मंगलवार, 1 मार्च 2022

सूरज निकला है

 *सूरज निकला है*


 घने बादलों की ओट से ,

 सूरज निकला है , 

  जब सूरज निकला है तो ,

  ग्लेशियर भी पिघला है ।

 कुछ अपनों ने वादा किया ,

  बरसों-बरस हमको भरमाया,

  सूरज तो छोड़ो ,

  चांद भी ना दिखलाया।

 हम तो बस तारों की तरह,  

    टिमटिमाते रहे ,

 सपने दिखा दिखाकर

बस हमें भरमाते रहे ।

 अब जब निकला है सूरज,

  हम इसकी ताकत बढ़ाते रहें, 

  सभी अपनों को ,

  अपना बनाते रहें।

मेरी आवाज



*मेरी आवाज* 


  मेरी आवाज गले से नहीं

  दिल से जब आयेगी,

 दूर तलक जायेगी।

पहाड़ से टकरायेगी,

  अपने आप को दोहरायेगी, 

 और फिर कुछ इस तरह 

 चहुं ओर फैल जायेगी ।


कुछ कान लगाकर सुनेंगे 

और जरूर सुनेंगे ,

और कुछ ऐसे भी होंगे यहां 

 जो सुनने का सिर्फ नाटक ही करेंगे।

  वहां मेरी यही आवाज

 सुनकर भी अनसुनी की जायेगी ।

 मेरी आवाज गले से नहीं 

 दिल से जब आयेगी।


 जो सुनेंगे वे मंथन करेंगे,

 मंथन करके फिर गुनेंगे ।

 जो नहीं सुनेंगे तो नहीं सुनेंगे,

  वे तो अपनी ही चलायेंगे,

अपनी अलग ही दाल गलायेंगे,

 ऐसे लोगों से फिर,

 मेरी आवाज मेरे ही पास 

लौट कर फिर आयेगी ।


मेरी आवाज गले से नहीं,

 दिल से जब आयेगी ।

मेरी आवाज गले से नहीं,

 दिल से जब आयेगी।


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल',

 मानसरोवर, जयपुर।