मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

नहीं मिलता बुजुर्गों को यथोचित सम्मान

          नहींं मिलता बुजुर्गों को यथोचित सम्मान

"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" बड़ी कोफ्त होती है ,दिल में गहरी टीस उठती है , उदासी छा जाती है मन पर- यह सोचते हुए कि आखिर आज के जमाने में , बुजुर्गों को वह यथोचित सम्मान क्यों नहीं मिल पाता , जिसके कि वे हकदार हैं । जन्म से युवा होने तक जो मां-बाप अपरिहार्य होते थे वे अब परिहार्य कैसे हो गए हैं । कहा यही जाता है कि बचपन व युवा अवस्था, चाहे कैसी भी गुजरे ,लेकिन वृद्धावस्था, किसी भी व्यक्ति की ,सुख व शांति से गुजरनी चाहिए । लेकिन कई बुजुर्गों के साथ एेसा नहीं हो पाता ।आईये , हम कुछ उदाहरणों से देखें कि , बुजुर्गों को कैसी-कैसी अवस्था से दो चार होना पड़ता है ।

1) एक  बीमार और विक्षिप्त बुजुर्ग को ,उसके दो बेटे एक कार में लेकर आते हैं और सड़क के किनारे , सुनसान जगह पर डाल कर चले जाते हैं । एक राहगीर उन्हें देखकर पुलिस में खबर करता है , पुलिस वाले उसे उठाकर ले जाते हैं और पूछताछ करने पर वह अपना पता बता देते हैं । पुलिस वाले उन्हें वापस अपने बेटों के पास पहुंचाते हैं और हिदायत देते हैं कि उन्हें ठीक से रखें ।

 2)  एक बुजुर्ग मां बाप को , एक बेटा अपने घर से बाहर निकाल देता है ,सामान सहित । वह बुजुर्ग दम्पति मकान के बाहर , फुटपाथ पर ही डेरा जमा लेते हैं । यह खबर जब एक स्वयंसेवी संस्था को लगती है तो उसके नुमाइंदे आते हैं और उस दंम्पति को अपनी संस्था में ले जाते हैं । बाद में उनके बेटे को समझा बुझाकर दंम्पति को वापस घर पहुंचाते हैं ।

 3) एक उच्चाधिकारी के स्वर्गवास के बाद, उनकी पत्नी को बेटा  और बहु मिलकर अपने मकान के "गैराज पोर्शन" में रख देते हैं और सुबह शाम खाने की थाली वही पहुंचा दी जाती है ।  एक महिला को नौकरी पर रखा जाता है ,जो दिन भर उन की देखभाल करती है । मां का इमारत के मुख्य भाग में आना -जाना मना है ।

  ये तो वे घटनायें थीं जो समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी हैं । इसके अलावा ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलते हैं  कि एक ही सन्तान होने के बावजूद भी बुजुर्गों को अलग से किराए से मकान लेकर रहना पड़ता है । एक से अधिक सन्तान होने पर भी कुछ , बहानाबाजी करते हुए, बुजुर्गों को अपने पास नहीं रखना चाहते । कहते हैं कि दो बर्तन पास पास होंगे तो टकरायेंगे ही और आवाज भी करेंगे ।।लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि एक बर्तन को उठा कर घर से बाहर कर दिया जाए । यह भी सही है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती । ताली किसी की प्रशंसा करने के लिए बजाई जाए तो सही है , लेकिन डराने या भगाने के लिए बजाई जाए तो किसी भी रुप में सही नहीं मानी जा सकती । ताली बजाने के लिए दोनों हाथ आमने सामने आते हैं और टकराते हैं । कभी ऐसा भी होता है कि दायां हाथ अपनी जगह पर है लेकिन बाया हाथ पूरी दूरी तय करके उससे टकराता। है । कभी ऐसा भी होता है कि बायां हाथ तो अपनी जगह पर है और दायां हाथ पूरी दूरी तय करके उससे टकराता है । आखिर कौनसा हाथ है दोषी ? आज का युवा वर्ग या फिर बुजुर्ग स्वयं ? विषय गंभीर है और इस पर चिंतन , मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता है । मैंने तो ऐसा किया है । क्या आपने भी इस बारे में विचार किया है या करेंगे ? मेरा आप से अनुरोध है कि , इस विषय पर आप भी चिंतन , मनन और विश्लेषण करें और जो निष्कर्ष निकले ,उसे मुझे प्रेषित करें , ताकि मेरे विचार ,जो उपग्रह की भांति शून्य में विचरण कर रहे हैं उन्हें दिशा और गति मिले और वे धरा पर आते हुए आलेख का रूप ले सकें ।आपके और हमारे विचारों से ऐसा आलेख तैयार हो ,जिसके पठन से ,यदि स्थिती में कुछ सुधार आ जाये , तो यह एक सकारात्मक कदम होगा ।         

