शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

जरा -- गजल

 जरा जरा सी बात पर क्यों नाराज  होती हो,

 वह जरा सी बात तो बताओ ना जरा।

  नाराजगी कितनी भी सही हमसे,

 एक नजर तो हमपे डालिये जरा।

 चेहरे पर क्यों इतनी उदासी छाई है, 

 बस एक बार मुस्कुरा दो जरा।

 जिस बात की कसक है दिल में, 

 वह बात हमें तो बताईए जरा। 

 क्यों निर्जल बादलों सी बनी बैठी हो, 

 एक बार तो झूमके बरसो जरा।

 जरा सी आहट से क्यों चौंक जाती हो,

 दिल को मजबूत बनाओ जरा।

  घने बादलों की ओट में क्यों छुपी हो, 

  चांद सा चेहरा तो दिखाइए जरा।

  दूर-दूर हैं एक जमाने से,

 अब तो पास आ जाईए जरा।

 जुल्फों से छुपा रखा है चांद से चेहरे को,

 जुल्फों को चेहरे से तो हटाईए जरा।

  एक बार नजदीक आ जाओ अगर, 

  हम भी आपसे गुफ्तगू कर लें जरा। 

 इस तरह गुमसुम रहना ठीक नहीं,

 प्यार के तराने गुनगुनाईये जरा। 

 अब ना ना छोड़कर हां हां कर दो,

 फिर प्यार की शहनाई बज जाएगी जरा।

बुधवार, 28 सितंबर 2022

आईना --कहानी

 नरेश को सरकारी नौकरी में इतना वेतन मिल ही जाता था कि घर खर्च के अलावा कुछ बचा भी लेता था।

  कुछ वर्षों पश्चात उसने 100 वर्ग गज का एक भूखंड खरीद कर मकान बना लिया। बस्ती बनी रहे इसलिए 'गेराज पोर्शन' में एक कमरा भी बना लिया। नरेश के साथ उसकी पत्नी,एक बेटा व मां, साथ ही रहते थे।

 वक्त के साथ बेटा बड़ा हो गया और नरेश को उसकी पढ़ाई-लिखाई के लिए अलग कमरे की जरूरत महसूस हुई, तो नरेश ने 'गेराज पोर्शन' वाला कमरा खाली करवा दिया। उसने अपनी पत्नी को कहा की मां को उस बगल वाले कमरे में रख देते हैं और यह कमरा बेटे के काम आ जाएगा। उसकी पत्नी ने कहा कि अच्छा हुआ हमने वह कमरा बनवा लिया। अब वह माताजी के लिये काम आ जाएगा। 

 बेटे ने जब यह बात सुनी तो उसने कहा कि पापा सही है, ऐसा कमरा समय पर काम आ जाता है।मैं भी जब मकान बनाऊँगा तो उसमें भी ऐसा ही कमरा बनाऊंगा ताकि आप लोग जब बूढ़े हो जाओगे तो आप लोगों को उस कमरे में रख सकूं।

  यह सुनते ही जैसे नरेश और उसकी पत्नी पर घड़ों पानी पड़ गया।उनको अपनी गलती महसूस हुई और जैसा करना चाह रहा था वैसा नहीं किया। 

सही कहा है कि "कब कोई बदल जाए- कब आईना सामने आ जाए।"

अपने बारे में सोच जरा--कविता

 अपने बारे में सोच जरा ,

 दुनिया की फिक्र में है पड़ा।

 नरम बहुत है दिल तेरा,

 तू चाहेगा करना भला।

पर वह नहीं हिचकिचायेगा,

तेरे साथ भी करना बुरा।

 मन तो तेरा निश्चल है,

 जैसे पारदर्शी और स्वच्छ जल।

 पर तू क्या जाने इस दुनिया में,

 दिलों में भरा कितना छल।

 कितना कुछ औरों को दिया, 

 बस दिया ही दिया नहीं लिया।

 जितना जैसा मिला तुझे,

  उतने में ही बस गुजारा किया।

 दुनिया में सिर्फ गैर ही नहीं,

 अपने भी कोई कम नहीं।

 अपनों को  खूब दिया और,

  इसका तुझको गम नहीं।

 लेकिन अपने बारे में भी तो सोच,

 क्या करना है यह भी तो खोज।

  अपने लिए भी कुछ कर ले,

    वरना तो पछतायेगा एक रोज।

सोमवार, 26 सितंबर 2022

जिंदगी का सफर

 रेलगाड़ी में महेश बड़ा गुमसुम सा बैठा हुआ था ।उसको समझ में नहीं आ रहा था की करे तो क्या करे। वह कौन से स्टेशन पर उतरे और अपना भाग्य आजमाये। अपने शहर से बाहर जाकर उसके मन में व्यापार करने का विचार आया लेकिन कौन से शहर में जाए ,यह तय नहीं कर पाया।

   जयपुर रेलवे स्टेशन से उसने मुंबई का टिकट लिया और फिर गाड़ी में बैठ गया। उसने सोचा कि जहां भी उसका विचार बनेगा वहीं उतर जाएगा और वहीं पर व्यापार शुरू करेगा। स्टेशन आते गए उसका विचार नहीं बना और वह आगे बढ़ता चला गया,अंततः वह मुंबई पहुंच गया ।

  स्टेशन से बाहर आकर वह पशोपेश में पड़ गया कि इतने बड़े महानगर में वह कहां जाए और यहां व्यापार करे तो कैसे?कोई भी जान पहिचान का नहीं है ।

