आज का दिन तो कर चुके हैं सनम हम तेरे नाम,
कोई तो गुल आखिर खिलने वाला है आज की शाम।
रवि किरणों के आगमन के साथ जन्मति है आशा,
और फिर समय के साथ-साथ बढ़ती है लालसा।
आशा न हो लालसा भी न हो ऐसा क्यों करुं मैं काम,
कोई तो गुल आखिर खिलने वाला है, आज की शाम।
तू ही बसी है मेरे मन में, तूने ही दिखाये थे सजीले सपने,
तू माने न माने पर मैं तो मानूं ,सपने नहीं होते कभी अपने।
जागा अब निद्रा को त्याग, सपनों का काम हुआ तमाम,
कोई तो गुल आखिर खिलने वाला है,आज की शाम।
चलो चलें हम धरा के इस कोने से , क्षितिज के उस पार,
न कोई सुख हो न कोई दुख हो, नजर न आये यह संसार।
हमारे मिलन के साक्षी होंगे अब ,धरती और आसमान,
कोई तो गुल आखिर खिलने वाला है,आज की शाम।
Mssa