शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

उम्मीद - कविता

उम्मीद ही तो  पाल रखी है ,

 जो जीने को करती है मजबूर।

 फिलहाल तो कुछ भी नहीं,

 जिसे पाकर हो जाऊँ मगरूर।


 पहले उम्मीद फिर इन्तेजार,

 यही करता हूं बार बार।

   प्रभु अब तो कर दो कृपा,

   हो चुका हूं बहुत बेजार।

ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे, -- कविता

दिल ही दिल में दबे बैठे हैं,

गुस्से से कैसे खुद ही ऐंठे हैं। 

संभालते नहीं संभलते कभी,

ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।


 लंबी सी राहों में चलते चलते,

मंज़िल की ओर बढ़ते बढ़ते।

न जाने कब और कैसे खो गये,

 ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।


कभी किसी से साझा नहीं हुए,

अपनी ही धुन में घुलते रहे।

बस अधर में ही झूलते रहे,

 ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2022

मुख में राम-- कविता

दुनिया में क्या-क्या करतब करते हैं लोग,

 मुख में राम बगल में छुरी रखते हैं लोग।

जो नहीं करना वही करते हैं लोग,

दुनिया को धोखे में रखते हैं लोग।


जो करना हो वही करने मे क्या जाता है,

जो दिल में होता है वही बाहर आता है ।

इस दुनियां में सम्मान पाता है वही,

 जो लोगों के दिल में समाता है।


सुख उन्हीं के आस पास मंडराता है,

प्यार भी सभी का भरपूर पाता है। 

जो मुख में राम बगल में छुरी नहीं,

जो दिल में है वही दर्शाता है।


 जो मन मे है वही करना है तो करें,

फिर जो जग से सुनना है तो सुनें। 

बेहतर तो होगा सफल जीवन के लिये,

स्पष्ट और पारदर्शी रास्ता ही चुनें।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

आंसू-कविता

अपनी आंखों में अविरत आंसू आने दो,

गहरे ग़मों को गहराई में गुम हो जाने दो।

 कौन था,क्यों था,किसलिए क्रोधित हुआ, 

 जान से ज्यादा,जी से न लगाओ,जाने दो।

पुष्प पारिजात का-कविता


  पुष्प पारिजात का मन को लुभाता है,

 जब भी देखो आंख में भर जाता है।

 यूं ही नहीं चर्चा हो जाती किसी की,

 कुछ तो है जो औरों से अलग कर जाता है।


  क्या बात करें किसी की बात का,

 हर कोई मजबूर है अपनी हालत का।

 अपनी जिंदगी में भी जियो ऐसे,

 जैसे है पुष्प पारिजात का ।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

मतलबी रिश्ते-- कविता


ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में,

 ढूंढने निकला था मैं फरिश्ते।

 पर अंत में इस नतीजे पर पहुंचा,

 यहां पर हैं सब मतलबी रिश्ते।


  हां यहां जरूर कोई किसी का है,

  जब उसका हो कोई मतलब।

  और जब निकल जाए मतलब,

  तो फिर दिखा जाते हैं करतब।


 वैसे तो इस जग में हैं अनेक रिश्ते,

  कुछ तो कहलाते हैं खून के रिश्ते,

  कुछ होते हैं सांसारिक रिश्ते।

 और जो बच गए वे मतलबी रिश्ते।


 इस दुनिया में क्या दो-चार भी नहीं हैं,

  क्या किसी में कोई सदाचार नहीं है।

 अब क्या कहें कुछ कह नहीं सकते,

  यहां पर तो हैं सब मतलब के रिश्ते।

कॉफी पर उसे बुलाया- हास्य कविता

 उस दिन न जाने क्यों दिमाग पर भूत चढ़ा था,

 या यूं कहो कि दिमाग ही सड़क पर पड़ा था।

 वह जो मेरी कविता पर जाती थी बलिहारी,

 सूरत से बड़ी प्यारी और थी सबसे न्यारी।

 जब भी मेरी कविता उसे फेसबुक पर दिखाई देती,

 वह फोन करके तुरंत ही मुझे बधाई देती। 

क्या बताएं जी हम तो उस पर लट्टू हो गए,

 दिल में बुन्दी विचार मिलकर लड्डू हो गए।

तो उस दिन मैंने उसे कॉफी का निमंत्रण दिया 

उसने उसे तुरंत ही  सहर्ष स्वीकार किया।

पत्नी को मैंने आइडिया से भगाया,

अच्छी साड़ी लेने बाजार भिजवाया।

क्या बताऊँ मैंने कॉफी पर उसे बुलाया,

मुझे क्या पता पति भी है आया।

लेकिन दुनिया मुझे यूं ही नहीं कहती होशियार,

 मैं भी था ऐसी स्थिति के लिए बिल्कुल तैयार।

मैं दोनों को देखकर खुश हुआ ऐसा दिखाया, 

 पति को तीखी नजर से देख दोनों को बिठाया।

कॉफी बना कर मैंने कर दी उनको पेश,

 मन में सोच रहा था थोड़ी देर में होगी मेरी ऐश।

 मैं सुन रहा था प्रशंसा की मीठी मीठी बोली, 

 इधर मौका देख मैंने पति की कॉफी में डाली गोली। 

 उसने यह देख लिया और बोली यह क्या डाला,

 मैंने कहा यह कॉफी का है स्पेशल मसाला।

 लेकिन जैसे ही उसका पति बेहोश हुआ,

 प्रेयसी नहीं अब उसका चंडी का भेष हुआ।

 उस दिन उसने कर दी मेरी तबियत से अच्छी धुनाई,

 अपनी बेचारी पत्नी से करवाई मैंने जगह-जगह सिकाई।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

