मिलता है।

 विपत्ति कितनी भी आ जाए न घबराएं,

नदी ही नहीं समुद्र का भी किनारा होता है।

जिसका कोई भी नहीं इस दुनिया में,

 उसका ऊपर वाला तो सहारा होता है।


Kalkkj

मुक्तक -गलतियाँ

 दो दिलों के बीच से पर्दा हटा दीजिए, 

गुलशन में आकर बहार का मजा लीजिए।

इंसान हूं मैं भी आखिर, हो ही जाती हैं,

हो गई गलतियों की सजा दीजिए।


हम बेवफा नहीं, हमसे वफा कीजिए,

हमारे बेहतर हालात की दुआ कीजिए।

नादान परिंदा समझ इस नेक दिल इंसान को,

हो गई गलतियों की सज़ा दीजिए। 


मशहूर हो तो न मगरूरी का नशा कीजिए  

इस तरहा अपनी न औकात बता दीजिए।

इंसान की बेहतरी तो इसी में है कि, 

खुद को,हो गई गलतियों की सजा दीजिए।


लाचार है अपनी आदत से,अब क्या कीजिए,

हो गई हो हमसे कोई खता तो बता दीजिए।

यूं दूर होकर हमसे न नजरें चुराईये,

हो गई गलतियों की सज़ा दीजिए। 


 वक्त भी क्या क्या सितम ढाता है, 

 वक्त बदले तो बहुत कुछ बदल जाता है।

 जो अभी तक तो आज था,

 वह कल , कल में बदल जाता है।


Mssa

सोमवार, 5 जून 2023

तेरे ही सपनें- कविता

 तेरे ही सपने अब मेरी धरोहर बन गए हैं,

 ये ही सपने तेरी यादों के समंदर बन गए हैं। 

रात रात भर सपने ही देखे पल भर भी न सोया,

 उनिंदि सी आंखों से ,तेरे ही ख्यालों में खोया।

 आशा तो थी कि बनकर बदरिया झम झम बरसेगी,

 मालूम न था कि तुझे देखने को भी आंखे तरसेगी।

 सपने तो पहले भी देखे, पर ऐसे न थे,

 जिनका कोई अर्थ निकल सके वैसे न थे।

 अब तो दिन में तेरी याद और रात में सपने होते हैं,

 कुछ तो लगते पराये जैसे , कुछ अपने से होते हैं। 

   कहते हैं कि कोई सपना तो सच हो जाता है,

  जो मिलने की आस होती है वह मिल जाता है। 

ऐसे ही सपने की चाह में, सपने देख रहा हूं,

 तब तो तू आएगी , तेरी राह देख रहा हूं।


MSA /dainik

दिल अगर जिंदा है- कविता

 दिल अगर जिंदा है तो धड़कना ही काफी नहीं,

 आंख अगर है तो फड़कना ही काफी नहीं।

 दिल में एहसास का होना बहुत जरूरी है,

और आंखों में नमी का होना बहुत जरूरी है। 

 दिल में प्यार भरा हो और दया का वास हो,

 आंखों में करुणा हो और प्रेम की प्यास हो।

 संकुचित दिलों में कभी प्यार नहीं पनपता,

 जैसे बंजर भूमि में कोई फूल नहीं खिलता।  

 आंखें जिधर भी देखें उधर ही हो कुशलता, 

  अपने कर्म में सभी को अवश्य मिले सफलता।

 दिल हमारा स्वच्छ जल सा पारदर्शी हो जाए,

 तो निश्चित ही हमारी नजर समदर्शी हो जाए।


Nkkkd

जिंदगी एक पहेली-- गीत

 नादान जिंदगी हादसों में उलझी हुई है,

नहीं यह ऐसी पहेली जो सुलझी हुई है।

 कितनी भी बुझाना चाहो भड़कती आग को,

 पर क्या करोगे उस चिंगारी का जो सुलगी हुई है।

राहों में सरपट चलने का इरादा था,

 मंजिल तक पहुंचने का वादा था।

 लेकिन कोशिश हमारी रंग नहीं ला पाई,

 क्योंकि वक्त कम और फासला ज्यादा था। 

कोई बताए किस्मत पर भरोसा करें या न करें,

 जो भी जिंदगी में मिले उसे सहन करें या न करें।

 जिंदगी तो जीने के लिए मिलती है,

 फिर जिंदगी के लिए हम क्यों मरें। 

   सोचता हूं राह में रुकुं या चलता चलूँ, 

  दिल के दुख किसी को कहूं या ना कहूं।

   असमंजस के इस भँवर से बाहर निकलकर,

   जिंदगी की पहेली को शायद सुलझा सकूं। 


Mssa/दैनिक 


शुक्रवार, 2 जून 2023

चलता चल राही-- कविता

कोई भी समस्या नहीं है भारी,

गर समझो इसको जो जिम्मेदारी।

सुलझा न सको तो मुझको दे दो,

सुलझाने की अब मेरी है बारी।


कोई भी बाधा हो,कर देंगे नाकाम, 

मंजिल तक जाना है, करेंगे अपना नाम।

आगे कदम बढ़ायेंगे,बस चलते ही जायेंगे,

बस यूं ही कट जायेगा सफर। 

हौसला हो जब मन में मुश्किल हो आसान,

काम करेंगे कुछ ऐसा जग में हो जाये नाम।

नहीं किसी से डरना है, नहीं राह में रुकना है,

बस यूं ही कट जायेगा सफर।।


  चलता चल राही, तू चलता चल,

 चाहे सूरज पहुंचे अस्ताचल,

 चलता चल राही,तू चलता चल--

आंधियों की तू परवाह न कर,

 बाधाएं आ जाएं तो आह न कर,

 निर्बाध गति से चलता चल, 

 चलता चल राही, तू चलता चल,

चाहे सूरज पहुंचे अस्ताचल,

 चलता चल राही,तू चलता चल--

चाहे मंजिल तक पहुंचना लगे अनिश्चित,

 घबराना न तू कभी भी किंचित, 

 दृढ़ निश्चय से चलता चल, 

 चलता चल राही, तू चलता चल। 

 चाहे सूरज पहुंचे अस्ताचल,

 चलता चल राही तू चलता चल--

मंज़िल लगे पर्वत सी ऊंची,  

  या कभी सागर सी नीची,

  ऊंच नीच से परे चलता चल,

चलता चल राही,तू चलता चल।

 चाहे सूरज पहुंचे अस्ताचल,

 चलता चल राही,चलता चल। 

 


Mssa / rssa

बुधवार, 31 मई 2023

पूनम का चांद-- लघुकथा

 यामिनी डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई रितेश का इंतजार कर रही थी। 'डिनर' का समय था और रितेश था कि 'ऑफिस' की किसी 'फाइल' में उलझा हुआ था। यामिनी सोच रही थी कि रितेश आए तो 'किचन' से भोजन लेकर आए और 'डिनर' करके , बाकी कार्य निपटा कर सोने की तैयारी करे । सहसा घर की 'लाइट' 'चली' गई लेकिन वहां पूर्ण रूप से अंधेरा नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे वहां कोई 'नाइट लैंप' जल रहा हो । यामिनी ने पीछे मुड़ कर, खिड़की की तरफ देखा तो पूनम का चांद नजर आया। बाहर बगीचे में फूलों के पौधों में विशेष चमक आ रही थी। वह सोचने लगी कि यह चांदनी का ही असर है, चांद की चांदनी कितनी शीतल और सुंदरता प्रदान करने वाली होती है । रितेश अपना काम निपटा कर वहां पहुंचा और यामिनी का चेहरा देखा तो देखता ही रह गया। उसके चेहरे पर चाँदनी की वज़ह से अलग ही चमक आ गई थी । उसने यामिनी को कहा "देखो आज तुम्हारा चेहरा वैसा ही लग रहा है जैसे कुछ वर्षों पूर्व था। मालूम नहीं क्यों तुम्हारे चेहरे की चमक फीकी हो गई। यामिनी ने कहा "घर की जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश ज्यादा जरूरी है ,चेहरे की चमक से ।अब बच्चे बड़े हो चुके हैं , घर की जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है तो देखना मेरे चेहरे की चमक तुम्हें ऐसी ही और वैसी ही देखने को मिलेगी जैसे पहले थी।  दोनों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कुराहट तैर गई।


MSA (wa)

सोमवार, 29 मई 2023

भोजन दान- लघुकथा

 मोहनलाल जी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे।अपनी आय में से एक हिस्सा मंदिर में दान किया करते थे। एक दिन जब वे अपनी कार से जा रहे थे तो चौराहे पर थोड़ी देर के लिए गाड़ी रुकी तो एक स्त्री रोती हुई उनके पास आकर कहने लगी कि उनके बच्चे भूखे हैं ,खाने को कुछ भी नहीं है। कुछ पैसा दे दो या फिर खाने के लिए कुछ।  मोहनलाल जी ने कार एक तरफ खड़ी की और उतर कर जा कर देखा तो वास्तव में वहां खाने को कुछ भी नहीं था और बच्चे रो रहे थे ।उन्हें बड़ा तरस आया।  उन्होंने सोचा कि मैं मंदिर में हमेशा दान दिया करता हूं ।मंदिर छोटा हो या बड़ा ,भगवान की मूर्ति छोटी हो या बड़ी ,उससे क्या फर्क पड़ेगा।लेकिन यदि वह  पैसा मानव सेवा में लगाऊंगा तो यह भी पुण्य का कार्य होगा, और यह वक्त की जरूरत भी है। उन्होंने उस परिवार के लिए खाने की व्यवस्था की और फिर एक संस्था बनाकर मंदिर में दान देने वाला पैसा गरीबों के भोजन के लिए लगाना शुरू किया ।वे जानते थे कि किसी भी व्यक्ति की सबसे पहली जरूरत भोजन ही है। कुछ और लोगों से उन्होंने साथ में जोड़ा।  अपने मित्रों को भी अलग-अलग क्षेत्र में ऐसी संस्था बनाकर गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने की योजना बनाकर  उस पर अमल करना शुरू कर दिया ।मोहन लाल जी को लगा कि इस कार्य में उन को ज्यादा संतुष्टि मिल रही है। 