   उसकी जिंदगी में भी ऐसा ही चलता रहा।उम्र के हिसाब से उसने कभी काम नहीं किया । शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ काम करूंगा , कुछ काम करूंगा यह सोचते सोचते कई साल निकाल दिये। फिर एक स्टेशनरी की दुकान खोली , उससे संतुष्ट नहीं हुआ।  फिर रेडीमेड कपड़ों की दुकान खोली वह अभी भी तो संतुष्ट नहीं था। उम्र निकलती जा रही थी । शादी के आग्रह  आते रहे लेकिन बाद में करूंगा , बाद में करूंगा करते-करते शादी की उम्र भी निकल गई। सब कर लूंगा , जल्दी भी क्या है , यह सोचते सोचते ही उम्र निकलती जा रही थी और वह कुछ स्थिर नहीं कर पा रहा था और अब वह उम्र के इस मोड़ तक पहुंच चुका था जहां लोग नौकरी से सेवा मुक्त होकर निश्चिंत होकर जीवन यापन करते हैं ।वह सोचने लगा कि वास्तव में मेरी उम्र तो बिना रूके सफर कर रही है । उसकी स्थिति वही हो गई थी जो प्रारंभ में बताया गया कि वह निश्चित नहीं कर पाया कि कौन से स्टेशन पर उतरे और अंततः अंतिम स्टेशन तक पहुंच गया।

रविवार, 25 सितंबर 2022

बेटियों की अहमियत

 इस भूमंडल में जरा देखिए,

 कहां नहीं है बेटियां।

 जहां जहां नजर डालो,

 वहां वहां हैं बेटियां ।

 इस धरा के हर कोने पर,

 हर क्षेत्र में है बेटियां।

 भूभाग पर ही नहीं ,

अंतरिक्ष में भी नाम लिखाती बेटियां। 

 सागर की गहराई या पर्वत की ऊंचाईयां,

 हर जगह इतिहास बनाती हैं बेटियां। 

 घर में मां की सहायक बनतीं, 

पापा को भी राह दिखाती बेटियां।

  माता-पिता से शिक्षा पाकर,

 संस्कारित होती बेटियां।

  ससुराल में जाकर भी,

  परिवार का मान बढ़ाती बेटियां। 

 स्वयं बेटी,मां,दादी,नानी ही नहीं,

 इस संसार की जननी होती हैं बेटियां।

 न होतीं नवरात्र में नौ देवियां,

  न होतीं जो जगत में बेटियां।

शनिवार, 24 सितंबर 2022

बुजुर्गों का महत्व

 अपने जीवन की एक उम्र पार कर,

 सारे अनुभवों का निचोड़ निकालकर।

  जब बुजुर्ग हो जाता है एक युवा,

 तो सुधार सकता है परिवार की हवा।


 बुजुर्ग देता है अपने सदस्यों को एक दिशा,

 जिस पर चलना चाहिए सभी को हमेशा।

 यदि चलते से इसी दिशा में सभी,

 बात मान कर नहीं भटकेगा कभी। 


 बुजुर्ग हर परिवार का प्रकाश स्तंभ है,

  जो वही दिशा दिखाता है जो सही है। 

 जरूरी है बुजुर्गों का सम्मान करना,

  दोस्तों उन बुजुर्गों पर अभिमान करना।


 यदि बुजुर्गों के निर्देशों का पालन करोगे,

 तो जीवन में कभी भी राह नहीं भटकोगे।

वो अपना गुजरा हुआ जमाना (स्कूल के समय का)

 वो अपना गुजरा हुआ जमाना,

 आज भी याद आता है।

 स्कूल के दिनों की 

  याद दिला जाता है।


याद दिलाता है जब भी,

  मुझको बहुत सताता है।

मुझको बहुत सताता है ,

फिर भी मन को बहुत भाता है।


  कभी समय पर,

  स्कूल को रवाना नहीं होते थे।

 हाथ में बस्ता लेकर,

 खूब दौड़ लगाते थे।


  मास्टर जी तो जैसे,

तैयार ही बैठे रहते थे।

कुछ मिनटों की देर होने पर,

 दो चार डंडे बरसाते थे। 


 खाली समय पर कक्षा में,

 खूब शोर मचाते ।

 सीधे-साधे बच्चों को 

 ताता थैय्यां खूब नचाते।


 सुन कर बच्चों का शोर,

हेड मास्टर जी आते।

 आकर के दस-बीस,

 उठक-बैठक लगवाते।

मुझे उड़ने दो।

 मैं उपवन की एक कली हूं,

 मुझे खिलने दो मुझे खिलने दो मुझे खिलने दो।

 पढ़ लिख कर बढ़ना है आगे,

  मुझे पढ़ने दो मुझे पढ़ने दो मुझे पढ़ने दो।


  दुनिया में लड़की को क्यों बदनाम किया,

  लड़के का तो आगे नाम किया।

  मैं भी करना चाहूं बहुत कुछ,

 कहानी ऐसी मुझे गढने दो मुझे गढ़ने दो मुझे गढ़ने दो।


  क्यों हमको सब ठेल रहे,

  क्यों गड्ढे में धकेल रहे।

  मुझको भी आगे बढ़ना है ,

मुझे बढ़ने दो मुझे बढ़ने दो मुझे बढ़ने दो।


 मैं भी उड़ना चाहूं उन्मुक्त रूप से,

  इस विशाल से फैले आकाश में,

   मेरे पंखों को ना नोचो,

 मुझे उड़ने दो मुझे उड़ने दो मुझे उड़ने दो।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

