मंगलवार, 31 जनवरी 2023

भारत का रहनेवाला--गीत (स्वरचित अंतरे)

 जंग छिड़ी है दुनिया में,

एक दूजे के प्यासे हैं - - - 

जनता भूखी प्यासी वहां,

 पर लड़ते जाते हैं - - -

 हमने जनता को सुखी किया-2

 मैं बात यही बतलाता हूं,

 भारत का रहने वाला हूं- - -


कितने ही देवी देव यहां,

उन सब को पूजा जाता है- - - 

 नफरत का तो नाम नहीं,

  यहां प्यार सभी पर आता है- - - 

  जिसे देख ले  अब सारी दुनिया -2

 वही दर्पण सब को दिखाता हूं,

 भारत का रहनेवाला हूं - - -


यहां दिलों में कोई भेद नहीं,

 हर दिल यहां पर गाता है- - - 

 गीत जहां भी शुरू हुआ,

  संगीत वहां मिल जाता है-- - -

 जब गीत यहां पर लिख ही लिया,

  मैं नित नित गीत सुनाता हूं,

 भारत का रहनेवाला हूं - - -

साथ निभाने का वादा-कविता

इस तरह से दूर दूर रहकर,

 क्या सताने का इरादा किया है तुमने। 

 अपने वादे से कभी मुकर न जाना तुम 

 देखो साथ निभाने का वादा किया है तुमने।


 रुख से रुख तो मिलाती नहीं हो,

 आंखें चुराती हो फिर झुकाती हो।

  मौन की भाषा यों अपना कर,

  आखिर कहना क्या चाहती हो।


 मेरा दिल तो एक मकान है,

  इसे कभी सराय न समझना।

  मैं अपने दिल को समझा ही लूंगा

  लेकिन तुझे भी तो पड़ेगा तड़पना।


 बात को पकड़ कर बैठे रहना ठीक नहीं

, छोड़ो सब यह बीते कल की बातें। 

  गिले-शिकवे सभी  भुला कर,

 फिर शुरू कर दें अपनी मुलाकातें।



मुक्तक/शेर

 तेरी रुसवाई रात भर रुलाती रही,

 रोज़  रोज़ रंजिशें राह में आती रहीं,

 रुख से रुख मिलाने का हौसला रख,

रंजिशें रुसवाई का रोना रोना ठीक नहीं।(1)

इस कदर वह छुप छुप कर मुझे देखती रही,

तो कहीं मेरा दिल नाजनी तक आ न जाये।(2)

इस तरह ग़र तुम मुझसे मिलती रहीं,

 तो कहीं हम एक होने तक आ न जाएं।(3)

जश्न हमारी हार का उन्होंने मनाया होगा, 

रिश्ता इस कदर दुश्मनी का निभाया होगा।(4)

सेवा करवाने का मुझे कोई शौक नहीं,

 मैं तो बस सेवक ही बनना चाहता हूं ।

 श्रीराम बनने की तो मेरी औकात नहीं,

 मैं तो बस केवट ही बनना चाहता हूं।(5)

और कहीं क्यों देखूं मैं मन के सिवा,

मन को ही देखूं मन ही तो दर्पण है। 

 ईश्वर जो कुछ दिया है तुमने मुझको 

 तेरा ही है, तुझको ही अर्पण है।

  मैं तो एक मुर्ख इंसान इस जहां में,

 मुझमें कहां इतनी समझ है।

 और कोई ठौर नहीं मेरे लिए,

 तेरे ही चरणों में मेरी जगह है।(6)

 प्रारूप को अंजाम तक पहुंचाने में हमने की कड़ी मशक्कत, 

 और उनका कहना है कि यह तो है एक संयोग फकत।(7)

                 . ************** 

 उसने कहा करो कोई काम ऐसा जिसमें हो मशक्कत,

  कर डाली हमने एक सिरफिरी हसीना से मोहब्बत ।(8)

 कविता नहीं है महज कुछ शब्दों की जमावट,

  यह तो है शब्दों की खूबसूरती से सजावट।(9)

खुद से उम्मीद थोड़ी भारी रख, 

चुका देगा कभी तो,थोड़ी उधारी रख।(10)

झुकना नहीं खामखां किसी के सामने, 

 अपने आपमें इतनी तो खुद्दारी रख ।(11)

जिधर देखो उधर,उसे कोई हमदर्द नजर आता नहीं, 

  लेकिन जिधर हमदर्द है,उधर तो नजर घुमाता नहीं।(12)

कवि की कल्पना का कोई छोर नहीं,

 यह जा सकती है किस ओर नहीं।

 कभी जा पहुंचे सागर की गहराइयों में,

 और कभी उड़ जाये नभ की ऊंचाईयों में।(13)

 जो मिलना था जिंदगी से वह नहीं मिला, 

फिर भी मुझे नहीं जिंदगी से कोई गिला।

जिंदगी को मैंने तो सब  कुछ दिया, 

शायद इसी का मिला है मुझे यह सिला।(14) 

सुकून की तलाश में था इधर से,

 किसी ने कहा मिलेगा उधर से।

 इधर से उधर ही डोलता  रहा,

 न जाने मिलेगा किधर से।(15)


हसरतों का बोझ लिए फिरते हैं यहां वहां,

वादे ही वादे मिले हम गये जहां जहां।

किस्मत ही जब नहीं साथ हमारे,

तुम ही बताओ आखिर हम जाएं तो जाएं कहां।(16)

यूं ना शरमा मुझसे,बस मुस्कुरा दे,

 तेरे गालों पर गड्ढों को मैं देखता रहूं।

 मुझे देख कर तू रचना करे,

 मैं तुझे देख कर गीत गाता रहूं।(17)