Mskm

न हों निराश ' कविता

 नर  हो न निराश करो मन को अचल,

करके अचल दे दो अपने मन को अतिशय बल। 

 निराश होने के कारण तो मिल जाएंगे कई,

पर अपने मन में भर लो आशाऐं नई।

माना कि दुनिया में पग-पग पर कांटे हैं,

 लेकिन विधाता ने फूल भी तो बांटे हैं। 

 अपनी ही नहीं सयानों की बात भी सुन लो, 

  समंदर किनारे सीप ही नहीं मोती भी चुन लो।

 ऊपर वाला है हम सभी का खेवनहार, 

  वह नहीं होने देगा किसी की भी हार।


Kalkkj

शनिवार, 27 मई 2023

कवि होना सौभाग्य - कविता

 आत्मा के सौंदर्य का शुद्ध रूप है काव्य,

 मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।

कवि हृदय में भावनाओं का सागर हिलोरे लेता है,

लहर की तरह भाव नाना तरह के संदेश देता है।   

 जैसे सुंदर फूल चुनकर मनभावन माला बनाई जाती है,

 धागों जैसे शब्दों को चुन कर कविता की चुनरी बुनी जाती है।

 कवि हृदय व्यक्ति कभी भावना शून्य नहीं हो सकता,

 वह कभी भावनाओं के जाल से मुक्त नहीं हो सकता।

 कवि समुद्र की गहराई में जाकर मोती चुन कर ला सकता है,

 और पर्वत की ऊंचाइयों पर जाकर  संजीवनी  ला सकता है। 

 हृदय की गहराइयों से ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं,

 मां की कोख से जैसे शिशु जन्म लेते हैं। 

शुद्ध काव्य आत्मा के अंतर तल से आकार लेता है 

 श्रोताओं को एक अनोखा, मनभावन उपहार देता है।

असंख्य जीव हैं इस दुनिया में कोई लघु कोई जैष्ठ है,

अंततः यही कि मानव होना बेहतर है पर कवि होना श्रेष्ठ है। 



Ckkk

पत्नि की मार- हास्य कविता

 क्या बताऊं यारो मैं पत्नी की मार सह लेता हूं, 

उसके सामने बिल्ली की तरह म्याऊं कर लेता हूं।

 उसको तो कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं है,

 जो कुछ कहना है अपने आप से कह लेता हूं।

 क्या बताऊं कैसी बीबी मेरे पल्ले पड़ी है,

 बात बात पर अपनी ही बात पर अड़ी है। 

  गुस्से में जब कर्कश वाणी में वह जब भी बोले  

 लगता है जैसे मेरी पीठ पर छड़ी पड़ी है।

 मेरी जीवन नैया की वही है खेवनहार,

  दिन में करता हूं उसे प्रणाम बारम्बार।

 हो जाए जो कभी बहस हम दोनों के मध्य,

 तो मैं कहता हूं तुम जीती और मैं गया हार।

 एक बात बताऊं तुमको मेरी सुनते जाओ,

 खुद ही समझो पत्नी को कभी न समझाओ।

  जिंदगी की गाड़ी चलानी हो जो सरपट 

  तो बीवी संग जीवन सरिता में बहते जाओ। 

आज़मा लो-- कविता

 ग़र घर नहीं है काफी तो सारा जहां लो,

यह जमीं ही नहीं, चाहो तो आसमां लो। 

यकीं करो मेरी बातों का ए जानेमन,

 बस एक बार तो मुझे, मौत से पहले आज़मा  लो। 

समंदर की गहराई जितना है मुझे प्यार,

पर्वत की ऊंचाई जितना है मुझे प्यार।

 यह बात समझ कर अपने आप को समझा लो,

बस एक बार तो मुझे मौत से पहले आज़मा लो।

कुछ मैंने कुछ तुमने अपने किस्से सुनाये,

मिलकर हमने प्यार के नगमें गुनगुनाये।

  मेरी नादाननियों को यूं न दिल से लगा लो, 

 बस एक बार तो मुझे मौत से पहले आज़मा लो।

 दिल में बहुत बेचैनियां भरी पड़ी हैं,

 प्यार की राह में रुकावट अड़ी पड़ी हैं।

 उलझी हुई हर पहेली को अब तो सुलझा लो,

 बस एक बार तो मुझे मौत से पहले आज़मा लो।


Mssa

शुक्रवार, 26 मई 2023

कच्चा प्यार- लघुकथा

 कामिनी और बृजेश न केवल पड़ोसी थे बल्कि दोनों एक ही स्कूल और एक ही क्लास में पढ़ते थे।  दोनों साथ जाते और स्कूल से वापस ही साथी आते । शाम को, और बच्चों के साथ कुछ समय  के लिए खेलते । वर्ष बीतते गए और बृजेश के पिताजी का तबादला दूसरे शहर में हो गया।  इस तरह दोनों के कॉलेज बदल गए थे।  कॉलेज की शिक्षा के बाद दोनों की नौकरी एक ही शहर में लग गई और अचानक एक दिन,इन दोनों की मुलाकात हुई । पुरानी निकटता धीरे-धीरे प्यार में बदलती गई। दोनों घंटों बातें करते रहते , यहां वहां घूमते हुए प्यार में डूबते गए। एक दिन अचानक कामिनी का एक्सीडेंट हुआ जिसमें उसका एक पैर बुरी तरह से घायल हो गया और अंत में उसके पैर को काटना ही पड़ा। बृजेश उससे मिलता और अल्प समय में ही वापस चला जाता। धीरे-धीरे बृजेश कामिनी से दूरी बनाने लगा। कामिनी को बुरा लगता था और वह उसे उलाहना देती लेकिन बृजेश था कि दूरी लगातार बढ़ाता रहा ।

 बृजेश को कामिनी से मिले हुए लगभग एक महीना हो गया था।  अचानक एक दिन,एक शोरूम में कामिनी ने देखा कि वहां बृजेश भी मौजूद है। वह बृजेश के पास गई और उसको बोला कि आखिर वह उससे दूर क्यों होता जा रहा है ? क्या मेरे प्यार में कमी आ गई है ? बृजेश कुछ देर चुप रहा फिर बोला कि मेरा संबंध एक अच्छी लड़की से हो गया है और अगले माह उससे शादी की वज़ह से मैं व्यस्त हूं। 

 कामिनी को ऐसी आशा नहीं थी । वह फट पड़ी "मैं समझती हूं जब से मेरा पैर कटा है, तुम मुझसे दूर होते गए। क्या ऐसा ही प्यार किया था तुमने मुझसे ? प्यार वह होता है जो मजबूरी में भी सहारा बने। लेकिन ऐसे समय में , ऐसी स्थिति में तुमने दूर होना ही ठीक समझा।  बृजेश , मैं जान गई हूं तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं था । वास्तव में कच्चा प्यार था। जो इधर से उधर झुक जाए उसे सच्चा प्यार नहीं कहा जा सकता, इसे कच्चा प्यार ही कहा जाएग। ठीक है तुम नहीं मिलोगे तो क्या  , मैं अपना जीवन अपने हिसाब से जी लूंगी। कामिनी दृढ़ निश्चय के साथ वहां से चल दी। 



Mskm

मुलाकात हुई तो- कविता

 सुख और चैन कहीं खो गए थे हमारे,

 खामोशी की चादर ओढ़े बैठे थे नजारे,

 जब उनसे मुलाकात हुई तो, 

  गीत गुनगुनाने लगी बहारें।

 झुकी नजरों से जब उसने देखा हमें,

  क्या हुआ था हमें कैसे कहें, 

 दिल की बगिया में जैसे फूल खिले,

  नदिया की धार में जैसे ग़म बहे।

  घूम रहे थे जैसे भंवरा आवारा,

 किसी फूल पर दिल नहीं आता था हमारा।

 देखा जब पहली ही बार तुम्हें,

  यह दिल तो हो गया बस तुम्हारा।

तुम्हारी नजर हम पर इनायत हो जाए 

 हमारे दिल की कलि फूल बन जाए।

 इंतज़ार न करा हमें इतना,

 अब तो इन्तज़ार सहा न जाए।

रविवार, 21 मई 2023

शाम और तन्हाई-- कविता

 एक शाम तन्हाई भरी, फिर तुम्हारा साथ,

 तराने प्यार के गुनगुनाते हम साथ-साथ।

  ना होगी कोई भी शिकायत इस जमाने से,

 तशरीफ़ रखो,मिला लो मेरे हाथ से हाथ। 


 हर शाम तुम्हारी याद मेरी हमसफर होती है,

 मेरी हर डगर तुम्हारी ही तरफ होती है।

 याद भी ना करूं तुम्हें,ऐसा तो हो नहीं सकता,

 हर शाम मेरे दिल में यादों की ग़ज़ल होती है। 


 कितनी खुशनुमा है यह शाम तेरे आने से, 

 खत्म हुई तन्हाई ,जो थी एक जमाने से।

 बस इतना समझ ले ऐ मेरे दिलबर, 

  तू मेरे लिए कम नहीं किसी खजाने से।


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शनिवार, 20 मई 2023

ओस और प्यास- कविता

 अपने दिल को हम समझाते रहे, 

उसको देख बस मुस्कुराते रहे।

 मालूम था हमें वह हमारी नहीं,

हम ओस से प्यास बुझाते रहे।

 उसका नजर आना ही सुकून देता था,

 कोरे खत में जैसे मजमून देता था। 

चांद हमें मिले ना मिले,

 पर वह चांदनी जरूर देता था।

 लगता है जैसे तकदीर संवर जाती है,

 देख कर उसको थकान उतर जाती है।

 नासाज हो चाहे कितनी भी 

 तबीयत हमारी सुधर जाती है। 

क्यों करें हम शिकवा किसी से,

शिकायत करें क्यों हर किसी से। 

ग़र हमें जब करनी ही होगी,

तो शिकायत करेंगे बस उसी से। 

शुक्रवार, 19 मई 2023

कुर्सी के चक्कर- हास्य कविता

दैया रे दैया कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया। 

 कुर्सी के खूब फेरे लगाते , जैसे तैसे कुर्सी हथियाते, बैठ कुर्सी पर शेर बन जाते, जब आ जाते चुनाव - तो बन जाते गैया, दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया गजब हैं भैया। 

  कुर्सी जब मिल जाए, खुद पावरफुल बन जाए, नोटों के बंडल खूब बनाते, हर रोज ही दिवाली मनाते ,जब आ जाते चुनाव-तो खूब बांटते रुपैया, दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया गजब हैं भैया। 

 पढ़-पढ़ कर भाषण देते, खुद अपने भाषण नहीं लिख पाते,  पढ़ने को किसी और से लिखवाते , जब आ जाएं चुनाव - खूब सुनाते कविता ,दोहा ,गीत और सवैया । दैया रे दैया ,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया। 

 कोई भी गीत कभी न गाया, कितना भी कहा कभी न सुनाया,  जब आ जाए चुनाव- तो बन जाएं गवैया।  दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया,  गजब हैं भैया। 

नेता बन कर खूब इतराये ,जो न किया वो खूब सुनाये, चमचों को तो खूब नचाये , जब आ जाएं चुनाव- खुद बन जाए नचैया  , दैया रे दैया,  कुर्सी  के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया। 

रैली कर करके खूब रिझाया,जनता को तो लॉलीपॉप दिखाया, जब मिल जाए कुर्सी,जनता को बंदर बना, बन जाए डमरु बजेय्या ।

दैया रे दैया ,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया ,गजब हैं भैया। 

कुर्सी ही उनकी दुनियां ,कुर्सी ही उनकी मुनियां, जब मिल जाये कुर्सी तो भाड़ में जाये दुनियाँ। 

कुर्सी पर चढ़कर करते ता ता थय्यां,

 दय्या  रे दय्या  कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, ग़ज़ब हैं भय्या। 


एक आह- कविता

 रोज एक आह सी उठती है। 


जमाने भर के गम उठाता कब तक फिरूँ, 

शिकायत करूं भी तो आखिर किससे करूं। 

 औरों की तरह मैंने भी खुशी मांगी थी जमाने से,

 लेकिन ज़माना तो बाज नहीं आया मुझे हराने से।

आखिर कब तक लड़ता रहूंगा मैं अपने आप से ही,

 जो कुछ कहना था मुझे वह बात अब तक नहीं कही।

 मेरे सांसों की सरसराहट क्या कभी तुमने सुनी,

 मेरी राह अलग और तुमने अलग राह चुनी।

 अब तो दिल में रोज एक आह सी उठती है, 

 मेरे कानों में चुपके से बस एक बात कहती है। 

 भूल जा जो हुआ,कब तक सीने से लगाए रखेगा,

 नई राह , नया सपना तेरे लिए  नई दुनिया रचेगा।


(MSA)

