दिल ही दिल में दबे बैठे हैं,
गुस्से से कैसे खुद ही ऐंठे हैं।
संभालते नहीं संभलते कभी,
ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।
लंबी सी राहों में चलते चलते,
मंज़िल की ओर बढ़ते बढ़ते।
न जाने कब और कैसे खो गये,
ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।
कभी किसी से साझा नहीं हुए,
अपनी ही धुन में घुलते रहे।
बस अधर में ही झूलते रहे,
ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।
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