शुक्रवार, 31 मार्च 2023

मुक्तक

 अहसान फरामोश लोगों से दूर रहना गवारा है,

 जिसके मन में हो अपनापन वही हमारा है।

 मुरली वाले के द्वार आ पड़ा हूं मैं, 

 बुढ़ापे की यही लाठी यही मेरा सहारा है।


दुनिया में दिख रहा क्या क्या नजारा है,

किसी को उजाड़ा तो किसी को संवारा है।

मैंने तो जीवन कर दिया श्याम के हवाले,

बुढ़ापे की यही लाठी यही मेरा सहारा है।


कर्म करें ऐसा ना किसी की हानि हो,

 हर्षित हो, मन में ना कोई ग्लानि हो।

 सर्व हित ही कार्य करेंगे हम,

न किसी भी रुप में मनमानी हो।

 मन से सभी विकार दूर करें,

 बस परमेश्वर के ध्यानी हों।

जिसे अपना समझता हूं वही तो घात में बैठे,

 बिन बुलाए ही वो मेरे जज्बात में बैठे।

बहार लाये थे जो मेरे मन उपवन में,

वही तो अब बन दुस्वप्न रात में बैठे।

तुम्हीं से कुछ जरूरी बात करनी है।

जो नहीं करी अब वह बात करनी है।।

 दिन तो ढल जाता है यूं ही यादों में।

 अब प्रतीक्षा तुम्हारी हर रात करनी है।।

ना किया हमने इश्क जब उम्र थी करने की,

हूक उठनी थी जब ,किसी पर मरने की। 

इश्क का भूत तो अब उतर ही गया ,

जब उम्र हो गई बिजली,पानी का बिल भरने की।।

गम में जो गर गमजदा हो गए,

तो अपने आप गुमशुदा हो गए,

मुस्कुरा कर जो हल खोज लिया,

तो समझो तुम खुदा हो गए।।



पल भर में बिखर जाते हैं जन्मों के रिश्ते ,
राम करे मिलके ना बिछड़े कोई भी ऐसे।
वादे किये थे जिंदगी भर साथ निभाने को,
 बुने थे जो सपनों के चादर बन गए है रेशे।

