शनिवार, 28 जून 2025

मैं धरा की धूल हूं -- कविता

शीर्षक -- मैं धरा की धूल हूं 

कर्ण मेरे सुन रहे धुन तुम्हारे साज की,

दीवानी हुई मैं तुम्हारी आवाज की।

मदमस्त हो थिरक रही‌, अधरझूल हूं,

तुम गगन का तारा,में धरा की धूल हूं।

प्रतीक्षा कर,घड़ी पल-पल निहारती,

त्याग नींद का कर, रात-रात भर जागती।

मुरझा गया जो, मैं अब वो फूल हूं,

तुम गगन का तारा में धरा की धूल हूं।

खिल गया था मन मेरा,मिलन की आस में, 

चाह रही थी कुछ बूंदें भड़कती प्यास में।

मिला न जो अब तक,मैं वह नदी का कूल हूं,

तू गगन का तारा, में धरा की धूल हूं।

कब मिलेगा मुझे ,कब प्रतीक्षा का अंत होगा,

मिलन का वह पल बस एक, या अनंत होगा।

हुई न मुझसे कदाचित, मैं वह भूल हूं,

तू गगन का तारा, में धरा की धूल हूं। 


Mssa - दैनिक



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