कैद हूं इस शोर में -- कविता

 कैद  हूं इस शोर में,

 आवाज कोई मिलती नहीं।

 कोई कहना चाहे कुछ भी,

 फरियाद कोई मिलती नहीं।


  झंझावातों के आते इस दौर में,

  कोई भी कली खिलती नहीं।

 बाधाएं अनेक है जीवन में,

 कोई राह अब मिलती नहीं।


  आसमाँ में बिजली चीखती,

   धरती पर शोर घनघोर है।

   उजाले की राह तकते,

   अंधेरा हर ओर है।


   काया तो मानव की पाई,

   पर भाग्य नहीं किसी ठौर में,

    कोई तो सुन ले मेरी,

    कैद हूं इस शोर में।

बुधवार, 21 दिसंबर 2022

एकाकीपन-- लेख

 इंसान को इस जगत में शिशु के रूप में लाया जाता है, और जब वह आ जाता है तो उसे जीना भी होता है।  जीने की विधा अलग-अलग हो जाती है। यह विधा   कुछ तो उसकी खुद की प्रवृत्ति पर निर्भर होती है व कुछ उसको मिले वातावरण पर।हम देखते हैं कि बालपन से ही कुछ बच्चे अपने आप में ही मस्त रहते हैं और मिलना,बातचीत करना उनकी प्रकृति में कम ही रहता है और कुछ ऐसे होते हैं जो अधिक से अधिक लोगों से बात करते हैं,प्रेम दर्शाते हैं,कई तरह के खेलों में रुचि रखते हैं। यह प्रवृत्ति समय के साथ बढ़ती ही जाती है। कुछ बच्चे पढ़ने के साथ-साथ अन्य विधाओं में भी उतनी ही रुचि लेते हैं और कुछ  पढ़ाई में ही व्यस्त रहना पसंद करते हैं। देखा जाता है कि ऐसे बच्चे जो अपने आप में ही मस्त रहते हैं या केवल पढ़ाई में ही व्यस्त रहते हैं, वे जीवन में आगे जाकर अपने आप में ही सिमट कर रह जाते हैं और एकाकीपन के शिकार हो जाते हैं। जीवन के उत्तरार्ध में मित्रों और सगे संबंधियों का साथ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है लेकिन उसके पूर्वार्ध के व्यवहार की वजह से उसे इनका साथ नहीं मिल पाता या वे लेना ही नहीं चाहते हैं। गुमसुम रहते हुए अपना जीवन गुजारते हैं और एकाकीपन का शिकार हो जाते हैं। देखा जाए तो  एकाकीपन एक घुन की तरह है, जो उम्र को धीरे-धीरे खा जाता है । ऐसे लोग देखने में उम्र से अधिक नजर आते हैं ,उनमें चुस्ती फुर्ती भी कम हो जाती है  चेहरा लटक जाता है चाल धीमी हो जाती है और जीने का जो आनंद उम्र के उत्तरार्ध में मिलना चाहिए उससे वंचित हो जाते हैं।

  यदि जीने का आनंद लेना है तो व्यक्ति को उन्मुख होना ही चाहिए।

बस हमें चाहिए- मुक्तक

 हवाओं में महक बस हमें चाहिए।

फ़िज़ाओं में बहक बस हमें चाहिए।।

दिलों में बुझी यह आग क्यों है। 

मौजों में रवानी बस हमें चाहिए।।


दिलों में जगह बस हमें चाहिए।

जान के लिए साँस बस हमें चाहिए।।

और क्या मांगूं तुझसे जाने जां।

जीने की आस बस हमें चाहिए।


उठ जाग पथिक अब भोर भई,

सोवत सोवत अंधियारी रात गई।

हरि भजन कर कुछ कसरत कर,

तुझे अब करने हैं काम कई।


नयन नीर भर आये-- गीत

 पिया तुझे तरस नहीं आये,

 मेरे नयन नीर भर आये ।

रात रात भर करवट बदलूं,

मुझे नींद न आये।


नींद अगर आ जाए तो,

 सपने में तुझको ही देखूं 

 सपना जब झूठा निकले,

  हो उदास मैं , उठ बैठूं

पिया तुझे - - - 


कल जब पनघट पर थी,

पूछ रही थीं सखियां सारी,

चिट्ठी पत्री ही आयेगी,

या खुद ही , आएंगे सैयां

पिया तुझे - - - 


सुबह से शाम तक,

 निराश हो जाऊं,

कोशिश कर के हारी,

 दिल के दर्द , रोक न पाऊँ

पिया तुझे तरस नहीं आये,

  मेरे नयन नीर भर आये

मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

मेरा परिचय-- कविता (संशोधित)

 

