सोमवार, 28 अगस्त 2023

टूटा तारा- कविता

 कहीं दूर जब तारा टूटता है,   

एक रोशनी सी नजर आती है।

तेरा दंभ भी शायद टूट जाए, 

ऐसा विचार मन में उभरता है।

देखता रहता हूं टूटते तारे को, 

शायद मन की मुराद पूरी हो। 

मन्नत मांगता हूं मैं उससे, 

मेरी चाहत न अधूरी हो। 

तूने भी शायद देखा होगा,

तुझे भी तो नजर आया होगा। 

जब से तूने दूरी बना ली है, 

मैंने कितना दुख झेला होगा।

अब जो तू नजरें इनायत कर दे, 

तो मेरी जिन्दगी बन जाएगी।

 मेरी ख्वाबों की झोली,

खुशियों से भर जाएगी।

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

कान्हा लियो अवतार- कविता

मथुरा में छाई बहार,
कान्हा लियो अवतार।
ऐसी मनभावन छवि पर,
मैं बलिहारी जाऊं बारंबार।
चहुं और छाई ऐसी खुशहाली,
 धरती पर छाई ज्यों हरियाली। 
 बाट  जोहते हर नर-नारी,
  कब आएंगे कृष्ण मुरारी।
 बागों में चिड़ियाँ चहचहाती,
  कोयल भी मीठी कूक लगाती।
मेघ गरज गरज कर बरसने लागे,
सोये मन प्रफुल्लित हो जागे। 
 दुख दर्द सब अपने भूले,
 बगिया में सखियां झूला झूले।
 मुरझाए फ़ूलों पर आई बहार,
जब कान्हा लियो अवतार। 