गृह नक्षत्र भी मिल जाते 

बुधवार, 29 मार्च 2023

सरस्वती वंदना

 कृपा करो मां सरस्वती

 विद्या तो दे दो हमें सभी

 न आये किसी  विधा में कमी

 कृपा करो मां सरस्वती - -- 

अभी तुमने कुछ सोचा नहीं,

 वीणा के तारों को छुआ नहीं, 

 झंकार नई जगा दे अभी, 

कृपा करो मां सरस्वती - - -  

 मेरा मन भटका यहां वहां,

 मेरी मंजिल तो है यहां यहां, 

मंजिल पर  मैं पहुंचा हूं अभी, 

कृपा करो मां सरस्वती- - - 

कमल पुष्प से  फैले महक, 

लगता है मोर रहा हो चहक,

 वीणा पर मधुर तान जब भी बजी,

 कृपा करो मां सरस्वती- - - 


चलो कोई बात नहीं- कविता

 कोई तो बात थी तुम में,

 जो हम नजरें हटा ना सके।

 एक नजर भी न देखो तुमने हमें,

- - - चलो कोई बात नहीं।

 हमने चाहा था तुम्हारा साथ,

  साथ साथ चलेंगे हम दोनों।

तुमने एक कदम भी गवारा न किया,

- - -  चलो कोई बात नहीं।

 फूल तुम्हें भेजा हमने खत में,

 खत के तो कई टुकड़े कर दिए।

 फूल को सजा दिया फूलदान में,

- - - चलो कोई बात नहीं।

 किसी न किसी से तो होगी तुम्हें मोहब्बत,

हम भी तुम्हारी तिजारत  करते हैं।

तुमने तो एक पल भी मुस्कुराकर न देखा,

- - -  चलो कोई बात नहीं।

ख्वाहिश -- कविता

सोच तो यह है की हर ख्वाहिश पूरी हो,

 कोई भी ख्वाहिश ऐसी ना हो जो अधूरी हो।

 इतनी पास आ जाएं वे सब हमारे,

 उनके और हमारे बीच कोई दूरी न हो। 


जीवन में ख्वाबों की माला बनाते रहें,

जो दिल को सुकून दे ऐसे सपने सजाते रहें।

 हां गमों के जंजालों से मीलों दूर होकर ,

 खुशियों के साज ही बजाते रहें।


 कोई पल भी ऐसा ना आए कभी,

कि हम ख्वाहिश करना ही छोड़ दें।

 जो तार से तार जोड़ा उसे बीच में ही छोड़,

चलो गमो से नाता तोड़ खुशियों से जोड़ दें।  


स्वरचित- सतीश गुप्ता पोरवाल

मंगलवार, 28 मार्च 2023

ऐसी ग़ज़ल लिखूं - ग़ज़ल


सोचता हूं मैं कोई ऐसी गजल लिखूं,

 कोई गफलत भी ना हो ऐसी सरल लिखूं। 

पड़ गया है सूखा चाहे मेरी चाहतों पर,

 पर तुझे तो लहलहाती फसल लिखूं। 

 झोपड़ी में रहने की हो चाहे  कुव्वत मेरी, 

 पर तुझे तो मैं एक आलीशान महल लिखूं। 

 कितना भी उलझ जाऊँ दुनिया की उलझनों में,

 पर तुझे तो हर उलझन का हल लिखूं।

 सूखी नदी में भी नहाना नसीब न हो मुझे,

 पर तुझे तो शिवजी पर चढ़ता हुआ जल लिखूं।

मैं तो हूं एक मुरझाया हुआ सा फूल,

पर तुझे तो सरोवर में खिलता कमल लिखूं । 

अब कुछ भी नहीं बचा मेरी जिंदगी में 

 पर तुझे तो जिंदगी की पहल लिखूं। 

 टूट गया,बिखर गया,कुछ कर न सका,

  पर तुझे तो हर काम का अमल लिखूं।

रविवार, 26 मार्च 2023

शोर ही शोर- ग़ज़ल

 जिधर देखो उधर मचा शोर ही शोर है ,

तसल्ली का तो नजर आता नहीं कोई छोर है।

 चुरा लिया जिसने उसका सुख-चैन,

  वह खुद नहीं कोई चितचोर है।

 नजरें उठाकर देखा जो खुले आसमां की ओर,

पाया कि वहां तो घटा घनघोर है।

 कद काठी तो बना ली बहुत ही खूबसूरत,

  पर दिल का देखो कितना कमजोर है।

  असल में क्या होना है उसको, नहीं जानता,

 लेकिन दिखावे का तो जोर पुरजोर है।

 नहीं पिघलता किसी का दुख दर्द देखकर, 

 देखिए इंसान हो गया कितना कठोर है।

 मैं यहां जाऊं या मैं वहां जाऊं,

 सोचता ही रहता नहीं मिलता कोई ठौर है। 

 दिखता तो है जैसे हो आला जनाब, 

लेकिन अंदर से देखो तो आदमखोर है।

आदमी आया था यहां इंसान बनने को,

 लेकिन आदमी भी न रहा देखो कैसा दौर है। 

शनिवार, 25 मार्च 2023

आधुनिक बहू- कहानी

 कृष्ण कुमार जी और उनकी पत्नी शांति जी, दोनों ही खुश थे।।खुश होते भी क्यों नहीं  जैसा सोचा था, घर में ऐसी बहू आ रही थी ।पढ़ी-लिखी इंजीनियर ,एक कंपनी में अच्छा वेतन पाने वाली। उन्होंने सोचा, जब बेटा-बहू दोनों की कमाई घर में आएगी तो दरिद्रता दूर होगी, इसी घर में एक मंजिल और बना लेंगे ताकि बेटा-बहू को किसी तरह की कोई तकलीफ ना हो। शादी हो जाने के बाद बेटा -बहु दोनों सुबह तैयार होकर अपनी अपनी कंपनी में जाते। बहू के फैशनेबल कपड़े पहनने से उनको कोफ्त तो होती लेकिन बर्दाश्त करते रहे । सुबह की चाय तो बहू बना लेती लेकिन नाश्ता और खाना शांति जी को ही बनाना पड़ता । कुछ दिन तो सामान्य रूप से गुज़रते गये लेकिन धीरे-धीरे यह दिनचर्या शांति जी को भारी लगने लगी। कालांतर में घर में पोता भी आ गया उसे संभालने की जिम्मेदारी भी कृष्ण कुमार जी और शांति जी की हो गई। दोनों को लगने लगा कि हम जैसे माता-पिता नहीं नौकर चाकर हो गए।  यह विचार और सुदृढ़ हो गया जब बेटे बहू ने अलग मकान खरीद कर बाहर जाने का उनको कहा। कृष्ण कुमार और शांति जी को लगा की  आधुनिक, पढ़ी-लिखी, नौकरी करने वालीं बहू को लेकर उनका जो सपना था वह टूटने की कगार पर आ गया था।