ख्वाब में चाशनी में- -


# विषय- ख्वाब में चाशनी में डूब रहा था- - 

स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल',मानसरोवर, जयपुर ।


सुना है कुछ पैसे आ जाते हैं तो,

 लोग दूध से नहाते हैं ।

 और ज्यादा पैसा आता है तो,

 लोग घी से नहाते हैं।

  हमारी तो है मिठाई की दुकान,

  तो हमने भी बना लिया एक प्लान।

  दूध और घी से नहाने वालों को बताएंगे, 

  हम यहां चासनी में नहाएंगे। 

 तो हम गुलाब जामुन से भरे 

 कड़ाहे में उतर गए ।

 पानी की तरह मुंह में भर ,

 कुल्ला करना था लेकिन निगल गए।

  स्विमिंग पूल की तरह अठखेलियां करते रहे,

   और बीच-बीच में गुलाब जामुन भी गटकते रहे।

चीटियों का एक रेला हमारी तरफ आ रहा था,

 इतना बड़ा गुलाब जामुन जो पहली बार देखा था।

 हम घबरा कर बाहर निकले 

  हड़बड़ी में फर्श पर ही फिसले।

 दुकान के लड़के को हमने बोला,

 अबे देखे मत ज्यादा मत सोच।

 जल्दी-जल्दी कपड़ा लाकर ,

  निगोड़ी चासनी को पोंछ।

   ख्वाब में मैं ,

चासनी में डूब रहा था।

नींद खुली तो मुझे चाट,

 श्वान मजा लूट रहा था।

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

चेहरे की सलवटें तजुर्बे का प्रमाण है

 घर में जब गूंजती हैं किलकारियां,

  खिल उठती हैं घर की फुलवारियां।

 उम्र जब कुछ और कदम बढ़ाती है,

  तो होने लगती हैं अठखेलियां। 

  बच्चे का जीवन कुछ इस कदर आगे बढ़ता है,

 चलता है संभलता है फिर लुढ़कता है।

  जब उम्र को पार करता हुआ,

  एक मुकाम तक पहुंचता है।

 तो फिर दुनिया को पहेली समझने वाला,

  दुनियादारी को समझने लगता है।

 रिश्ते-नाते  दुनिया के ताने-बाने से गुजरता है,

 देख दुनिया के करिश्मे रोता है कभी मुस्कुराता है।

  उम्र के दौर में गोते लगाते हुए,

 जवानी के आते समझता है दुनियादारी।

  आती है कई समस्याएं जीवन में 

 कुछ लगती है हल्की-फुल्की कुछ भारी भारी।

  गृहस्थ जीवन में आ जाने पर,

 बहुत कुछ समझने और समझाने पर।

  अनुभव उसको आने लगता है,

इसी अनुभव से अपनों को भली भांति समझाता है।

  भरी उम्र में चेहरे पर आई लालिमा,

 फिर उम्र के साथ धूमिल होने लगती है।

  धीरे धीरे फिर बुजुर्ग के चेहरे पर, 

  झुर्रियां यानी सलवटें प्रकट होने लगती है।

 चेहरे पर बनी सलवटें तजुर्बे का प्रमाण है,

  ऐसी सलवटो को हमारा प्रणाम है।

बुधवार, 21 सितंबर 2022

बस एक तेरी आरजू


दिल से दिल मिले थे,

 नसीब अच्छे लगे  थे।

तुम्हारे हमारे बीच 

 न शिकवा थे न गिले थे।

 लगता था हमारी बगिया में, 

 रंग बिरंगे फूल खिले थे। 

 न मिलती थी तुम,

तो हम रहते थे बेकरार।

 दिल हमारा तड़पता था,

 रोता था जार जार। 

 समय गुजरता ही नहीं था, 

 जब हम करते थे तुम्हारा इंतजार।

  हमारा यह बेकरार दिल ,

  तुम्हे ही देखना चाहता था बार-बार।

   एक झलक भी जब दिख जाती, 

   तो जैसे आ जाती थी बहार। 

 आंसुओं का भी पता नहीं,

 आंखों से बहे न बहे ।

 बस एक तेरी आरजू बरकरार रहे, 

 दिल का क्या है यह रहे न रहे।

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

स्त्री की पिसती जिंदगी और चाय का प्याला

 रोज के नियम के हिसाब से ममता ने सुबह 6:00 बजे उठ कर , घर का झाड़ू- पोछा करने के बाद , चाय बनाई और महेश को आवाज दी- उठो चाय पी लो।महेश चाय पीता हुआ अखबार के पन्ने पलटता रहा,उधर ममता बच्चे के लिए नाश्ता बनाने में जुट गई, उसका स्कूल का समय जो हो रहा था। महेश इधर-उधर समय व्यतीत करता हुआ ममता को कहता है कि मेरा टिफिन जल्दी तैयार कर दिया करो ,ऑफिस में लेट हो जाता हूं, हालांकि ममता जानती थी कि वह उसकी वजह से लेट नहीं होता। बच्चे के स्कूल और महेश के ऑफिस जाने के बाद वह घर के अन्य कार्य में व्यस्त हो जाती। फिर बच्चे के स्कूल से आने के बाद कुछ समय के लिए बिस्तर पर सुस्ता लेती । शाम को महेश ऑफिस से आते ही तुरंत आवाज लगाता- अभी तक चाय तैयार नहीं हुई, तुम्हें मालूम था मैं ऑफिस से आने वाला हूं। ममता तुरंत चाय बनाती और दोनों चाय पी लेते। फिर ममता शाम के खाने की तैयारी करती ।यही क्रम रोजाना चलता रहता । 

  एक दिन महेश को उसका मित्र नरेंद्र अपनी पत्नी के साथ बाजार में मिल गया , तो महेश बात करते हुए नरेंद्र की पत्नी के चेहरे को एकटक देखने लगा।नरेंद्र ने कहा-क्या बात है आज भाभी को पहली बार देखा है क्या? महेश ने कहा कि-अरे मैं देख रहा हूं कि भाभी के चेहरे पर कितना तेज है, मेरी पत्नी के चेहरे पर तो नहीं। नरेंद्र ने कहा कि इसका सीधा सा राज है- सिर्फ दो समय की चाय । मैं सुबह पत्नी से 15 मिनट पहले उठता हूं और चाय बना कर उसे आवाज देता हूं- चाय पी लो। शाम को ऑफिस से आने के बाद मैं ही चाय बनाता हूं।बेशक मैं थका हुआ रहता हूं पर वह भी तो थकी हुई रहती है।तुम भी यही फार्मूला क्यों नहीं अपपाते हो ?

