उम्मीद ही तो पाल रखी है ,
जो जीने को करती है मजबूर।
फिलहाल तो कुछ भी नहीं,
जिसे पाकर हो जाऊँ मगरूर।
पहले उम्मीद फिर इन्तेजार,
यही करता हूं बार बार।
प्रभु अब तो कर दो कृपा,
हो चुका हूं बहुत बेजार।
उम्मीद ही तो पाल रखी है ,
जो जीने को करती है मजबूर।
फिलहाल तो कुछ भी नहीं,
जिसे पाकर हो जाऊँ मगरूर।
पहले उम्मीद फिर इन्तेजार,
यही करता हूं बार बार।
प्रभु अब तो कर दो कृपा,
हो चुका हूं बहुत बेजार।
दिल ही दिल में दबे बैठे हैं,
गुस्से से कैसे खुद ही ऐंठे हैं।
संभालते नहीं संभलते कभी,
ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।
लंबी सी राहों में चलते चलते,
मंज़िल की ओर बढ़ते बढ़ते।
न जाने कब और कैसे खो गये,
ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।
कभी किसी से साझा नहीं हुए,
अपनी ही धुन में घुलते रहे।
बस अधर में ही झूलते रहे,
ज़ज्बात कुछ तेरे कुछ मेरे।
दुनिया में क्या-क्या करतब करते हैं लोग,
मुख में राम बगल में छुरी रखते हैं लोग।
जो नहीं करना वही करते हैं लोग,
दुनिया को धोखे में रखते हैं लोग।
जो करना हो वही करने मे क्या जाता है,
जो दिल में होता है वही बाहर आता है ।
इस दुनियां में सम्मान पाता है वही,
जो लोगों के दिल में समाता है।
सुख उन्हीं के आस पास मंडराता है,
प्यार भी सभी का भरपूर पाता है।
जो मुख में राम बगल में छुरी नहीं,
जो दिल में है वही दर्शाता है।
जो मन मे है वही करना है तो करें,
फिर जो जग से सुनना है तो सुनें।
बेहतर तो होगा सफल जीवन के लिये,
स्पष्ट और पारदर्शी रास्ता ही चुनें।
अपनी आंखों में अविरत आंसू आने दो,
गहरे ग़मों को गहराई में गुम हो जाने दो।
कौन था,क्यों था,किसलिए क्रोधित हुआ,
जान से ज्यादा,जी से न लगाओ,जाने दो।
पुष्प पारिजात का मन को लुभाता है,
जब भी देखो आंख में भर जाता है।
यूं ही नहीं चर्चा हो जाती किसी की,
कुछ तो है जो औरों से अलग कर जाता है।
क्या बात करें किसी की बात का,
हर कोई मजबूर है अपनी हालत का।
अपनी जिंदगी में भी जियो ऐसे,
जैसे है पुष्प पारिजात का ।
ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में,
ढूंढने निकला था मैं फरिश्ते।
पर अंत में इस नतीजे पर पहुंचा,
यहां पर हैं सब मतलबी रिश्ते।
हां यहां जरूर कोई किसी का है,
जब उसका हो कोई मतलब।
और जब निकल जाए मतलब,
तो फिर दिखा जाते हैं करतब।
वैसे तो इस जग में हैं अनेक रिश्ते,
कुछ तो कहलाते हैं खून के रिश्ते,
कुछ होते हैं सांसारिक रिश्ते।
और जो बच गए वे मतलबी रिश्ते।
इस दुनिया में क्या दो-चार भी नहीं हैं,
क्या किसी में कोई सदाचार नहीं है।
अब क्या कहें कुछ कह नहीं सकते,
यहां पर तो हैं सब मतलब के रिश्ते।
उस दिन न जाने क्यों दिमाग पर भूत चढ़ा था,
या यूं कहो कि दिमाग ही सड़क पर पड़ा था।
वह जो मेरी कविता पर जाती थी बलिहारी,
सूरत से बड़ी प्यारी और थी सबसे न्यारी।
जब भी मेरी कविता उसे फेसबुक पर दिखाई देती,
वह फोन करके तुरंत ही मुझे बधाई देती।
क्या बताएं जी हम तो उस पर लट्टू हो गए,
दिल में बुन्दी विचार मिलकर लड्डू हो गए।
तो उस दिन मैंने उसे कॉफी का निमंत्रण दिया
उसने उसे तुरंत ही सहर्ष स्वीकार किया।
पत्नी को मैंने आइडिया से भगाया,
अच्छी साड़ी लेने बाजार भिजवाया।
क्या बताऊँ मैंने कॉफी पर उसे बुलाया,
मुझे क्या पता पति भी है आया।
लेकिन दुनिया मुझे यूं ही नहीं कहती होशियार,
मैं भी था ऐसी स्थिति के लिए बिल्कुल तैयार।
मैं दोनों को देखकर खुश हुआ ऐसा दिखाया,
पति को तीखी नजर से देख दोनों को बिठाया।
कॉफी बना कर मैंने कर दी उनको पेश,
मन में सोच रहा था थोड़ी देर में होगी मेरी ऐश।
मैं सुन रहा था प्रशंसा की मीठी मीठी बोली,
इधर मौका देख मैंने पति की कॉफी में डाली गोली।
उसने यह देख लिया और बोली यह क्या डाला,
मैंने कहा यह कॉफी का है स्पेशल मसाला।
लेकिन जैसे ही उसका पति बेहोश हुआ,
प्रेयसी नहीं अब उसका चंडी का भेष हुआ।
उस दिन उसने कर दी मेरी तबियत से अच्छी धुनाई,
अपनी बेचारी पत्नी से करवाई मैंने जगह-जगह सिकाई।
कैद हूं इस शोर में,
आवाज कोई मिलती नहीं।
कोई कहना चाहे कुछ भी,
फरियाद कोई मिलती नहीं।
झंझावातों के आते इस दौर में,
कोई भी कली खिलती नहीं।
बाधाएं अनेक है जीवन में,
कोई राह अब मिलती नहीं।
आसमाँ में बिजली चीखती,
धरती पर शोर घनघोर है।
उजाले की राह तकते,
अंधेरा हर ओर है।