शनिवार, 19 अगस्त 2023

दूर जा रहे- ग़ज़ल

 दूर जा रहे रुक जाओ ना कुछ पल और,

अभी तो रात गहरा रही,नहीं हुई है भोर।

ऐसी भी क्या बेरुखी क्या हुई हमसे कोई खता,

 तुम्हारी यह चुप्पी बना रही है हमें कमजोर।

 हर ओर उदासी का मंजर दिखाई दे रहा,

 छा गई ई ज्यों आसमां पर घटा घनघोर।

हम तो थेअपने आप में ही मस्त रहने वाले,

क्यों चुरा लिया दिल हमारा,क्यों बनी चितचोर।

थोड़ी मोहलत तो दो,समझा लूं अपने दिल को,

 अब तो यही फरियाद करते हैं तुमसे पुरजोर।  

 उदासी की मझधार में गोते लगा रहा दिल,

 तू ही बता कैसे जाऊं मैं किनारे की ओर।


Mssa



राखी नहीं एक धागा- कविता

 राखी नहीं मात्र धागों का त्यौहार,

इसमें परिलक्षित होता भाई बहन का प्यार।

 कहने को तो है यह मात्र एक धागा,

लेकिन इसमें दुनिया भर का प्यार समाता।

  भाई बहन जब एक दूसरे से होते हैं दूर, 

  तो इंतजार होता है इस त्यौहार का भरपूर।

  कैसे भूल जाए कोई बहन राखी भेजना,

 दिल में भरी हो चाहे कितनी ही वेदना।

 बेशक कभी-कभी हो जाती है कुछ गलतफहमियां,

  लेकिन राखी का त्योहार मिटा देता है सब दूरियां।

 बरसों से चली आ रही , बन गई है यह एक रीत,

  राखी का यह धागा बन गया है भाई बहन के प्यार का प्रतीक।


Mssa

रविवार, 13 अगस्त 2023

 *विजयी रचना --*


 जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे,

मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा।

नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा,


 एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर,

 कुछ तेरूंगा और डूब जाऊंगा।

मैं तो ठहरा एक ठहरा हुआ पानी,

नदी के जल को कहां है फुर्सत रुकने की।

वह तो अविरल बहता ही रहता है,

कल कल मधुर संगीत सुनाता रहता है।


 यदि मैं ऐसे ठहरा ही रहा तो,

 जल जैसा मन प्रदूषित हो जाएगा।

 ग़र नदिया से जो जा मिलूंगा, 

 तो मन स्वच्छ पारदर्शी हो जाएगा। 


 एक उफनती नदी को कहां है फुर्सत, 

 कि वह कुछ पल भी ठहर जाए,

 वह तो अविरल चलने की आदी है,

 अपने जल को यहां से वहां पहुंचाती है। 


  अपने मन के भावों को अपने में ही न सिमटा लूं,

उदार दिलों से मिलकर अपने भावों को विस्तार दिला दूँ। 

वे न आएं मेरे पास तो न आएं, 

मैं तो किंचित भी नहीं सकुचाऊंगा।

मैं उनसे मिलने की खातिर,

उनके पास चला जाऊंगा। 



*दूसरी रचना--*

जिंदगी यह कैसी है जिंदगी,

 कभी लगती है उलझी हुई पहेली।

 और कभी मेरे संग संग चलती,

 मेरी अतरंग सी सहेली।


 कभी सपाट राहों पर सरपट दौड़ती,

 कभी गड्ढों भरी राहों पर उछलती कूदती।

 चिंघाड़ती अनवरत चलती ही रहती,

 कभी अचानक मौन हो ठहरती।


 कभी लगता है यहां अपनों का मेला है,

कभी लगता हर इंसान यहां तो अकेला है।

 कभी जलेबी सी उलझी पर मीठी लगती,

 और कभी लगता यह तो झमेला है।


 एक उम्र तक करते रहे बन्दगी,

 झुकती कमर सी लगती है जिंदगी।

 कभी नित नई आशाएं लिये हुए,

 दुल्हन नवेली सी लगती है जिंदगी।


 जिंदगी जीते जीते निकल गई हैजिंदगी

उमंग है दिल में फिर से मिलेगी नई जिंदगी।

ना मिली चाही गई ठंडक न मिली उष्णता,

 कभी तो दाल जैसी गलेगी जिंदगी।


*चार पंक्तियां--*


कर्म करें ऐसा ना किसी की हानि हो,

 हर्षित हो, मन में ना कोई ग्लानि हो।

 सर्व हित ही कार्य करेंगे हम,

 न किसी भी रुप में मनमानी हो।


सतीश गुप्ता 'पोरवाल', जयपुर।

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

गगरी -- कविता

 छलक न जाए गगरी जरा संभालना, 

कुछ उलीचना है यह बात जरा समझना।

 क्या करना है कितना करना है यह जानना जरूरी है,

 सयानों की कही हुई बात को मानना जरूरी है।

कुछ बातें एक सीमा तक ही अच्छी लगती हैं,

 बिना सोचे समझे कही बातें कच्ची लगती हैं।

जरूरत से ज्यादा हर चीज बुरी होती है,

 उसके साथ कुछ न कुछ कमी जुड़ी होती है।

 न इतराओ कभी भी अपनी उपलब्धि पर,

 आहिस्ता करो जो करना है न जाओ जल्दी पर। 

 जो हमें कहना था वह तुम्हें कह दिया,

 यह भी सही है कि तुमने सब कुछ सुन लिया। 

 तुम चाहो तो जैसा हमने कहा वैसा करो,

 या फिर जैसी तुम्हारी प्रवृत्ति है वैसा ही करो।

सोमवार, 7 अगस्त 2023

तेरे दिल में रहूं -- गज़ल

 न मेरा कोई ठिकाना रहूं तो कहा रहूं,

बस थोड़ी जगह दे दे रहूं तो तेरे दिल में रहूं।

दिल में है तूफान और आंखों में सूनापन, 

अपना दर्द कहूं तो आखिर किसे कहूं। 

 नहीं रहता आजकल मुझे कुछ भी याद,

बस एक ही हसरत है कि तेरी यादों में रमूं।

 खोलते पानी के जैसा है दिल और दिमाग, 

  अब  तो हसरत है कि मैं बर्फ की तरह जमूं। 

  रहता हूं गुमसुम एक अरसे से,

   तू हां कर दे तो जमकर हंसूं।

 हसरतों के महल तो बहुत बनाए थे मैंने,

अब तो लगता है कि बस खंडहर की तरह ढ़हूं।


Mssa