कागज के मानिंद हो जाते हैं सब रिश्ते,
जब किसी मोहपाश से बहक जाते हैं।
खून के हों रिश्ते या सांसारिक हों,
कितना भी संभालो तड़क जाते हैं।
माता-पिता लाते हैं दुनिया में संतान को,
पति पत्नी करते हैं वादा साथ निभाने को।
पर कहां चले जाते हैं कर्तव्य और वादे,
जब लोग निकल पड़ते हैं स्वार्थ कमाने को।
लाख जतन करें रिश्ते निभाने को,
फिर भी रार से रिश्ता जोड़ जाते हैं।
ये जतन भर नहीं पाते दरार कभी,
अपने निशाँ तो छोड़ जाते हैं।
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