गुरुवार, 18 मई 2023

ढलती शाम..-- कविता

 ढलती शाम में क्या सब कुछ ढ़ल जाता है,

मानव का जो स्वभाव है क्या वह बदल जाता है।

 सूरज सवेरे आता है शाम को चला जाता है,

 लेकिन सच है कि वही सूरज अगली सुबह फिर आता है।

माना की उम्र रुकती नहीं बढ़ती ही जाती है,

 कमर परिवार और उम्र के बोझ से झुकती ही जाती है। 

 जीवन में जिंदगी भर हम बहुत कुछ कर जाते हैं,

  करते करते ढलती उम्र में थक भी जाते हैं।

  लेकिन उम्र का यही पड़ाव हमें संदेश देता है,

 आशा का कमल तो हर उम्र में खिल सकता है।

  करना चाहते थे हर कोई बहुत कुछ जिंदगी में, 

 लेकिन उम्र निकल जाती है परिवार की बंदगी में।

 इससे पहले कि जिंदगी हमें दे जाए अंततः धोखा, 

 पकड़ लो इस अवसर को समझकर सुनहरा मौका। 

बुधवार, 17 मई 2023

आख़िरी खत- कविता

 वह आखिरी खत जो मैंने तुम्हें लिखना चाहा,

 पर क्या बताऊं सच तो यह है कि मैं लिख नहीं पाया। 

 बहुत कोशिश की मैंने कि आखिर कुछ तो लिखूं, 

लेकिन फिर सच तो यह है की भाव ही नहीं जगा पाया। 

 जानता हूं कि  खत का ज़माना बहुत पुराना है,

 इस जमाने में आखिर खत कौन लिखता है।

 लेकिन मैंने तुम्हें इस ज़माने में भी  लिखे,

 क्योंकि खत में मेरा प्रेम शब्दों के जाल बुनता है। 

 मेरे जीवन में बहार बन कर  जब से तू आई थी,

 मेरा जीवन  एक उपवन सा खिल गया था।

एक अरसे से सुषुप्त से पड़े हुए मेरे मन को, 

 अचानक से जैसे जीवनदान मिल गया था। 

  बहुत सपने देखे थे हम दोनों ने मिलकर, 

 सोचा था आखिरी खत मे उन्हें उकेर दूंगा। 

 प्रणय निवेदन अब फिर करने का कोई भाव नहीं,

 उस आखिरी खत को बड़े जतन से कहीं सुरक्षित रख दूंगा


मंगलवार, 16 मई 2023

जुदा मत होना- कविता

 एक पल को भी तू मुझसे जुदा मत होना,

 खुदा कसम तू मुझसे कभी खफा मत होना। 

 दिल की गहराइयों से चाहा है हमने तुम्हें,

 बड़ी मुद्दतों के बाद पाया है हमने तुम्हें।

 तुम्हारे आने  भर से दिल की बगिया खिल जाती थी,

 जैसे दुनिया भर की खुशियां हमको मिल जाती थी। 

  अब क्या हमारी जानम हमसे रूठ गई,

  प्यार की कड़ी जो जोड़ी थी वह टूट गई।

   हम तो दिल के घर से बेघर हो गये थे,

   अपने आप से ही बेखबर हो गये थे।  

  जुदा मत होना तू कि मैं टूट जाऊंगा,

   अपने आप ही से मैं रूठ जाऊंगा।

  मेरे ख्यालों के समंदर में तेरी ही कश्ती है,

   मुझे तो बस तू , बस तू ही जचती है।

सोमवार, 15 मई 2023

मूर्ति की कराह -कहानी (संशोधित/संक्षेप)

 #चेतना किस्से कहानियां कविताएं 

#पाक्षिक कहानी लेखन

#हॉरर 

पिताजी को सुबह की फ्लाइट से बंगलुरू जाना था, सामान का वजन देखने के लिये नेहा और रोहन स्टोर से तुला लाने स्टोर की ओर गए। उस समय क्योंकि बिजली नहीं थी , स्टोर से टॉर्च की रोशनी में  तुला उठाकर घूमे ही थे कि कोहनी की टक्कर से वहां टेबल पर रखी एक मूर्ति नीचे गिर पड़ी। दरवाजे का ताला लगाते ही उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी। नेहा बोली "सुना तुमने, यह कौन कराह रहा है"? रोहन  बोला "अरे,यह आवाज़ तो अंदर से आ रही है। डर के मारे दोनों की घिग्घि बंध गई।


 इतने में तेज "म्याऊँ" की तेज आवाज सुनाई दी ,दोनों ने पलट कर टॉर्च की रोशनी में उस ओर देखा तो एक बिल्ली चमकती आंखों से उनकी ओर देख रही थी, उनका डर और बढ़ गया, फिर बिल्ली अपने पंजों के बल बैठकर उठने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उन पर  कूदेगी।अब तो दोनों की चीख निकल गई और दौड़ कर कमरे की ओर भागे। उन्होंने देखा कि वही बिल्ली दरवाजे उन पर कूदने वाली स्थिति में बैठी है। बिल्ली ने दोनों को घूर कर देखा और जोर से म्याऊँ बोल कर चली गई। 

माता-पिता के घर से जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। अगले दिन  रात के दूसरे पहर उसी समय फिर कराहने की आवाज आई। रोहन को अब तो रोज ही रात के दूसरे पहर उस दरवाजे के पीछे से कोई आहट सी सुनाई देने लगी तो वह सोचने के लिए मजबूर हो गया,कि पिताजी के आने के बाद किसी तांत्रिक से मिलेंगे। 


स्वरचित--सतीश गुप्ता पोरवाल,जयपुर।

रविवार, 14 मई 2023

मूर्ति की कराह - कहानी

 रोहन और नेहा ने माताजी और पिताजी का सारा सामन पैक करवा दिया था। वे अल सुबह 5:00 बजे की फ्लाइट से बेंगलुरु जाने वाले थे,  तो सुबह 3:00 बजे ही घर से निकलना था।  सामान पैक करने के बाद उन्हें तौलना भी जरूरी था ताकि  वजन निर्धारित सीमा से ज्यादा न हो।  

ऐसे सामान जो यदा-कदा ही काम आते थे वे दालान के एक कोने में एक छोटे से कमरे में डाल दिए थे, जिसे स्टोर का नाम दिया गया था। रोहन और नेहा स्टोर से तुला लाने स्टोर की ओर गए। उस समय क्योंकि बिजली नहीं थी ,टॉर्च की रोशनी में वहां पहुंचे, ताला खोला और अंदर से तुला उठाकर घूमे ही थे कि कोहनी की टक्कर से वहां टेबल पर रखी एक मूर्ति नीचे गिर पड़ी। दोनों  ने पलट कर देखा तो उसकी एक टांग टूट चुकी थी लेकिन जल्दी में वे तुरंत निकले।  दरवाजा का ताला लगाते ही उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी।  दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा ओर नेहा बोली "सुना तुमने, यह कौन कराह रहा है"? रोहन ने इधर-उधर देखा और अंत में दरवाजे पर कान लगाकर कर बोलो "अरे,यह आवाज़ तो अंदर से आ रही है। डर के मारे दोनों की घिग्घि बंध गई।

 इतने में तेज "म्याऊँ" की तेज आवाज सुनाई दी ,दोनों ने पलट कर टॉर्च की रोशनी में उस ओर देखा तो एक बिल्ली चमकती आंखों से उनकी ओर देख रही थी, उनका डर और बढ़ गया, फिर बिल्ली अपने पंजों के बल बैठकर उठने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उन पर  कूदेगी।अब तो दोनों की चीख निकल गई और दौड़ कर कमरे की ओर भागे। उन्होंने देखा कि वही बिल्ली दरवाजे उन पर कूदने वाली स्थिति में बैठी है। बिल्ली ने दोनों को घूर कर देखा और जोर से म्याऊँ बोल कर चली गई। 

माता-पिता के घर से जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। अगले दिन  रात के दूसरे पहर उसी समय फिर कराहने की आवाज आई। 

 दोनों ने थोड़ी हिम्मत की और बाहर आए, उन्होंने देखा कि यह आवाज़ तो स्टोर रूम से ही आ रही है,  दोनों डर कर वापस आए तो देखा कमरे के दरवाजे पर बिल्ली बैठी है, वे और डर गये। बिल्ली के जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। तीन दिन के बाद पिताजी वापस आ गए, तब उनको सारी बात बताई तो उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से वह आवाज मूर्ति की ही है,  वह मूर्ति एक तांत्रिक ने उनको दी थी लेकिन उन्होंने बेकार समझते हुए स्टोर रूम में रख दी थी। सारा वाकया सुनने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि उसी तांत्रिक से मिलकर इस समस्या का निराकरण कराया जाएगा। 

शनिवार, 13 मई 2023

मधुशाला-- कविता

 गमों के बोझ तले दबकर जीवन बोझिल कर डाला 

 इधर-उधर कहां भटक रहा,राह जोहती मधुशाला।

 दुनिया में सुख और दुख दोनों ही मिलते हैं,

  किसी को कांटे तो किसी को फूल मिलते हैं। 

 जज्बातों की आंधी ले जाती है कहीं उड़ा कर,

  खुद हंसती है तुम्हें दोराहे पर खड़ा कर। 

  घुप्प अंधेरे से बाहर निकल फैल रहा उजाला, 

  इधर-उधर कहां भटक रहा,राह जोहती मधुशाला।

भ्रमजाल-- कविता

 दिग्भ्रमित मनुष्य कहां जा रहा है,

 नजर कुछ आता नहीं, बस चला जा रहा है।

 नजर नजर का फेर है, दुनिया जानती है,

 पर भ्रष्ट बुद्धि यह कहां मानती है।

 दृढ़ निश्चय हो फिर चिंतन मनन भी हो,

 कुछ अच्छा करने को फिर मन भी हो। 

आधुनिकता को ही जिसने मन में ओढ़ लिया,

 संस्कारों को तो उसने झकझोर दिया।

 वह क्या जाने क्या होती है दुनियादारी,

 वह तो निभा भी नहीं पाता अपनों से रिश्तेदारी। 

अब तो समझ जा,भ्रमजाल को तोड़ दे,

 जिस गलत राह पर जा रहा, उसे मोड़ दे।

शुक्रवार, 12 मई 2023

मेरी खाऊ रानी- पेरोडी

 मेरी खाऊ रानी कितना खाएगी तू ,

 कब तक प्लेट सजाएगी तू ,

 ये तो बता कब ब्रेक लगायेगी तू ,

 रुक जा तू रुक जा । रुक जा तू रुक जा ।


 चाऊमीन खाके , चाट पकौड़ी खूब दबाके ,

 गोलगप्पे तो 10-20 डकारे ,

ये तो बता सांस कब लेगी तू ,

 मेरी खाऊ रानी कितना खाएगी तू, 

कब तक प्लेट सजाएगी तू ,

ये तो बता कब ब्रेक  लगाएगी तू  ,रुक जा  तू रुक जा । 


काजू कतली  , प्लेट में भर ली,

 नजर  इनायत हलवे पे कर ली

 दंगल मे कूद कर, , रोटी  भर ली  

अब तो बता  कब थक जाएगी तू ,

मेरी खाऊ - -, 


गुरुवार, 11 मई 2023

यादों का कर्ज - कविता

 समंदर की लहरों का कारवां कभी रुकता नहीं ,

पर्वत श्रृंखला का मस्तक कभी झुकता नहीं।

 यादों का कर्ज तो ऐसा कर्ज है, 

 कितना भी चुकाओ कभी चुकता नहीं।

 जिंदगी में कुछ लम्हे ऐसे आते ही हैं 

 दिल कितना भी संगदिल हो रुला ही जाते हैं।

 यादों के ऐसे ही कितने ही लम्हे, 

 रह रह कर दिल पर कहर ढाते हैं।

  पास आने की गुजारिश की पर नहीं आए तुम, 

   भुलाने की कोशिश की पर भुला न पाये हम। 

  प्यार की इबारत लिखी तुमने खतों में 

  उन खतों से दर्द की स्याही मिटा न पाये हम। 

इश्क की रूहानियत -मुक्तक

  इश्क की रुहानियत की वे बात करते हैं ,

  बिन बादल ही वे बरसात करते हैं। 

 अश्क जिनकी आंखों में करते हैं बसर, 

 उनसे वह मुस्कुराने की बात करते हैं।

राह से गुजर गये एक नजर देखा नहीं,

जरिये खतों के के ही मुलाकात करते हैं। 

 दिल में जिसके प्यार की एक बूंद तक नहीं,

  हमसे दिल लगाने की बात करते हैं।

शादी के लड्डू- हास्य कविता

 सुन भाई मुन्ना, बबलू और गुड्डू,

 क्या तुमने भी खाये शादी के लड्डू।

 मैंने तो सुना है कि 

  ये लड्डू जिसने भी खाये,

  वे अपने जीवन में जरूर पछताये।  

  और जिसने नहीं खाये वे भी पछताये।

   यदि अभी तक नहीं खाया तो,

   मेरी बात मानकर सावधान हो जाओ 

  और यदि खा लिया है तो  

  पत्नी के सामने नादान हो जाओ।

नहीं पड़े जो तुम जो शादी के जतन में, 

पंछी बन उड़ते फिरो मस्त गगन में।

 शादी कर ली तो होती रहेगी बीबी से खटपट 

 बच्चे भी दिन प्रतिदिन पैदा करते रहेंगे  झंझट।

   हमसे तो रहा नहीं गया और खा लिया,

 इस लड्डू ने तो बड़ी मुसीबत में डाल दिया।

 या तो आजादी से जीवन जीने की करो कामना,

या फिर शादी का लड्डू खाकर करो मुसीबतों से सामना।

 बीबी तुम्हारी कभी कपड़े धुलवायेगी,

और कभी-कभी बर्तन भी साफ करवाएगी।

 कभी सिर्फ खिचड़ी और दूध दलिया खिलाएगी

 लेकिन हां कभी-कभी तो हलवा भी खिलाएगी

शॉपिंग खूब करके तुम्हारी जेब हल्की करेगी,

 लेकिन कभी बीमार पड़े तो तुम्हारी सेवा भी करेगी।

 मर्जी तुम्हारी है शादी का लड्डू खाओ ना खाओ भैया,

 क्या बताएं हमने तो खा लिया दैया रे दैया।

 