   अगले दिन महेश ने ऐसा ही किया। सुबह जल्दी उठकर चाय बना कर ममता ममता को आवाज दी-आओ चाय पी लो।ममता  आश्चर्य से उठी और चाय पी ली । 

  महेश ने उसके चेहरे की ओर देखा तो उसे लगा कि आज सूरज अपनी लालिमा लिए हुए,आसमान में नहीं उसके घर में ही उगा है।

मैं समंदर हूं -- लेख

 

जी हां मैं समंदर हूं । जितना विशाल मेरा तन है उतना ही विशाल मेरा मन और दिल है।कई देशों की , कई नदियों को मैंने पनाह दी है , उनका स्वागत किया है और कहा है कि आओ और मुझ में समा जाओ । कई बड़े बड़े जीव जंतु /छोटी बड़ी मछलियों को मैंने अपने तन के अंदर पनाह दे रखी है। वे घूमती फिरती है , अठखेलियां करती है  तो मुझे अच्छा लगता है। मेरे शरीर के अंदर से बड़ी-बड़ी पनडुब्बियों एक जगह से दूसरी जगह यानी मेरे शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक आती-जाती रहती हैं , मैंने कभी उन्हें मना नहीं किया । कई देशों के बड़े बड़े जहाज मेरे सीने को चीरते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं , मुझे कभी ऐतराज़ नहीं हुआ। मैं शांत रहना चाहता हूं लेकिन मेरे शरीर के अंदर और बाहर इतनी हलचल की जाती है कि कभी-कभी मुझे क्रोध भी जाता है और इसका खामियाजा किसी पनडुब्बी / जहाज को भुगतना ही पड़ता है, जिसका मुझे दुख भी होता है । मैं बहुत ताकतवर हूं ,मेरी भुजाओं में बहुत ताकत है। चाहता हूं कि मेरी इस ताकत का इस्तेमाल मानव मात्र की सेवा के लिए हो।

सोमवार, 19 सितंबर 2022

कुछ पाना रह गया

 इस दुनिया में आकर के अपनी उपलब्धी से आज तक कोई भी संतुष्ट नहीं हुआ।रामचरण जी के परिवार को यूं तो दो वक्त की रोटी नसीब थी , किराए का घर था ,दो पुत्रियां भी थीं लेकिन फिर भी कोई कसक मन में थी। चाह रहे थे कि उनकी दुकान थोड़ी और बड़ी हो जाए,घर में एक बेटा आ जाए, स्वयं का मकान हो जाए , साथ ही एक कार भी यदि वह खरीद सकें तो सोने में सुहागा हो जाए।

  किस्मत ने साथ दिया और उनका धंधा अच्छा चलने लगा,दुकान में सामान भी बढ़ गया, घर में बैटा हो गया और कुछ समय बाद एक,छोटी ही सही पर ,एक जमीन खरीद ली। अब रामचरण जी सोचने लगे कि पास की दुकान भी खरीद लूं तो दुकान और बड़ी हो जाए ,धंधा और अच्छा चले। बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया था तो वह एक अच्छे स्कूल में जाए,चाहे फीस कितनी भी जमा करनी पड़े।ईश्वर की कृपा से ऐसा ही हुआ।समय और गुजरा और बच्चा शादी लायक हो गया। अब वे सोचने लगे कि बच्चे की शादी किसी धनी परिवार में हो जाए, जमीन पर मकान बना दूं और बेटे के लिए भी एक दुकान अलग से शुरू कर दूं। लो जी ऐसा भी हो गया, सब कुछ और अच्छा होता चला गया।

 अब रामचरण जी सोचने लगे ,उसे पास की दुकान भी मिल जाए तो दुकान बड़ी हो जाए, बेटा भी अलग से कार खरीदे, समाज में उसका अच्छा नाम हो जाए ।

  सब कुछ उसके हिसाब से होता रहा, किस्मत कुछ ऐसे ही उसका साथ दे रही थी । रामचरण जी की उम्र काफी हो चुकी थी एक दिन वे बीमार पड़े और बीमारी इतनी बढ़ी कि लाइलाज हो गई । उन्हे लगा कि उनका अंत समय नजदीक ही है । अभी भी उनको जीवन से लगाव रहा। प्रार्थना करने लगे -हे ईश्वर अभी तो मुझे बहुत कुछ करना बाकी है-मेरा पोता बड़ा हो  गया, उसकी शादी हो जाए, मकान पर एक मंजिल और चढ़ा दूं , पैसा इतना हो जाए कि मंदिर में और समाज में दान भी दूं। लेकिन अबकी बार ईश्वर ने उनकी नहीं सुनी और वे इस दुनिया से चले गये। जो कुछ उनके मन में था वह मन में ही रह गया ।हालांकि उनको बहुत कुछ प्राप्त हो गया था , लेकिन सच कहा है कि 

 *"सब जग में पाकर के और कुछ पाना रह गया"।*

रविवार, 18 सितंबर 2022

कहानी-प्यार में हार भी जीत होती है

 यूं तो राजेश फक्कड़ प्रवत्ति का था 'ना  काहू से दोस्ती ना काहू से बैर' और अपनी ही धुन में मस्त रहता था। साहित्य सृजन का उसे शौक ही नहीं बल्कि जुनून था।जब भी समय मिलता कविता , कहानी , लेख आदि लिखता रहता।कभी पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भेजता और कभी साहित्यिक 'फेसबुक' पटल पर।

  एक दिन वह अपनी बाइक से घर से बाहर निकला ही था कि तुरंत ब्रेक लगाना पड़ा।ब्रेक न लगाता तो आती हुई लड़की से टकरा जाता।राजेश ने कहा- सॉरी बेबी। भाव शून्य चेहरे से उत्तर मिला- बेबी नहीं , महिमा नाम मेरा। राजेश अपने काम पर चला गया लेकिन महिमा का चेहरा उसके दिल में  प्रवेश कर चुका था। 

