जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे,
मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा।
नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा,
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर,
कुछ तेरूंगा और डूब जाऊंगा।
मैं तो ठहरा एक ठहरा हुआ पानी,
नदी के जल को कहां है फुर्सत रुकने की।
वह तो अविरल बहता ही रहता है,
कल कल मधुर संगीत सुनाता रहता है।
यदि मैं ऐसे ठहरा ही रहा तो,
जल जैसा मन प्रदूषित हो जाएगा।
ग़र नदिया से जो जा मिलूंगा,
तो मन स्वच्छ पारदर्शी हो जाएगा।
एक उफनती नदी को कहां है फुर्सत,
कि वह कुछ पल भी ठहर जाए,
वह तो अविरल चलने की आदी है,
अपने जल को यहां से वहां पहुंचाती है।
अपने मन के भावों को अपने में ही न सिमटा लूं,
उदार दिलों से मिलकर अपने भावों को विस्तार दिला दूँ।
वे न आएं मेरे पास तो न आएं,
मैं तो किंचित भी नहीं सकुचाऊंगा।
मैं उनसे मिलने की खातिर,
उनके पास चला जाऊंगा।
Ckkk- मासिक
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