शुक्रवार, 24 मार्च 2023

वफा-बेवफा-- ग़ज़ल

 हम उनसे नजरें मिलाते रहे करते रहे वफा,

 एक नजर क्या चुराई तो हम हो गए बेवफा।

 बात क्या है आखिर हमें भी बताओ,

 या यूं बेवजह ही हो गए हो खफा।

 चेहरे तक लटकती जुल्फें लगती थी खूबसूरत,

 आखिर तुमने उसे क्यों दिया हटा।

 ऐसी भी क्या नाराजगी क्यूँ बेजार करती हो

  किस बात की हमें देना चाहती हो सज़ा। 

   क्या तुम चाहती हो यह तो बताओ,

  क्या मेरी रजा में नहीं है तुम्हारी रजा।

  मेरी जिंदगी में तुम्हारी जिंदगी मिला दो,

 फिर देखो आ जाएगा जिंदगी जीने का मजा।

गुरुवार, 23 मार्च 2023

पुराने ज़ख़्म- कविता

पुराने ज़ख्म  हर जख्म को हरा कर देते हैं,

 वे कौन है जो हर ज़ख्म को जवां कर देते हैं।

 अक्सर लोग पुराने ज़ख्मों को गहराई में डुबो देते हैं,

लेकिन कुछ लोग आकर फिर से नश्तर चुभो देते हैं।

 जीवन इंसान का दुनियां में कुछ ऐसा ही होता है,

   पग पग  पर उसे दुखों का सामना करना पड़ता है।

  दुख जब असहनीय हो जाए तो जैसे ज़ख़्म बन जाता है, 

 और दिल को कुतरने वाला पीड़ा का कीड़ा बन जाता है। 

 आप तो ज़ख्म पर चाहे मलहम लगा लेते हैं, 

  लेकिन कुछ लोग उस पर नमक लगा देते हैं।

 ज़ख्मों के निशां सारी हालत बयां कर देते हैं,

  पुराने ज़ख्म हर ज़ख्म को हरा कर देते हैं।

बुधवार, 22 मार्च 2023

घर-द्वार-- कविता

 जिसे घर-बार मिला, संसार मिला,

 जैसे गंगा का हरिद्वार मिला। 

 स्थिर जीवन उसका ही हिला,

 जिसे घर-द्वार न मिला कुछ न मिला। 

 घर द्वार किसी ने छोड़ दिया,

 तो दुनिया ने मुंह अपना मोड़ लिया। 

 अपने परायों का भेद न किया, 

 अपनों से नाता तोड़ लिया।

 सुख शांति कहां मिल पाती है,

 यह तो छाया की तरह आती-जाती है।

 घरवालों का जहां शोर मचा,

  बस उसी में संसार रचा।

 घर द्वार ही अपनी दुनिया है,

 इसी में बसी सब खुशियां हैं।

रिक्शेवाला--कहानी

 रामेश्वर लाल जी खाना खाने के बाद ,भरी दोपहर में छाता लगाकर घर से बाहर निकले, दुकान जाने के लिए। दुकान पास ही थी तो वे पैदल ही आया-जाया करते थे।थोड़ी दूर जाने पर उन्हें सड़क के किनारे एक रिक्शेवाला कड़क धूप में भी रिक्शे में सोते हुए दिखा।   सब रिक्शे वाले तो  घर चले गए लेकिन वह इस तपती धूप में भी यहां बैठा था। उन्हें उस पर दया आई, उन्होंने सोचा कि पैदल जाने के बजाय रिक्शा से चला जाए। वे जानबूझकर रिक्शे से गये और उसे तय किया  हुआ भाड़ा दिया। दो-तीन दिन इसी तरह  निकलने के बाद उन्होंने देखा कि आज तो उसने अच्छे धुले हुए कपड़े पहने हुए थे।रिक्शे पर बैठते हैं उन्होंने पूछा-क्या भाई आज तो बड़े स्मार्ट लग रहे हो , तो उसने कहा कि कल मैं बाजार से साबुन लाया था उससे कपड़े धोए इसलिए साफ लग रहे हैं ।रामेश्वर लाल जी उसके रिक्शे का इस्तेमाल ज्यादा ही करने लगे,बाजार से दुकान पर सामान लाने के लिए एवं अन्य कार्यों के लिए। कुछ दिन के बाद उनको उस रिक्शे वाले में परिवर्तन दिखाई दिया ।उन्होंने पूछा कि आज तो ज्यादा खुश दिखाई दे रहे हो, तो रिक्शा वाले ने कहा कि सेठ जी बहुत दिनों के बाद कल मैं बच्चों को बाजार ले गया कुछ खरीदा और आइसक्रीम भी खिलाई , पत्नी और बच्चे बहुत खुश थे । रामेश्वर लाल जी ने देखा कि रिक्शावाले के चेहरे पर एक सुकून और खुशी दिखाई दे रही थी।