 एक दिन अचानक महिमा सामने आ गई और कहा -अरे राजेश जी ,आप तो बहुत अच्छे कवि हो। बहुत उम्दा कविताएं लिखते हो और सुनाते हो।राजेश ने आश्चर्य से कहा- तुम्हें मेरा नाम भी मालूम है और काम भी ,कैसे? महिमा ने कहा कि मुझे कविताएं सुनने का शौक है । मैंने आपका 'लाइव' काव्य पाठ "मानसरोवर काव्य मंच" के 'फेसबुक' पटल पर देखा था। कहने के साथ ही उसने राजेश को पास के ही रेस्त्रां में, साथ में, चाय पीने को आमंत्रित किया।राजेश स्वयं ही उसका साथ चाहता था , मना नहीं कर पाया और यह उनकी पहली विशेष मुलाकात बन गई ।

  वह राजेश के दिल में बस चुकी थी और वह मन ही मन सपने बुनने लगा था,उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने का । लेकिन अचानक एक दिन महिमा उसके घर पर आई और उसके हाथ में एक निमंत्रण पत्र देते हुए कहा कि आपको अवश्य आना है । निमंत्रण पत्र देखते ही वह चौंक पड़ा । यह क्या, तुम्हारी शादी हो रही है? महिमा ने कहा कि सबकी होती है और मैं खुश हूं कि मैं जिसको चाहती हूं उससे ही हो रही है। राजेश के दिल को धक्का तो लगा लेकिन फिर संभल गया ,आखिर कवि जो था और कवि जीवन के उतार-चढ़ाव को अच्छी तरह समझता है । संभलते हुए उसने कहा-हां हां अवश्य ही आऊंगा,तुम बुलाओ और मैं न आऊं  ऐसा तो हो ही नहीं सकता।

  पहले तो राजेश को लगा कि वह हार गया है लेकिन अगले ही कुछ क्षणों में उसका मन स्थिर हुआ और उसने सोचा कि उसको उसका प्यार मिल गया है और ऐसा होना ही चाहिए। इस विचार के आते ही उसको लगा कि वह हारा नहीं है जीत गया है और वह मन ही मन बुदबुदाया कि "यही है प्यार की रीत , जिसमें कभी मिलती है हार तो कभी मिलती है जीत"।


स्वरचित कहानी--

सतीश गुप्ता'पोरवाल' 

 मानसरोवर, जयपुर ।

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

आवाज को साज दो

प्रारब्ध पर मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो,

 मधुरता मिले तभी जब आवाज को साज दो।

 आवारा सी लग रही है जिंदगी मेरी,

  अब तुम ही आकर इसे पहिचान दो।

  प्रारब्ध पर मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो।


  चाहता हूं जिन्दगी में बहुत कुछ करना,

 आ जाओ तुम्ही इसे आगाज दो।

 इंतजार तो कर लिया बहुत हमने,

 अब अन्त कल नहीं बस आज हो। 

प्रारब्ध पर मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो। 


 दिल में छुपा कर रखे थे राज बहुत,

 बताया तुम्हें ही तुम ही मेरे हमराज हो। 

 एक ही ढर्रे में चलना मुझे पसंद नहीं,

  मेरे अंदाज को एक नया अंदाज दो। 

प्रारब्ध पर  मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो।


  तन्हा तन्हा कब तक चलता रहूंगा मैं,

  जिंदगी के सफर में तुम ही मेरा साथ दो।

 सांसें कैसे तन से जुड़ी हुई हैं,

  तुम ही हां तुम ही इसका राज हो। 

    प्रारब्ध पर मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो।


  मैं तो अदना सा एक इंसान,

 तुम ही इस इंसान की आवाज हो।

 मेरी तमन्ना से तुम कैसे अनजान हो,

  अब देर न कर मेरी आवाज को साज दो।

 प्रारब्ध पर मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो। 


  मैं पंख बनू तुम मेरी परवाज हो,

 बात तो बने तभी तुम मेरी आवाज को साज दो। 

प्रारब्ध पर मैं रुका हुआ तुम इसे अंजाम दो,

मधुरता मिले तभी जब मेरी आवाज को साज दो।

बुधवार, 14 सितंबर 2022

शायरी

 हमने कहा ,आज न जीने की तमन्ना है और न मरने का इरादा है,

  वे बोले कम से कम दूसरा तो पूरा कर ,यह प्लान तो आधा आधा है।

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हमने कहा,मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के ,

 उन्हे नहीं मालूम आगे है नाली ,

 उन्होंने हमें न देखने की ही कसम खा ली।

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इस दुनिया से मुझे हरदम ही मिला ,

 गम तो ज्यादा,पर सुकून कम ही मिला।

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बड़े मासूम बनकर वो कत्ल करते हैं ,

 बड़ी भोली सी अपनी शक्ल रखते हैं।

  देखते हैं  वो इधर ना उधर ,

   हर काम बड़े बेवक्त करते हैं ।

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 तुम आगाज तो करो अंजाम हम कर देंगे,

  तुम कोरा कागज दो शब्दों से हम भर देंगे।

 हमारा जीना तो क्या जीना,

  यह जिंदगी तुम्हारे नाम कर देंगे। 

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आज कुछ तो नया नहीं होगा,

 कोई अफसाना बयां नहीं होगा।

 उम्र तो उम्र है हावी होगी ही,

 कभी कोई बुजुर्ग जवां नहीं होगा।

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अक्सर अमृत के बदले जहर उगलते हैं लोग,

 अंदर से होते काले सफेद दिखते हैं लोग।

  अब हमने तो ज़हर पीने की आदत ही बना ली,

    हमारी इस आदत से जलते हैं लोग।

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 बहुत की तूने बेवफाई ए सनम।

 हम भी तेरी नजरों में गिरके रहेंगे।

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हम भला किसी से क्यों डरेंगे।

 जो करना है वह करके रहेंगे।।

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दुनिया ने हमको भला बनने न दिया।

     अब तो हम बुरे ही बनके रहेंगे ।।

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कमबख्त नींद तो हमें आ ही गई होती, 