काया तो मानव की पाई,
पर भाग्य नहीं किसी ठौर में,
कोई तो सुन ले मेरी,
कैद हूं इस शोर में।
इंसान को इस जगत में शिशु के रूप में लाया जाता है, और जब वह आ जाता है तो उसे जीना भी होता है। जीने की विधा अलग-अलग हो जाती है। यह विधा कुछ तो उसकी खुद की प्रवृत्ति पर निर्भर होती है व कुछ उसको मिले वातावरण पर।हम देखते हैं कि बालपन से ही कुछ बच्चे अपने आप में ही मस्त रहते हैं और मिलना,बातचीत करना उनकी प्रकृति में कम ही रहता है और कुछ ऐसे होते हैं जो अधिक से अधिक लोगों से बात करते हैं,प्रेम दर्शाते हैं,कई तरह के खेलों में रुचि रखते हैं। यह प्रवृत्ति समय के साथ बढ़ती ही जाती है। कुछ बच्चे पढ़ने के साथ-साथ अन्य विधाओं में भी उतनी ही रुचि लेते हैं और कुछ पढ़ाई में ही व्यस्त रहना पसंद करते हैं। देखा जाता है कि ऐसे बच्चे जो अपने आप में ही मस्त रहते हैं या केवल पढ़ाई में ही व्यस्त रहते हैं, वे जीवन में आगे जाकर अपने आप में ही सिमट कर रह जाते हैं और एकाकीपन के शिकार हो जाते हैं। जीवन के उत्तरार्ध में मित्रों और सगे संबंधियों का साथ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है लेकिन उसके पूर्वार्ध के व्यवहार की वजह से उसे इनका साथ नहीं मिल पाता या वे लेना ही नहीं चाहते हैं। गुमसुम रहते हुए अपना जीवन गुजारते हैं और एकाकीपन का शिकार हो जाते हैं। देखा जाए तो एकाकीपन एक घुन की तरह है, जो उम्र को धीरे-धीरे खा जाता है । ऐसे लोग देखने में उम्र से अधिक नजर आते हैं ,उनमें चुस्ती फुर्ती भी कम हो जाती है चेहरा लटक जाता है चाल धीमी हो जाती है और जीने का जो आनंद उम्र के उत्तरार्ध में मिलना चाहिए उससे वंचित हो जाते हैं।
यदि जीने का आनंद लेना है तो व्यक्ति को उन्मुख होना ही चाहिए।
हवाओं में महक बस हमें चाहिए।
फ़िज़ाओं में बहक बस हमें चाहिए।।
दिलों में बुझी यह आग क्यों है।
मौजों में रवानी बस हमें चाहिए।।
दिलों में जगह बस हमें चाहिए।
जान के लिए साँस बस हमें चाहिए।।
और क्या मांगूं तुझसे जाने जां।
जीने की आस बस हमें चाहिए।
उठ जाग पथिक अब भोर भई,
सोवत सोवत अंधियारी रात गई।
हरि भजन कर कुछ कसरत कर,
तुझे अब करने हैं काम कई।
पिया तुझे तरस नहीं आये,
मेरे नयन नीर भर आये ।
रात रात भर करवट बदलूं,
मुझे नींद न आये।
नींद अगर आ जाए तो,
सपने में तुझको ही देखूं
सपना जब झूठा निकले,
हो उदास मैं , उठ बैठूं
पिया तुझे - - -
कल जब पनघट पर थी,
पूछ रही थीं सखियां सारी,
चिट्ठी पत्री ही आयेगी,
या खुद ही , आएंगे सैयां
पिया तुझे - - -
सुबह से शाम तक,
निराश हो जाऊं,
कोशिश कर के हारी,
दिल के दर्द , रोक न पाऊँ
पिया तुझे तरस नहीं आये,
मेरे नयन नीर भर आये
मैं खुद अपना परिचय क्यों और कैसे दूँ,
जाने-माने और प्रसिद्ध में अपना नाम कैसे लूं।
अब क्या बताऊँ मैंने क्या-क्या किया,
अपने लिए नहीं दूसरों के लिए ही जिया।
कुछ लोग कहते हैं कि मैं इंसान तो नहीं ,
कुछ कहते हैं कि भगवान भी नहीं।
जब मैंने पूछा तो क्या मैं शैतान हूं,
तो बताया कि नहीं मैं शैतान भी नहीं।
न मैं ज़मीं हूं न आसमाँ हूं,
मैं नहीं जानता मैं कहां हूं।
कोई पुकार ले मुझे प्यार से,
तो समझ लो मैं वहां हूं ।
कभी मैं सोचता हूं अपनों के लिए,
कभी सोचता हूं परायों के लिए।
सच कहूं तो दिल दुखता है मेरा,
ज़माने से सतायों के लिए।
देखा जाए तो मैं तो मैं हूं,
हां थोड़ा सा विस्तृत हो जाऊं तो हम हूं ।
और ज्यादा फ़ैलूं तो मैं सब हूं,
यही मेरा परिचय और नहीं बस हूं।
किसी को किसी ने कभी कुछ सिखाया ही नहीं,
क ख ग से आगे कभी लिखाया ही नहीं।
अपने आप को बड़े शेर खान समझते हैं,
और पाला पड़ जाए तो पतली गली से निकलते हैं।
जो जी में आया,जब आया बोल दिया,
नहीं बोलना था लेकिन मुँह खोल दिया।
अब कौन समझाए इनको क्या करना चाहिए,
वैसे तो सबको तोल-मोल कर बोलना चाहिए।
पहले सुनो फिर चिंतन-मनन करो,
इसके बाद ही फिर बोलने का प्रयत्न करो।
गुलशन की बहार बन जाती है जवानी,
मोती पर जैसे चढ़ जाता है पानी।
उन्हें क्या पता हमारी जिंदगी का पता,
किस किस को सुनायें गुमशुदा जिंदगी की कहानी।
टकटकी लगाए सब बैठे हैं यहां,
हम पर क्या बीती किसी ने न जानी।
लब तो हमारे खामोश हो चुके हैं,
पर सब सुनना चाहते हैं हमारी जुबानी।
था जमाना जब हमारे भी होते थे,
हर दिन खुशनुमा और रातें सुहानी।
