शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

वो आंसू न बहे-- कविता

 वो आंसू न बहे आंखों में ही ठहर गये,

  ग़मों को छुपाने का हमें हुनर था,

 देखने वाले सोचते ही रहे,

 आंसू आखिर गये तो किधर गये।


  इस दुनिया में हम रोते हुए ही आये थे,

 हमें मालूम नहीं किसने हमें रोना सिखाया,

 किसने दुनिया में यह नियति बनाई,

  हां जब आये तो आंसू आंखों में ही समाये थे।


 आत्म सम्मान से अपना जीवन जिया था,

 बरसों जाने क्या-क्या सपने देखे थे,

 गैरों से भरी पड़ी है यह दुनिया,

  तुम्हें अपना समझा क्या बुरा किया था।


 मैंने तुम्हें समझा बहुत समझा,

 तुमने समझने की कोशिश भी नहीं की,

 अब मेरे दिल के जज्बात आंसुओं में बदल गए,

वो आंसू न बहे आंखों में ही ठहर गये।

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