  सतीश कुमार गुप्ता

अभागन

          .    (एक मार्मिक लघुकथा) 

     अरे ओ बंसी , जा रस्सी लेकर आ और बांध दे इसके हाथ और पैर । आज फैसला हो ही जाए , दो  साल से खुद तो फोकट का खा ही रही है और एक बच्चा और पैदा कर दिया, इसको भी हम ही खिलाते रहें, हराम का पैसा है क्या हमारे पास , इसका बाप तो आगे कुछ देता नहीं । कहा था हमने,  जो दिया था.वह क्या जिंदगी भर चलेगा ? दो लाख और दे दो लेकिन , इसके बाप के कान में जूं भी नहीं रेंग रही, आज तो अंतिम फैसला होकर ही रहेगा । बंसी ने जैसे ही उसके हाथ और पैर बांधे , मां के कहने पर सबसे पहले बंसी ने ही उद्घाटन किया और  डंडे मार मार कर अपनी पत्नी को बेहाल कर  दिया । फिर मां डंडा अपनी बेटी को देते हुए  बोली , ले अब तेरा नंबर आ गया , मोबाइल चाहिए था ना तेरे को , नहीं मिला , तो दे दे अब सजा । और बेटी शुरू हो गई- दे दनादन, दे दनादन  । मां ने अब बेटी से डंडा लेकर बेटे को दिया और कहा- ले तेरे को मोटरसाइकिल चाहिए थी ना , नहीं मिली तो ले तू भी ले बदला । देवर ने भाभी की मार मार कर चमड़ी उधेड़ दी । मां ने छोटे बेटे से डंडा लेकर फिर से बंसी को देते हुए कहा कि,ले और अब अंतिम क्रिया कर ही दे ।बंसी ने डंडा उठाया और पूरे वेग से उस "अभागन" के सिर पर मार दिया । बेचारी बहू अब अंतिम सांस तक पहुंचते पहुंचते , मन ही मन बुदबुदाई - पिताजी मुझे माफ कर देना , मैं असमय.ही जा रही हूं , मैं आपको कंगाल नहीं कर सकती थी और इसीलिये मैंने आपको ,  इनकी मांग पूरी करने को मना किया ।  पिताजी , आपने कहा था कि बेटी खड़ी हुई ससुराल जाती है  और वहां से निकलती है- लेटी हुई । मुझे संतोष है कि मैंने आपका कहा पूरा किया । एक हिचकी आई और बस - - - - -

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

भगतराम.का भविष्य फल

😀भगतराम का भविष्य फल 😀

भगतराम जी कर चुके थे बी ए पास,
 घूम रहे थे नौकरी की दिल में लेकर आस।
 चाह रहे थे होना अफसर पर थी लाचारी ,
किस्मत पर लौट रही थी बेकारी ही बेकारी ।
तभी अचानक एक ज्योतिषी दिख आया,
देख भगतराम ने उसको अपना भाग्य आजमाया ।
पूछा, बोलो होगी कैसे मेरी नैया पार,
 या पड़ा रहूंगा मैं तो यूं ही बेकार।
 देखी चट से ज्योतिषी ने हाथ की रेखाएं ,
बोला तुझे भाग्य से है बड़ी-बड़ी आशाएं ।
आई है क्यों मुख पर तेरे निराशा घोर,
होंगी बस ट्रक औ कारें तेरे चारों ओर ।
 यह सुनकर भगत राम जी अति ही हर्षाये ,
निकाल जेब से रुपए दस भेंट तुरंत कर आये ।
 सोचा उसने, कितना खुश नसीब मैं हो जाऊंगा ,
बस ट्रक औ कारों का मालिक बन जाऊंगा ।
मिली नौकरी भगतराम को खत्म हुई निराशा ,
  पर वह इससे रख सकता था रोटी की ही आशा।
  एक रोज फिर उसे वही ज्योतिषी दिख आया,
 दौड़ तुरंत ही वह उसके पास आया ।
बोला सोचा था मैंने सैर करूंगा कारों पर ,
 पर ट्रैफिक कंट्रोल कर रहा मैं चौराहों पर ।
 ज्योतिषी था तेज बोल उठा जल्दी से,
  तू सोच रहा है बता दिया था तुझे गलती से ।
 सुन चौराहे पर ड्यूटी जब तेरी रहती है ,
तब क्या बस,ट्रक ,कारें चारों ओर नहीं रहती है
😀😀😀😀😀😀😀