  गर तेरी यादों ने न घेरा होता ।

 उदासियों का घर न होता ,

 गमों का न डेरा होता।

रविवार, 11 सितंबर 2022

भाषा,संस्कृति,संस्कार और व्यापार

 *भाषा,संस्कृति ,संस्कार और व्यापार*

  किसी भी देश की उन्नति मैं भाषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है।जितने भी उन्नत देश हैं जैसे अमेरिका,चीन, जापान जर्मनी फ्रांस ब्रिटेन आदि,इन सब की अपनी भाषा है और अपनी भाषा पर गर्व है। कोई भी विदेशी इन देशों में जाकर बसता है तो उन्हें उनकी भाषा सीखनी पड़ती है लेकिन भारत में कोई भी विदेशी आए उसे हिंदी सीखने की जरूरत नहीं,अंग्रेजी से ही काम चल जाता है।

 बच्चों को प्रारंभ से ही अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में प्रवेश दिलाते हैं।बच्चे की हिंदी से दूर अंग्रेजी की प्रवृत्ति यहीं से शुरू हो जाती है। विशेष तौर पर,जो भारतीय विदेशों में हैं वे वहां पर अपने बच्चों से अंग्रेजी में ही बातचीत करते हैं,फल स्वरूप वे यहां आने पर नाना-नानी दादा-दादी आदि से भी संवाद स्थापित नहीं कर पाते। शुभकामना/संवेदना संदेश भी अंग्रेजी में ही दिए जा रहे हैं।भाई,भाई को बेटा, पिता को अंग्रेजी में बधाई दे रहा है। 

 सामाजिक माध्यम अंग्रेजी भाषा से भरा पड़ा है ।हम देखते हैं कि,दक्षिण भारतीय राज्यों को छोड़ दें तो भी,कई प्रदेशों,जैसे गुजरात महाराष्ट्र आदि में भी दुकानों पर लगे हुए पट्ट स्थानीय भाषा में ही लिखे मिलेंगे।हमारे देश में बनने वाले उत्पाद पर 90 से 100% तक अंग्रेजी में ही लिखा होता है।

  हिंदी के मुख्य कहानी/कविता/ साहित्य के "फेसबुक" पटल पर टिप्पणियां भी अधिकतर अंग्रेजी में ही दी जा रही हैं।

 *बेचारी हिंदी को अपने प्रचार के लिए, हिंदी दिवस मनाना पड़ता है*

मुक्तक-2

 आज न जाने क्यों मन उदास है,

सभी दूर न कोई पास है ।

 मिट जाएंगी कभी तो दूरियां, 

  मन में बस यही आस है।

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मेरे ही गुलशन में क्यों है पतझड़ जब सब में बहार आई है,

 सबके खेत लहलहा रहे मेरे पर ही क्यों सूखे की लहर आई है।

 देर न कर अब तो बता दे मेरे परमेश्वर,

  सबके चेहरों पर है खुशी मेरे पर ही क्यों उदासी छाई है।

********************

प्रजातंत्र के इस मंदिर में हम अपना योगदान करेंगे ,

 मत पेटी में गुप्त रूप से अपना मतदान करेंगे।

 सरकार बनाने में चलेगी अब हमारी ही मर्जी,

  नहीं चलेगी किसी हाल में नेताओं की मनमर्जी।

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 ईश्वर में भरपूर निष्ठा है मेरी ,

 पूजा अर्चना भी खूब करता हूं मैं। 

 इंसान जब भी गलत काम करे ,

  तो भर्त्सना भी खूब करता हूं मैं। 

   **********************

तू वीर है तो वीर बन, 

 धैर्य छोड़ अधीर बन।

  सोच सोच में फर्क कर,

  प्यादा नहीं वजीर बन।

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की सदा तो सदा मां कृपा चाहिए ,

 यही कृपा हे मां हर दफा चाहिए ,

  मेरा तो भविष्य ही मां ,

  आपके द्वारा ही रचा चाहिए।

  *********************

कभी-कभी सामने वाले को,

 जलाना पड़ता है ।

जलाकर उन्हें 

राख बनाना पड़ता है।

 राख बनेंगे तभी तो,

 हल्के बनेंगे। 

हल्के बनेंगे ,

तभी तो हमारे बनेंगे। 

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जब सोच ही लिया तो ,

मन में द्वंद्व नहीं होता। 

 एक ठोकर खा जाने से,

 इंसान चलना बंद नहीं करता।

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  ये रंज-ओ-गम सभी मिलकर भी मुझ को न हरा पाते,

  कितना भी कर लें सितम मुझको ना घबरा पाते।

  रख लेते हम अपने दिल पर काबू ,

 यदि वे एक नजर तो देख लेते जाते जाते।

      ***************

चमन में फूल बस यूं ही नहीं खिलते ,

कली को खिलने दोगे तभी तो फूल बनेगी।

  *****************

अमावस के अंधकार को लील लिया ,

 सबके मन में हर्षोल्लास भर दिया ।

  जब देखा जगमगाता हुआ ,

   घर की देहरी पर जगमग दिया ।

      *******************

इबादतों में न दम , मुहब्बत तभी मुकम्मल नहीं हुई थी।

  वह वह रही , मैं मैं रहा , शख्सियत हम नहीं हुई थी। 


धड़क-धड़क धड़कता था दिल रुकती हुई थी सांसें,

वो मंजर देख-देख कर मन हो जाता था खिन्न।

 कितनी भी कोशिश की मैंने उन्हें भुलाने की,

 लेकिन यदा-कदा याद आ ही जाते हैं वे बेजार से दिन।

 दिलों की दूरियां बहुत तड़पाती हैं रुलाती हैं, 

टूटे हुए दिलों की कहानियां सुनाती हैं।

 पर कुछ आत्माएं  ऐसी भी हैं दुनियां में, 

जो ग़मों के ही सही,नगमें गुनगुनाती हैं ।






शनिवार, 10 सितंबर 2022

तू रसगुल्ला, मैं सूखा लड्डू


 #सतीश गुप्ता'पोरवाल'


