अहसान फरामोश लोगों से दूर रहना गवारा है,
जिसके मन में हो अपनापन वही हमारा है।
मुरली वाले के द्वार आ पड़ा हूं मैं,
बुढ़ापे की यही लाठी यही मेरा सहारा है।
दुनिया में दिख रहा क्या क्या नजारा है,
किसी को उजाड़ा तो किसी को संवारा है।
मैंने तो जीवन कर दिया श्याम के हवाले,
बुढ़ापे की यही लाठी यही मेरा सहारा है।
कर्म करें ऐसा ना किसी की हानि हो,
हर्षित हो, मन में ना कोई ग्लानि हो।
सर्व हित ही कार्य करेंगे हम,
न किसी भी रुप में मनमानी हो।
मन से सभी विकार दूर करें,
बस परमेश्वर के ध्यानी हों।
जिसे अपना समझता हूं वही तो घात में बैठे,
बिन बुलाए ही वो मेरे जज्बात में बैठे।
बहार लाये थे जो मेरे मन उपवन में,
वही तो अब बन दुस्वप्न रात में बैठे।
तुम्हीं से कुछ जरूरी बात करनी है।
जो नहीं करी अब वह बात करनी है।।
दिन तो ढल जाता है यूं ही यादों में।
अब प्रतीक्षा तुम्हारी हर रात करनी है।।
ना किया हमने इश्क जब उम्र थी करने की,
हूक उठनी थी जब ,किसी पर मरने की।
इश्क का भूत तो अब उतर ही गया ,
जब उम्र हो गई बिजली,पानी का बिल भरने की।।
गम में जो गर गमजदा हो गए,
तो अपने आप गुमशुदा हो गए,
मुस्कुरा कर जो हल खोज लिया,
तो समझो तुम खुदा हो गए।।