हालातों से पहुंच गये हम कहाँ से कहाँ ,
अब तो जिंदगी से है एक उम्र चुरानी।
अब तो बस बचा ही क्या है जिंदगी में,
अब न वे मौजें हैं न मौजों की रवानी।
मौत तो इशारा कर रही है दूर से,
लेकिन हमने अब जीने की है ठानी।
#मानसरोवर काव्य मंच#
जिंदगी क्या है सांसो का एक सफर होता है ,
मिट्टी सी काया में जीवन का बसर होता है।
क्यों लें किसी की बद्दुआ इस जमाने में,
कहते हैं कि दुआओं में असर होता है।
चाहते तो सभी हैं अमृत का रसपान करना,
रसपान करके फिर उन्मुक्त जीवन जीना ।
लेकिन यहां अमृत के बदले जहर का डर होता है,
कहते हैं कि दुआओं में असर होता है।
हमने तो माता-पिता को ही सर्वोपरि माना है,
सर्वव्यापी ईश्वर के आगे भी सर झुकाया है।
न करें आदर सम्मान तो कहर होता है,
कहते हैं कि दुआओं में असर होता है।
कतरा कतरा हो चुकी जिंदगी को
अब कैसे संवार लूं।
अब तू ही बता ऐ जिंदगी
जिंदगी में अब बचा क्या है ।
बहुत कुछ किया मैंने,
तुझे करीने से जीने के लिए
क्या क्या न किया अमृत पीने के लिए
अब जीवन ही मेरे लिए सजा है ।
जो जी रहे हैं खुलकर
वे न मर रहे हैं घुटकर
सांसों पर सांसे भरे जा रहे हैं
जिंदगी उनके लिए मजा है
खुशमिजाजी भरी जिनके दिलों में,
जिंदगी का मजा वे ही ले रहे हैं।
तू भी ले ले जिंदगी का ऐसा ही मजा,
दुनिया से आ रही ऐसी सदा है।
न सोच कि जिंदगी में अब बचा क्या है
Ab
भविष्य का निर्धारण आखिर कौन करेगा,
आने वाले पलों का हिसाब आखिर कौन रखेगा।
ऊपर जो बैठा है बहीखाता लेकर,
वही कर्म के अनुसार भाग्य रचेगा।
हम और तुम कुछ भी ना कर पाएंगे,
जहां का इशारा होगा वही हम जा पाएंगे।
इस भवसागर में वही तर पाएगा,
जो धर्म के अनुसार ही यहां चलेगा।
धर्म-कर्म का चोला जो ओढ़ेगा ,
वही जीवन में सफल हो पाएगा।
प्रभु मेरे कैसे-कैसे जतन करूं,
कि आपकी कृपा मैं पा जाऊं।
भक्ति आपकी करूँ इतनी,
कि आपकी निगाह में आ जाऊं।
या तो पुष्पमाला बनकर,
आपके गले को सजाऊं।
या फिर पुष्प ही बन कर,
आपके चरणों में गिर जाऊं।
सारा जग गुणगान करे महिमा तेरे नाम की,
जो कोई अपनी ही करें नहीं किसी भी काम की।
हे प्रभु ऐसी राह दिखा दे हमें,
जो भी जग में हम करें वही हो काम की।
न कभी सुख देखे न कभी दुख बीते,
चले जा रहे हैं पथरीली राहों पर,
असमंजसों के भंवर में घूम रही
जवानी,
मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।
सभी के दिल थे बहुत ही प्रफुल्लित,
जब तुम्हारा अवतरण हुआ था यहां,
अब लद गए वे दिन और रातें सुहानी,
मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।
मां की आंखें देखती थीं अपने लाल को,
पिता भी फूले नहीं समाते थे देखकर अपने लाल को,
और तुम्हें सूझती है करने को हरदम नादानी,
मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।
जिंदगी के तूफानों से टकराकर जीर्ण शीर्ण हो गए,
आंखों के समंदर में अब ज्वार आता नहीं,
कभी तूने दिलाई नहीं मात'पिता को मौजों की रवानी,
मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।
सिल दो मेरे होठों को यदि नहीं सुनना है तुम्हें,
जो तुम्हें अच्छी लगे वह बात नहीं करनी है मुझे।
जो बात अच्छी हो वही मैं कहूंगा
चाहे मुझे कितना भी सितम पड़े सहना।
यदि तुम हमारे धर्म ग्रंथ पढ़ लेते,
क्या है सही क्या गलत समझ लेते।
मेरी बातों को गलत मानकर,
यूंही किसी भ्रम में नहीं पड़े रहते।
बेहतर होगा अपने आपको आईने में देखना,
पहले जरूरी है अपने आप को परखना।
यदि तुम अपने अंतर्मन से डरोगे,
मेरा मूंह बंद करने की गलती नहीं करोगे।
हम सबको चाहिये तोल मोल कर बोलना,
मीठे बोलों से जग में सुख से रहना।
किसी भी परिवार में देवरानी जेठानी में तुलना आम बात है।एक त्यौहार पर रिश्तेदारों में बांटने के लिए जेठानी पार्वती के मायके से 10 किलो बेसन की बर्फी और देवरानी प्रीति के मायके से सिर्फ 3 किलो लड्डू आये। प्रीति बड़ी रुआँसी हो रही थी,कि सासूजी नाराज होंगी।उसका लटका हुआ मुँह देखकर सासू जी उसके पास आकर बोली चिंता मत कर,किसी को मालूम नहीं होगा मैंने सात किलो लड्डू और खरीद कर उन लड्डुओं में मिला लिये हैं।प्रीति उनकी इस सरलता से मोहित हो गई।