मंगलवार, 9 मई 2023

परिवार का निर्णय-लघुकथा

 सोनाली जैसे ही ऊपर पहुंची उसने देखा कि वहां हंसी मजाक चल रहा है,उसको देखते ही सब चुप हो गए।  सब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि देखें सोनाली क्या बोलती है ।कुछ देर चुप रहने के बाद सोनाली ने चुप्पी तोड़ी।  वह बोली "मैं नौकरी भी करूं, जो तनख्वाह मिले वह परिवार में लगा दूँ , इसके बावजूद भी परिवार में होने वाले आयोजन मेरे ही सिर पर । मेरा तो एक पैर ऑफिस में और एक घर में रहता है । मैं ही जानती हूं कि किस तरह से सामंजस्य बनाकर चल रही हूं।  जब नौकरी करती हूं तो मेरा कर्त्तव्य बनता है कि पूरी तन्मयता से अपने काम को अंजाम दूं और यहां घर में भी मेरा कर्त्तव्य समझ कर पूरी कोशिश करती हूं कि जितना हो सके हर कार्य में योगदान दूँ, लेकिन फिर भी सुनना मुझे ही पड़ता है। आखिर मैं कब तक बर्दाश्त करूं। मैं साथ में खाली काग़ज़ लेकर आई हूं आप लोग उस पर मेरा त्यागपत्र लिख दें, मैं 'साइन' कर दूंगी और फिर पूरा समय घर के काम में ही देती रहूंगी।" 

 सोनाली द्वारा इस तरह के आचरण से सभी हतप्रभ रह गए।  उनको इसी स्थिति में छोड़कर वह वापस नीचे चली गई ।सभी सोच में पड़ गए ,उसकी तनख्वाह का घर के खर्च में बड़ा योगदान था।  यदि उसने नौकरी छोड़ दी तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा?सब ने मिलकर निर्णय किया कि सभी साथ चल कर उसको मनाते हैं। उधर सोनाली अपने कमरे में बैठी हुई निर्णय का इंतजार कर रही थी। 

सोमवार, 8 मई 2023

समाधान--लघुकथा

 सोनाली अब बहुत कुछ सोच चुकी थी।  वह जानती थी कि बिना सोचे समझे कुछ कहने से समस्या का समाधान नहीं होता।  ऊपर सासू मां के कमरे तक पहुंचते-पहुंचते, वह संयत हो चुकी थी।  अचानक उसके कमरे में पहुंचने से मां- बेटे, देवर-देवरानी, सब चौंक उठे।मांजी को तो लगा कि सोनाली गुस्से में है और जरूर ही अब गर्मा- गर्मी होगी। लेकिन सोनाली ने बड़ी ही शालीनता से कहा 'मांजी पूजा की  सामग्री मैं ऑफिस से आते वक़्त ले आयी थी,जिन जिन को बुलाना है, उन सबका मैंने फोन कर दिए हैं। पूजा के दिन मैं लंच के बाद ही छुट्टी लूँगी ,उसके पहले का काम आप लोग संभाल लेना। मेरे आने के पहले सारी तैयारियाँ मेरी प्यारी प्यारी देवरानी करके रखेगी ना ? सोनाली ने सीधा सीधा प्रश्न देवरानी की तरफ उछाल दिया। देवरानी को हाँ में सिर हिलाना ही पड़ा। "तो ठीक है, मेरे आने के बाद हम सब मिलकर सानंद पूजा संपन्न करवा लेंगे।" यह कहते हुए सोनाली  नीचे अपने कमरे पर पहुंची 

 तैयार होकर सोनाली ऑफिस पहुंची तो तुरंत बॉस का बुलावा आ गया। जैसे ही वह बॉस के कैबिन में पहुंची, बॉस ने कहा "सोनाली,एक समस्या आ गई है.."- सोनाली सोचने लगी कि ऐसा क्यों है कि घर हो, सहेलियाँ हों या ऑफिस, सब मुझसे ही समस्या का समाधान चाहते हैं। सोनाली ने सोचा कि उसका नाम सोनाली नहीं बल्कि समाधान होना चाहिए था।

नकाब -' कविता

 जमाने में आज कैसे-कैसे चलन चलते हैं, 

 प्रवृत्ति रहती वही चेहरे के भाव बदलते हैं। 

दिल के अंदर क्या छुपा हुआ है जाने ना कोई,

 हर पल चेहरा वही सिर्फ नकाब बदलते हैं।

 सरल स्वभाव रखने में आखिर क्या है मुश्किल,

 क्या जैसे हैं वैसे रहने से नहीं मिलती मंजिल।

 हमने तो देखे हैं ऐसे ऐसे कई चेहरे ,

 जो पहुंचे हैं या पहुंचेंगे मंजिल तक आज नहीं तो कल। 

श्वेत वस्त्र धारण करते हैं दिल तो काला रहता, 

 मन में घनघोर अंधेरा बाहर चाहे उजाला रहता।

 मुंह में राम बगल में छुरी वाले रहते हैं लोग,

 नहीं आते इनके झांसे में यदि अपने को संभाला होता


रविवार, 7 मई 2023

करुण नयन - कविता

 करूण नयन से करबद्ध निवेदन करते, 

 दुःख दर्द मिले जो हमको नयनों में भरते।

  हर पल हिय में अग्नि सी प्रज्वलित होती रहती,

  हवन कुंड में हवन सामग्री ज्यों डलती रहती।

 पल पल निहार रहे थे सुख के ही क्षण मिल जायें,

 चाहा था हर कली यहां की फूल बनकर खिल जाये।

 गमों का निशाँ न रहे खुशियां ही खुशियां मिल जाएं,

  सागर की गोद से ज्यों सीपों  में मोती मिल जाये।

   अखियां थक जाती है पंथ निहार निहार 

   सूखे जीवन में आ नहीं पाती कोई बहार ।

  ना जाने दुनियाँ में कैसे जी लेते हैं लोग,

  वे तो कर भी नहीं पाते सुखों का उपभोग।

 करुणा से भर जाता है दिल देख कर आंखें पथराई,

  गौर से देखें तो आंखों में दिखती कितनी गहराई ।

देखकर उनके करूण नयन दिल करुणा से भर जाता,

 दया दृष्टि से दिल से दिल का नाता जुड़ जाता।

 

शनिवार, 6 मई 2023

महाराणा प्रताप-- कविता

 महाराणा प्रताप  के आगे हम अपना सर झुकाते हैं, 

उस प्रतापी राजा की कहानी तुम्हें सुनाते हैं। 

परदेेश में भी जिसके नाम का डंका बजता था, 

आगे जिसके अच्छे-अच्छों का सर झुकता था।

 नाम के जिससे थर-थर कांपे दुश्मन हर दिशा में, 

चैन न आए दिन में नींद न आए निशा में। 

वीरों की धरती की गाथा हर एक की जुबानी,  

 कह रही महाराणा की वीरता की कहानी। 

 जिस दुश्मन ने भी देखा वो प्रतापी भाला, 

 उसके गले में अटका निवाला। 

याद है हमें वह युद्ध हल्दीघाटी का,

आभारी जिसका कण-कण इस देश की माटी का। 

सुख-दुःख- कविता

 किस-किस पर भरोसा करें जनाब ,

देखिए ग्रीष्म ऋतु का बदला मिजाज।

 क्या बताएं इस मौसम की तो क्या बात है,

 कभी गर्मी ,कभी सर्दी, कभी बरसात है।

 जीवन में कभी सुख और कभी दुख आ ही जाता है,

 न सुख में हंसो न दुख में डरो यह पाठ पढ़ा जाता है। 

 हौसला रखकर इंसान पग पग आगे बढ़ता है, 

इसी हौसले से दुख घट और सुख बढ़ जाता है।

 हर इंसान करता है सुखों की ही कामना, 

 पर करना ही पड़ता है दुखों से भी सामना।

 मौसम का तो चाहे कितना ही बदल जाए मिजाज,

 पर इंसान चाहे तो  रख सकता है सुखों का हिसाब। 

गुरुवार, 4 मई 2023

पीहर का अंगना- गीत

  छूटा - छूटा  रे पीहर का अंगना, 

  मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना।

 छूटा -छूटा रे पीहर का अंगना,

  मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना।

चाहे संग हो गए मेरे सजना,

 मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना। 

कैसे कैसे पढ़ी कैसे कैसे लिखी,

प्यारी-प्यारी सहेलियों से मिली।

 याद आये वो सावन में झूलना,

  मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना। 

छूटा छूटा रे ‌--

मां की ममता मैं यणकैसे भुला दूं,

 पिता का प्यार कैसे भुला दूं।

 याद आए वो आंगन  बुहारना, 

मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना।


बुधवार, 3 मई 2023

विश्वामित्र का यज्ञ

 किसी भी माता-पिता के लिए संसार का सबसे सुखदाई पल होता है अपने बच्चों को सोते हुए या खेलते हुई अवस्था में निहारना।  बच्चों के सौम्य और शांत चेहरे को देखकर उनकी आत्मा को तृप्ति प्राप्त होती है। 

  गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात, राजा दशरथ, राम को निद्रा अवस्था में निहारने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। इतने में वहां आती हैं और और दशरथ जी को पूछती हैं कि क्या हुआ?