मैं खुद अपना परिचय क्यों और कैसे दूँ,

जाने-माने और प्रसिद्ध में अपना नाम कैसे लूं।

 अब क्या बताऊँ मैंने क्या-क्या किया,

   अपने लिए नहीं दूसरों के लिए ही जिया।

 कुछ लोग कहते हैं कि मैं इंसान तो नहीं ,

 कुछ कहते हैं कि भगवान भी नहीं। 

 जब मैंने पूछा तो क्या मैं शैतान हूं,

 तो बताया कि नहीं मैं शैतान भी नहीं।

न मैं ज़मीं हूं न आसमाँ हूं,

मैं नहीं जानता मैं कहां हूं।

कोई पुकार ले मुझे प्यार से,

 तो समझ लो मैं वहां हूं ।

कभी मैं सोचता हूं अपनों के लिए,

 कभी सोचता हूं परायों के लिए।

 सच कहूं तो दिल दुखता है मेरा,

 ज़माने से सतायों के लिए। 

 देखा जाए तो मैं तो मैं हूं,

 हां थोड़ा सा विस्तृत हो जाऊं तो हम हूं ।

 और ज्यादा फ़ैलूं तो मैं सब हूं,

 यही मेरा परिचय और नहीं बस हूं।

चिंतन- कविता

 किसी को किसी ने कभी कुछ सिखाया ही नहीं,

  क ख ग से आगे कभी लिखाया ही नहीं।

 अपने आप को बड़े शेर खान समझते हैं,

 और पाला पड़ जाए तो पतली गली से निकलते हैं।

  जो जी में आया,जब आया बोल दिया,

 नहीं बोलना था लेकिन मुँह खोल दिया।

 अब कौन समझाए इनको क्या करना चाहिए,

 वैसे तो सबको तोल-मोल कर बोलना चाहिए।

 पहले सुनो फिर चिंतन-मनन करो, 

 इसके बाद ही फिर बोलने का प्रयत्न करो।

गुमशुदा जिंदगी की कहानी-- कविता

 गुलशन की बहार बन जाती है जवानी,

मोती पर जैसे चढ़ जाता है पानी।

उन्हें क्या पता हमारी जिंदगी का पता,

किस किस को सुनायें गुमशुदा जिंदगी की कहानी।


 टकटकी लगाए सब बैठे हैं यहां,

 हम पर क्या बीती किसी ने न जानी।


लब तो हमारे खामोश हो चुके हैं,

पर सब सुनना चाहते हैं हमारी जुबानी। 


 था जमाना जब हमारे भी होते थे,

 हर दिन खुशनुमा और रातें सुहानी।


हालातों से पहुंच गये हम कहाँ से कहाँ ,

अब तो जिंदगी से है एक उम्र चुरानी।


अब तो बस बचा ही क्या है जिंदगी में,

अब न वे मौजें हैं न मौजों की रवानी।


 मौत तो इशारा कर रही है दूर से,

  लेकिन हमने अब जीने की है ठानी।

रविवार, 18 दिसंबर 2022

दुआओं में असर होता है -- कविता

 #मानसरोवर काव्य मंच#

जिंदगी क्या है सांसो का एक सफर होता है ,

मिट्टी सी काया में जीवन का बसर होता है।

 क्यों लें किसी की बद्दुआ इस जमाने में,

  कहते हैं कि दुआओं में असर होता है। 


 चाहते तो सभी हैं अमृत का रसपान करना,

 रसपान करके फिर उन्मुक्त जीवन जीना ।

 लेकिन यहां अमृत के बदले जहर का डर होता है,

 कहते हैं कि दुआओं में असर होता है।


हमने तो माता-पिता को ही सर्वोपरि माना है,

 सर्वव्यापी ईश्वर के आगे भी सर झुकाया है।

 न करें आदर सम्मान तो कहर होता है,

 कहते हैं कि दुआओं में असर होता है।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

जिंदगी में अब बचा क्या है -- कविता

 कतरा कतरा हो चुकी जिंदगी को 

अब कैसे संवार लूं। 

अब तू ही बता ऐ जिंदगी 

जिंदगी में अब बचा क्या है ।


बहुत कुछ किया मैंने,

तुझे करीने से जीने के लिए 

क्या क्या न किया अमृत पीने के लिए 

अब जीवन ही मेरे लिए सजा है ।


जो जी रहे हैं खुलकर 

 वे न मर रहे हैं घुटकर

सांसों पर सांसे भरे जा रहे हैं 

जिंदगी उनके लिए मजा है 


खुशमिजाजी भरी जिनके दिलों में, 

जिंदगी का मजा वे ही ले रहे हैं।

 तू भी ले ले जिंदगी का ऐसा ही मजा, 

दुनिया से आ रही ऐसी सदा है। 

न सोच कि जिंदगी में अब बचा क्या है





Ab

धर्म-कर्म-- कविता

 भविष्य का निर्धारण आखिर कौन करेगा,

आने वाले पलों का हिसाब आखिर कौन रखेगा।

 ऊपर जो बैठा है बहीखाता लेकर,

   वही कर्म के अनुसार भाग्य रचेगा।


हम और तुम कुछ भी ना कर पाएंगे,

 जहां का इशारा होगा वही हम जा पाएंगे। 

 इस भवसागर में वही तर पाएगा,

  जो धर्म के अनुसार ही यहां चलेगा।


  धर्म-कर्म का चोला जो ओढ़ेगा ,

  वही जीवन में सफल हो पाएगा।

भवसागर -- कविता

भवसागर में तैरना चाहता हूं तैर नहीं पाता,
पार उतरना चाहता हूं उतर नहीं पाता ।
करना चाहता हूं बहुत कुछ कर नहीं पाता,
कैसी यह बेबसी है समझ भी नहीं पाता।