  लेकिन यदि वास्तव में कोई देखता तो पाता कि उससे ज्यादा चमक रामेश्वर लाल जी के चेहरे पर थी , किसी गरीब की सहायता करके उसकी जिंदगी खुशहाल करने की चमक।

मंगलवार, 21 मार्च 2023

मां मेरी मां - गीत (संशोधित)


#विषय : मां

                           *मां मेरी मां*

मां,मेरी मां, तू ही मां तू ही आया,

 सारा जग तुझ में ही समाया।


 न जाने कहां पर था मैं,

 इस दुनिया से था अनजान।

मां तूने ही तो डाली थी, 

मेरी काया में जान।

मां मेरी मां तुम ही मां तू ही आया,

 सारा जग तुझमें ही समाया।


 इस दुनिया में जब मैं आया,

  सामने बस तुझको ही पाया।

कितने-कितने कष्ट उठाकर,

मां तूने मुझको जन्माया।

मां मेरी मां तू मां तू ही आया,

 सारा जग बस तुझमें ही  समाया।


 मेरा मुंह देख कर देख कर,

  तू कितना हर्षाती थी।

जब भी मुझको रोना आता,

तुरंत दौड़ कर आती थी।

मां मेरी मां तू ही मां तू ही आया,

 सारा जग बस तुझमें ही समाया ।


    जब कभी मैं राह भटकता,

  तूने ही राह दिखाई।

  जब आई कठिनाई,

  माँ तेरी याद आई। 

 मां मेरी मां तू ही मां तू ही आया ,

 सारा जग बस तुझमें ही समाया ।


स्वरचित- सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।

कविता बन गई- कविता

 हां,आज भी मै लिखने जा रहा हूं एक कविता, 

 मन में भावों की कल कल बहने लगी थी सरिता।

 वैसे तो अमूमन रोज ही मैं कविता लिखता रहता हूं, 

 विश्व कविता दिवस पर आज भी लिखने की सोचता हूं। 

 समझ नहीं पा रहा था कि आखिर लिखूं तो क्या लिखूं, 

  कभी सोचा हास्य लिखूं तो कभी सोचा शृंगार लिखूं ।

  वैसे तो वीर रस की कविता भी मुझे लुभाती है,

   रोजमर्रा की जिंदगी पर लिखी कविता भी मुझे भाती है।

   कई तरह के भावों में आखिर ठन ही गई, 

  और मुझे लगता है एक कविता बन ही गई। 

सोमवार, 20 मार्च 2023

गुरू से ज्ञान --कविता

 अज्ञानता के अंधेरे में विचरण कर रहा था, 

  बिना पतवार के ही मैं नाव खे रहा था। 

 अब जब मुझे गुरु मिले तो ज्ञान पाया,

 दुनियादारी गुरु की संगत से ही जान पाया। 

 कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंधेरे में रोशनी ढूंढते हैं,