 दशरथ जी अचकचा जाते हैं  और कहते हैं कि नींद नहीं आ रही थी,  राम का चेहरे देखे बिना सो नहीं पा रहा था तो उसे देखने आ गया। ऐसा था दशरथ जी का पुत्र प्रेम।

 उधर  ऋषि विश्वामित्र द्वारा यज्ञ कराया जा रहा था। रावण ने राक्षसों को कहा कि इन राजाओं को असली शक्ति इन यज्ञों द्वारा ही मिलती है। अतः बेहतर होगा कि इनके यज्ञ में विघ्न डाल कर यज्ञ को असफल कर दिया जाए।  इस हेतु दो राक्षस आकाश मार्ग  से यज्ञ स्थल पर आए और यज्ञ वेदी में     पहले हड्डियां डाली और fi6रक्त भी डाल दिया।  इस तरह से बार बार विघ्न डालकर यज्ञ को असफ़ल करके वहां से अंतर्ध्यान हो गए राजा दशरथ जी का दरबार लगा हुआ है मंत्री जी कर रहे हैं कि गुरु आश्रम से लौटने के बाद अब जबकि आपके चारों पुत्र योग्य हो गए हैं जंत जनता की नजरें उनका रूप उनके ऊपर है और जनता चाहती है की दशरथ जी कहते हैं कि महर्षि विश्वामित्र जी हैं इनको शिक्षा दीक्षा दी है अतः देहि इनकी योग्यता का निर्धारण करके बता सकते हैं कि किसको क्या कार्यभार समझाया जाए और उनको उनकी योग्यता के हिसाब से कार्यभार समझा दिया जाए। इतने में ही एक हर कराकर सूचना देता है किम ऋषि विश्वामित्र जी पधार रहे हैं एकाएक आया जानकर जिस वजह से होते हैं दशरथ जी चूक जाते हैं भी गुरु वशिष्ट जी को पूछते हैं कि अचानक उनका आना कैसे हो सकता है तो गुरु वशिष्ट जी कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान के ज्ञाता जब इस तरह से अचानक आते हैं तो जरूर कोई विशेष बात है उनका आगे बढ़ कर स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन तुरंत उनको आदर सहित वहां लाने के लिए जाते हैं, राजा दशरथ करते हैं की मुरली पर आपका स्वागत है पधारिए आपके पधारने से अयोध्या नगरी धन्य हो गई है उन्हें आदर सहित लाकर उनके श्रद्धा से पैर पखारते हैं। इतने आदर सत्कार से प्रसन्न होकर विश्वामित्र जी कहते हैं कि हे सूर्यवंशी के राजा दशरथ तुम्हारे साम्राज्य में सब कुशल मंगल तो है ना तुम्हारी राजनीति ऋषि मुनियों की धर्म और सत्संग बराबर निर्विघ्न रूप से चल रहे   होंगे। तब राजा दशरथ ने पूछा कि किस प्रयोजन से आपका यहां आना हुआ तब ऋषि परशुराम जी कहते हैं कि हम जिस प्रयोजन के लिए आए हैं, आपसे आशा है कि वह प्रयोजन आप पूरा करेंगे। दशरथ जी ने कहा कि आप बताइए मैं क्या कर सकता हूं तब विश्वामित्र जी  ने कहा कि रावण ने कुछ राक्षसों को हमारे यज्ञ को असफ़ल करने के लिए लगा रखा है,विशेष तौर पर सुबोह और ताड़का पुत्र मरीच को। रावण को लगता है कि हमारी यज्ञ से राज्य का राजा और ताकतवर हो जाएगा और रावण नहीं चाहते कि ऐसा हो। इसलिए उन राक्षसों का वध करने के लिए मैं राम को लेने आया हूं यह सुनकर दशरथ जी एकदम से टूट जाते हैं और कहते हैं कि राम तो अभी बच्चा जैसा है और राक्षसों से कैसे मुकाबला कर पाएगा।  विश्वामित्र जी कहते हैं कि क्योंकि मैं खुद यज्ञ करवा रहा हूं इसलिए मैं क्रोध नहीं कर सकता ,लेकिन रामजी में वह शक्ति है , इसलिए मैं उनको लेने आया हूं यह सुनकर दशरथ जी और टूट जाते हैं और विनती करने लगते हैं कि कृपया करके रामजी को न ले जाएं वह राक्षसों का मुकाबला कहां कर पाएगा।  यह सुनकर विश्वामित्र जी आग बबूला हो जाते हैं और कहते हैं कि यदि आपको अपना वादा पूरा नहीं करना है तो ठीक है, ऐसे ही चला जाऊंगा फिर  वे गुरु वशिष्ट जी को समझाने के लिए कहते हैं। वशिष्ठ जी दशरथ जी को समझाते हैं कि राम में राक्षसों का वध करने  की सामर्थ्य है।  वैसे तो विश्वामित्र जी भी ऐसा कर सकते हैं लेकिन वे यह गौरव रामजी को दिलाना चाहते हैं।दशरथ जी राम जी को उनके साथ भेजने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन वे कहते हैं कि अकेले नहीं जाएंगे, लक्ष्मण भी साथ जाएगा। राम और लक्ष्मण की जोड़ी को विश्वामित्र जी के साथ भेजने को तैयार हो जाते हैं। 


आगे आगे विश्वामित्र जी और उनके पीछे राम और लक्ष्मण । कोई साधन नहीं घने जंगलों में पैदल ही चले जा रहे हैं। विश्वामित्र जी के आश्रम सिद्धाश्रम में पहुंचने में 4 दिन लगते हैं लगभग डेढ़ योजन चलने के बाद सरयू नदी के किनारे पहुंचते हैं। विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को कुछ पानी सरयू नदी से पीने को कहते हैं । इसके बाद कुछ मंत्रों का ज्ञान देते हैं जिनसे भूख और प्यास से निजात मिलती है और निडरता मन में भर जाती है।  रात नदी के किनारे बिताकर फिर वे आगे चलते हैं। अगली दिन सरयू और गंगा के संगम के पास अंगदेश नामक आश्रम में पहुंचते हैं फिर अगली सुबह को वे नाव के द्वारा नदी को पार करते हैं। राम पूछते हैं कि पानी इतना शोर क्यों कर रहा है तो विश्वामित्र जी कहते हैं कि दो नदियों का पानी यहां मिलता है इसलिए इतनी आवाज हो रही है। नदी पार करके वे घने जंगल में पहुंचते हैं जहां विचित्र जानवरों व पक्षियों की आवाजें  आ रही थी। जंगल में एक राक्षसी ताड़का का राज चलता था। वह बहुत ही क्रूर प्रकृति की थी,इंसान को मार देती थी उनके घरों को उजाड़ देती थी। विश्वामित्र जी ने राम को उसे मारने के लिए कहा। राम ने अपना धनुष संभाला और तीर चला कर ताड़का को मार डाला।

मंगलवार, 2 मई 2023

त्रिशा (स्वीकार है) - लघुकथा

  त्रिशा बहुत खुश थी , बाहर से ही डिब्बा खोलकर आवाज लगाती हुई अंदर आई-मम्मी,पापा, कहां हो? जैसे ही मम्मी ने आकर दरवाजा खोला, मिठाई का एक टुकड़ा उनके मुंह में डालते हुए,बाहों के घेरे में लेते हुए ड्राइंग रूम तक ले आई। बेशक वहां कुछ लोग और बैठे हुए थे लेकिन वह सीधी पापा के पास गई और एक मिठाई का टुकड़ा उनके भी मुंह में डाल दिया,बोलते हुए कि पापा-पापा मेरा इंक्रीमेंट हो गया और प्रमोशन भी। फिर उसे नजर घुमाई और देखा कि वहां तीन लोग और बैठे हुए थे, एक नौजवान और उसके मम्मी और पापा। 

 वह थोड़ी सकुचाते हुए वहीं पर सोफे पर बैठ गई। संदीप और उसके माता-पिता तीनों की निगाहें त्रिशा पर थीं। त्रिषा के पापा ने बोलना शुरू किया -बेटी तुम्हारे माता-पिता ने सारी बातें बता दी हैं। अब भविष्य के बारे में तुम्हारा क्या विचार है ? त्रिषा ने तुरंत बोला, मेरी तो हां ही है ,तो संदीप के माता-पिता दोनों एक सुर में खुश होते हुए बोले अच्छा है, तुम्हें यह रिश्ता मंजूर है। त्रिशा चौकी और बोली मैं तो अपने ऑफिस के बारे में बोल रही थी ।आज मेरा प्रमोशन हुआ है और इंक्रीमेंट मिला है, हां लेकिन यदि दाम्पत्य जीवन की बात करें तो इस बारे में काफी सोच विचार करना पड़ेगा।  संदीप के पिताजी ने कहा कि हम लोग एक ही शहर में हैं। तुम दोनों की नौकरी एक ही शहर में है, तुम्हारी सरकारी नौकरी है तो समय की परेशानी भी नहीं रहेगी और आगे क्या करना क्या नहीं करना वह भी तुम्हारी मर्जी पर ही निर्भर होगा।  जब सब कुछ त्रिशा पर ही छोड़ा जा रहा था तो वह मना भी करती तो कैसे ?

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

धूल तेरी गलियों की- कविता

 धूल मैं तेरी गलियों की इधर-उधर उड़ती फिरूँ, 

 बन गई वह कली जो फूल बन कर न खिलूं।

 चाहा बहुत था मैंने तेरे संग संग चलना ,

 बस तेरे संग जीना तेरे संग ही मरना।

क्या क्या ख्वाब दिल में सजाए थे मैंने,

 हर दिन त्यौहार जैसे मनाए थे मैंने।

   मैं  तो बस इतना ही जान रही हूं,

  तू माने न माने मैं तुझे अपना मान रही हूं।

 क्या करूं क्या ना करूं बन गई अधरझूल हूं मैं,

 बस इतना ही समझ ले तेरी गलियों की धूल हूं मैं।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

पुरवाई-रुसवाई -- कविता

जब-जब भी चली यह सुहानी पुरवाई,

 सच कहता हूं प्रिये तुम्हारी याद आई। 

 तुमको लेकर देखे थे मैंने जो सपने,

 अभी तक नहीं हो पाए वे अपने। 

 मेरा दिल तुम्हारे नाम से ही धड़कता है,

 दिल रह-रह कर बस तुम्हें ही याद करता है।

  मेरे दिल की आवाज नहीं दी तुम्हें सुनाई,

  सह नहीं पा रहा हूं मैं तुम्हारी यह रुसवाई।


स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।

गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

अतीत -- कविता

 अतीत को छोड़ो और, 

 आज और कल की सोचो।

 जो बीत गया सो बीत गया,

 खामखां अपने बाल न नोचो। 

 होना था उसे कोई रोक ना सके,

 कुछ कर ना सके कुछ टोक न सके। 

   कोशिश कितने ही करो रोकने की,

  लेकिन किस्मत थी वही भोगने की।

 बीते हुए कल की चिंता करना है व्यर्थ,

 सोचो कमजोर नहीं है हम हैं  पूर्ण समर्थ।

 आने वाले कल को संभाल लेंगे संवार लेंगे,

अपने आपको उस सदमे से निश्चित ही उबार लेंगे।

लत शराब की- कविता

 यह क्या हालत हो गई जनाब की ,

जबसे लग गई है लत शराब की। 

 अब तो जब देखो झूमते रहते हैं,

 इसी लत ने तो हालत खराब की। 

नशा तो हर कोई करना चाहता है 

 पर जरूरी नहीं कि वह पीना चाहता है।

कोई चाहता है ज्यादा डिग्री हासिल करना, 

 कोई ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहता है। 

किसी को ज्यादा से ज्यादा डींगें हांकना है,

 किसी को हवा में भी बातें करना है।

 हर किसी की अपनी अपनी आदत है 

 किसी काम को शिद्दत से करना ही तो  लत है।

 काम करना है जमाने में तो ऐसा करो, 

 कि असफलता से तुम कभी ना डरो। 

 लत करो तो ऐसी कि जमाने में मिसाल बन जाओ, 

  लेकिन मेरे भाई  लत शराब की कभी न करो। 


बुधवार, 26 अप्रैल 2023

अपना-पराया-- कविता

 यूं ही कोई पराया नहीं हो जाता है ,

प्रेम भाव शून्य में खो जाता है। 

 आखिर कोई तो है जो चलते चलते,

 बीच राह में कांटे बो जाता है ।

दुनिया में जब आए तो सब अपने थे, 

यहां पर पाले कितने ही सपने थे।

जब होश संभाला तो सामने आया,

 इनमें से आखिर अपने कितने थे। 

  प्रेम भाव का यहां अकाल पड़ा हुआ, 

 हर एक जुबां पर प्रश्न खड़ा हुआ। 

मैं हूं बस मैं ही हूं जहाँ मे, 

समभाव पर यहां तमाचा जड़ा हुआ।

 हर कोई यहां एक दूसरे को समझाता है,

 पर समझ में नहीं किसी को आता है। 

 कोई तो बात होती है आखिर, 

यूं ही कोई पराया नहीं हो जाता है। 

ऋषिकेश यात्रा-- संस्मरण

 यह यात्रा वृतांत सन 1977 का है । दूरदर्शन केंद्र मुंबई में सेवा के दौरान , 3 महीने की ट्रेनिंग के लिए मुझे दिल्ली भेजा गया। देश के अन्य शहरों से भी दूरदर्शन एवं आकाशवाणी केंद्रों से इंजीनियर ट्रेनिंग के लिए आए थे।  ट्रेनिंग अवधि के दौरान 3 दिन की छुट्टियों में हमारा 7 लोगों का समूह , एक ट्रैवल कंपनी की बस के द्वारा,  देहरादून,मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार दर्शन के लिए रवाना हुआ ।रास्ते भर रमणीक दृश्य देखते हुए, देहरादून , मसूरी तक यात्रा की। इसके पश्चात वहां से ऋषिकेश पहुंचे। बस के ड्राइवर ने आधे घंटे का समय दिया और कहा कि इस समय अवधि में लक्ष्मण झूला के उस पार जाकर भ्रमण कर आ जाएं। हमारा समूह कुछ मस्ती में था तो समय होने पर एक साथी ने कहा कि समय हो रहा है जल्दी चलें तो दूसरे ने कहा कि हम 7 लोग हैं छोड़कर थोड़े ही जा सकते हैं, और इस तरह आराम से वापस बस स्टैंड पर पहुंचे। 

