भोले भाले बच्चे मन के हैं सच्चे,
कौतूहल से देख रहे हैं चावल ये कच्चे।
हमारी माता यह गोल गोल घुमा रही है,
घूमाती हुई हाथ से समेट भी रही है।
कौतूहल ही तो है जो प्रश्न बन के उभरते हैं,
उत्तर पाने के लिए यही तो सवाल बनते हैं।
शायद घर में आज बड़ा आयोजन है,
मां का आज बहुत प्रफुल्लित मन है।
आयोजन आज हल्का-फुल्का नहीं, बहुत भारी है,
लेकिन उदासी और थकान हमेशा ही ग्रहणी से हारी है।
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