बहार

☘बहार ☘

उपवन के विकसित फूलों की खुशबू , 
 महक निराली मेरे दिल को दे जाती है ।
 सावन के झोकों से, पेड़ों के झुरमुट से, 
 वीणा मेरे दिल की बजा वो जाती है ।

 बहारों का साया है उपवन के आंगन में,
 श्रंगार दुल्हन सा कर जाती है ।
 सजाती है जैसे मांग में सिंदूर, 
 अंखियों में काजल लगा जाती है ।

रसपान करते रहे भौंरे फूलों के तन पर, 
 महक और उनकी महकती जाती है ।
 चाहें ना हम महक से कुछ भी,
  फिर भी चाहत बस बहकती जाती है ।

 उपवन से उठकर,झोकों के बल पर,
 बहार मेरे दिल में आ ही गई ।
  न रह मुरझा कर खिल तू जा , 
 बात मेरे दिल को सिखा वह गई ।


प्रलय के राग

प्रस्तुत है , स्वरचित एक कविता जो आज के माहौल में प्रासंगिक है ।
         🔥प्रलय के राग🔥

क्रांति की बेला क्योंकि करने लगी पुकार,
  लेखनी फिर आज मेरी गाने लगी प्रलय के राग।
 याद वो हैं आ रहे आग में जो लौह थे ,
 दुश्मनों की चाल में बन  रहे अवरोध थे ।
 उठी तलवार जो किसी की बन रहे वो ढाल थे,
  टूट पड़े रणभूमि में वो बन कर काल थे।
 नेत्र दृष्टि से उनकी बिखर पड़ी थी आग-आग,
  लेखनी फिर- - -
 पायलों की झनकार सुन ज्यों रोम-रोम फड़क उठे,
 घायलों के घाव यों और भी असर करे ।
आंख चाहे राह ढूंढे बांह चाहे साथ छोड़े ,
 घास की हों चाहे रोटियां पर मान का लिहाफ ओढ़े ।
 हिल उठे थे सुषुप्त मन भी सुनी जब रण की हुंकार,    लेखनी फिर- - -
 मातृभूमि को देखता है कौन गिद्ध दृष्टि से,
 वरद् हस्त मिला हुआ है जिस धरा को सृष्टि से।
 कौन है जो मूर्ख बन स्वप्न में इतरा रहा,
  बार-बार रेत में नादान महल बना रहा ।
 जल रहे हैं इस ह्रदय में देश प्रेम के चिराग,
 लेखनी फिर  - - -
 पर्वतों की श्रंखला और सागरों की मौज में,
 घूमता है मन मेरा आज किसी की खोज में।
आग लगा दे मन में भाव ऐसे मिल सकेंगे ,
 चेतना मिल जाए ऐसी लोग सोते जग सकेंगे ।
 बहार ऐसी लाऊंगा मैं वन बनेंगे बाग-बाग,
 लेखनी फिर- - -
 झंझावात उठ रहे अनगिनत तुम अभी तक सो रहे ,
 मृग-मरीचिका सी दुनिया में उतर कर खो रहे ।
 भुजाएं फड़क न उठी तुम्हारी सुनकर धरा की कराह,
  तुम्हारे इस मौन पर भर सकूंगा मैं मात्र आह ।
  कुंठित सुरों के हर साज के गूंज उठेंगे तार-तार,
  लेखनी फिर- - -
 गदा उठाकर भीम और धनुष उठा अर्जुन बनो,
पर्वतों को तोड़ सको और बिंदु को भी भेद दो।
  ठोकर तुम्हारी जहां पड़े जलधार वहां फूट पड़े,
  क्रोध दृष्टि पड़े जिधर कहर वहां टूट पड़े ।
 नैन मल के सो ना फिर
उठ जवान जाग-जाग,
लेखनी फिर आज मेरी गाने लगी प्रलय के राग ।

रचयिता --
 सतीश कुमार गुप्ता
मानसरोवर , जयपुर ।
9414047338