स्वरचित- सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।





लफ्जों के ज़ख़्म- कविता


 हमें तो प्रेम की गंगा बहाने का शौक है,

 लेकिन कितना अंतर आ जाता है लहजों में ,

 हमने जिसे प्यार से सरोबार किया,

 कोई जख्म दे गया लफ्जों में। 


 खंजर भी चलाए गर कोई कोई गम नहीं,

 उस जख्म में इतना दर्द नहीं होता।

  लफ्जों के बाण जब चल जाते हैं,

 दिल उष्ण हो जाता है सर्द नहीं होता।


बहुत कोशिश की हमने जख्मों को भरने की,

 लेकिन यह जख्म तो अब नासूर हो गए।

  हमने तो उनसे नज़दीकियां  ही मांगी,

  लेकिन वो हमसे क्यों दूर हो गए।


  जाने क्यों लोग दिल में क्या लिए बैठे हैं,

  क्या बुरा है दो मीठे बोल बोल देने में।

  नीम की कड़वाहट को तज कर ,

 भला है वाणी में शहद घोल देने में।



सोमवार, 30 जनवरी 2023

हरी भरी धरती- कविता

 हरी भरी धरती पर  बहती 

निर्मल पावन जल धारा 

यह जलधारा  खेतों में बहती,

मिलता अन्न भरपूर हमारा।


 पूरब से जब उगता सूरज,

  लालिमा छा जाती नभ में।

 प्रभात किरणों से जगमग होता,

  उजियारा हो जाता जग में।


 दिन के उजियारे की ऊर्जा,

  तन-मन में साहस भर देती।

  मन में जो करने को होता 

  ऐसा करने को प्रेरित करती।


सूरज चांद सितारे से नभ, 

 चम-चम चमकता रहता।

 ऐसा  भारत देश हमारा ,

 हमको सबसे प्यारा लगता।


बिटिया से बहू- कविता

 बिटिया किसी की आज बहू बन कर आई है,

बड़ी मुद्दतों के बाद यह घड़ी आई है।

पहली बार यह घर में प्रवेश कर रही है, 

आज से यह घर की अहम सदस्य बन रही है।

बड़े सपने पाले होंगे उसने अपने मन में,

 बहार जरुर आएगी उसके नये चमन में।

नहीं सोचा था उसने घर से विदाई होगी,

एक दिन अपनों से ही पराई होगी।

बाबुल का घर यूं छोड़ना पड़ेगा,

फिर एक नये आशियाने मे जाना पड़ेगा।

दुनियां के रस्म और रिवाज तो निभाने होंगे,

जो पराये थे वे अपने बनाने होंगे।

अब यही मेरा घर मेरा ज़माना है,

सारी उमर सारा समय यहीं बिताना है।

दर्द के फूल (संशोधित) -कविता

 दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं,

 जख्म कैसे भी हो कुछ रोज में भर जाते हैं।

 लम्हे जो दिल को घुन की तरह लगते हैं, 

 जो धैर्य धरा तो संवर जाते हैं ।


 मंजिल तक पहुंचना है,पहुंच नहीं पाते हैं,

 राह में आई बाधाओं को पार नहीं कर पाते हैं।

खुशियों के पल तो हैं चार दिन के, 

 आते हैं और यूं ही गुजर जाते हैं।

 

 जाने कहां चला जाता है स्वाभिमान,

   गये-गुजरों के आगे सर झुकाते हैं।

 जो चलते हैं सिर्फ अपनी मनमर्जी से,

 इनको भला कोई क्यों समझाते हैं।


 वृक्ष कितने भी आच्छादित हो जाएं,

 एक दिन तो ठूंठ बन ही जाते हैं।

क्यों तिजारत करें हम किसी की,

 खामखां वे खुदा बन जाते हैं।


घमण्ड करता है जब इंसान,

सर पर चढ़ कर बोलता है।

पर एक दिन चूर चूर होता है

 तब वह पागल बन डोलता है।


दिन कैसे भी हों गुजर जाते हैं,

जवानी कैसी भी हो ढल जाती है।

कितना भी इतरा लें अपनी काया पर,

 यह काया तो एक दिन जल जाती है।

शनिवार, 28 जनवरी 2023

सावन आया-- कविता



सावन आया जानकर मन में उठी तरंग,

 हिय माही भर गए भांति भांति के रंग।


 उपवन में छा गई मस्त-मस्त बहार,

 जैसे गीतों में सज गई राग मल्हार। 


 अमवा की डाल पर पड़ गए हैं झूले,

 झूले में झूला झूलते कष्ट सभी ही भूले।


 सखी सहेली सब मिलकर करे हंसी ठिठोली,

 आंगन में जैसे सज जाये मनभावन रंगोली।


पिया जब तू मिले होठ गुलाबी,गाल हो जाएं लाल,

प्यार से सरोबार हो जाए दिल, नहीं रहे मलाल।


 पिया इस सावन में झूला झूलूं तेरे संग में,

 प्रेम की धारा बह जाए मेरे रग-रग में।

Mssa/ kalkkj 

@copyright

गण और तंत्र-कविता

 गण और तंत्र में, 

 अजीब सी कशमकश है।

 कौन किस पर भारी है,

  बड़ा असमंजस है।

 गण चाहे तंत्र,

  हमारे हिसाब से चले।

 और तंत्र चाहे,

 गण हमारे सांचे में ढले।

 तंत्र की अपनी ही ,

कुछ सीमाएं हैं।

 लेकिन गण की,

 अपनी आशाएं हैं। 

समझोता जो हो जाए,

 गण में और तंत्र में,

 तो सच में यह,

 आदर्श गणतंत्र हो जाए।

यही तिरंगा हमारी शान- कविता

हरी भरी धरती पर  बहती 

निर्मल पावन जल धारा 

यह जलधारा  खेतों में बहती,

मिलता अन्न भरपूर हमारा।


 पूरब से जब उगता सूरज,

  लालिमा छा जाती नभ में।

 प्रभात किरणों से जगमग होता,

  उजियारा हो जाता जग में।


 दिन के उजियारे की ऊर्जा,

  तन-मन में साहस भर देती।

  मन में जो करने को होता 

  ऐसा करने को प्रेरित करती।


सूरज चांद सितारे से नभ, 

 चम-चम चमकता रहता।

 ऐसा  भारत देश हमारा ,

 हमको सबसे प्यारा लगता।


 जिस देश में हमने जन्म लिया,

 उस भारत पर हमें अभिमान।

  लहर लहर लहराता तिरंगा,

  यही तिरंगा है हमारी शान।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

उस वक़्त आना प्रभु जी- कविता

  

