खुशियां दो कदम दूर से ही क्यों मुड़ जाती हैं,
गम की घड़ियां कुछ और क्यों जुड़ जाती हैं।
मैंने पूछा सूरज,चंदा और सितारों से,
चारों ओर फैले सभी नजारों से।
कहीं से कोई धीमी भी आवाज आती नहीं,
कोई भी घड़ियां आकर मुझे समझाती नहीं।
ऐसा बेदर्द वक्त मुझी तक आता क्यों है,
मेरा दिल बार बार आखिर घबराता क्यों है।
मैं भी चाहता हूं जमाने की खुशियां मुझे मिले,
लेकिन जब भी मिले मुझे गम ही मिले।
पथरा गई आंखें खुशी का इंतजार करते करते,
उँगलियाँ भी थक गई है माला जपते जपते।
ए बेदर्दी वक़्त अब तो थोड़ा सुधर जा,
फुर्सत मिले तो थोड़ा इधर भी आ।
यहां आकर थोड़ी तो खुशी मुझे भी दे दे,
पूरे नहीं तो मेरे थोड़े तो गम हर ले।
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