 वहां जाकर देखा तो हमारे होश उड़ गए। हमारी बस वहां नहीं थी।  हमने आसपास पूछा तो उन्होंने बताया कि इस बस को तो गए हुए लगभग 20 मिनट हो चुके हैं। अब करते क्या ? हरिद्वार जाने वाली बस का इंतजार किया, बस आई, तुरंत उसमें बैठे और हरिद्वार पहुंचे। वहां पहुंचकर गंगा नदी के किनारे गए और आसपास  नजर दौड़ाई तो पुल के उस पार बस खड़ी हुई नजर आई ।जल्दी-जल्दी चल कर बस तक पहुंचे और ड्राइवर पर बरसने लगे।लेकिन ड्राइवर ने अन्य यात्रियों को पहले ही समझा दिया था , तो दूसरे यात्री हमारे ऊपर हावी होने लगे। हमारे लिए चुप हो जाने के अलावा और दूसरा रास्ता नहीं था। क्योंकि बस को रवाना होने में कुछ ही समय बचा था , तो ड्राइवर ने में सिर्फ 15 मिनट का समय दिया।इतने कम समय में हम स्नान नहीं कर पाये, सिर्फ हाथ और मुंह पर गंगा जी का पानी लगाया और बस में बैठकर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। सच ही कहा है कि समय की कीमत पहिचाननी चाहिए।


सोमवार, 24 अप्रैल 2023

उम्मीद-- कविता

                                                                                          उम्मीद पर ही दुनियां कायम है, 

 कहते हैं कुछ सयाने लोग।

तो क्या उम्मीद को ही पाले रहूं,

 या निराशा में ही पहुंच जाऊँगा परलोक।  

उम्मीद ही तो पाल रखी है ,

जो जीने को करती है मजबूर।

 फिलहाल तो कुछ भी नहीं,

जिसे पाकर हो जाऊँ मगरूर।

पहले उम्मीद फिर इन्तेजार,

 यही करता हूं बार बार।

 प्रभु अब तो कर दो कृपा,

 हो चुका हूं बहुत बेजार।

रविवार, 23 अप्रैल 2023

  *** पवित्र  धागा  और  वादा***


भा ई बहन का नाता है अटूट,
इसमें न मिलावट न खोट।
इस रिश्ते को नवीनता देने
रक्षा बंधन का आता त्यौहार 
जिसका महत्त्व है इतना,
इन्सां के सोये दायित्व को
दे जाते हैं ये,
एक नई चेतना।
 मिला मुझे और ग्रहण किया
तुम्हारे स्नेह में भीगा
भ्राता  व भगिनी  के बीच
अटूट प्रेम को दृढ बनाने ,
भ्राता  को सर्व -संपन्न करने ,और
चतुर्मुखी उन्नति की कामना लिए
तुम्हारा पवित्र धागा।
मेरे दायित्व को
नई चेतना मिली ,
मैने जानी कच्चे धागे की मजबूती ,
भगिनी , मैं भी करता हूँ
हृदय की गहराईयों से
तुम्हारे प्रति अपना दायित्व,
निभाने का वादा।

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

धरती करे पुकार-- कविता (संशोधित)

 जन्म दात्री इस माटी का सम्मान करें,

सर्वप्रिय है जो देश हमें उसका गुणगान करें।

 आजाद हिंद के होंं सिपाही सेवा देश की कर जायें,

 मोह रहे न तन का प्राण न्योछावर कर जायें।

 गुलशन बन जायें हम भी देश में लायें बहार ,

पूर्ण धरा पर हरियाली कर दें धरती करे पुकार।


 मातृभूमि के जन-जन को नूतन जीवन दान करें,

 पाठ पढ़ायें ऐसा उनको भारत पर अभिमान करें।

 हटेंं ना पीछे कभी भी हम काम निराला कर जायें,

 हो जायें चाहे शहीद नाम देश का अमर कर जायें।

  बन जायें हम सब डोली उठाने को कहार,

उठाएं खुशहाली की डोली फिर धरती करे पुकार ।


 सर्वत्र देश का नाम हो ऐसा हम अभियान करें,

  सर्वमुखी प्रतिभा फैले जग में ऐसा हम अरमान करें।

 आभा से हो जाए पूर्ण सेवा ऐसी करते जायें,

सुवासित हो उपवन यह खून से इसे सींचते जायें।

 रोक न सके हमें नदियों की मझधार ,

 नैया देश की पार करें धरती करे पुकार।


वीर शहीदों ने सींचा इसको हम इसकी रखवाली करें,

संपन्नता से हो जाए पूर्ण फिर रोज हम दिवाली करें।

 ना रहे भूख कहीं भी अन्न इतना उपजायें,

 आंख उठाये दुश्मन जो सीमा पर डट जायें ।

गीत गायें और करें खुशहाली की नौका विहार ,

भारत मां के लाल हैं हम धरती करे पुकार।

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

दबी कुचली कलम- कविता

 मेरी कलम की धार थी बहुत ही तेज, 

 इसने अच्छे अच्छों के खोल दिए थे भेद। 

कोई फर्क नहीं पड़ता था कौन क्या है,

 नहीं जानती कौन कर्मचारी और कौन नेता है।

 अन्याय के खिलाफ इसने खूब आवाज उठाई है,

 रिश्वतखोरों,भ्रष्टाचारियों की साख मिट्टी में मिलाई है।

जैसे-जैसे मेरी कलम तेज और तेज चलने लगी 

 तो कुछ लोगों को यही कलम खलने लगी।

  कलम के निशाने पर थे वे करने लगे मंत्रणा,

सब मिलकर देने लगे इसे नाना प्रकार की यंत्रणा। 

 ऐसे सभी लोगों ने आपस में हाथ मिला लिए थे,

और मेरी कलम को दबाने के लिए तैयार हो लिए थे। 

 कुछ लोगों ने कहा दबाने से काम नहीं चलेगा,

 इसको कुचल देना ही बेहतर उपाय रहेगा।

 तब से दबाने और कुचलने का क्रम जारी रहा,

  बेचारी कलम पर चौतरफा दबाव बहुत भारी रहा। 

 बावजूद इसके अभी भी मेरी कलम बोलती है,

 कई सफेदपोशों के छुपे राज खोलती है ।

 चाहे लोगों को यही कलम अभी भी खलती है ,

 लेकिन यही दबी कुचली कलम अभी भी चलती है


मंज़िल तक-- कविता

 कौन कहता है की राह में चलना है आसान,

यहां पर पग पग पर पड़ता है व्यवधान ।

 यहां पर राही कभी गिरता भी है, 

 और फिर गिर कर संभलता भी है। 

 हौसले वाले राह की मुश्किलों से घबराते नहीं,

 घबराकर बीच राह में रुक जाते नहीं। 

वे जिन्हें होती हैं मंजिलों की तलाश, 

 हमेशा पाले रहते हैं मन में पूरी आस। 

 कभी मुसाफिर राह में भटक जाता है,

 उसे कहीं दोराहा या कहीं चौराहा नजर आता है ।

 जो अपनी सोच को दृढ़ निश्चय में बदल पाएगा, 

 वही बाधाओं को पार कर मंजिल तक पहुंच पाएगा। 

रविवार, 16 अप्रैल 2023

मैं चलूंगा मगर- - लघुकथा(संशोधित)

 *मैं  चलूंगा,मगर- -*

         सुभाष को कोई जवाब न देते हुए राम नारायण ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और कुर्ते की छोर से उसे पोंछने लगे ।उन्होंने  सुकेश को कहा कि आओ अंदर बैठते हैं फिर सोचते हैं। अंदर आकर राम नारायण  सोच विचार की ओर बढ़े और सुभाष के साथ हुए घटनाक्रम के दौर में पहुंच गए। 

  सुभाष का बेटा जर्मनी से आया हुआ था, उसने सुभाष को यहां का मकान बेचकर जर्मनी में ही आकर रहने के लिए कहा। सुभाष ने मकान तो नहीं बेचा, लेकिन वे दोनों पति-पत्नि, बेटे के साथ जर्मनी चले गए, लेकिन  ज्यादा समय तक वहां रह नहीं पाये। शुरू में तो उनकी बहू और बच्चों ने खूब आवाभगत की फिर धीरे धीरे उनका अनादर होने लगा। वह तो अच्छा था उन्होंने मकान नहीं बेचा था, तो वापस आकर इसी मकान में शांति से रहने लगे। 

  सहसा, राम नारायण ने अपना मुंह खोला - मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं तुम्हारे साथ जरूर चलूंगा । यह सुनकर कमल प्रसन्न हो गया और बोला, तो पिताजी सारा सामान पैक कर लेते हैं तो पिताजी  बोले-सारा सामान नहीं केवल कुछ ही , मैं सिर्फ 15 दिन वहां रहूँगा और तुम लोगों के साथ हंसी-खुशी यह समय व्यतीत कर वापस यहां आऊंगा। शेष समय यहीं पर बिताऊंगा ,अपने साथियों के साथ। विश्वास के साथ उन्होंने यह कहा, सुकेश उनका चेहरा देखता ही रह गया। 

 उसे शायद नहीं मालूम था कि दूसरों के अनुभव से भी सबक लिया जा सकता है। 


ismodse@dbcorp.in

शनिवार, 15 अप्रैल 2023

गाँव से शहर- कहानी

 सुभाष को कोई जवाब न देते हुए राम नारायण ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और कुर्ते की छोर से उसे पोंछने लगे,शायद उन्हें कुछ समय चाहिए था सोचने के लिए।उन्होंने सुभाष को आज नहीं जाने के लिए कहा और सुकेश को कहा कि आओ अंदर बैठते हैं फिर सोचते हैं। अंदर आकर उन्होंने  सुकेश को कहा कि जाओ, नहा धोकर तरोताजा हो जाओ, कुछ नाश्ता करेंगे और फिर बातचीत करते हैं ।सुकेश स्नानघर की ओर रवाना हो गया और राम नारायण  सोच विचार की ओर बढ़े और अपने सुभाष के साथ हुए घटनाक्रम के दौर में पहुंच गए। 

  सुभाष के एक बेटा और दो बेटियां थीं। दोनों बेटियों की शादियां,  शिक्षा पूर्ण होने के बाद, हो चुकी थीं और वे अपने परिवार में खुश थीं। सुभाष ने अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलवाई, वह एक कंपनी में इंजीनियर हो गया और 2 साल बाद ही जर्मनी में एक अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर वहां चला गया। पिछले 20 सालों से अपने परिवार के साथ वह वहीं पर था। पिछले वर्ष उनके बेटे ने उन्हें कहा कि आप और माताजी दोनों ही वहां बुढ़ापे में अकेले हैं काफी तकलीफ होती होगी, तो क्यों न आप लोग भी हमारे साथ जर्मनी में ही आकर रहें। वहां का मकान बेच देंगे और यहां पर थोड़ा बड़ा मकान ले लेंगे ताकि आपको और हमें कोई असुविधा ना हो।  बेटे की बात मानकर सुभाष ने  मकान बेचने की कोशिश की लेकिन समय रहते ऐसा नहीं हो पाया,और वे दोनों , बेटे के साथ जर्मनी चले गए। लेकिन  ज्यादा समय तक वहां रह नहीं पाये। शुरू में तो उनकी बहू और बच्चों ने खूब आवाभगत की ,बहुत आदर सत्कार किया। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे उसमें कमी आती गई। कभी-कभी तो किसी बात पर झगड़ते और अनादर कर बैठते। कुछ समय तो सुभाष और उनकी पत्नी ने यह सब बर्दाश्त किया लेकिन जब पानी सर से ऊपर गुजरने लगा तो वे वापस अपने देश लौट आए।  उन्होंने राम  नारायण को सारा वृत्तांत सुनाया। जो आप बीती सुनाई, उसके अनुसार--

