सोमवार, 12 दिसंबर 2022

अधूरे सपने-- कविता

 चाहता तो है बहुत कुछ पाना,

 न कुछ खोना बस पाना ही पाना,

  कैसे हो पाएगा यह सब संभव,

   जब देखेगा हमेशा अधूरे सपने।


  मैं हूं बस में ही हूं,

 और सब तो बस गौण हैं,

  जब यह सोच है तुम्हारी 

  तो फिर कौन होंगे तुम्हारे अपने।


किसी ईश्वर को तुमने माना नहीं,

 उनकी लीला को तुमने जाना नहीं, 

जब आई मुसीबत जिंदगी में,

  तो फिर लगे माला जपने।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें