गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

दायरा (संशोधित)-- कविता

 अतीत के दायरे से निकल,

वर्तमान की कठोर धरती पर,

 जब मैं विचरण करता हूं,

 तो सोचता हूं कि आदमी,

आदम से आदमी हो गया है ।

पर जब वर्तमान की कठोर धरती से उठ,

भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूं,

 तो सोचता हूं कि कहीं आदमी,

आदमी से आदम न हो जाये।

  लेकिन अपनी सोच को यही नहीं रोकता हूं,

 इस सोच को एक नई सोच देता हूं।

  यदि आदमी में मानवता आ जाए तो,

  यदि आदमी मानव बन जाए तो।

 तो शायद शांति की कल्पना को साकार करेगा,

  तो बता आदमी तू मानव बनेगा?

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