सच है खामोश रहकर भी,
बहुत कुछ कह जाना भी एक कला है।
कभी कड़वा कहकर आक्रोशित करने से,
खामोश लबों की भाषा में ही भला है।
जुबां चाहे रहे खामोश किसी की,
पर बहुत कुछ कहना चाहता है।
ऐसे में अवसर को भांपते हुए,
चेहरे को मौका देना चाहता है।
जरूरी तो नहीं कि हमेशा,
मुँह ही खोला जाये।
वक्त की नजाकत को देखते हुए,
आखों से भी बोला जाये।
अक्सर लोग बेकाबू होकर,
भावना में बह जाते हैं।
लेकिन सयाने होते हैं वो,
जो खामोशी से सब कुछ कह जाते हैं।
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