नकुल की पत्नी आज ही मायके से वापस आने वाली थी । वह उसे लेने के लिए स्टेशन पर आया हुआ था। वह ट्रेन जिससे उसकी पत्नी आ रही थी लगभग एक घंटा देरी से आने वाली थी ,उससे पहले ही दूसरी ट्रेन आकर प्लेटफार्म पर आकर रुकी। उसने देखा कि लोग धड़ाधड़ ट्रेन से उतर रहे हैं और कुली को आवाज देकर सामान उस पर लाद रहे हैं।उसे उन कुलियों पर बड़ा तरस आया,बेचारे कहां-कहां से आकर दुनिया का बोझ उठा कर परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। एक कुली के सिर पर बिस्तरबंद देखकर उसे बड़ी हंसी आई , आज के जमाने में भी लोग बिस्तर साथ लेकर चलते हैं। वह प्लेटफार्म पर चहलकदमी करने लगा।समय बिताने के लिए एक बच्चे से अखबार खरीद लिया पास ही एक बच्चा,बूट पॉलिश करने वाला,खाली बैठा हुआ था।उसने अपने जूतों की तरफ देखा और पाया कि उसके जूतों की चमक भी स्वयं के चेहरे की जैसी हो गई थी , पत्नी जो न थी इतने दिनों से। तो उसने उस बच्चे से कहा-ले भाई मेरे चेहरे पर तो चमक आने ही वाली है, तू इन जूतों को भी चमका दे। बच्चा जूतों को चमकाने लगा और वह अखबार पढ़ता रहा। उसके मन में विचार आया कि एक छोटा बच्चा अखबार बेच रहा है और दूसरा बूट पॉलिश कर रहा है,उसे उन पर तरस आया।जब पूछा तो मालूम हुआ कि दोनों भाई-भाई हैं और परिवार के पालन-पोषण के लिए यह कार्य कर रहे हैं।
नकुल सरकारी कार्यालय में बड़ा अफसर था उसे मालूम था कि गरीब बच्चों और परिवार के लिए बहुत सी सरकारी योजनाएं हैं लेकिन ये योजनाएं सभी तक नहीं पहुंचती। उसमें उन बच्चों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की और गरीब परिवार के लिए भी मासिक सहायता राशि उपलब्ध कराई।
बच्चे स्कूल में पढ़ने लगे थे और परिवार में संतुष्टि का आगमन हुआ। उधर वह ट्रेन भी आ चुकी थी जिसमें उसकी चमक यानी पत्नी आ रही थी।
(जब आई कठिनाई , मां याद तेरी आई )
न जाने कहां पर था मैं,
इस दुनिया से था अनजान।
मां तूने ही तो डाली थी,
मेरी काया में जान।
इस दुनिया में जब मैं आया,
सामने बस तुझको ही पाया।
कितने-कितने कष्ट उठाकर,
मां तूने मुझको जन्माया।
मेरा मुंह देख कर देख कर,
तू कितना हर्षाती थी।
जब भी मुझको रोना आता,
तुरंत दौड़ कर आती थी।
जब कभी मैं राह भटकता,
तूने ही राह दिखाई।
जब आई कठिनाई,
माँ तेरी याद आई।
गुनगुन करता भंवरा आता,
सुन सुन कहकर गीत सुनाता।
काँटों से तो दूरी बनाकर,
फूलों संग समय बिताता।
चुन्नू मुन्नू तुम भी आओ,
मेरे संग संग खेल रचाओ।
खेलो कूदो नाचो गाओ,
फूलों का मन हरसाओ।
आसमान में बादल छाए,
बरखा का संदेसा लाए।
देखो बूँदें आने लगी हैं,
रिमझिम रिमझिम गाने लगी हैं।
भंवरा फूलों पर मंडराता,
कान में जाकर गीत सुनाता।
फूलों के मन भी हर्षाये,
सब ने मिलकर गाने गाये।
चाहता तो है बहुत कुछ पाना,
न कुछ खोना बस पाना ही पाना,
कैसे हो पाएगा यह सब संभव,
जब देखेगा हमेशा अधूरे सपने।
मैं हूं बस में ही हूं,
और सब तो बस गौण हैं,
जब यह सोच है तुम्हारी
तो फिर कौन होंगे तुम्हारे अपने।
किसी ईश्वर को तुमने माना नहीं,
उनकी लीला को तुमने जाना नहीं,
जब आई मुसीबत जिंदगी में,
तो फिर लगे माला जपने।
कोई बताए कैसे काबू में रखें दिल को,
यह दिल तो संभाले नहीं संभलता।
कोशिश भी कर लो चाहे मुट्ठी में बंद करलो,
मुट्ठी से रेत की मानिंद फिसलता।
हमारा दिल हमने आपको दे दिया,
अब आपका दिल हमको चाहिये।
या तो आप हमारे पास आओ,
या फिर हमको वहां बुलाइये ।
कोई बताए कैसे काबू करें कमबख्त दिल को,
यह तो संभाले नहीं संभलता संगदिल सुन लो।
दिल ही दिल में सोच चुके थे दिल देने का,
अब सोच विचार न करो मुझे चुन लो।
उस दिन दिल दे दिया था दिलदार को,
उसी दिन उसने उछाल उछाल कर तोड़ दिया।
अब क्या अकेली ही अठखेलियाँ करूं,
बेदर्दी, बेवफा ने बेवजह ही मेरा साथ छोड़ दिया।
साँझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
मन को जब समझाया हमने,
तब आखों में नींद समाई।
जब जब सोचूं बात पिया की,
याद सताये बात पिया की ।
जब समझाऊं मन को अपने,
दिल हौले से फिर धड़का।
सांझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
लिखना चाहूं प्रेम की पाती,
क्या लिखना है समझ न पाती।
कोई आकर मुझे समझाए,
कैसे होगी प्रेम की बरखा।
सांझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
प्रेम की भाषा समझ न आये,
समझ न आये और उलझाये,
ओ मेघा अब तू ही आकर,
मुझको और उनको समझा।
सांझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
मन को जब समझाया हमने,
तब आखों में नींद समाई।
सांझ ढली।