लगता है जैसे किसी ने हाथों को बांध दिया हो 
किसी ने जैसे पैरों को जकड़  लिया हो।
आंखों पर जैसे काला चश्मा लगा दिया,
सभी ने मुझे बेबसी में उलझा दिया।

भँवर में फंसकर नहीं रहना चाहता हूं,
अब भवसागर को पार करना चाहता हूं।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

प्रभु वंदना-' कविता

 प्रभु मेरे कैसे-कैसे जतन करूं,

 कि आपकी कृपा मैं पा जाऊं।

 भक्ति आपकी करूँ इतनी,

 कि आपकी निगाह में आ जाऊं।

 या तो पुष्पमाला बनकर,

आपके गले को सजाऊं।

  या फिर पुष्प ही बन कर, 

 आपके चरणों में गिर जाऊं।

 सारा जग गुणगान करे महिमा तेरे नाम की,

 जो कोई अपनी ही करें नहीं किसी भी काम की।

  हे प्रभु ऐसी राह दिखा दे हमें,

  जो भी जग में हम करें वही हो काम की।

मुरझाई सी आंखें-- कविता



न कभी सुख देखे न कभी दुख बीते,

  चले जा रहे हैं पथरीली राहों पर,

  असमंजसों के भंवर में घूम रही

जवानी,

 मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।


 सभी के दिल थे बहुत ही प्रफुल्लित,

  जब तुम्हारा अवतरण हुआ था यहां,

 अब लद गए वे दिन और रातें सुहानी,

 मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।  

 

  मां की आंखें देखती थीं अपने लाल को,

 पिता भी फूले नहीं समाते थे देखकर अपने लाल को,

 और तुम्हें सूझती है करने को हरदम नादानी,

 मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।


 जिंदगी के तूफानों से टकराकर जीर्ण शीर्ण हो गए,

 आंखों के समंदर में अब ज्वार आता नहीं,

 कभी तूने दिलाई  नहीं मात'पिता को मौजों की रवानी,

  मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।

तोल मोल कर बोलना- कविता



सिल दो मेरे होठों को यदि नहीं सुनना है तुम्हें,

 जो तुम्हें अच्छी लगे वह बात नहीं करनी है मुझे।

 जो बात अच्छी हो वही मैं कहूंगा 

 चाहे मुझे कितना भी सितम पड़े सहना।


यदि तुम हमारे धर्म ग्रंथ पढ़ लेते,

 क्या है सही क्या गलत समझ लेते।

 मेरी बातों को गलत मानकर,

यूंही किसी भ्रम में नहीं पड़े रहते।


 बेहतर होगा अपने आपको आईने में देखना,

 पहले जरूरी है अपने आप को परखना।

यदि तुम अपने अंतर्मन से डरोगे,

 मेरा मूंह बंद करने की गलती  नहीं करोगे।


हम सबको  चाहिये तोल मोल कर बोलना,

मीठे बोलों से जग में सुख से रहना।

बुधवार, 14 दिसंबर 2022

सरलता-- लघुतम कहानी

 किसी भी परिवार में देवरानी जेठानी में तुलना आम बात है।एक त्यौहार पर रिश्तेदारों में बांटने के लिए जेठानी पार्वती के मायके से 10 किलो बेसन की बर्फी और देवरानी प्रीति के मायके से सिर्फ 3 किलो लड्डू आये। प्रीति बड़ी रुआँसी हो रही थी,कि सासूजी नाराज होंगी।उसका लटका हुआ मुँह देखकर सासू जी उसके पास आकर बोली चिंता मत कर,किसी को मालूम नहीं होगा मैंने सात किलो लड्डू और खरीद कर उन लड्डुओं में मिला लिये हैं।प्रीति उनकी इस सरलता से मोहित हो गई।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

रेलवे प्लेटफार्म -- लघु कथा

 नकुल की पत्नी आज ही मायके से वापस आने वाली थी । वह उसे लेने के लिए स्टेशन पर आया हुआ था। वह ट्रेन जिससे उसकी पत्नी आ रही थी लगभग एक घंटा देरी से आने वाली थी ,उससे पहले ही दूसरी ट्रेन आकर प्लेटफार्म पर आकर  रुकी। उसने  देखा कि लोग धड़ाधड़ ट्रेन से उतर रहे हैं और कुली को आवाज देकर सामान उस पर लाद रहे हैं।उसे उन कुलियों पर बड़ा तरस आया,बेचारे कहां-कहां से आकर दुनिया का बोझ उठा कर परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। एक कुली के सिर पर बिस्तरबंद देखकर उसे बड़ी हंसी आई , आज के जमाने में भी लोग बिस्तर साथ लेकर चलते हैं। वह प्लेटफार्म पर चहलकदमी करने लगा।समय बिताने के लिए एक बच्चे से अखबार खरीद लिया पास ही एक बच्चा,बूट पॉलिश करने वाला,खाली बैठा हुआ था।उसने अपने जूतों की तरफ देखा और पाया कि उसके जूतों की चमक भी स्वयं के चेहरे की जैसी हो गई थी , पत्नी जो न थी इतने दिनों से। तो उसने उस बच्चे से कहा-ले भाई मेरे चेहरे पर तो चमक आने ही वाली है, तू इन जूतों को भी चमका दे। बच्चा जूतों को चमकाने लगा और वह अखबार पढ़ता रहा। उसके मन में विचार आया कि एक  छोटा बच्चा अखबार बेच रहा है और दूसरा बूट पॉलिश कर रहा है,उसे उन पर तरस आया।जब पूछा तो मालूम हुआ कि दोनों भाई-भाई हैं और परिवार के पालन-पोषण के लिए यह कार्य कर रहे हैं।