   तुम उस वक्त आना प्रभुजी जब प्रलय  हो निकट,

  अभी तो धीरे-धीरे स्थिति को हो जाने दो विकट। 


 अभी तो मानव रंगा हुआ है अपने ही रंग में,

 कोई सदाचार दिखता नहीं उसके जीने के ढंग में।


 अभी उसे अपने अहम में खो जाने दो,

 जो होना चाहता है उसे हो ही जाने दो।


 तुम उस वक्त आना प्रभुजी जब हो जाए अति,

 और प्रहार करना ऐसा कि मारी जाए उसकी ऐसी मति।



मेरी खुशी तुम हो-- कविता

 जिसके लिए तरसता रहा वह मेरी खुशी तुम हो,

 जो जिंदगी अब तक न मिली वह जिंदगी तुम हो।

 जिसके संग संग मैं चलूं वह कारवां तुम हो,

 जिंदगी जी लूं जहां सुकून से वह जहां तुम हो।

 तुम चांद सी बादलों की ओट में छुप जाती हो,

 चांदनी को जैसे छुपा अंधेरा घना कर जाती हो।

 अब तो आकर नजरे मिला लो मुझसे,

 नहीं रहेगा मुझे कोई भी गिला शिकवा तुझसे।

 हटा दो मेरे चेहरे पर छाई ये उदासी की लकीरें,

 हम तो चाहें हमें तो जकड़ लें प्यार की जंजीरें।

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

मेरी तक़दीर लिखने वाले- कविता

 मेरी तकदीर लिखने वाले तूने कोई कसर नहीं छोड़ी, 

 कोशिश बहुत की मेरी जीने की आस तूने तोड़ी।

 लेकिन मैं ठहरा जीवट किस्म का इंसान ,

 अपने दम पर पा लिया मैंने इसका निदान।

 कर रहा हूं मैं अपनी बुद्धि औ समय का इस्तेमाल,

  संवार लूंगा मैं अपनी जिंदगी का हर पल हर हाल। 

  जी तोड़ मेहनत भी मेरी  कभी तो रंग लाएगी,

  एक दिन तो मुझे अपने खुशनुमा दिन दिखाएगी।

  मेरी तकदीर लिखने वाले तू देखता रह जाएगा,

  यह बंदा अपनी तकदीर कविता की तरह लिखता चला जाएगा।



भारत देश मेरा-' कविता

 हरी भरी धरती पर  बहती 

निर्मल पावन जल धारा 

यह जलधारा  खेतों में बहती,

मिलता अन्न भरपूर हमारा।


 पूरब से जब उगता सूरज,

  लालिमा छा जाती नभ में।

 प्रभात किरणों से जगमग होता,

  उजियारा हो जाता जग में।


 दिन के उजियारे की ऊर्जा,

  तन-मन में साहस भर देती।

  मन में जो करने को होता 

  ऐसा करने को प्रेरित करती।


सूरज चांद सितारे से नभ, 

 चम-चम चमकता रहता।

 ऐसा  भारत देश हमारा ,

 हमको सबसे प्यारा लगता।


 जिस देश में हमने जन्म लिया,

 उस भारत पर हमें अभिमान।

  लहर लहर लहराता तिरंगा,

  है यही तिरंगा हमारी शान।

दर्द के फ़ूल-- कविता

 दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं,

 जख्म कैसे भी हो कुछ रोज में भर जाते हैं।

 मंजिल तक पहुंचना है,पहुंच नहीं पाते हैं,

 राह में आई बाधाओं को पार नहीं कर पाते हैं।

खुशियों के पल तो हैं चार दिन के, 

 आते हैं और यूं ही गुजर जाते हैं। 

 जाने कहां चला जाता है स्वाभिमान,

   गये-गुजरों के आगे सर झुकाते हैं।

 जो चलते हैं सिर्फ अपनी मनमर्जी से,

 इनको भला कोई क्यों समझाते हैं।

 वृक्ष कितने भी आच्छादित हो जाएं,

 एक दिन तो ठूंठ बन ही जाते हैं।


 क्यों तिजारत करें हम किसी की,

 खामखां वे खुदा बन जाते हैं।

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

विश्वास की डोर- कविता

बंधन तो हो जाता है अनजानों या जानो का,

 अजीब समीकरण है इस जग में रिश्तो का।

 रिश्तो की डोर बंध जाए कभी शैतानों से,

 और कभी बंधन हो जाए फरिश्तों का।


 रिश्ते कुछ पल के हों या जनम जनम के,

 होते हैं विश्वास पर हीआधारित।

 गुण अवगुण तो होते हर इंसान में,

 लेकिन भौतिक रूप से होना है सामाजिक।


 बहुत महीन है विश्वास की डोर,

 पल भर में कट जाती है।

 ओर न  छोर मिल पाता है,

 लालसा हो तो मन भटकाती है।



देशभक्ति गीत-जन्मदात्री इस माटी

 जन्म दात्री इस माटी का सम्मान करें,

सर्वप्रिय है जो देश हमें उसका गुणगान करें।
 आजाद हिंद के होंं सिपाही सेवा देश की कर जायें,
 मोह रहे न तन का प्राण न्योछावर कर जायें।
 गुलशन बन जायें हम भी देश में आती बहार के,
पूर्ण धरा पर हरियाली कर दें धरती कहे पुकार के।
 मातृभूमि के जन-जन को नूतन जीवन दान करें,
 पाठ पढ़ायें ऐसा उनको भारत पर अभिमान करें।
 हटेंं ना पीछे कभी भी हम काम निराला कर जायें,
 हो जायें चाहे शहीद नाम देश का अमर कर जायें।
  बन जायें वंशज हम डोली उठाते कहार के,
उठाएं मातृभूमि की डोली फिर धरती कहे पुकार के।
 सर्वत्र देश का नाम हो ऐसा हम अभियान करें,
  सर्वमुखी प्रतिभा फैले जग में ऐसा हम अरमान करें।
 आभा से हो जाए पूर्ण सेवा ऐसी करते जायें,
सुवासित हो उपवन यह खून से इसे सींचते जायें।
 माझी ना बन जायें कहीं हम नदियों की मझधार के,
 नय्या देश की पार करें हम धरती कहे पुकार के।
वीर शहीदों ने सींचा इसको हम इसकी रखवाली करें,
संपन्नता से हो जाए पूर्ण फिर रोज हम दिवाली करें।
 ना रहे भूख कहीं भी अन्न इतना उपजायें,
 आंख उठाये दुश्मन जो सीमा पर डट जायें ।
गीत गायें फिर हम खुशहाली की नौका विहार के,
भारत मां के लाल हैं हम धरती कहे पुकार के।

पेड़ों की रक्षा - लघु कथा

 जब  मन में लालच आ जाता है तो ज्ञान का प्रवेश बंद और अज्ञान का आगमन हो जाता है। आनंदपुर गांव के जमींदार के साथ भी ऐसा ही हुआ।

  एक पंडित जी ने उनको बताया कि उनकी धनसंपदा में अत्यंत वृद्धि हो सकती है यदि वे देवी के एक मंदिर की स्थापना उपयुक्त स्थान पर करें। बात धनसंपदा की थी तो जमीदार ने तुरंत अपने कारिंदे को बुलाया और उन पंडित जी को साथ में लेकर उपयुक्त स्थान तलाश करने के लिए भेज दिया। पंडित जी ने कुछ ही समय में एक स्थान तय करके बता दिया।अगले ही दिन ज़मींदार ने वहां के पेड़-पौधे   काटकर जमीन साफ करने के लिए भेज दिया।यह बात जब पास में रहने वाले परिवार को मालूम हुई तो वे चिंतित हुए और उन्होंने इसका विरोध करने की ठानी। उस घर की महिला उस बड़े पेड़ के पास गई जिसे काटने की तैयारी थी और उससे लिपट गई।उसने कहा कि यहां कोई पेड़ नहीं काटना चाहिए ,देखते नहीं पेड़ और पौधों से कितनी हरियाली हो रही है। इस हरियाली से हमें शुद्ध हवा मिलती है। पेड़ों और हरियाली की वजह से कितने ही मोर और अन्य पक्षी यहां विचरण करते हैं। आपको ऐसा करते देख उसकी दोनों बच्चियां भी आ गईं और वे भी पेड़ से लिपट कर पेड़ काटने वाले को बार-बार ऐसा करने के लिए मना करने लगीं। जब पेड़ काटने वाले व्यक्ति को और भी कई व्यक्ति उधर आते हुए दिखे तो वापस जमीदार के पास गया और उनको कहा कि वहां पर भारी विरोध हो रहा है और उनका कहना है कि पर्यावरण की रक्षा करना बहुत जरूरी है इसलिए पेड़ ना काटा जाएं। जमीदार ने पंडित जी को दूसरी खाली जमीन तलाश करने को कहा और इस तरह से वहां पर मौजूद पेड़ों और हरियाली की रक्षा हो गई।