  उन्होंने कहा कि शुरू शुरू में तो अतिथि तुम कब आओगे से शुरुआत होती है, फिर अतिथि आइए आपका स्वागत है ,अतिथि कब तक रहोगे ,फिर अतिथि कब जाओगे, फिर अतिथि जाते क्यों नहीं हो की भावना पनपती जाती है।  राम नारायण भाई तुम तो समझ सकते हो कि जो बेलगाम रहे हों, थोड़ा सा भी लगाम उन पर कस दी जाए,  यानी उनकी स्वतंत्रता में थोड़ी सी भी बाधा आ जाए तो वह सहन नहीं होता और धीरे-धीरे तकरार होने लगती है और बढ़ती ही जाती है। वह तो अच्छा था हमने मकान नहीं बेचा था, तो हम वापस आकर इस मकान में शांति से रह रहे हैं। 

 थोड़ी देर में सुकेश स्नानादि से निवृत्त होकर पिताजी के पास आकर बैठ गया। इस बीच पिताजी ने चाय बना ली थी और साथ में बिस्किट रख दिए थे ।चाय की चुस्की लेते हुए फिर से  सुकेश ने पूछा - तो पिताजी सामान पैक कर लें, चलना ही है ।पिताजी ने तसल्ली से कहना  शुरू किया- देखो बेटा तुम लोग वहां शहर में बसे हुए हो,  तुम्हारी मां को गुजरे हुए भी कई साल हो चुके हैं,मैं यहाँ शांतिपूर्वक अपना बुढ़ापा गुजार रहा हूं,  मुझे किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं है घर की सफाई,खाना बनाना ,बर्तन आदि के लिए एक महिला लगा रखी है जो वह यह काम कर जाती है बाकी मेरे हम उम्र साथियों के साथ समय गुजर जाता है। मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं तुम्हारे साथ जरूर चलूंगा । यह सुनकर कमल प्रसन्न हो गया और बोला तो पिताजी सारा सामान पैक कर लेते हैं तो   पिता जी  बोले-सारा सामान नहीं केवल कुछ ही , मैं सिर्फ 15 दिन वहां रहूँगा और तुम लोगों के साथ हंसी-खुशी यह समय व्यतीत कर वापस यहां आऊंगा।   शेष समय यहीं पर बिताऊंगा अपने साथियों के साथ। विश्वास के साथ उन्होंने यह कहा, सुकेश उनका चेहरा देखता ही रह गया। 

 उसे शायद नहीं मालूम था कि दूसरों के अनुभव से भी सबक लिया जा सकता है।


ismodse@dbcorp.in

बैचेन दिल- कविता

 मेरे बेचैन दिल को कभी तो करार आएगा, 

 वह कभी तो मेरे पास होकर बेकरार आएगा।

 वह पल होगा कितना हसीन सोच रहा हूं मैं,

जब उसके आने से मेरा जीवन संवर जाएगा। 


 कितनी हसरतें जीवन में पाल रखी थी मैंने,

 बड़े जतन से दिल में संभाल रखी थी मैंने।

 उसे शायद अंदेशा भी न हो इस बात का, 

   अपनी हसरतें अभी तलक जवान रखी थी मैंने।

अंधा युग-- कविता

   देखो जी यह कैसा अंधा युग अब आया है, 

 अपराध करे कोई, किसी और को अपराधी दिखलाया है। 

 मंजिल तो सबकी एक सभी यह जानते हैं, 

 लेकिन एक साथ चलना कहां चाहते हैं।

 कुटिल लोगों के मन में भ्रम जाल है बड़ा रचा हुआ, 

  सबके मन में निज स्वार्थ है कूट-कूट कर भरा हुआ। 

 निजी स्वार्थ के खातिर अपनों को तो छोड़ दिया, 

 अपनों से जो नाता था पल भर में तोड़ दिया ।

चलता है जमीन पर देखता है आसमान की ओर, 

 ऐसे लोगों के स्वार्थ का नहीं होता कोई भी छोर।

आंख सजल हो जाए किसी का दुःख दर्द देखकर,

दिल जिनका भर आए  किसी को विपत्ति मे देखकर। 

 इंसानियत जिनमें नजर आ जाए ऐसे लोग मिलेंगे कम,

 हैवानियत का तो बोलबाला है यही है सबसे बड़ा गम। 

 गलत तो नहीं कहते लोग कि यह कैसा अंधायुग आया है,

  सच कहते हैं कि कलयुग आया है, कल युग आया है।

राज श्री का प्रयोग- कविता

 सुना है राज श्री नया आयाम दे रहा है,

  अपने रचनाकारों को पैगाम दे रहा है।

 हर एक कर रहा है यहां अपनी कीर्ति स्थापित,

  और हो रहा है काव्य जगत में आच्छादित ।

 बढ़ाया है कलमकारों को देकर अलग मान,

  सब पा रहे हैं संस्था से भरपूर सम्मान।

राज श्री की है कोशिश मिले सबको खूब पहचान,

  चढ़ते जाएंगे एक के बाद एक कई पायदान। 

 मुश्किल राहें हर एक की  हो रही यहां आसान,

  वह दिन दूर नहीं जब कई  तो छू लेंगे आसमान।

 नई-नई प्रतियोगिता कर, कर रही नया आगाज, 

  रचनाकारों को आगे बढ़ने को दे रही आवाज। 

 राज श्री दैनिक कार्यों से होती शुभ प्रभात, 

  शुभ प्रभात से ही होती दिन की शुरुआत। 

अपने मन की,अपने दिल की रखते यहां सब बात,

कविता ग़ज़ल गीत कहानी से कहते मन के ज़ज्बात।

 राज श्री उमंगों की है बन रही नया सवेरा,

  ये ही उमंगें कर रहीं सबके दिलों में बसेरा।

 दे रहे अपना समय,सभी सदस्य पूर्ण सहयोग,

  खूब सफल रहा है राज श्री का य़ह प्रयोग।

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

कुत्ते जैसी जिन्दगी चाहिए- लघुकथा(संशोधित)

 फटे पुराने कपड़े पहने हुए, बाल पूरी तरह बिखरे हुए, कई दिनों से नहीं नहाया हुआ, वह बालक टकटकी लगाए गाँव में हो रही शादी के   मुख्य दरवाजे के पास खड़ा हुआ था, जहां एक शादी का भोजन चल रहा था।लोग तरह-तरह के पकवान अपनी प्लेट में लेकर स्वाद से खाए जा रहे थे।वह सोच रहा था कोई तो ऐसा हो जो एक प्लेट में सारे नहीं तो कुछ ही,  रख कर मुझे दे जाए ।उसकी सोच भंग हो  गयी , जब दरवाजे पर खड़े गार्ड ने डंडा घुमाते हुए उसको वहां से भाग जाने के लिए कहा । वह वहां से चल दिया लेकिन आगे जाकर रुक गया जहां पर बची हुई जूठन फेंकी जा रही थी । उसने देखा कि एक कुत्ता वहां पर कुछ खा रहा था। बच्चे ने सोचा कि मेरे खाने लायक भी जरूर होगा। मैं भी खा सकता हूं, यह सोचकर वह जूठन में से कुछ उठाकर खाने लगा। वहाँ से गुज़रते हुए कुछ संभ्रांत व्यक्तियों ने जब उस बच्चे को झूठन खाते हुए देखा तो उन्हें लगा कि यह खाकर बच्चा बीमार पड़ सकता है। यह सोच उन्होंने उसको वहां से भगा दिया। बच्चे की आंखों में आंसू आ गए ,रोते हुए उसने भगवान से कहा- हे भगवान तूने मुझे कहां लाकर डाल दिया ,न अंदर  खाने को मिलता है और न बाहर। कुत्ते से बढ़कर क्यों दी मुझे , कम से कम कुत्ते जैसी जिंदगी तो देता, उसके साथ,मैं भी खाता और कोई नहीं भगाता। 

सागर जैसी आंखों वाली - गाना (संशोधित)

 हो, चेहरा है या चाँद खिला है

ज़ुल्फ़ घनेरी शाम है क्या

सागर जैसी आँखों वाली

ये तो बता तेरा नाम है क्या


चेहरा है या चाँद खिला है

ज़ुल्फ़ घनेरी शाम है क्या

सागर जैसी आँखों वाली

ये तो बता तेरा नाम है क्या


 जब से देखा तुझको जानम,

 क्या-क्या ख्वाब सजे दिल में।

 रातों में तो नींद नहीं 

सपने देख रहे थे दिन में।


 सपनों का तो छोर नहीं है, 

 एक दरिया सा बह जाए।

 दिल में जो फूल खिला है,

 वह एक गुलशन बन जाए।


 दिल तुझ पर आ ही गया,

 अब तू ही बता यह राज है क्या।

 सागर जैसी आंखों वाली यह तो बता तेरा नाम है क्या 

 तेरी खातिर छोड़ दिए अब,

 सब अपने बेगाने हुए ।

दिल में राज छुपे थे जो,

 वो सब अफ़साने हुए।

  सामने आकर नजर मिला ले, 

    मिलने से क्यों डरती है ,

  तेरे लिए तो प्रेम की धारा ,

 झर झर करके बहती है। 

 अब तू ही बता दे मुझको,

 नाम तेरा गुमनाम है क्या

सागर जैसी आंखों वाली यह तो बता तेरा नाम है क्या 

नारियां -- गीत(संशोधित)

 इस धरा के हर कोने पर,

हर क्षेत्र में हैं नारियां।

भूभाग पर ही नहीं ,

अंतरिक्ष में भी नाम लिखाती नारियां। 


 सागर की गहराई या पर्वत की ऊंचाईयां,

हर जगह इतिहास बनाती नारियां। 

घर में मां की सहायक बनतीं, 

पापा को भी राह दिखाती नारियां ।

इस धरा  के हर कोने पर,  हर क्षेत्र में है नारियां। 



माता-पिता से शिक्षा पाकर,

 संस्कारित होती नारियां।

 ससुराल में जाकर भी,

परिवार का मान बढ़ाती नारियां। 

इस धरा के हर कोने पर,हर क्षेत्र में है नारियां।


स्वयं बेटी,मां,दादी,नानी ही नहीं,

 संसार की जननी होती हैं नारियां,

जो न होतीं जगत में नारियां।

 तो नवरात्र में कहां से आती नौ देवियां। 

इस धरा के हर कोने पर ,हर क्षेत्र में है नारियां।


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

बेटा या बेटी- लघु कथा

 सुंदरलाल जी को पूरी आशा थी कि पहली लड़की के बाद अब उनके घर में लड़के का ही आगमन होने वाला है। उनकी पत्नी के पेट का आकार देखते हुए कुछ जानकार महिलाओं का यही कहना था।  लेकिन हुआ वही जो विधाता को मंजूर था, घर में दूसरी लड़की ही आ गई।सुंदर लाल जी को थोड़ी मायूसी तो हुई लेकिन उनकी पत्नी मोहिनी जी ने कहा कि कोई बात नहीं लक्ष्मी ही तो आई है। सब अपना भाग्य अपने साथ लेकर आते हैं। सुंदरलाल जी की एक सरकारी विभाग में साधारण नौकरी थी लेकिन उनकी आय से घर का खर्च आराम से चल जाता था। होनी को कुछ और ही मंजूर था 2 साल बाद ही उनको गंभीर बीमारी हुई और वह चल बसे।  उनकी जगह उनकी पत्नी मोहिनी को विभाग में नौकरी मिल गई और इस तरह घर परिवार का खर्चा चलता रहा। दोनों बेटियां अच्छी पढ़-लिख गई थीं। बड़ी बेटी की शादी एक अच्छे परिवार में हो गई।कुछ वर्षों के बाद छोटी बिटिया के लिए भी रिश्ता आया।  लड़का और उसके माता-पिता उसे देखने आए हुए थे। अन्य औपचारिकताओं के बाद बिटिया से पूछा गया कि तुम क्या चाहती हो, तो उसने कहा कि मेरा स्पष्ट विचार है की शादी के बाद हम लोग यहां, मेरी मां के साथ रहेंगे। ये यहां पर घर जमाई नहीं बल्कि बेटा बन कर और मैं बेटी नहीं बल्कि बहू बनकर मां की सेवा करेंगे और इस तरह से जीवन की गाड़ी आगे बढ़ाएंगे।  किसी के पास भी, ना करने का कोई अवसर नहीं था। 