 नकुल सरकारी कार्यालय में बड़ा अफसर था उसे मालूम था कि गरीब बच्चों और परिवार के लिए बहुत सी सरकारी योजनाएं हैं लेकिन ये योजनाएं सभी तक नहीं पहुंचती। उसमें उन बच्चों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की और गरीब परिवार के लिए भी मासिक सहायता राशि उपलब्ध कराई।

 बच्चे स्कूल में पढ़ने लगे थे और परिवार में संतुष्टि का आगमन हुआ। उधर वह ट्रेन भी आ चुकी थी जिसमें उसकी चमक यानी पत्नी आ रही थी।

मां तेरी याद आई -- कविता

 (जब आई कठिनाई , मां याद तेरी  आई )


 न जाने कहां पर था मैं,

 इस दुनिया से था अनजान।

 मां तूने ही तो डाली थी, 

 मेरी काया में जान।


 इस दुनिया में जब मैं आया,

  सामने बस तुझको ही पाया।

 कितने-कितने कष्ट उठाकर,

  मां तूने मुझको जन्माया।


 मेरा मुंह देख कर देख कर,

  तू कितना हर्षाती थी।

   जब भी मुझको रोना आता,

   तुरंत दौड़ कर आती थी।


    जब कभी मैं राह भटकता,

    तूने ही राह दिखाई।

    जब आई कठिनाई,

    माँ तेरी याद आई।

भंवरा -- बालगीत

 गुनगुन करता भंवरा आता,

सुन सुन कहकर गीत सुनाता।

काँटों से तो दूरी बनाकर,

  फूलों संग समय बिताता।


  चुन्नू मुन्नू तुम भी आओ,

  मेरे संग संग खेल रचाओ।

  खेलो कूदो नाचो गाओ,

   फूलों का मन हरसाओ।


   आसमान में बादल छाए,

    बरखा का संदेसा लाए।

    देखो बूँदें आने लगी हैं,

    रिमझिम रिमझिम गाने लगी हैं।


    भंवरा फूलों पर मंडराता,

    कान में जाकर गीत सुनाता।

    फूलों के मन भी हर्षाये,

    सब ने मिलकर गाने गाये।

सोमवार, 12 दिसंबर 2022

अधूरे सपने-- कविता

 चाहता तो है बहुत कुछ पाना,

 न कुछ खोना बस पाना ही पाना,

  कैसे हो पाएगा यह सब संभव,

   जब देखेगा हमेशा अधूरे सपने।


  मैं हूं बस में ही हूं,

 और सब तो बस गौण हैं,

  जब यह सोच है तुम्हारी 

  तो फिर कौन होंगे तुम्हारे अपने।


किसी ईश्वर को तुमने माना नहीं,

 उनकी लीला को तुमने जाना नहीं, 

जब आई मुसीबत जिंदगी में,

  तो फिर लगे माला जपने।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

प्यार में सिर फूटा- हास्य कविता



ओ प्यार के राही पहले मेरी बात सुनना,
 सब कुछ कर लेना लेकिन प्यार नहीं करना।
 प्यार का झगड़ा बहुत ही तगड़ा जैसे फेविकोल,
 इस प्यार के लफड़े में भांति भांति के झोल। 
 प्यार करने तो चला पर तुझे नहीं है भान,
 सामने वाले तगड़ी हुई तो बनेगा युद्ध का मैदान।
 मेरी बुद्धि घास चरने चली गई थी,
 तो दिल में एक झुरझुरी सी हुई थी।
  मैंने सामने वाली खिड़की में देखा एक चांद का टुकड़ा,
  और यहीं से शुरू हो गया मेरे दिल का  दुखड़ा।
 मुझे देख उसका मुखमंडल मुस्कुराया, 
क्या बताऊँ उसने इस तरह मुझे फंसाया।
उसने अंगुली से पास आने का इशारा किया, 
मैं उसके इशारे पर बिना डोर खिंचता चला गया।
  मैंने इजहार-ए-मोहब्बत के लिए किया इशारा,
  लेकिन यह क्या उसने गमला ही उठा कर दे मारा।
 दिल टूटा,सिर फूटा,गमला हुआ धराशायी,
 मंजर यह देख उसकी आंख भर आयी।
हाय मेरा गमला कहके उसने गमला उठाया,
मेरे फूटे सिर पर उसे तरस न आया।
अब सिर जुड़वाने डॉक्टर के पास जा रहा हूं,
टांके कितने लगेंगे अंदाजा लगा रहा हूं।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

