दृश्य अदृश्य हुए, मनमोहक थे,अब छितराए,
न भरोसा करना किसी पर यह मुझे बतलाए।
मैं तो चाहता था गगन के सितारे गिनना,
पर मध्य में नहीं, नैनों में बदरा छाए।
आगत का करता रहा मैं अभिनंदन,
जाने वाले को भी करता रहा मैं वंदन।
भला ही करता रहा मैं अब तक सभी का,
फिर भी न जाने क्यों हो जाती है अनबन।
मैं आसमां तक पहुंचने का ख्वाब नहीं देखता,
पर मुश्किल को सामने देख घुटने नहीं टेकता।
नहीं है मेरे दिल में किसी से भी नफ़रत,
तीर मेरी नज़र का किसी को नहीं भेदता।
किसी के ख्वाबों के महल मैंने नहीं ढ़हाए
कागज की नाव समझ नदिया में नहीं बहाए।
फिर भी पराया समझते हैं मुझे कुछ लोग,
बात यही कि, उनके नैनों में बदरा छाए।
Mssa
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