जिसे घर-बार मिला, संसार मिला,
जैसे गंगा का हरिद्वार मिला।
स्थिर जीवन उसका ही हिला,
जिसे घर-द्वार न मिला कुछ न मिला।
घर द्वार किसी ने छोड़ दिया,
तो दुनिया ने मुंह अपना मोड़ लिया।
अपने परायों का भेद न किया,
अपनों से नाता तोड़ लिया।
सुख शांति कहां मिल पाती है,
यह तो छाया की तरह आती-जाती है।
घरवालों का जहां शोर मचा,
बस उसी में संसार रचा।
घर द्वार ही अपनी दुनिया है,
इसी में बसी सब खुशियां हैं।
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