दिल - लघु कविता

 कोई बताए कैसे काबू में रखें दिल को, 

 यह दिल तो संभाले नहीं संभलता।

  कोशिश भी कर लो चाहे मुट्ठी में बंद करलो,

  मुट्ठी से रेत की मानिंद फिसलता।


   हमारा  दिल हमने आपको दे दिया,

   अब आपका दिल हमको चाहिये। 

    या तो आप हमारे पास आओ,

    या फिर हमको वहां बुलाइये ।


कोई बताए कैसे काबू करें कमबख्त दिल को,

 यह तो संभाले नहीं संभलता संगदिल सुन लो।

 दिल ही दिल में सोच चुके थे दिल देने का,

 अब सोच विचार न करो मुझे चुन लो।


  उस दिन दिल दे दिया था दिलदार को,

 उसी दिन उसने उछाल उछाल कर तोड़ दिया। 

 अब क्या अकेली ही अठखेलियाँ करूं,

बेदर्दी, बेवफा ने बेवजह ही मेरा साथ छोड़ दिया।

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

साँझ ढली --गीत

 साँझ ढली और मन महका,

 सपनों ने ली अंगड़ाई।

 मन को जब समझाया हमने,

 तब आखों में नींद समाई।


    जब जब सोचूं बात पिया की, 

  याद सताये बात पिया की ।

  जब समझाऊं मन को अपने,

  दिल हौले से फिर धड़का।

  सांझ ढली और मन महका,

  सपनों ने ली अंगड़ाई।


लिखना चाहूं प्रेम की पाती, 

 क्या लिखना है समझ न पाती।

 कोई आकर मुझे समझाए,

  कैसे होगी प्रेम की बरखा।

  सांझ ढली और मन महका,

  सपनों ने ली अंगड़ाई।


 प्रेम की भाषा समझ न आये,

 समझ न आये और उलझाये,

 ओ मेघा अब तू ही आकर,

  मुझको और उनको समझा।

सांझ ढली और मन महका,

 सपनों ने ली अंगड़ाई।

  मन को जब समझाया हमने,

  तब आखों में नींद समाई।

 सांझ ढली।

क्या रखा है रूठने मनाने में

 अजी,क्या रखा है रूठने मनाने में,

 क्यों हिचकिचाते हो प्यार जताने में।

 हमने तो चाहा है बस तुम्हें ही,

  फिर कोई कैसा भी हो जमाने में। 


 तुम्हारे नाम की ही माला जपती हूं,

 बस तुम्हारा ही पाठ हर दिन पढ़ती हूं।

 दिल जो खाली खाली था अभी तक,

 उसमें बस तुम्हें ही बसाया करती हूं।


 गर रूठ भी जाओगे तो क्या करोगे,

 मुझे छोड़कर और कहां जाओगे। 

 तुम्हारी आंखों में मेरा ही अक्स होगा,

 जहां भी जाओगे मुझे ही पाओगे।


 छोड़ दीजिए यह रूठने की आदत,

 न कीजिए मुझसे कोई भी खिलाफत।

 मेरी बात का कर लो पूरा यकीन,

  मुझे समझिए बस अपनी ही अमानत।

रविवार, 4 दिसंबर 2022

आलस्य-- कविता

 आलस्य ही तो है जो मुझे रोक रहा है,

  वरना मैं भी कुछ न कुछ तो लिखता।

 और सभी कवियों की ही तरह,

  मेरा भी दिल कुछ तो खिलता।


 लिखना चाहूं मैं बहुत कुछ बातें,

 कुछ इधर की कुछ उधर की।

 जो हो चुका और जो ना हुआ,

 लेकिन मेरी लेखनी का स्वभाव मुझसे नहीं मिलता।


यह आलस्य नाम की चिड़िया मेरी नहीं सुनती,

  सच कहता हूं मैं भी चाहता हूं लिखना,

  मैं भी चाहता हूं कवियों की श्रेणी में आना,

 यदि नहीं चाहता तो क्यों अपना दिमाग घिसता।


 प्रतिस्पर्धा का है यह जालिम जमाना,

  देखा-देखी और लोग भी आलस्य करने लगे,

 कहीं मैं आलसियों का सरताज न घोषित हो जाऊं,

  इसीलिए कुछ लिखने की कर ली है  धृष्टता।

हौसला-- कविता

 हौसला ही तो नहीं था उसमें,

 वरना वह क्यों पीठ दिखाता।

 बड़ी-बड़ी बातें करने वाला,

 सीना तान कर खड़ा हो जाता।


 हमने देखे ऐसे ऐसे बरखुरदार,

 होते हैं जमीन पर बातें आसमान की। 

  खुद के बारे में तो ज्यादा जानते नहीं, 

और बात करते हैं सारे जहान की।


   सुनो आसमान में उड़ने वाले,

  अपनी जमीं पर ही रहा करो ।

 अरे भाई खुद  हौसला न रखो तो,

  दूसरों का हौसला अफजाई किया करो।

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

शब्द कुंद पड़ गये-' कविता

 शब्द कुंद पड़ गए ज़ुबान ने भी चुप रहना ठीक समझा


जब से आए हैं इस जगत में,

कहते ही जा रहे हैं,

 सुनने वाले सुन तो रहे हैं

 क्या सुन रहे हैं छुपाना ठीक समझा।


 कभी शब्दों की माला पिरो कर,

 कभी कविता के रूप में पेश किया,

 लेख लिख कर भी कोशिश की,

 कभी हास्य कविता से हंसाना ठीक समझा।


हम तो ठहरे गाय जैसे इंसान,

या यों  कहें कि दीया जैसे इंसान,