ओय किधर को जाती तू  

 सुन ले ओ मेरी बजरबट्टू।

  तू बुन्दी एक ग्राम की,

  में सौ ग्राम का लड्डू ।


  कल को होटल वाले ने,

  खूब बनाया बुद्धू ।

 ढाई ग्राम के अंगूर संग मिक्स किया, 

   सब्जी में ढाई किलो का कद्दू।


  तुझे लग रहा होगा कि तू है गुड्डी,

 और मैं तेरा गुड्डू ।

 पर तू लग रही पोती सी,

  और मैं लग रहा दद्दू । 


 तू समझ रही है ,

  मैं तुझ पर हूं लट्टू ।

  हवा जरा आने दे ,

 यहां से दूर हट तू ।

 

 इधर-उधर क्यों घुमा रही,

 समझा क्या भाड़े का टट्टू,

 अच्छा बाबा तुम रसगुल्ला हो रस से भरा,

   मैं बुन्दी का सूखा  लड्डू।

सागर तुम्ही दिखाओ मुझे कोई रास्ता



फसा हुआ हूं सांसारिक भंवर में,

 कोशिशें सब नाकाम होती जा रहीं,

 रास्ता निकलने का नजर नही आता, 

 सागर तुम्ही दिखाओ मुझे कोई रास्ता ।


 कभी पहाड़ की चोटी पर नजर आता हूं मैं,

  कभी गहरी खाई में गिरता हुआ पाता हूं मैं,

 क्या करूं क्या ना करूं समझ नहीं पाता,

 सागर तुम्ही दिखाओ मुझे कोई रास्ता।


  दुख मेरे सीने में हैं अथाह , 

 और किससे मांगू मैं पनाह 

  मेरा दुख और कोई समझ नहीं पाता,

   सागर तुम्ही दिखाओ मुझे कोई रास्ता।

वक्त ऐसे ऐसे दिन दिखा रहा है

 वक्त भी इस वक्त इतना अहम हो गया है,

  हर किसी को खुदा होने का वहम हो गया है।

 जो था कल पाले दया अपने दिल में,

 वह आज कितना बेरहम हो गया है।

  वक्त था एक जब घेरे रहते थे मुझको,

  तुम अपने हो यही कहते थे मुझको।

  विपत्ति आखिर किस पर ही नहीं आती,

  परिस्थितियां आकर किसको नहीं सताती।

  जाना पहिचाना हर चेहरा अब,

 अनजाना बन दूरियां जता रहा है।

 वक्त ऐसे ऐसे दिन दिखा रहा है,

  अपने पराए का भेद बता रहा है।

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

जीवन की जिजीविषा


#विषय: जीवन की जिजीविषा क्या है?

दिनांक: 6 सितंबर,


स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'

 (S.K. Gupta)


  व्यक्ति जब बच्चे के रूप में इस दुनिया में आता है बल्कि यह कहें कि उसे इस दुनिया में लाया जाता है तो वह नहीं जानता कि वह इस दुनिया में क्यों आया है । उसकी कोई चाह नहीं होती, जैसे रखा जाता है वैसे ही रहता है, जो खिलाया-पिलाया जाता है वही खाता-पीता है,जो मिल जाता है वही ले लेता है। लेकिन जैसे जैसे वह बड़ा होता है,कुछ समझने लगता है तो उसकी चाहत पैदा होने लगती है। किसी की गोद में जाना पसंद करता है और किसी की में नहीं। कुछ करना चाहता है और कुछ नहीं, इत्यादि ।जब और बड़ा होता है,स्कूल जाने लगता है,वह समझता है कि सब बच्चे जाते हैं इसलिए वह भी जा रहा है, और पढ़ रहा है।समय के साथ उसे लगता है की टीचर बनना कितना अच्छा है और उससे भी अच्छा प्रिंसिपल होना। घर पर उसे लगता है कि वह पापा या मम्मी जैसे होता तो अपने आप कहीं भी आता-जाता,खुद ही कार चलाता,जो मर्जी होती वह खरीदता। जब वह दिन आ जाता है कि खुद कुछ आमदनी करने लायक होता है तो उसकी सोच शुरू होती है कि उसके पास भी बड़ी से बड़ी कार हो ,बड़ा से बड़ा मकान हो,अच्छे से अच्छे कपड़े हों,  देश और विदेश की- अच्छे-अच्छे देशों के अच्छे-अच्छे शहरों में भ्रमण कर सके यानी सब कुछ अच्छे से अच्छा हो,और इसके लिए उसके पास अकूत धन होना चाहिए। यह अकूत धन तभी हो सकता है जब वह बहुत बड़ा व्यापारी, उद्योगपति या उसे बहुत बड़ी नौकरी मिल जाए। यानी कि सभी तरह से उसके पास बहुत ज्यादा धन हो तो वह सब इच्छायें पूरी कर पाए।

 जिजीविषा तो सबकी होती है लेकिन क्या पूरी हो पाती है ? कुछ लोग तो पहले ही हार मान बैठते हैं और उनका यह कहना होता है कि हमें तो बस दो वक्त की रोटी , सिर पर छत का साया और पहनने को कपड़े हों बस। इससे ज्यादा यह कि बच्चों की पढ़ाई- लिखाई और शादी का खर्चा निकल जाए।कुछ लोग चाहते हैं कि सामान्य या उससे अधिक 'स्टेटस' वाली जिंदगी जीने को मिल जाए । कुछ चाहते हैं कि किसी भी क्षेत्र में एक, दो नहीं तो कम से कम तीन नंबर पर तो उनका नाम हो काम हो और वैसी ही जिन्दगी हो। होता तो वही है जो नसीब में होता है लेकिन जिजीविषा का अधिकार तो सभी को है ।

चल चला चल


शीर्षक:चल चला चल

स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल'

 ( S.K. Gupta)


चला जा रहा हूं,

 बस चला जा रहा हूं,

 मुझे नहीं मालूम,

 मेरी मंजिल है क्या?