अजी,क्या रखा है रूठने मनाने में,
क्यों हिचकिचाते हो प्यार जताने में।
हमने तो चाहा है बस तुम्हें ही,
फिर कोई कैसा भी हो जमाने में।
तुम्हारे नाम की ही माला जपती हूं,
बस तुम्हारा ही पाठ हर दिन पढ़ती हूं।
दिल जो खाली खाली था अभी तक,
उसमें बस तुम्हें ही बसाया करती हूं।
गर रूठ भी जाओगे तो क्या करोगे,
मुझे छोड़कर और कहां जाओगे।
तुम्हारी आंखों में मेरा ही अक्स होगा,
जहां भी जाओगे मुझे ही पाओगे।
छोड़ दीजिए यह रूठने की आदत,
न कीजिए मुझसे कोई भी खिलाफत।
मेरी बात का कर लो पूरा यकीन,
मुझे समझिए बस अपनी ही अमानत।
आलस्य ही तो है जो मुझे रोक रहा है,
वरना मैं भी कुछ न कुछ तो लिखता।
और सभी कवियों की ही तरह,
मेरा भी दिल कुछ तो खिलता।
लिखना चाहूं मैं बहुत कुछ बातें,
कुछ इधर की कुछ उधर की।
जो हो चुका और जो ना हुआ,
लेकिन मेरी लेखनी का स्वभाव मुझसे नहीं मिलता।
यह आलस्य नाम की चिड़िया मेरी नहीं सुनती,
सच कहता हूं मैं भी चाहता हूं लिखना,
मैं भी चाहता हूं कवियों की श्रेणी में आना,
यदि नहीं चाहता तो क्यों अपना दिमाग घिसता।
प्रतिस्पर्धा का है यह जालिम जमाना,
देखा-देखी और लोग भी आलस्य करने लगे,
कहीं मैं आलसियों का सरताज न घोषित हो जाऊं,
इसीलिए कुछ लिखने की कर ली है धृष्टता।
हौसला ही तो नहीं था उसमें,
वरना वह क्यों पीठ दिखाता।
बड़ी-बड़ी बातें करने वाला,
सीना तान कर खड़ा हो जाता।
हमने देखे ऐसे ऐसे बरखुरदार,
होते हैं जमीन पर बातें आसमान की।
खुद के बारे में तो ज्यादा जानते नहीं,
और बात करते हैं सारे जहान की।
सुनो आसमान में उड़ने वाले,
अपनी जमीं पर ही रहा करो ।
अरे भाई खुद हौसला न रखो तो,
दूसरों का हौसला अफजाई किया करो।
शब्द कुंद पड़ गए ज़ुबान ने भी चुप रहना ठीक समझा
जब से आए हैं इस जगत में,
कहते ही जा रहे हैं,
सुनने वाले सुन तो रहे हैं
क्या सुन रहे हैं छुपाना ठीक समझा।
कभी शब्दों की माला पिरो कर,
कभी कविता के रूप में पेश किया,
लेख लिख कर भी कोशिश की,
कभी हास्य कविता से हंसाना ठीक समझा।
हम तो ठहरे गाय जैसे इंसान,
या यों कहें कि दीया जैसे इंसान,
जिस ने जैसा कहा वैसा हमनें किया,
लेकिन लोगों ने हमें ठगना ठीक समझा।
बेजार हो चुके हैं दुनिया की बातों से,
कब तक सुनाएं कब तक समझाएं,
अब तो शब्द कुंद पड़ गए,
जुबान ने भी चुप रहना ठीक समझा।
क्यों करें हम यहां पर किसी की भी खिलाफत,
जमाने में नहीं हमें किसी से भी अदावत।
सच मान लो मेरा कहा मेरे दोस्तों,
मेरी जिंदगी तो है बस तुम्हारी अमानत।
तुम्हारी याद आती है तो,
वह मंजर याद आता है।
वह मंजर याद आता है तो,
हमको बहुत सताता है।
हम चिट्ठी दर चिट्ठी तुम्हें भेजते रहे ,
जवाब देना तुम्हें नहीं गवारा क्या यही समझें।
या फिर अपनी बिखरी लटों में अंगुली डालकर,
धीरे-धीरे घुमाकर हमें देखना तुम्हारा इशारा समझें ।
सब्जा इतना कर दो इस जमाने में,
गिन्नीयां ही गिन्नीयां भरी हो जैसे खजाने में।
कहीं भी गमों के मानिंद सूखा नजर न आए
इसी का तो हाथ होगा धरती को सजाने में।
कमबख्त आखिर कहूं तो किसे कहूं,
दिन को, दिल को या किस्मत को कहूं।
मेरे वश में तो कुछ भी नहीं,
अब जो भी हो उसे ही सहूं।
दुनिया में आये हैं तो जीना ही पड़ेगा,
मुसीबतों से दो चार तो होना ही पड़ेगा।
दुनिया तुम्हें तरह-तरह के सबक सिखाएगी,
और तुम्हें इम्तिहान तो देना ही पड़ेगा।
यह सच है कि जिंदगी इम्तिहान लेती है ,
किसी को पास किसी को फेल करती है।
फेल होने वालों को तो दुख देती है,
और पास होने वालों के दुख हरती है।
आपाधापी की इस दुनिया में मची हुई रेलम पेल,
कोई हो जाता 'पास' और कोई होता फेल।
सिक्का तो उछाल ही दिया है,
कौन जीतेगा यही किस्मत का खेल।
अब नहीं रहा हमें दुनिया से कोई काम,
अब चाहे गला रहे सूखा या पिला दे कोई जाम।
कोई भी नगमा दिल को सुकून देता नहीं,
मेरी जिंदगी तो है बस डूबती एक शाम।
हौले हौले से मेरे दिल के करीब आकर बोलना,
दिल तुम्हारा चाहे न चाहे तुम मगर बोलना।
गुरु से गहन गुर ग्रहण करके,
विद्यालय में विद्या से विचार करें।
विचार से विवेक से विश्लेषण करके,
जीवन को जीवट जंजालों से मुक्त करें। ।
जीने का कोई उद्देश्य तो होना ही चाहिए,
जिंदगी तो सादगी से ही जीनी चाहिए।
विचारों में बनाए रखिए मौलिकता,
और जीवन में स्थिरता होनी ही चाहिए।
सपनों के पीछे भागना क्या मृगतृष्णा कहलायेगा ,