सोमवार, 23 जनवरी 2023

हाथों में बांसुरी लिए -- कविता


हाहाकार मचा है सकल जग में,

 व्याकुलता छा रही मानव के मन में।

 मधुर तान में गीत सुनाना होगा,

  हाथों में बांसुरी लिए एक ग्वाला होगा। 


अपनी ही धुन में मगन हो रहे, 

 क्या सही क्या गलत समझ नहीं रहे।

 रास्ता सही उन्हें दिखाना होगा, 

 हाथों में बांसुरी लिए एक ग्वाला होगा।


 कर्कश वाणी में कोई बोल रहा,

 अपने बोली को नहीं तोल रहा।

 तोल-मोल कल बोलना सिखाना होगा,

 हाथों में बांसुरी लिए एक ग्वाला होगा।


 सुख शांति समृद्धि मिल जाएगी,

 हर दिल की कली फिर खिल जाएगी।

 हर कोई यहां फिर मतवाला होगा,

 हाथों में बांसुरी लिए एक ग्वाला होगा।



कदमों को कुछ पल-- कविता

 उमड़ते घुमड़ते अपने भावों से,

 मन के किसी अनजान कोने से,

 मुझे  अब कुछ कहना है,

कदमों को कुछ पल ठहरना है।


 मन में कुछ विचार उमड़ते हैं,

 मस्तिष्क में इधर-उधर विचरते हैं,

 इतनी भी जल्दी क्या है निर्णय की,

 सही गलत की तुलना करना है।


आपाधापी की इस दुनियां में,

भागदौड़ करना ठीक नहीं।

पग पग पर बाधा मिल जाएगी,

हमें यहां पर गिरना और संभलना है।

शनिवार, 21 जनवरी 2023

मुझे विश्वास है-- कविता

 विश्वास करूं तो आखिर किस पर, 

 अपनों पर करूं या करूं परायों पर।

जिनसे मेरा रक्त संबंध नहीं उन पर,

 या   करूं अपने ही सरमायों पर।


  इस जग में कौन अपना है कौन पराया है,

 कौन अब तक यह जान पाया है।

  विश्वास ही नहीं अति विश्वास किया जिन पर,

 उनसे ही अक्सर धोखा खाया है।


 मुझे विश्वास है कि मेरे विश्वास को  कभी,

 अविश्वास या विश्वासघात में नहीं बदला जाएगा।

 मेरा मुकद्दर तो मेरे साथ है,

 जैसा मैंने किया वैसा ही मुझे मिल जाएगा।

और तुम खो गये-- कविता


हर हाल में रखा ख्याल लेकिन फिर भी,

 बहार में फूल मूरझा गए बागान में। 

 दिल की धड़कन में छुपा कर रखा था तुम्हें,

 और तुम खो गए कहीं जहान में।


मजबूरी कुछ तुम्हारी कुछ हमारी भी होगी,

 जानता हूं मजबूरी यूं ही नहीं हुआ करती।

 सुबह से शाम तो होती ही है लेकिन,

  शाम इतनी जल्दी ढ़ला नहीं करती।


 खुशबू मिले गुलाब की ऐसी चाहत थी मेरी,

 नीयत फिर तुम्हारी अचानक कैसे बदल गई।

चमन फूलों का आकर सपनों में इतरा रहा था,

 और तुम आकर के चमन में कांटे बो गई।


 आसमान में बादल घटा बन छाने लगे,

 पक्षियों की चहचहाहट मधुर रागिनी सी लगी।

और तुम बादलों की ओट में छुप कर जैसे, 

 मुझसे लुकाछिपी सी खेलने लगी।



जीवन आधार-- कविता

 किसी भी कोण से न निराधार तुम हो,

मुझे तो पूर्ण विश्वास जीवन आधार तुम हो।


नहीं होता विश्वास का कोई भी आकार, 

तुम्हीं ने मुझे सहारा दिया हर प्रकार।


 मैं ठहरा मूढ़ अकिंचन नादान इंसान,

हर कठिनाई में तुमनें ही दिया निदान।


कई कई बार मैं समस्याओं से घिरा रहा,

 किंकर्तव्यविमूढ़ सा असमंजस में प़डा रहा।


मेरे सपने तो तब होने लगे साकार,

 जब तुम बन गए मेरे जीवन के आधार।

नर से नारायण-- कविता

 भांति भांति के जतन करके हारा मैं, 

 ढूंढता रहा कहां कहां सहारा मैं।

अब तो तय है और समय मैं न गवाऊं,

  अब तो बस नर से नारायण को पाऊं।


यह जग तो है बस झूठी ही माया,

 यहां कौन इसे कब समझ है पाया।

 नर को समझा महज एक माटी का पुतला,

  यही विचार तो क्यों मस्तिष्क में उछला।


नभ में ढूँढा,धरा पर भी खोज लिया,

हर जतन,हर तरह, हर रोज किया।

अब तो बस नर के आगे ही शीश झुकाऊं,

नहीं कहीं और,नर से ही नारायण को पाऊँ।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

क्यों अपने चले जाते हैं- कविता


दिल के दर्द किसी को सुनाई नहीं देते, 

 कितने अंगारे हैं दिल में दिखाई नहीं देते। 


खुशियों का ठिकाना अब हमें मिलता नहीं,

 सुकून भरा दरवाजा अब खुलता नहीं।


साथ साथ थे, इक दूजे के पास पास थे,

संदेह का तो कतरा भी नहीं एक दूसरे के विश्वास थे।


तुम्हारी बात हमें कभी भी दिल में नहीं चुभी, 

 लेकिन अब क्यों दिखा दी तुमने इतनी बेरुखी।


 दिल के दर्द आंसू बन आंखों में उतर आए हैं,

 छुपाना कितना भी चाहा छुपा नहीं पाये हैं।


 अब तो अपने आप को हर समय कोसते हैं,

 और कोसते कोसते हम हर घड़ी सोचते हैं।

 