 जिस ने जैसा कहा वैसा हमनें किया,

  लेकिन लोगों ने हमें ठगना ठीक समझा।


 बेजार हो चुके हैं दुनिया की बातों से,

 कब तक सुनाएं कब तक समझाएं,

 अब तो शब्द कुंद पड़ गए,

 जुबान ने भी चुप रहना ठीक समझा।

मुक्तक/शायरी

 क्यों करें हम यहां पर किसी की भी खिलाफत,

 जमाने में नहीं हमें किसी से भी अदावत।

  सच मान लो मेरा कहा मेरे दोस्तों,

 मेरी जिंदगी तो है बस तुम्हारी अमानत।


तुम्हारी याद आती है तो,

 वह मंजर याद आता है।

 वह मंजर याद आता है तो,

 हमको बहुत सताता है।


हम चिट्ठी दर चिट्ठी तुम्हें भेजते रहे ,

  जवाब देना तुम्हें नहीं गवारा क्या यही समझें।

 या फिर अपनी बिखरी लटों में अंगुली डालकर,

  धीरे-धीरे घुमाकर हमें देखना तुम्हारा इशारा समझें ।


सब्जा इतना कर दो इस जमाने में,

गिन्नीयां ही गिन्नीयां भरी हो जैसे खजाने में।

कहीं भी गमों के मानिंद सूखा नजर न आए

 इसी का तो हाथ होगा धरती को सजाने में।


कमबख्त आखिर कहूं तो किसे कहूं,

 दिन को, दिल को या किस्मत को कहूं।

  मेरे वश में तो कुछ भी नहीं,

  अब जो भी हो उसे ही सहूं।


दुनिया में आये हैं तो जीना ही पड़ेगा,

 मुसीबतों से दो चार तो होना ही पड़ेगा।

 दुनिया तुम्हें तरह-तरह के सबक सिखाएगी,

 और तुम्हें इम्तिहान तो देना ही पड़ेगा।


यह सच है कि जिंदगी इम्तिहान लेती है ,

किसी को पास किसी को फेल करती है।

 फेल होने वालों को तो दुख देती है,

और पास होने वालों के दुख हरती है।


आपाधापी की इस दुनिया में मची हुई रेलम पेल,

 कोई हो जाता 'पास' और कोई होता फेल।

 सिक्का तो उछाल ही दिया है,

 कौन जीतेगा यही किस्मत का खेल।

 

 अब नहीं रहा हमें दुनिया से कोई काम,

 अब चाहे गला रहे सूखा या पिला दे कोई जाम।

 कोई भी नगमा दिल को सुकून देता नहीं,

  मेरी जिंदगी तो है बस डूबती एक शाम।


 हौले हौले से मेरे दिल के करीब आकर बोलना, 

   दिल तुम्हारा चाहे न चाहे तुम मगर बोलना।


गुरु से गहन गुर ग्रहण करके,

 विद्यालय में विद्या से विचार करें।

विचार से विवेक से विश्लेषण करके,

  जीवन को जीवट जंजालों से मुक्त करें। ।


जीने का कोई उद्देश्य तो होना ही चाहिए,

 जिंदगी तो सादगी से ही जीनी चाहिए।

 विचारों में बनाए रखिए मौलिकता, 

 और जीवन में स्थिरता होनी ही चाहिए।

 

सपनों के पीछे भागना क्या मृगतृष्णा कहलायेगा ,

सपनों से दूर रहेगा तो मंजिल कैसे पायेगा।

 जिंदादिल होकर जो लक्ष्य की ओर बढ़ जायेगा,

 वही अंततः सपनों को सच कर पायेगा।


सुख चैन कहां सिधारे, 

मुख आभा कोऊ न निखारे।

मम उर माही तू ही बिराजे, 

नैन निहारे चरण तिहारे ।


गुम हो गई जो बागों में आती थी बहार, 

फूल चमन में मुरझा गए क्यों इस बार।

 दिल अब लगता नहीं जरा भी हमारा, 

   जब से उजड़ गया है हमारा यह दयार।


  सोच की मानिन्द सरल नहीं जीवन मानव का ,

 सफल,सुरक्षित जीवन जीने की होती है कामना।

  सफल हो जीवन यदि मैं,मेरा,हमारा छोड़कर,

  मानव के जीवन में समर्पण की हो भावना।


बीमार का हाल पूछने चले आते हैं ,

दिलासा कम देते ज्यादा डराते हैं। 

इस तरह से हाल पूछना तो कमतर है,

 बीमार को अपने हाल पर छोड़ना ही बेहतर है।


सर्द हवाओं और फर्द में रस्साकशी जारी है,

 कहना मुश्किल है कौन किस पर भारी है।

 सर्द हवाएं उष्ण हवाओं में बदल जायें,

  ऐसी ही हम करबद्ध विनती करते जायें।




दरार-- कविता

 कागज के मानिंद हो जाते हैं सब रिश्ते,

 जब किसी मोहपाश से बहक जाते हैं।

 खून के हों रिश्ते या सांसारिक हों,

 कितना भी संभालो तड़क जाते हैं।


 माता-पिता लाते हैं दुनिया में संतान को,

 पति पत्नी करते हैं वादा साथ निभाने को।

 पर कहां चले जाते हैं कर्तव्य और वादे,

 जब लोग निकल पड़ते हैं स्वार्थ कमाने को।


लाख जतन करें रिश्ते निभाने को,

 फिर भी रार से रिश्ता जोड़ जाते हैं।

   ये जतन भर नहीं पाते दरार कभी,

    अपने निशाँ तो छोड़ जाते हैं।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

