सोमवार, 30 सितंबर 2024

बस इतना चाहूं -- कविता

 समझना चाहेंगे तभी तो समझ पायेंगे,

 वरना तो चक्रव्यूह में फसते जाएंगे।

 यह जग तो है जाल माया का,

 क्या लेकर आथे थे, क्या लेकर जाएंगे। 

न चाहते थे आना,न चाहते हैं जाना, 

पर नियति को तो था हमको जग में लाना। 

भवसागर में नहीं यूं ही डोलते रहना,

 जाने दुनिया, काम ऐसा कर जाना। 

पर्वत से ऊंचे ख्वाब नहीं पालना ,

सागर की गहराई नहीं नापना।

 जीवन में बस मैं इतना चाहूं,

जब भी हो, किसी के काम आ जाना।

 हे दयानिधि मैं द्वार तुम्हारे आया,

 झूठी है दुनिया, झूठी है यह काया। 

 ढूंढ रहा था पागल भंवरा बन,

 सच क्या है यह तेरी भक्ति में ही पाया।


Mssa