सपनों से दूर रहेगा तो मंजिल कैसे पायेगा।
जिंदादिल होकर जो लक्ष्य की ओर बढ़ जायेगा,
वही अंततः सपनों को सच कर पायेगा।
सुख चैन कहां सिधारे,
मुख आभा कोऊ न निखारे।
मम उर माही तू ही बिराजे,
नैन निहारे चरण तिहारे ।
गुम हो गई जो बागों में आती थी बहार,
फूल चमन में मुरझा गए क्यों इस बार।
दिल अब लगता नहीं जरा भी हमारा,
जब से उजड़ गया है हमारा यह दयार।
सोच की मानिन्द सरल नहीं जीवन मानव का ,
सफल,सुरक्षित जीवन जीने की होती है कामना।
सफल हो जीवन यदि मैं,मेरा,हमारा छोड़कर,
मानव के जीवन में समर्पण की हो भावना।
बीमार का हाल पूछने चले आते हैं ,
दिलासा कम देते ज्यादा डराते हैं।
इस तरह से हाल पूछना तो कमतर है,
बीमार को अपने हाल पर छोड़ना ही बेहतर है।
सर्द हवाओं और फर्द में रस्साकशी जारी है,
कहना मुश्किल है कौन किस पर भारी है।
सर्द हवाएं उष्ण हवाओं में बदल जायें,
ऐसी ही हम करबद्ध विनती करते जायें।
कागज के मानिंद हो जाते हैं सब रिश्ते,
जब किसी मोहपाश से बहक जाते हैं।
खून के हों रिश्ते या सांसारिक हों,
कितना भी संभालो तड़क जाते हैं।
माता-पिता लाते हैं दुनिया में संतान को,
पति पत्नी करते हैं वादा साथ निभाने को।
पर कहां चले जाते हैं कर्तव्य और वादे,
जब लोग निकल पड़ते हैं स्वार्थ कमाने को।
लाख जतन करें रिश्ते निभाने को,
फिर भी रार से रिश्ता जोड़ जाते हैं।
ये जतन भर नहीं पाते दरार कभी,
अपने निशाँ तो छोड़ जाते हैं।
कभी-कभी कोई बात होती है और नहीं भी होती।एक पक्ष को लगता है, कोई बात ऐसी थी तो दूसरे को लगता है कोई बात ऐसी थी ही नहीं। छोटी सी बात पर दोस्ती में दरार पड़ जाती है।
राकेश का छोटी सी बात पर पड़ोसी सूरज से मनमुटाव हो गया था। बच्चों में झगड़ा हुआ और पड़ोसी ने बच्चे को चांटा मार दिया।कुछ अनर्गल वाक्यों का आदान प्रदान हुआ और रंजिश पैदा हो गई। एक दूसरे के घर आना- जाना बंद। घर से बाहर निकलते वक्त कभी आमना-सामना भी हो गया तो नज़र को घुमा देना नई प्रक्रिया हो गई थी।
एक दिन अपनी धुन में ही राकेश ने पड़ोसी सूरज की डोर-बेल बजा दी।वे बाहर निकले और राकेश उनके साथ ही अंदर चला गया। थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे फिर सूरज ने पूछा- चाय पियोगे, राकेश ने कहा नहीं,पिछले माह से ही मैंने चाय पीना छोड़ दिया। फिर कहा चलो कॉफी पी जाए।
अक्सर देखा गया है कि जो लोग चाय नहीं पीते वे कॉफी के लिये ना नहीं कर पाते, राकेश ने भी ऐसा ही किया। थोड़ी देर कॉफी पीते रहे फिर राकेश ने ही बात शुरू की-अरे भाई उस दिन बच्चों के झगड़े में मैंने तुम्हारे बच्चे को चांटा मार दिया था, मुझे इस बात का अफसोस है ,लेकिन उसने भी तो मेरे बच्चे को धक्का मार कर गिरा दिया था,तो आवेश में मैंने ऐसा कर दिया।शायद मैंने गलत किया था।
अब सूरज की बारी थी बोलने की। उसने कहा कि हां मेरे बच्चे को धक्का नहीं देना चाहिए था,तुम्हारे कहना सही है। चलो छोड़ो जो हो गया सो हो गया ।
बस हो गई बोलचाल शुरू, सारे गिले- शिकवे कॉफी के कप पर दूर हो गये, दोस्ती बरकरार रही।
स्वरचित एवं मौलिक - सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर
वो आंसू न बहे आंखों में ही ठहर गये,
ग़मों को छुपाने का हमें हुनर था,
देखने वाले सोचते ही रहे,
आंसू आखिर गये तो किधर गये।
इस दुनिया में हम रोते हुए ही आये थे,
हमें मालूम नहीं किसने हमें रोना सिखाया,
किसने दुनिया में यह नियति बनाई,
हां जब आये तो आंसू आंखों में ही समाये थे।
आत्म सम्मान से अपना जीवन जिया था,
बरसों जाने क्या-क्या सपने देखे थे,
गैरों से भरी पड़ी है यह दुनिया,
तुम्हें अपना समझा क्या बुरा किया था।
मैंने तुम्हें समझा बहुत समझा,
तुमने समझने की कोशिश भी नहीं की,
अब मेरे दिल के जज्बात आंसुओं में बदल गए,
वो आंसू न बहे आंखों में ही ठहर गये।
अतीत के दायरे से निकल,
वर्तमान की कठोर धरती पर,
जब मैं विचरण करता हूं,
तो सोचता हूं कि आदमी,
आदम से आदमी हो गया है ।
पर जब वर्तमान की कठोर धरती से उठ,
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूं,
तो सोचता हूं कि कहीं आदमी,
आदमी से आदम न हो जाये।
लेकिन अपनी सोच को यही नहीं रोकता हूं,
इस सोच को एक नई सोच देता हूं।
यदि आदमी में मानवता आ जाए तो,
यदि आदमी मानव बन जाए तो।
तो शायद शांति की कल्पना को साकार करेगा,
तो बता आदमी तू मानव बनेगा?