 क्यों छोड़कर हमें अपने चले जाते हैं,

 दर्द आंसू से क्यों नयन भीग जाते हैं।


गुरुवार, 19 जनवरी 2023

भोले भाले बच्चे- कविता

भोले भाले बच्चे मन के हैं सच्चे, 

 कौतूहल से देख रहे हैं चावल ये कच्चे।

 हमारी माता यह गोल गोल घुमा रही है,  

 घूमाती हुई हाथ से समेट भी रही है।

  कौतूहल ही तो है जो प्रश्न बन के उभरते हैं,

 उत्तर पाने के लिए यही तो सवाल बनते हैं।

 शायद घर में आज बड़ा आयोजन है, 

  मां का आज बहुत प्रफुल्लित मन है। 

आयोजन आज हल्का-फुल्का नहीं, बहुत भारी है,

 लेकिन उदासी और थकान हमेशा ही ग्रहणी से हारी है।



मंगलवार, 17 जनवरी 2023

प्रभात वंदना- कविताएं

अब और न किसी की कामना है,

 जब तेरे चरणों में चारो धाम हैं ।

  हर पहर तेरी ही सेवा में रत रहूं,

   बस अब यही मुझे एक काम है।


तेरी ही कृपा से मेरा लेखन है,

निरंतर मन में होता चिंतन मनन है। 

भाव प्रवाह होता तेरी ही कृपा से 

नित नई कविता का होता सृजन है।


आओ मन से स्वागत करें ऋतुराज बसंत का,

पीली पीली सरसों से आई बहार का ।

सर्द सर्द सा दिन है,मनभावन है 

जय जय कृष्णा का जैसे वृंदावन है।


  हे परमपिता जब तक है साँस में साँस,

निष्काम भाव से करता रहूं मैं हर काम।

 कपट छल कभी मेरे निकट भी न आवे,

जीवन भर निश्चल मन से ही काम सुहावे।

बाहर की दुनिया मुझे कितना भी ललचाये,

 कोमल मेरा मन कहीं फिसल न जाये।

  जपता रहूं तेरा ही नाम सुबह और शाम,

 किसी और का नहीं अंतर्मन में बसा है तेरा नाम।


 और किसी को क्यों देखूं मैं,

मेरे मन मंदिर में तू ही बसा मेरे सांवरे।

 किसी और के संग क्यों जाऊं मैं,

  बड़ा प्यारा लगता संग तेरा रे। 

जनम जनम के दुख हर लेना,

 अब मुझे बस तेरा ही सहारा रे।

   दिन-रात करूं मैं तेरी ही पूजा,

  यह जग झूठा तू ही बस सच्चा रे।


पूरा ना मिले,मिल जाए बस आधा,

 हां यही है मेरी अभिलाषा।

 साक्षात मिलो या ना मिलो मेरे श्याम,

 पर कोई रूप दिखाने को तो आजा।

 किस विध प्रवेश पाऊं मैं,

 खिड़की खुली है पर बंद है दरवाजा।

 सदा साथ रहे न रहे गम नहीं,

मिलने का एक बार तो कर ले वादा।

 कुछ तो बोल ए मेरे परमपिता ,

 कम बोलेगा पर समझूंगा ज्यादा ।

पूरा न मिले,मिल जाये बस आधा ।


जग है झूठा  बस मैं ही सच्चा ,

 यह विचार है मिथ्या।

 माया के पीछे क्यों भागे 

 जग का बच्चा बच्चा ।

अंतर्मन में ध्यान धरो तो,

समझ में आए प्रभु की माया।

 हिय विचार ही सच्चा है,

  झूठी है यह काया।


हे शिव शंकर हे भोलेनाथ,

गले में लिपटा जहरीला नाग।

न्यूनतम आवरण धारण किये,

गहन शक्ति  से बने शक्तिमान।

बिगड़े काज बने जग माहि,

जब जब लिया भोले का नाम।

सारे जग के हे पालनहार,

तेरा ही नाम जपूं सुबह और शाम।


भव सागर में डोल रही है नैया,

 नहीं साथ में कोई खिवैय्या।

विषय वासना त्याग चुका हूं,

अन्तर्मन खंगाल चुका हूं।

मैल धो-धो निर्मल किया है मन,

और कितनी परीक्षाएं  लोगे भगवन।


 खुशियों के पल डरे डरे, 

 मेरे नयन नीर भरे।

 ओ कान्हा अब तो सुन ले,

 मेरे लिए कुछ खुशियां चुन ले।

 मैं भी घूमूं खुशियों के मेले में,

कब तक रहूंगा गमों के झमेले में।

ओ कान्हा तू दूर नहीं पास है,

बस अब तो तू ही मेरी आस है।

 





कम्बख्त दर्द-- कविता


जैसे समंदर किनारों को बुहारता है,