   बस पता चलेगा अंत में,

  कि पहुंचा हूं शून्य में या अनंत में।

  साथी कोई नहीं इस सफर में,

 शायद मेरे कदमों के निशान बनेंगे, 

  किसी के लिए दिशा निर्देश,

  या तो चलेगा गति तीव्र में,

  या फिर गति मंद में। 

  कुछ भी हो मंत्र तो यही है,

  की चल चला चल,

  कोई तेरा साथ दे या ना दे,

  तू अकेले ही चल चला चल।

दिल में उठती तरंगो से

 #मानसरोवर_काव्य_मंच 

#दिल में उठती तरंगो से


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'

 (S.K. Gupta)

   

  दिल में उठती तरंगों से,

  सोचता हूं कि क्या लिखूं।

  कहानी लिखूं कविता लिखूं,

 या फिर लेख लिखूं।

  सोचता हूं कुछ तो लिखूं,

 लेकिन आखिर क्या लिखूं।

  पहाड़ों पर लिखूं 

  बहारों पर लिखूं। 

   सूखे पेड़ पत्तों पर लिखूं,

   बाढ़ में बहते मकानों पर लिखूं। 

 जो मन को हर्षाये,

  उस पर लिखूं।

  या जिस पर तरस आए,

  उस पर लिखूं। 

 लेखनी मेरी पहले सोचती है,

 फिर धीरे से कहती है।

  जल्दी काहे की जरा रुक,

  पहले सोच लें विचार ले।

  मन में आते जज्बातों को,

  जरा संभाल ले।

  यूं ही कुछ भी लिख देगा,

  फिर लिखकर मिटा देगा।

  अमीरों पर तो बहुत लिखा है,

  कभी गरीबों पर भी लिख देना।

  अट्टालिकाओं पर तो बहुत नजर थी,

  कभी झोपड़ी की और भी देख लेना। 

  मन में उमड़ते भाव लिखूं,

 यानि कि जज्बात लिखूं।

 कलम मेरी खाली न रहे,

   कोई तो बात लिखूं।

गुरु ही गुरु

 स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'


           *शिक्षक दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनायें*

   गुरु से ही ज्ञान मिलता है , गुरु से ही प्रेरणा मिलती है। संक्षेप में कहें तो गुरु ही प्रकाश स्तंभ है  जिससे जीवन में सही दिशा में बढ़ने का संकेत मिलता है । हमारे जीवन में गुरु के रूप में शिक्षक का बहुत महत्व है, वही हमें सही दिशा का ज्ञान कराता है ।इसी संदर्भ में प्रस्तुत है मेरे साथ घटित एक सच्ची घटना,जिसे कहानी का रूप दिया गया है । 

                  *गुरु ही गुरु*


आगे की शिक्षा प्राप्त करके,तकनीकी क्षेत्र में जाने से पहले,राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,बारां में, मैंने कुछ समय के लिए एक शिक्षक के रूप में कार्य किया था। एक दिन की बात है--एक तो गर्मियों के मौसम की गर्मी,ऊपर से बिजली का गायब हो जाना । ऐसे में मैं बाहर आकर पेड़ की छांव में,चबूतरे पर,एक कुर्सी पर बैठ गया । हवा के झोंकों से पेड़ों के पत्ते कुछ-कुछ शीतल बयार का आभास दे रहे थे।हाथों में अखबार के पन्ने पलटता हुआ,समय पर पार पाने की कोशिश कर रहा था। अचानक आवाज आई-भैया थोड़ी देर मैं भी यहां चबूतरे पर बैठ जाऊं ? मैंने सरसरी निगाह डाली और बोला कि हां बैठ जाइए। कुछ समय बाद वे बोले कि भैया क्या एक गिलास पानी मिल जाएगा?मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा और कुछ आभास हुआ तो मैंने उनको कहा कि आप यहां कुर्सी पर बैठिये, मैं दूसरी कुर्सी ले आऊंगा और आपके लिए पानी भी लेकर आता हूं । वे सकुचाते हुए उस कुर्सी पर बैठ गए।मैं पानी लेकर आया और उनको दिया। वे एक-एक घूंट करके पानी पी रहे थे और मैं अपनी निगाहें , लगातार,उनके चेहरे पर डालता हुआ पहिचानने की कोशिश कर रहा था।जब वे पानी पी चुके तो मैंने पूछा-क्या आपका नाम छोगालाल जी है ? उन्होंने थोड़े आश्चर्य से उत्तर दिया-हां,यही मेरा नाम है, तुम्हें कैसे पता ? जवाब के बजाय मैंने फिर प्रश्न किया-क्या आप किसी समय, मांगरोल के प्राथमिक विद्यालय में हेड मास्टर थे? अब तो उनका आश्चर्य और भी बढ़ गया और बोले- तुम्हें कैसे मालूम ? अब जबकि मैं उन्हें पूरी तरह पहचान गया था , मैं नीचे झुका और उनके चरण छूकर कहा कि आपके सानिध्य में ही मैंने अपने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। हर शनिवार को बाल सभा में आप का संबोधन बहुत ही प्रेरणादायक रहता था और वही प्रेरणा हम अपने जीवन में उतार कर आगे बढ़ते जा रहे हैं। फिर मैंने उन्हें बताया कि मैं भी, फिलहाल,एक शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा हूं। उन्होंने यह कहते हुए कि अच्छा-अच्छा आज एक गुरु का दूसरे गुरु से मिलन हो रहा है। तो मैंने सिर झुका कर कहा कि नहीं आपके सामने तो मैं शिष्य ही हूं,यह तो गुरु-शिष्य का मिलन है, मैं तो आगे भी,जीवन में शिष्य ही रहना चाहता हूं ताकि जिंदगी भर जहां से जो भी,जब भी प्रेरणादायक मिले उसे ग्रहण करता रहूं। वे गले मिलने के लिए आगे बढ़े लेकिन मैंने एक कदम पीछे कर लिया और उनके चरण छूने के लिए झुकने लगा लेकिन सहसा ही उन्होंने मुझे उठा कर बाहों में भर लिया।

  कुछ उनकी आंखों में नमी थी और कुछ मेरी आंखों में।