 लेकिन असफल होकर किंकर्तव्यविमूढ़ से रहते हैं।

 कुछ लोग दुनियादारी को समझ नहीं पाते हैं,

 सिर्फ अपने रास्ते आते हैं अपने रास्ते जाते हैं।

  अल्प बुद्धि से ही अपने आप को समझदार समझते हैं,

  उनको जो करना होता है बस वही करते रहते हैं। 

 किसके साथ कैसा व्यवहार करना है नहीं जानते हैं,

 अपनों को पराया और परायों को अपना मानते हैं ।

 गुरु की संगत में जाएंगे तभी ज्ञान को पाएंगे,

 और तभी दुनिया में दुनियादारी को समझ पाएंगे।

 याद रहे हम सबको,गुरु ही ज्ञान की खान है ,

 गुरु को मान देना ही स्वयं अपना मान है।

शनिवार, 18 मार्च 2023

नीरज जी का गीत

 गीत जब मर जाएंगे फिर क्या यहां रह जाएगा,

एक सिसकता आंसुओं का कारवां रह जाएगा। 

 आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे,

 जब न यह बस्ती रहेगी तू कहां रह जाएगा। 

 गर चिरागों की हिफाजत फिर उन्हें सौंपी गई,

 रोशनी मर जाएगी खाली धुआं रह जाएगा। 

  आएगा अपना बुलावा जिस घड़ी उस पार से,

  मैं कहां रह जाऊंगा तू कहां रह जाएगा।

   जिंदगी और मौत की नीरज कहानी है यही,

  फुर्र हो जाएगी चिड़िया आशियां रह जाएगा।

  गीत जब मर जाएंगे -----

मैं हूँ,बस मैं ही-- ग़ज़ल

  ग़मों पर देखो खुशियों का पर्दा डाला हुआ है, 

 जाने किसकी मिसाल,किसका हवाला हुआ है।

  मैं हूं ,बस में ही हूं ,और कोई नहीं,

 ऐसा भ्रम अनेकों ने पाला हुआ है।

अंधेरों की और बढ़ा हूं मैं जब जब भी, 

 जाने कहां से आकर उजाला हुआ है।

 फिसल पट्टी पर जैसे फिसल रहा था दिल,

 क्या बताएं  तुम्हें कैसे संभाला हुआ है। 

 क्या करें, कैसे करें,समझ नहीं आता,

यह जीवन तो मकड़ी का जाला हुआ है।

 सांप बन कर लिपटा था जो गले से,

 न जाने कैसे वह माला हुआ है।

 गमगीन था जो एक लंबे अरसे से,

 वह दिल अब मतवाला हुआ है।  

 झूठों की इस फरेबी दुनिया में, 

 सच का ही अक्सर मुंह काला हुआ है। 

 कौन हूं,क्या हूं पूछते हैं लोग अक्सर मुझसे,

 जवाब हमने अब तक टाला हुआ है।

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

काला पति- हास्य कविता

 यह क्या बात कर दी आपने भईया जी,हाय रब्बा,

 मेरा पति कतरा नहीं काले पेंट का है पूरा डब्बा।

मैं भी थी बहुत नखराली लेकिन दिमाग वाली, 

 क्या हुआ जो मैं हूं गोरी और नहीं काली। 

 चलो मैं बता देती हूं मेरा अपना किस्सा,

मेरे पति की संपत्ति में मेरा है बड़ा हिस्सा।

 धन-धान्य से भरा रहता है पूरा घड़ा,

 और बैंक में है उसका लॉकर सबसे बड़ा।

 तुम ही बताओ गोरे पति को क्या चाटूं

  देश विदेश में नहीं घूमें तो क्या घर में बैठूं।

  वह काली कमाई भी अच्छी भली कर लेते हैं,

  दूसरों का माल अपना बनाकर घर भर लेते हैं। 

आपने आखिर क्यों मुझ बाला को घेरा है,

  मेरा पति जैसा भी है,बस मेरा है।

  दुनियां के कुछ भी कहने से कुछ भी नहीं होना है,

  मेरा पति ऐसा-वैसा नहीं, खालिस काला सोना है। 

इक अजनबी हसीना से--गाना

  हमने उसको देख लिया ,

 उसने हमको देख लिया ,

    देख रहे थे दूर से ही हम। 

लब जो हिले तो फिर , ऐसा लगा तो फिर, जैसे फिर बात हो गई,

  इक अजनबी हसीना से- - 2

 चांद तारों में कहीं,

इन नजारों में कहीं,

 छुप गई वो मिलती नहीं।

देखा हमने सारा जहां, ढूंढा उसे यहां वहां, न जाने कहां खो गई।

एक अजनबी हसीना से ----- 

खूबसूरत था समां, 

झुक रहा था आसमां, 

मंद हवा भी बहने लगी।

 उसे  जो छुआ तो फिर,बाहों में लिया तो फिर ,जाने क्यों बरसात हो गई ,

एक अजनबी हसीना से- - - 

गुरुवार, 16 मार्च 2023

कैसी कहानियां-- कविता

 भूली हुई उन कहानियों में मेरा अक्स नजर आएगा,