 जैसे माली उपवन को संभालता है।

 वैसे ही खुशियों का एक एक पल,

 संग आकर मेरे जीवन को संवारता है।


अनभिज्ञ रहा मैं जीवन के रंगढंग से,

रंग रहा था अपने को अपने ही रंग से।

 दिल मेरा खुशियों का डेरा पहिचानता है,

 लेकिन दर्द... ये  कम्बख्त मेरा घर जानता है।


दूर से ही देखकर दर्द को,जी घबराया, 

 नमस्ते,आदाब,सतश्री अकाल भी फरमाया,

लेकिन दिल न पिघला , रौद्र रूप दिखाया,

  रौद्र रूप दिखा कर अपना, मुझे खूब डराया।


 भोर की किरणों से मेरा घर जगमगाये,

  रात का तिमिर न कभी आकर डराये।

  कम्बख्त दर्द को दिशाहीन कर दूंगा,

  जीवन मे खुशियां ही खुशियां भर दूंगा।


स्वरचित-'

सतीश गुप्ता पोरवाल

सोमवार, 16 जनवरी 2023

जन्मदिन की शुभकामनाएं

"हे इंसान ,कर्म किये जा ,फल की चिंता मत कर" इसी मूलमंत्र को अपने जीवन में आत्मसात करते हुए, आप जीवन पथ पर निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। सेवामुक्त,होने के बाद ,लोग जिस समय को विश्राम का समय मानते हैं ,सात दशक पूर्ण करने के पश्चात् भी ,इस समय में, आप विभिन्न क्षेत्रों में दोगुने उत्साह से काम कर रहे हैं ---यह हमारे लिए प्रेरणा का प्रसंग है।
              "आप जियें हजारों साल ,यह हमारी है आरजू "
              जन्मदिन की बहुत -बहुत शुभकामनायें। 

रविवार, 15 जनवरी 2023

खामोश रहकर भी- कविता

 सच है खामोश रहकर भी,

 बहुत कुछ कह जाना भी एक कला है।

 कभी कड़वा कहकर आक्रोशित करने से,

 खामोश लबों की भाषा में ही भला है।


 जुबां चाहे रहे खामोश किसी की,

  पर बहुत कुछ कहना चाहता है।

  ऐसे में अवसर को भांपते हुए,

  चेहरे को मौका देना चाहता है।


  जरूरी तो नहीं कि हमेशा,

   मुँह ही खोला जाये।

  वक्त की नजाकत को देखते हुए,

  आखों से भी बोला जाये।

 

अक्सर लोग बेकाबू होकर,

भावना में बह जाते हैं। 

 लेकिन सयाने होते हैं वो, 

 जो खामोशी से सब कुछ कह जाते हैं।

शनिवार, 7 जनवरी 2023

युग बीते नव सृजन-- कविता

युग बीते नव सृजन को,

 फिर लालायित हुआ मन।

बीते युग को किया नमन,

और आगत का अभिनंदन ।


युगों युगों से है धरती,

न जाने कब इसका सृजन हुआ।

 यह क्रम बना रहे अविरल,

 ऐसा होना कठिन हुआ।


 कुछ चल पड़े एक ही राह पर,

 उनको मंजिल का न दर्शन हुआ,

 सोच समझकर राह चुनी तो,

 उद्देश्य उनका सफल हुआ।


स्वयं,परिवार,समाज देश के लिये,

क्या,क्यों,कैसे, जैसे करना है।

इन सब पर चिंतन मनन करें,

युग बीते अब नव सृजन करें।

ज़ज्बात जिन्दगी और ग़म-- कविता


ज़ज्बात जिंदगी और गम,

जिंदगी के साथ चलते रहेंगे।

न छोड़ पाएंगे हम किसी को,

किसी मोड़ पर मिलते रहेंगे।


 इंसान है तो ज़ज्बात हैं,

 हर दिल इनको सजाता है 

 ज़ज्बात हैं,मन के भाव हैं।

इनके साथ ही जिंदगी बिताता है।


जिंदगी तो बिना मांगे मिलती है,

चाहे न चाहे दुनियां में आ जाती है।

जिंदगी को जिंदादिली से जी लें,

तो खुशियों की बगिया खिल जाती है।


 सीधे सपाट राहों पर चलते चलते,

 कभी और कहीं कांटे मिल जाते हैं।

  ग़म भी इसी इन्तज़ार में रहते हैं,

  मौका मिला और लिपट जाते हैं।


  जब इस दुनियां में आ ही गये हैं,

   हर हाल में जीना ही पड़ेगा।

  ज़ज्बात जिंदगी और ग़म से  

  अनचाहे भी नाता जोड़ना ही पड़ेगा।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

