*मेरी आवाज*
मेरी आवाज गले से नहीं
दिल से जब आयेगी,
दूर तलक जायेगी।
पहाड़ से टकरायेगी,
अपने आप को दोहरायेगी,
और फिर कुछ इस तरह
चहुं ओर फैल जायेगी ।
कुछ कान लगाकर सुनेंगे
और जरूर सुनेंगे ,
और कुछ ऐसे भी होंगे यहां
जो सुनने का सिर्फ नाटक ही करेंगे।
वहां मेरी यही आवाज
सुनकर भी अनसुनी की जायेगी ।
मेरी आवाज गले से नहीं
दिल से जब आयेगी।
जो सुनेंगे वे मंथन करेंगे,
मंथन करके फिर गुनेंगे ।
जो नहीं सुनेंगे तो नहीं सुनेंगे,
वे तो अपनी ही चलायेंगे,
अपनी अलग ही दाल गलायेंगे,
ऐसे लोगों से फिर,
मेरी आवाज मेरे ही पास
लौट कर फिर आयेगी ।
मेरी आवाज गले से नहीं,
दिल से जब आयेगी ।
मेरी आवाज गले से नहीं,
दिल से जब आयेगी।
स्वरचित--
सतीश गुप्ता 'पोरवाल',
मानसरोवर, जयपुर।
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