प्रसन्नता नहीं चेहरे पर
खस्ता हो रही हालत
आलस्य भी भरा हुआ
दूर कर ले इन सबको
अपना ले आमोद-प्रमोद
खेत में बोना बीज़ का
बिना खेत जुताई के
फिर फसल की प्रतीक्षा
क्या फसल आ जाएगी।
ग़मों के बोझ से
अक्सर दब जाते हैं
गमगीन होकर रुक जाते हैं
मन में साहस भरकर
खुशियों का खजाना भर ले
अपने जीवन में
आमोद प्रमोद को
आत्मसात कर ले।
*धर्म की धारणा एवं धर्म का आवरण क्या है।*
धर्म के बारे में चर्चा करने के लिए हमें शीर्षक को दो भागों में विभाजित करके चलना चाहिए
1) धर्म की धारणा एवं
2) धर्म का आवरण।
हमें यह देखना है कि आखिर धर्म क्या है ? हम क्यों ईश्वर /देवी /देवताओं की पूजा करते हैं? इसलिए नहीं कि हम उनसे कुछ मांगे और वे हमें वह सब दें। हमें उनकी पूजा इसलिए करनी चाहिए कि वे धर्म के रास्ते पर चले अर्थात मानव मात्र के कल्याण के लिए जैसा आचरण करना चाहिए वैसे किया। स्वयं स्वार्थी न बनते हुए, सामने वालों के कल्याण के बारे में सोचा। वे सब हमारे लिए आदर्श हैं और उनको सम्मान देने के लिए हम उनकी पूजा करते हैं, इसी को ही धर्म मान लिया गया।
दूसरे भाग में हम देखते हैं की लोग धर्म के नाम पर आडंबर करते हैं। अर्थात उन्होंने धर्म का आवरण ओढ़ा हुआ है,वे सिर्फ दिखावा करते हैं। भजन कीर्तन एवं नाना प्रकार के धार्मिक आयोजन /अनुष्ठान करते हैं। ऐसे ही लोगों के व्यक्तिगत व्यवहार को देखा जाए तो मालूम होगा कि परिवार में ही वैमनस्य फैला हुआ है।एक दूसरे से स्पर्धा करते हैं ,नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। स्वयं आगे बढ़ना चाहते हैं और दूसरे को पीछे रखना चाहते हैं। ऐसे लोग धर्म का आवरण धारण करके रहते हैं।
यदि हम धार्मिक हैं ,धर्म पर चलना चाहते हैं तो हमें अपने से अधिक अन्य की परवाह करनी चाहिए। हम भी सुखी रहें और अन्य सभी भी सुखी रहें, ऐसे प्रयास करने चाहिए। यही सच्चा धर्म होगा। हम भी वैसा ही व्यवहार करें जैसा हमारे आदर्श ईश्वर या महापुरुष करते रहे हैं।
#विधा : कहानी
सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।
अच्छा भला परिवार था, सब अच्छे से समय गुजार रहे थे। लेकिन मोहित के घर टी वी आने के बाद माहौल बदलता जा रहा था। पत्नी कामिनी को सीरियल देखने का शौक था। लगभग सभी सीरियल में स्त्रियां साजिश करती हुई नजर आती हैं ,और ऐसी ही भावना कामिनी के अंदर घर करने लगी और परिवार का माहौल बिगड़ने लगा। मोहित अक्सर समाचार सुना करता था । सब जानते हैं कि समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है। अतः सरकार के प्रति उसके मन में दुर्भावना आने लगी। जब भी दोस्तों के साथ बैठता, सरकार की कमियां बताता रहता जिससे उसके दोस्त उससे दूर होते चले गए। बच्चे कौन से कम थे , जब-तब कार्टून फिल्में देखते और उनके जैसे ही संवाद करने लगते। टेलीविजन के बहुत पास बैठते । समय के साथ धीरे-धीरे उनकी नेत्र ज्योति कम होने लगी और इतनी कम उम्र में ही उनको चश्मे की आवश्यकता पड़ गई।
घर का माहौल जिस तरह से बिगड़ता हुआ नजर आ रहा था मोहित का क्रोध टेलीविजन पर बढ़ता ही जा रहा था । वह समझ गया था कि टेलीविजन से निरर्थक सामग्री परोसी जा रही है और यही कारण है कि घर का माहौल कुछ से कुछ हो गया है। एक दिन उसे लगा कि अति हो चुकी है तो उसने टेलीविजन उठाया और जमीन पर दे मारा और घर पर सब को ताकीद कर दिया कि जब तक सब कुछ पहले जैसा नहीं हो जाता वह दोबारा टेलीविजन नहीं लेगा और लेगा तो सब पर कुछ अंकुश तो लगेगा ही।
सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर
#100 शब्दों की कहानी
# मतभेद
महेश के पिताजी के देहांत के बाद उनका खेत, एक सरकारी योजना के अंतर्गत सरकार ने अपने अधीन कर लिया और उसका मुआवजा महेश को दे दिया। महेश ने अपनी दो विवाहित बहिनों को,बंटवारे के अंतर्गत 30-30% हिस्सा दे दिया एवं स्वयं 40% रख लिया।दोनों बहिनों को यह नागवार गुजरा और नाराज रहने लगीं। भाई और बहिनों के बीच मतभेद उभर आए थे। महेश के चाचा ने उन दोनों बहिनों को समझाया कि देखो तुम दोनों बहिनों की शादी में पैसा महेश ने ही लगाया अतः उसका इतना तो हक बनता है। मतभेद दूर हो गये।
टेढ़ी मेढी पगडंडियों से गुजरती जिंदगी,
नाना प्रकार के सबक सिखाती जिंदगी।
कोई सीधे-सीधे सफर में चला जा रहा है,
कोई टेढ़े मेढ़े रास्तों से समेट रहा है जिंदगी।
जब दुनिया में आ गए तो जीना तो है,
अमृत या विष जो भी हो पीना तो है।
समझने की कितनी भी कोशिश कर लें,
पर समझ न आए यह जिंदगी।
ठहरे भवसागर में नाव जैसी नजर आती है,
सीधे-सीधे चलती जाती है ज़िंदगी।
कभी-कभी बिना पतवार के डोलती,
भंवर में फंसती नजर आती है जिंदगी।
नहीं समझ पाते आखिर क्या है यह जिंदगी,
किसी को तो लगता है एक पहेली है।
समझ बूझ कर यदि समझ लिया तो,
सच कहता हूं यह एक सहेली है।
कभी धूप कभी छांव नजर आती है,
कभी श्वेत कभी स्याह नजर आती है जिंदगी,
कोई नहीं जानता जिंदगी में,
क्या क्या रंग दिखाती है जिंदगी।
किसी को स्याह-रात काली घटा नजर आती है जिंदगी,
किसी को रंगीन खूबसूरत छटा नजर आती है जिंदगी।
