बुधवार, 30 जुलाई 2025

मन टूटा हो तो - कविता

 आसमां भी पाताल लगे, जब मन टूटा हो तो, 

पछताना ही विकल्प लगे, जब कुछ छूटा हो तो।

रस्सी टूटे,बंधन छूटे,फिर कश्ती छूट जाये किनारे से,

मन ही जब लड़खड़ा जाये,न चले किसी सहारे से। 

मन आखिर क्यों दुखी रहे, क्यों न यह सुखी रहे,

जैसी परिस्थिति ढलते रहो,जैसे फूल सूरजमुखी रहे।

हल्की बयार हो या हो झंझावात, कभी डगमगाना नहीं,

कश्ती को यूं मझधार में छोड़कर कभी भी भागना नहीं।

गिर-गिर कर गिरना नहीं, गिरकर उठना ही जिंदगी है,

हौसला रखकर आगे बढ़ना ही, जिंदगी की बंदगी है।

अगर कस ली है कमर,दुर्दिनों से दो-दो‌ हाथ करने की,

तो क्यों महसूस हो जरूरत,समझौते की बात करने की।

टूटे हुए दर्पण में झांको तो, स्व छवि मलीन ही दिखाता है,

ले लें जब दृढ सकल्प, तो फिर दुखों से पार पा जाता है।

Mssa

शनिवार, 12 जुलाई 2025

आया सावन झूम के-

 चारों ओर जमीं पर छाई है देखो हरियाली 

मुझे को बता दे तू  किसकी बनेगी घरवाली

बहका --- हो

 बहका रे मन मेरा डोला रे मन मेरा

बहका कि मंच गई धूम रे

के आया सावन झूम के- 2


काली काली घटा भी देखो घिर‌ आई

तेरे मेरे बदन को छूकर चले पुरवाई 

महका --- हो

महका  रे तन तेरा महका रे मन मेरा

महका के मच गई धूम रे 

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

नैनों में बदरा छाए -- कविता

 दृश्य अदृश्य हुए, मनमोहक थे,अब छितराए,

 न भरोसा करना किसी पर यह मुझे बतलाए।

मैं तो चाहता था गगन के सितारे गिनना,

पर मध्य में नहीं, नैनों में बदरा छाए।


आगत का करता रहा मैं अभिनंदन,

 जाने वाले को भी करता रहा मैं वंदन।

 भला ही करता रहा मैं अब तक सभी का,

फिर भी न जाने क्यों हो जाती है अनबन। 


मैं आसमां तक पहुंचने का ख्वाब नहीं देखता,

 पर मुश्किल को सामने देख घुटने नहीं टेकता।

नहीं है मेरे दिल में किसी से भी नफ़रत,

तीर मेरी नज़र का किसी को नहीं भेदता। 


किसी के ख्वाबों के महल मैंने नहीं ढ़हाए 

कागज की नाव समझ नदिया में नहीं बहाए।

फिर भी पराया समझते हैं मुझे कुछ लोग,

बात यही कि, उनके नैनों में बदरा छाए।


Mssa