एक कप कॉफ़ी दोस्ती की - लघुकथा



 कभी-कभी कोई बात होती है और नहीं भी होती।एक पक्ष को लगता है, कोई बात ऐसी थी तो दूसरे को लगता है कोई बात ऐसी थी ही नहीं। छोटी सी बात पर दोस्ती में दरार पड़ जाती है।


   राकेश का छोटी सी बात पर पड़ोसी सूरज से मनमुटाव हो गया था। बच्चों में झगड़ा हुआ और पड़ोसी ने बच्चे को चांटा मार दिया।कुछ अनर्गल वाक्यों का आदान प्रदान हुआ और रंजिश पैदा हो गई। एक दूसरे के घर आना- जाना बंद। घर से बाहर निकलते वक्त कभी आमना-सामना भी हो गया तो नज़र को घुमा देना नई प्रक्रिया हो गई थी।


  एक दिन अपनी धुन में ही राकेश ने पड़ोसी सूरज की डोर-बेल बजा दी।वे बाहर निकले और राकेश उनके साथ ही अंदर चला गया। थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे फिर सूरज ने पूछा- चाय पियोगे, राकेश ने कहा नहीं,पिछले माह से ही मैंने चाय पीना छोड़ दिया। फिर कहा चलो कॉफी पी जाए। 

 अक्सर देखा गया है कि जो लोग चाय नहीं पीते वे कॉफी के लिये ना नहीं कर पाते, राकेश ने भी ऐसा ही किया। थोड़ी देर कॉफी पीते रहे फिर राकेश ने ही बात शुरू की-अरे भाई उस दिन बच्चों के झगड़े में मैंने तुम्हारे बच्चे को चांटा मार दिया था, मुझे इस बात का अफसोस है ,लेकिन उसने भी तो मेरे बच्चे को धक्का मार कर गिरा दिया था,तो आवेश में मैंने ऐसा कर दिया।शायद मैंने गलत किया था।


 अब सूरज की बारी थी बोलने की। उसने कहा कि हां मेरे बच्चे को धक्का नहीं देना चाहिए था,तुम्हारे कहना सही है। चलो छोड़ो जो हो गया सो हो गया ।

 बस हो गई बोलचाल शुरू, सारे गिले- शिकवे कॉफी के कप पर दूर हो गये, दोस्ती बरकरार रही।


स्वरचित एवं मौलिक - सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर

वो आंसू न बहे-- कविता

 वो आंसू न बहे आंखों में ही ठहर गये,

  ग़मों को छुपाने का हमें हुनर था,

 देखने वाले सोचते ही रहे,

 आंसू आखिर गये तो किधर गये।


  इस दुनिया में हम रोते हुए ही आये थे,

 हमें मालूम नहीं किसने हमें रोना सिखाया,

 किसने दुनिया में यह नियति बनाई,

  हां जब आये तो आंसू आंखों में ही समाये थे।


 आत्म सम्मान से अपना जीवन जिया था,

 बरसों जाने क्या-क्या सपने देखे थे,

 गैरों से भरी पड़ी है यह दुनिया,

  तुम्हें अपना समझा क्या बुरा किया था।


 मैंने तुम्हें समझा बहुत समझा,

 तुमने समझने की कोशिश भी नहीं की,

 अब मेरे दिल के जज्बात आंसुओं में बदल गए,

वो आंसू न बहे आंखों में ही ठहर गये।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

दायरा (संशोधित)-- कविता

 अतीत के दायरे से निकल,

वर्तमान की कठोर धरती पर,

 जब मैं विचरण करता हूं,

 तो सोचता हूं कि आदमी,

आदम से आदमी हो गया है ।

पर जब वर्तमान की कठोर धरती से उठ,

भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूं,

 तो सोचता हूं कि कहीं आदमी,

आदमी से आदम न हो जाये।

  लेकिन अपनी सोच को यही नहीं रोकता हूं,

 इस सोच को एक नई सोच देता हूं।

  यदि आदमी में मानवता आ जाए तो,

  यदि आदमी मानव बन जाए तो।

 तो शायद शांति की कल्पना को साकार करेगा,

  तो बता आदमी तू मानव बनेगा?

आमोद-प्रमोद ' कविता

 प्रसन्नता नहीं चेहरे पर

 खस्ता  हो रही हालत

 आलस्य भी भरा हुआ 

 दूर कर ले इन सबको

 अपना ले आमोद-प्रमोद

 खेत में बोना बीज़ का 

 बिना खेत जुताई के 

 फिर फसल की प्रतीक्षा

क्या फसल आ जाएगी।

ग़मों   के बोझ से

 अक्सर दब जाते हैं

  गमगीन होकर रुक जाते हैं

 मन में साहस भरकर 

खुशियों का खजाना भर ले

 अपने जीवन में 

 आमोद प्रमोद को 

 आत्मसात कर ले।