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

जीने का अंदाज- कविता

 भुला कर हर बात,नई जिंदगी शुरू कीजिए,

 जो कुछ बुरा हुआ उसे बस दफना दीजिए।

 समझ लीजिए वह एक बुरा सपना था,

 वह तो मात्र कल्पना थी कहां अपना था। 

 फिर से अजनबी बन कर, फिर से मिलिए,

 और फिर कदम से कदम मिलाकर साथ चलिए।

  मेरे जीने का अंदाज तुम्हें भी भा जाएगा,

 सुख जो दूर था वह पास आ जाएगा।

 गमों में चूर रहने की जरूरत क्यों है,

 आखिर उनसे रूबरू होने की फ़ुरसत क्यों है।

 कल जो हुआ सो हुआ, जाने दो,

 भूल जाओ , जो हुआ उस फसाने को।

 अब हमें कल को खुशनसीब बनाना है,

 दुखों की काली परछाई को दूर हटाना है।

 आने वाले कल के लिए ताना-बाना बुनना है

  जीवन के विशाल समंदर से हमें मोती चुनना है। 

इंसान बन गया- कविता

  इंसान हूं इंसानियत मुझ में भरपूर है,

 आदमी तो आदमीयत के नशे में चूर है।

 क्या दुनिया में  बस यही है दुनियादारी, 

 नहीं बची है किसी में अब ईमानदारी।

 जमीर तो हर किसी ने जैसे बेच खाया हो,

 दया ,पराया दर्द जैसे अपने से दूर हटाया हो।

 खुदगर्ज इतना कि खुद ही नजर आता है,

 हर दूसरा उसको पराया ही नजर आता है।

 बहुत कोशिश की थी मैंने आदमी से इंसान बनने की,

 ठान लिया था मैंने जो बनना था बनने की। 

 मुश्किलों से भरा सफर था आदमी से इंसान बनने का,

 पर जिंदगी में ध्येय तो यही था कठिन काम करने का। 

 सभी बाधाओं को पार कर आखिर में इंसान बन ही गया,

 आखिर जो बनना था वह मैं बन ही गया। 

सोमवार, 10 अप्रैल 2023

आवाज तो दी होती- कविता

 मुड़ना  फिर पीछे देखना,

यह हमारी फितरत में नहीं।

लेकिन हम अपनी फितरत भी बदल डालते 

 एक बार आवाज तो दी होती। 

 मोहब्बत तो खूब करते हैं हम तुमसे,

 हमारी मोहब्बत का कोई सानी नहीं।

यही मोहब्बत जागती है रात भर,

 पल भर को भी यह नहीं सोती। 

 हम तुम्हें मानते हैं बगिया का एक महकता फूल,

  हवा का झोंका  महका देता है मेरे मन को।

 तुम्हें चाहे कली से बनता फूल कहूं 

 या फिर सीप में पड़ा खूबसूरत मोती। 

अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है मुझे,

 तू चाहे उजाले में विचरण करती रहे। 

 नहीं है मुझे फिर भी कोई भी गम,

मैंने मान लिया तुझे मेरे जीवन की ज्योति।

स्कूल चले हम- कविता

 होता यह गर स्कूल मैं नहीं जाता,  

 समझ लो मैं अनपढ़ ही रह जाता। 

 मम्मी मेरी अल सुबह ही उठ जाती है, 

 उठकर जल्दी ही हमारा टिफिन बनाती है।

 पीली यूनीफॉर्म पहिन कर हम तैयार हो जाते हैं, 

 और पीला ही स्कूल बैग कंधों पर टांगते हैं।

 मम्मी का हाथ पकड़कर हम दोनों चल देते हैं,

 लेकिन आगे-पीछे और दाएं-बाएं भी देखते हैं।

 पढ़-लिख कर हम पढ़े लिखे हो जाएंगे, 

 और छोटे बच्चे से एक दिन ऑफिसर हो जाएंगे। 

 शिक्षा से ही हम इंसान बन पाएंगे,

 वरना तो ऐसे ही गंवार रह जाएंगे।

शनिवार, 8 अप्रैल 2023

डाली से टूटा फ़ूल- कविता

 टूटकर फूल डाली से कुछ परेशान है,

 क्या पड़ा रहेगा वह जहां है,

  इस जहान में उसकी क्या गति होगी,

  गंतव्य उसका आखिर कहां है।


 बड़ा खुशनुमा माहौल था,

 जब वह कली बनकर आया था ।

देखकर यहां का सुहाना मंजर, 

 फूला नहीं समाया था।


 कसूर क्या था आखिर उसका,

वह तो अपनी खुशबू ही बिखेर रहा था।

 अपनी उपस्थिति से इस जहान का,

   अप्रतिम सौंदर्य ही बढ़ा रहा था। 


अब ना जाने उसकी मंजिल क्या होगी, 

 क्या उसका रुप ही बदल दिया जाएगा।

 जैसा कुछ कलियों और फूलों के साथ हुआ,

  क्या उसे भी वैसे ही मसल दिया जाएगा।

 

  क्या किसी माला में गुंथ कर,

  किसी के गले की शोभा बढ़ाऊँगा,

  या फिर ऐसे ही किसी मंदिर में,

  ईश्वर के सम्मुख चढ़ा दिया जाऊंगा।

 

 हो सकता है किसी मैयत पर जाऊं,

 बड़े ही पशोपेश में पड़ा हुआ हूं।

  कितना बैचेन और  असहाय हूं,

   मैं एक फूल डाली से तोड़ा हुआ हूं। 


मुसाफिर हूं- कविता (संशोधित)

 मुसाफिर हूं यारों मुझे चलते रहना होगा,

कई  कई मुश्किलों से लड़ना होगा।

 बाधाएं तो राहों में आएंगी अनेक,

 हौसले से बाधाओं को पार करना होगा।

 मुश्किलों में जो डालना चाहें हमें,

  उन्हें सबक सिखाना होगा।

मंज़िल तक पहुंच गए ग़र,

 तो ध्येय पूर्ण हमारा होगा।

 सपना देखना भला किसे बुरा लगे,

 बुरे सपने से नहीं डरना है,

मन में उत्साह भरा ग़र,

सपना पूरा अपना होगा। 

मंजिल कितनी भी दूर ही सही,

 अनंत तक तो नहीं चलना है।

 चलते रहना है, बस चलते रहना है 

  और अंततः अपनी मंजिल तक पहुंचना है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

कयामत-- कविता

  यूं न सितम ढ़ाओ इन प्यार  के मारों पर,

 तुम्हारी राह में फूल बिछाते इन कुंवारों पर।

 बहुत बेजार हो चुके हैं तुम्हारे इन्तजार  में,

अब तो कुछ तो रहम खाओ हम बेचारों पर।


कली-कली,फूल-फूल चमन में खिल गये,

पर देखे थे जो ख़्वाब वो सब अधूरे रह गये,

तुमने कहा था आज तो आने को,

पर हम फिर राह तकते रह गये।

 

  मैं तो यहां हूं और तुम न जाने कहां,

 ढूंढा था हमने तुम्हें यहां और वहां।

 कर दो अब तो इस इंतजार की इन्तहाँ,

 तभी बस  पाएगा हमारे दिल का जहां।


 न जाने क्यों हमें तुम्हारी याद आती है,

जमीं से आसमांं तक यही फरियाद आती है,

चले आओ अब तो सभी फासले मिटा कर,

अब तो रोज कयामत की रात आती है।


 बड़े जतन से कमाई थी इज्जत  मैंने,

 जाने क्यों वह इसे घटाना चाहता है। 

 बहुत कुछ किया मैंने जमाने के लिए,

 पर जाने क्या मुझसे जमाना चाहता है।

 दिलों में छाया अंधेरा अपनों में ही,

जाने क्यों इसे बढ़ाना चाहता है 

 तिल तिल जलकर घर को रोशन किया।

जाने क्यूँ शमा को बुझाना चाहता है ।

लाख समझा लो तुम किसी को,

 पर वह कहां मानना चाहता है।

 बड़ा बेरहम है यह जालिम जमाना, 

 बस अपनी ही चलाना चाहता है। 


सोमवार, 3 अप्रैल 2023

तूझे छू कर आती हवा- कविता

 छू कर तुम्हें गुजरना हवा का,

 निशब्द कर जाता है मुझे।

 क्या गुजर जाती है तब मुझ पर,

 यह कैसे पता होगा तुझे।

  एक नजर ही तो देखा था तुझे,

 तब से मुझ में जग उठी थी तेरी चाह।

 तेरे दिल तक पहुंचने की ढूंढ रहा था,

  कोई तो होगी बस एक तो राह।

 छोटी सी गुजारिश है तुझ से,

 एक नजर से उठाकर देख ले जरा।

 दिल में मेरे कैसे तूफान उठ रहे,

तुझे तो कैसे मालूम होगा भला।

 तुझे छू कर आती है जो हवा,

 उस हवा की महक मुझे महका जाती है। 

 तुझसे मिलने की जो चाहत है,

 मेरे दिल को वो बहका जाती है

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

मुक्तक

 अहसान फरामोश लोगों से दूर रहना गवारा है,

 जिसके मन में हो अपनापन वही हमारा है।

 मुरली वाले के द्वार आ पड़ा हूं मैं, 

 बुढ़ापे की यही लाठी यही मेरा सहारा है।


दुनिया में दिख रहा क्या क्या नजारा है,

किसी को उजाड़ा तो किसी को संवारा है।

मैंने तो जीवन कर दिया श्याम के हवाले,

बुढ़ापे की यही लाठी यही मेरा सहारा है।


कर्म करें ऐसा ना किसी की हानि हो,

 हर्षित हो, मन में ना कोई ग्लानि हो।

 सर्व हित ही कार्य करेंगे हम,

न किसी भी रुप में मनमानी हो।

 मन से सभी विकार दूर करें,

 बस परमेश्वर के ध्यानी हों।

जिसे अपना समझता हूं वही तो घात में बैठे,

 बिन बुलाए ही वो मेरे जज्बात में बैठे।

बहार लाये थे जो मेरे मन उपवन में,

वही तो अब बन दुस्वप्न रात में बैठे।

तुम्हीं से कुछ जरूरी बात करनी है।

जो नहीं करी अब वह बात करनी है।।

 दिन तो ढल जाता है यूं ही यादों में।

 अब प्रतीक्षा तुम्हारी हर रात करनी है।।

ना किया हमने इश्क जब उम्र थी करने की,

हूक उठनी थी जब ,किसी पर मरने की। 

इश्क का भूत तो अब उतर ही गया ,

जब उम्र हो गई बिजली,पानी का बिल भरने की।।

गम में जो गर गमजदा हो गए,

तो अपने आप गुमशुदा हो गए,

मुस्कुरा कर जो हल खोज लिया,

तो समझो तुम खुदा हो गए।।



पल भर में बिखर जाते हैं जन्मों के रिश्ते ,
राम करे मिलके ना बिछड़े कोई भी ऐसे।
वादे किये थे जिंदगी भर साथ निभाने को,
 बुने थे जो सपनों के चादर बन गए है रेशे।

गृह नक्षत्र भी मिल जाते