बीबी गई है मायके- हास्य कविता

बीवी के घर में रहते,

 हम भीगी बिल्ली बन जाते हैं।

 उसकी अनुमति के बिना,

कुछ भी नहीं कर पाते हैं।

 रह रह कर वह,

 बड़ा रौब जमाती है।

 हम विद्यार्थी और वह,

 हेड मास्टरनी बन जाती है।

  दंड देने के लिए कभी खड़ा करती।

 कभी उठक-बैठक भी लगवाती है।  

 हमने सोचा जिंदगी भर न सही,

 एक दिन तो खुलकर जिया जाए।

 'आईडिया' आया बीवी को,

  मायके भेज दिया जाए।

हमने ऐसा ही किया ,

और फिर दोस्तों को फोन किया।

 चलो ना पार्टी-शार्टी का इंतजाम किया जाए,

 बीवी गई है मायके क्यूँ ना इंजॉय किया जाए।

 पार्टी चल ही रही थी कि अचानक,

 घर की घंटी घन-घन घननाई,

 दरवाजा खोला तो,

 सामने बीवी नजर आई।

उसे देखते ही फिर,

हम भीगी बिल्ली बन गए। 

वह बोली तुम कैसे,

 दिखावटी शेर बन गए।

हमने पूछा अच्छा बताओ,

 तुम वापस कैसे आई।  

 उसने कहा तुम्हारे किसी,

 विभीषण ने खबर पहुंचाई।

  आगे क्या हुआ होगा,

    आप समझ सकते हो।

  समझ नहीं आया तो,

  कविता दोबारा पढ़ सकते हो।

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

विश्वास और अंधविश्वास--आलेख

 इस जगत में इंसान से इंसान में, परस्पर व्यवहार में ,विश्वास का बहुत बड़ा स्थान है।व्यक्ति चाहे परिवार के हों , व्यवहार के हों या अजनबी हों  एक दूसरे से विश्वास के बल पर ही जीवन में आगे बढ़ते हैं। 

  जीवन में विश्वास का बहुत महत्व है, लेकिन विश्वास के साथ ही दो शब्द जुड़ जाते हैं - एक है अंध और दूसरा है घात ।

 जब विश्वास होगा तभी विश्वासघात और तभी अंधविश्वास हो पाएगा। बिना विश्वास के ना विश्वासघात होगा और ना अंधविश्वास ।

  आज हम  विश्वास और अंधविश्वास के बारे में ही बात करेंगे । सबसे पहले व्यक्ति को ईश्वर पर विश्वास होता है, यह पूर्ण विश्वास है या अंधविश्वास यह विवाद का विषय है। अधिकतर लोग मानते हैं  कि ईश्वर है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो नहीं मानते हैं। प्रामाणिक या प्रायोगिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता कि वास्तव में ईश्वर है,और ऐसे लोग ईश्वर को मानना एक अंधविश्वास ही मानते हैं। 

  समाज में देवी देवताओं के प्रकोप पर भी विश्वास किया जाता है। तरह-तरह की पूजा /यज्ञ किए जाते हैं। मनोरथ सफल हो गया तो विश्वास हो जाता है और नहीं हुआ तो अंधविश्वास। यानी कहा जाएगा कि यह तो अंधविश्वास है। ऐसी कई सामाजिक और धार्मिक रीतियां चली आ रही हैं  जिन पर लोगों को पूर्ण विश्वास है किंतु ऐसे भी लोग हैं जो उनको नहीं मानते  यानी इसे अंधविश्वास मानते हैं ।

   हम कह सकते हैं कि विश्वास और अंधविश्वास, मानव की अपनी प्रकृति और सोच पर निर्भर करता है। कभी विश्वास करने वाला अंधविश्वासी  जाता है और अंधविश्वासी भी विश्वासी हो जाता है,परिस्थितियों पर निर्भर करते हुए।