 गुमशुदा है जो इस जहां से वह शख्स  नजर आएगा। 

 तारे गिन गिन कर भी गुजारे न गुजरता था,

 नजर डालोगे तो तुम्हें वह वक्त नजर आएगा।


 इस जहां से तो हमने कुछ मांगा नहीं था,

 जहां से मैं चला था फिर देखा तो वहीं था। 

 कहते थे लोग गलत राह पर चल दिए,

  पर मैं मानता हूं कि मैं सही था।


 भूली हुई वे कहानियां फिर से उभर आती हैं, 

 जाता हूं मैं जिधर उधर ही चली आती हैं। 

  कहानियों से रिश्ता ही ऐसा जुड़ चुका है मेरा,

   कि मुझे ये कहानियां जिंदगी की तरह भाती हैं।


 जिंदगी में आखिर कहानियां कौन बनाता है,

  नहीं बनती जैसी कोई बनाना चाहता है। 

  कुछ कहानियां बनती हैं जिन्हें भूल जाएं,

   कुछ ऐसी भी जिन्हें याद रखना चाहता है। 

मंगलवार, 14 मार्च 2023

भेड़ और भेड़िया-- कहानी

 एक जंगल में भेड़ियों का एक समूह विचरण करता था,उसी जंगल में एक भेड़िया भी था। उसकी निगाह इन भेड़ों पर थी और यदा कदा मौका देख कर जैसे ही अकेली भेड़ दिखाई देती उस पर झपटता  और खा जाता।वे बहुत सहमी हुई थीं, उन्होंने भेड़िए को समझाने की कोशिश की लेकिन उसको कोई असर नहीं हुआ। लाचार होकर उनको भेड़िए के घर के सामने धरना देना पड़ा। यह वह घर था जो सूना पड़ा हुआ था और भेड़िए ने वहां अपना बसेरा बना लिया था। भेड़िए को सबक सिखाने  को भेड़े इकट्ठे होकर दरवाजों पर धक्का देने लगीं। भेड़िया घबरा गया और उसने अपने मित्र सियार को बुलाया और सहायता करने को बोला। सियार ने देखा कि उस पुराने घर में कुछ लकड़ी और कीलें पड़ी हुई थीं ,पास में एक हथौड़ी भी थी। उसने   कीलों के माध्यम से लकड़ी के बड़े टुकड़े दरवाजे पर ठोक दिए और कहा कि अब तुझे कोई खतरा नहीं है। भीड़ भी कम नहीं थी उन्होंने खिड़की पर आकर भेड़िए को कहा कि तुम कहां तक बचोगे ,हमारे साथ जंगल की और भी जानवर आएंगे। हाथी भी आएगा और तुम्हारे दरवाजे को   तोड़कर तुम्हें मार डालेगा। यह सुनकर भेड़िया घबरा गया और हाथ जोड़कर माफी मांगने लगा।  उसने कहा कि मैं आगे से तुम लोगों पर हमला नहीं करूंगा,तुम निश्चिंत होकर जंगल में विचरण कर सकते हो ।

 भेड़िए की माफी के साथ ही मामला समाप्त हो गया।

शुक्रवार, 10 मार्च 2023

खुशियाँ दो कदम दूर-- कविता

 खुशियां दो कदम दूर से ही क्यों मुड़ जाती हैं,

गम की घड़ियां कुछ और क्यों जुड़ जाती हैं।

 मैंने पूछा सूरज,चंदा और सितारों से,

 चारों ओर फैले सभी नजारों से। 

 कहीं से कोई धीमी भी आवाज आती नहीं,

 कोई भी घड़ियां आकर मुझे समझाती नहीं। 

 ऐसा बेदर्द वक्त मुझी तक आता क्यों है,

 मेरा दिल बार बार आखिर घबराता क्यों है।

 मैं भी चाहता हूं जमाने की खुशियां मुझे मिले,

 लेकिन जब भी मिले मुझे गम ही मिले।

 पथरा गई आंखें खुशी का इंतजार करते करते, 

   उँगलियाँ भी थक गई है माला जपते जपते।

  ए बेदर्दी वक़्त अब तो थोड़ा सुधर जा,

  फुर्सत मिले तो थोड़ा इधर भी आ। 

यहां आकर थोड़ी तो खुशी मुझे भी दे दे,

 पूरे नहीं तो मेरे थोड़े तो गम हर ले। 

मंगलवार, 7 मार्च 2023

होली में नया रिश्ता- लघु कथा

 किसी भी मोहल्ले में भांति भांति के लोग रहते हैं। किसी का मिजाज नरम तो किसी का गरम। शर्मा जी और वर्मा जी का परिवार आमने-सामने रहता था, कभी-कभी उनमें आपसी नोकझोंक किसी न किसी बात पर हो जाती थी।  एक बार यह नोकझोंक इतनी आगे बढ़ी कि वह झगड़े में परिवर्तित हो गई। पुरुषों से शुरू हुआ झगड़ा स्त्रियों तक पहुंच गया था।  झगड़े के बीच ही शर्मा जी ने मिसेज वर्मा को कह दिया कि तुम आग लगाने आ गई हो।मिसेज वर्मा और आग बबूला हो गई और खूब खरी-खोटी सुनाने लगी।