*अतः यह कहा जा सकता है कि विश्वास और अंधविश्वास में महीन अंतर है।*

जाते जाते-- कविता


यूं न अपने नैनों से नीर बहाते,

मन के भावों को हम यूं न दबाते।

इतना भी क्या रंज छुपा था दिल में,

 जाते जाते कुछ तो कह जाते। 


 हम तो थे सब अपने ही,

 क्यों गैरों संग हमें बिठाया।

 समझ नहीं थी ग़र हमें जो 

 कुछ तुम ही हमको समझाते।


कुछ बातें अनजाने में हो जाती हैं,

 क्यों दिल से तुमने उन्हें लगाया।

 दिल खोलकर जो हमसे कह देते,

  हम खंडहर की भांति ढ़ह जाते।


नेह कितना है दिल में हमारे ,

यह तुम्हें बतला न  पाये।

संग सरिता में हम भी बह जाते,

 ग़र जाते जाते कुछ तो कह जाते।

ऊंचे दरख्तों से-- कविता


ऊपर की ओर देखो आसमां की ओर देखो,

 आसमां की ऊंचाई का क्या अंदाजा लगाओगे।

 मापने को कितने भी दरख़्त लगा लो,

  ऊंचे दरख्तों से आसमां नहीं झुकेगा।


 चाहें अनेक है जितना चाहो चाह लो,

 कोई बंदिश भी नहीं चाहने पर।

 कमर कस ही ली है कुछ करने को,

 तो भला फिर कोई क्यों रुकेगा।


रास्ते अनेक है दुनिया के मेले में, 

भटकाने को बैठे हैं ये अनेक रास्ते। 

 समझ बूझ कर जो चुन लेगा,

तो भला कोई गलत राह पर क्यों मुड़ेगा।


  गर दिल बड़ा और दिमाग खुला है,

  तो कोई अपनी ही नहीं चलाएगा।

  भले लोगों की भली बात अवश्य सुनेगा,

 क्योंकि ऊंचे दरख़्तों से आसमां नहीं झुकेगा।

पैसे का भूत-' कविता

खाली दिमाग शैतान का घर होता है,

उसे जो नहीं करना वही करना होता है। 

 ऐसे शैतान से आखिर क्यों कुछ कहना,

 यदि कहा तो फिर पड़ेगा तुम्हें सुनना।


 किसी के दिमाग में भूसा भी भरा होता है,

 उसे तो बस अन्न छोड़ घास ही चरना होता है।

 जरा जरा सी बात पर वह भड़कता है,

 अपने आपको तीस मारखां समझता है।


किसी के पास आसानी से पैसा आ जाता है,

तो उसका दिमाग आसमान पर चढ़ जाता है।

 दिमाग में पैसा ही पैसा घूमता रहता है,

 रह रह कर पैसे को ही चूमता रहता है।


जब सिर पर पैसे का भूत सवार हो जाता है,

 तो ऐसा व्यक्ति मान मर्यादा भूल जाता है।

ऐसे व्यक्ति के दिमाग से पैसा निकाल दिया जाए,

 तो सच है वह आसमान से धरातल पर आ जाए।

बुधवार, 4 जनवरी 2023

भरपूर बरसात-- लघुकथा

 गांव रामपुर नदी किनारे बसा हुआ था। नदी में भरपूर पानी रहता था जिससे वहां रहने वाली अपनी खेती- बाड़ी की सिंचाई करते थे और अच्छी फसल प्राप्त करते थे। एक साल ऐसा हुआ कि बरसात के मौसम में,आधा मौसम गुजरने के बावजूद भी बरसात नहीं हुई। नदी का पानी कम होता गया, और वह लगभग नाले में तब्दील हो गई।गांव वाले चिंतित हुए,नदी में पानी नहीं आया तो सिंचाई कैसे होगी, फसल भी नहीं आएगी और जीवन यापन कैसे होगा?सभी गांव वालों ने निर्णय किया कि एक यज्ञ किया जाए और इंद्र देव से कृपा करने की प्रार्थना की जाए। सही समय पर यज्ञ प्रारंभ हुआ , सब ने बढ़-चढ़ कर खूब आहुतियां दीं और इंद्र देव से प्रार्थना की कि है ईश्वर जमकर पानी बरसायें ताकि नदी में भरपूर पानी आ जाए। यज्ञ से इंद्रदेव प्रसन्न हुए और कुछ ही समय में आसमान में बादल छा गए,तेज  हवाएं चलने लगीं और बिजली भी चमकने लगी।बरसात का प्रारंभ हुआ लेकिन यह क्या ! बरसात बहुत तेज हुई और रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। नदी में पानी बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे पानी ने विस्तार लिया और बाढ़ का रूप ले लिया।पानी इतना आ गया कि गांव के मकान आधे से ज्यादा डूब गए।गांव में अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग तो ऊपर छप्पर पर चढ़ गए। गांव की एकमात्र नाव से कुछ लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाए जाने लगा। कुछ महिलाएं अपने बच्चों को लेकर कमर तक के पानी में सुरक्षित स्थान पर जाने लगीं।कुछ लोगों ने गुहार लगाई- हे इंद्रदेव!आप क्यों रूठे हो, हम से ऐसी क्या गलती हो गई।

   सहसा आकाशवाणी हुई- "मैंने तो तुम्हारी ही प्रार्थना स्वीकार की, तुमने भरपूर बरसात की मांग की थी और मैं भरपूर ही दे रहा हूं। गांव वालों को अपनी गलती का एहसास हुआ और फिर इंद्र देव से प्रार्थना की,कि है ईश्वर अब बस करो । ईश्वर ने उनकी सुनी और बरसात थम गई ।धीरे-धीरे पानी उतर गया और गांव वाले फिर अपने गांव में आकर अपने काम में लग गए।

   "सच ही कहा है कि उतना ही मांगो जितना कि पर्याप्त हो ,भरपूर के लालच में नहीं पड़ना चाहिए।"

मंगलवार, 3 जनवरी 2023

चाँद (अनुप्रास अलंकार)--कविता

चम चम सी चमकती चंदा की चांदनी में,

चकोर बन चंचल मन चितचोर हुआ।

चारों दिशाओं से चकोर चहकने लगा,

 चकरा कर चित्त ने तुझे चाहा तेरा हुआ।


मन मेरा मोह लिया मन मोहिनी ने,

मेरे मन मंदिर में मूर्ति बन समा गई।

मैं मंत्र मुग्ध हो मोहपाश में बंध गया,

मंज़िल मेरी यही मनमीत मुझे बता गई।

सफ़र में हूं-- कविता (संशोधित)

सच है सफर में हूं सफर में रहा हूं ,

जिंदगी को जिंदगी की तरह जी रहा हूं।

 जिद करके अपनी अलग राह नहीं चुनी,

 नदिया की धारा के साथ बह रहा हूं।


 जिंदगी में मोड़ तो अनेक आए ,

किधर जाऊं इस असमंजस में नहीं रहा हूं,

प्रकाश स्तंभ मुझे जिस ओर नजर आया,

 मैं उस ओर ही बढ़ता जा रहा हूं।


क्यों छुपाऊं दुनिया से यह राज मैं,

 अपने सपनों को करीने से सजा रहा हूं मैं।

 साजों के ढेर हैं इस दुनिया में,

मुग्ध कर दे सभी को वह साज बजा रहा हूं मैं।


सूरज निर्विघ्न रूप से रोशनी फैला रहा,

चाँद भी रूपसी बन चाँदनी में नहला रहा।

  क्यों रहता मैं  किसी से भी कम,

  जिंदगी का सफर निर्बाध चलता रहा।