 अगले ही माह होली का त्यौहार आ गया। होलिका दहन के लिए होली सजाई गई। मोहल्ले के सभी स्त्रियों ने वहां पूजा अर्चना की।इसके पश्चात शुभ मुहूर्त में होलिका को अग्नि दी गई । फिर होलिका की परिक्रमा की जा रही थी कि अचानक मिसेज वर्मा की साड़ी ने आग पकड़ ली।  शर्मा जी की निगाह सबसे पहले उस पर पड़ी और वे तुरंत दौड़कर उनकी साड़ी खींचकर आग बुझाने लगे।  जैसे ही वर्मा जी ने देखा वे आग बबूला होकर दौड़े और शर्मा जी को धक्का दे दिया। लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी की साड़ी ने आग पकड़ ली थी और शर्मा जी ने तो आकर उसको बुझाया यदि वे  वैसा ना करते तो बहुत बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। उन्हें पश्चाताप हुआ और जाकर शर्मा जी से माफी मांगी और उनके गले लग गए।  फिर बोले मुझे माफ करना तुमने पड़ोसी का धर्म निभाया है । हमें अच्छे पड़ोसी की तरह रहना चाहिए, पुराने गिले शिकवे सब भुलाकर नए रिश्ते निभाना है। वहां पर उपस्थित सभी जनों ने ताली बजाकर इस नए रिश्ते का स्वागत किया।

सोमवार, 6 मार्च 2023

आओ ना होली खेलेंगे-- कविता

 *आओ ना होली खेलेंगे*

और कोई हो ना हो,

 तुम मुझे और मैं तुम्हें रगेंगे,

आओ ना होली खेलेंगे। 

 तन्हाई की बात अब छोड़ो,

 आपस में मेलजोल बढ़ेंगे।

दूर दूर रहकर क्या मिलेगा, 

खुशी मिलने में बरसों लगेंगे।

 आओ ना होली खेलेंगे।।

आज तो ऐसे रंगो चेहरे,

 कि देखकर लोग डरेंगे।

 कितनी भी खलिश रही हो,

आज तो हम तुम गले मिलेंगे।

आओ ना होली खेलेंगे।।

राग-द्वेष रहे ना अब कभी,

 ऐसे हमारे  दिल मिलेंगे।

मिल-जुल कर रंगों की बौछार करेंगे,

 ऐसे ही हर त्यौहार मनेंगे।

आओ ना होली खेलेंगे।।

शनिवार, 4 मार्च 2023

छवी दिलदार की-- कविता

 

कोरा कागज था अभी तक मन मेरा , 

नहीं डाला था अभी तक किसी ने डेरा।

आ गई है अब सुहानी लहर बहार की, 

मेरे मन बसी छवि दिलदार की।


भटक रहा था शून्य में और अनंत में,

 कोई तो मिले जिसे बसाऊँ मन में ,

मुझे तो थी तलाश बसंत बहार की, 

अब मेरे मन बसी छवि दिलदार की।


न जानू मैं उसके दिल में है क्या,

 मेरे बारे में सोचती है क्या वह भला। 

क्या बताऊं मैं बातें गुले गुलजार की 

अब तो मेरे मन बसी छवी दिलदार की।


स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

फुलेरा होली - संस्मरण

 बचपन से ही मैं बड़ा संकोची स्वभाव का था। दोस्त स्कूल में थे लेकिन उनसे दोस्ती स्कूल तक ही सीमित थी।  पड़ोस में भी बराबर के लड़कों से दोस्ती थी लेकिन सीमित ही थी , हमजोली जैसा कुछ नहीं था । कालांतर में स्कूली शिक्षा पूरी हुई,फिर महाविद्यालय की शिक्षा पूरी प्राप्त की और रुड़की विश्वविद्यालय से टेलीविजन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद दूरदर्शन मुंबई में नियुक्ति हुई। 

   "लड़की" देखने का दौर चल रहा था। यह दौर इंदौर में जाकर संपन्न हुआ,और वही "लड़की" अंततः मेरी पत्नी बनी। जीवन में पहली बार किसी से इतनी अंतरंगता हुई और मैंने अपनी पत्नी को ही अपनी "हमजोली" मान लिया। होली के अवसर पर मैंने कुछ छुट्टियां  लीं और निश्चय किया कि कुछ दिन इंदौर रहूंगा पत्नी के साथ और फिर अपने घर जाकर अपनों के साथ।

  जिस दिन मैं इंदौर पहुंचा वह था "फुलेरा होली" का दिन। अपनी ससुराल पहुंचने से पहले ही मैंने रास्ते में कुछ फूल खरीद लिये। प्रारंभिक चाय नाश्ते के बाद,मैं अपने पत्नी का इंतजार कर रहा था कि वह आएगी तो मैं फूलों से उसका स्वागत करूंगा। वह आई भी और कमरे की चौखट से अपना चांद सा मुखड़ा दिखाया। मैं तैयार ही था मैंने फूलों को हाथों में लेकर उसकी और उछाला। लेकिन यह क्या, वह तो एक ओर हो गई और उसी वक्त हमारी सासु जी ने प्रवेश किया।  वे सारे फूल जो पत्नि की ओर उछालना चाहता था, सासू जी पर पहुंच गए। उन्होंने पूछा-कंवर साहब यह क्या? मैं सकुचा गया लेकिन तुरंत बात बदल कर बोला - मैं इंतजार ही कर रहा था कि आप आएंगी और आपका स्वागत फूलों से करूंगा। वे हौले से मुस्कराई , उनके चेहरे से लग रहा था जैसे वह कर रही हो कि मैं सब जानती हूं कि आप क्या चाहते  हो।उन्होंने मेरी पत्नी को आवाज दी और वे फूल वापस मेरी अंजली में रख दी और कहा कि लो जो करना था ,वह अब करो । एक पल को तो मैं सकुचा गया लेकिन फिर वही किया जो करना था।  अब सकुचाने की बारी मेरी पत्नी की थी।वह आकर पास बैठ गई , सासूजी वापस जा चुकी थीं।,और हम आपसी वार्तालाप में संलग्न हो गए। शाम होने को आई थी मेरे सालों ने कहा कि जीजाजी चलो आज फिल्म देखने चलते हैं।मैंने सोचा चलो अच्छा है पत्नि और सालों के साथ थोड़ा बाहर जाने और फिल्म देखने का मौका मिलेगा । लेकिन फिर यह क्या ! मेरे दोनों साले तैयार होकर आ गए और कहा चलो जीजाजी पिक्चर चलते हैं ।तो मैं अपने दोनों सालों के साथ पिक्चर देखने गया, लेकिन फिर  यह क्या! फिल्म का पोस्टर देख कर मैंने अपने सालों को कहा, भाई यह क्या मैं तो अपनी पत्नी को देखने आया था और तुम "माँ" दिखा रहे हो।दरअसल उस सिनेमा हॉल में फिल्म "माँ" चल रही थी।खैर मुझे वहां "मां" देखनी पड़ी ।

 मैं सोचने लगा कि फिल्मकारों ने "माँ" तो बनाई, पत्नी नाम से फिल्म क्यों नहीं बनाई।

मोहे रंग दे (संशोधित) -- कविता

         ओ श्याम, मोहे रंग दे ऐसे रंग में पिया,

        सिहरन सी दौड़े रग रग में पिया।

 मेरी रग रग में तुम ही समाओ,

  मेरे दिल में तुम बस जाओ,

  दिन तो कैसे भी गुजर जाये,

  न जाने कैसे बीत रही रतियां,

      मोहे रंग दे ऐसे रंग में पिया,

      सिहरन सी दौड़े रग रग में पिया।


    पनघट पे सखियां राह निहारे

   बात बात में बात बनाये

    घूर घूर मोहे देख रही,

    खूब नचाती अपनी अखियां।

        मोहे रंग दे ऐसे रंग में पिया, 

        सिहरन सी दौड़े रग-रग में पिया।


     रात रात भर राह निहारुं,

     नयनों में सपने सजाऊं।

     दिल में जो बीत रही है,

     फिर कैसे जाये जिया। 

         मोहे रंग दे ऐसे रंग में पिया,

        सिहरन सी दौड़े रग रग में पिया।


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।