अब जो भी हो जैसे भी हो कुछ भी हो,
मुझे ही नहीं सभी को जीनी है यह जिंदगी।
रोशन लाल जी मोहल्ले के बड़े आदमी थे । प्रकृति उनकी कुछ ऐसी थी कि जो उन्होंने सोच लिया और कह दिया वही सही है। मोहल्ले के निवासी भी उनकी बड़ी इज्जत करते थे और उनकी बात को आंख मूंद कर मानते थे।
उन दिनों शहर में एक कॉलोनी में भूखंड बेचे जा रहे थे । रोशन लाल जी ने कॉलोनाइजर से तय किया कि वे अपने मोहल्ले वालों को बहुत सारे भूखंड बिकवा देंगे। कॉलोनाइजर ने उन्हें बदले में अच्छी राशि के भुगतान का वादा किया । जब मोहल्ले के ही एक समझदार निवासी ने तह में जाकर मालूम किया तो मालूम हुआ कि यह जमीन तो सरकार अपने अधीन लेने वाली है। उन्होंने अपने मोहल्ले के निवासियों को बहुत समझाया लेकिन कोई उनकी बात मानने को तैयार नहीं हुआ, उन सबको तो रोशन लाल जी पर पूरा भरोसा था। रोशन लाल जी की नजर उन्हें मिलने वाले धन पर थी , उनकी आंखों पर तो इस धन का चश्मा चढ़ा हुआ था। तो उन्होंने इस बात पर कुछ ध्यान नहीं दिया। फल स्वरुप मोहल्ले वालों ने बहुत सारे भूखंड खरीद लिये।
अगले वर्ष सरकार ने वह जमीन अपने अधीन कर ली और उसका मुआवजा किसान को दे दिया। किसान बड़ा धूर्त और स्वार्थी था ।उसने सारा धन अपने पास ही रख लिया और किसी को कुछ नहीं दिया। मोहल्ले के सारे निवासी ठगे जा चुके थे।
कहते हैं ना किसी के ऊपर आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए, वरना पछताना पड़ सकता है, और हुआ भी यही।
#विषय : दिल के दर्द आंखों में0
# दिनांक 29/11/ 2022
स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
गमों के जख्मों को कैसे नासूर बनने दें,
लगता है दिल की चादर को चूहे कुतर आए हैं।
कितना ही संभाला हमने अपने आपको,
लेकिन दिल के दर्द आंखों में उतर आए हैं।
तुम्हें देखा तो सपने सुहाने होने लगे थे,
नीरस से जीवन में जीने के बहाने मिले थे।
रुकती हुई सांसों को जैसे जीवनदान मिला,
उजड़े हुए गुलशन में फूल फिर से खिले थे।
देखे थे हमने मिलकर ख्वाब महलों के,
बेरुखी से तेरे अब खण्डहर बने हैं।
जिन पत्थरों को हमने फूल सा समझा था,
वे अब खाने को ठोकर दर-दर बने हैं।
ख्वाबों की जो सरिता कल कल बहने लगी थी,
सोचा था तैरती नय्या से हम उतरेंगे किनारे।
सपने हमारे यूं ही चूर-चूर न होंगे,
चमकेंगे नभ में बनकर के सितारे।
विरह वेदना से दिल तड़प रहा है,
सूरज के गोले सा दिल दहक रहा है।
अब चाहे तो फिर से कर दे प्रणय निवेदन,
दिल का दर्द आंखों में सिसक रहा है।
#विषय: माँ
स्वरचित --
सतीश गुप्ता पोरवाल , जयपुर।
ममता मयी माँ की महान महत्ता,
दिल में दया और दर्द की गहनता।
जान लो जज्बात जन्म जननी के,
मेरा मन माँ के मन में महकता।
बताऊं क्या बड़ी बात बेबसी की,
रात रात भर रोती जो जन्म पर हंसी थी।
भूल गया बेटा बड़ा बनकर,
परायो पर प्यार पर माँ के लिये कंजूसी थी।
मैंने अनजाने में मुट्ठी में माँ की उंगली मांगी,
अनजाने में ही अपनी अंजलि में उंगली थामी।
मेरे लिए इस दुनियां में कोई नहीं ,
माँ ही मेरा आसमां माँ ही मेरी जमीं।
#उड़ान
स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
होता है जब तुम्हारा जन्मदिन ,
उमड़ पड़ती है मन में भावना।
सदा खुश रहो अपने जीवन में,
हमारी यही है शुभकामना।
गम ना कभी आसपास रहे ,
हमेशा हंसता खिलखिलाता रहे।
हर खुशी तुम्हारे साथ रहे,
हमारा अपना कभी न उदास रहे।
हर स्त्री की चाहत होती है यही,
कि जिंदगी भर वह सुहागन ही रहे।
काल न आ जाए उसके जीवनसाथी पर कभी,
जब भी मरे सुहागन ही मरे।
मांग में भर लेती है अपने सिंदूर,
सजाती है भाल पर बिंदिया।
हथेलियों पर लगाती है मेहंदी,
और कलाई में पहनती है चूड़ियां।
रंग बिरंगी चूड़ियां चमकती हैं कलाई में,
स्त्री का चेहरा खिल खिल जाता है।
सुहागन होने का उसे होता है गर्व,
सारी दुनिया का सुख जैसे उसे मिल जाता है।
पहाड़ों से महानता समंदर से गहनता,
गुफाओं से शांति जंगल से हरियाली चुराते हैं,
चलो इक नया शहर बसाते हैं।
मानव में मानवता बच्चों में चपलता,
बिखरे हुए उसूलों को जमाते हैं,
चलो इक नया शहर बसाते हैं।
स्त्रियों का संवरना पुरुषों का उम्दा पहनना,
सभी मनुष्यों को सभ्य बनाते हैं,
चलो इक नया शहर बसाते हैं।
रिश्तो को महत्ता संबंधों में मधुरता,
संसार एक ऐसा बसाते हैं।
चलो इक नया शहर बसाते हैं।
सौहार्द की भावना उन्नति की कामना,
समानता की भावना जगाते हैं,
चलो इक नया शहर बसाते हैं।
राह में कांटे बहुत बिछाती है दुनिया,
इन कांटो से बच कर तू आगे बढ़ना।
लहू-लुहान न हो जाए कहीं पैर तेरे,
बहुत सोच समझकर राह पर चलना।
बाधाएं तो राह में आती ही हैं,
इन बाधाओं से कभी न डरना।
कभी जब हौसला होने लगे पस्त,
तो अपने अंतर्मन की आवाज को सुनना।
राहें तो अनेक हैं मंजिल पर पहुंचने को,
पर सोच समझकर ही सही राह चुनना।
मंजिल तो अवश्य ही मिल जाएगी तुझको,
नये कदम विश्वास के रखकर तू आगे बढ़ना।
मौन है सुखी जीवन का आधार,
जग के कोलाहल से वंचित हो,
तपस्या जब की जाती है,
तो शांति का मिलता है उपहार।
हमारी तो है बस यही कामना,
जीवन गुजरे शांति से सबका ।
यदि हो जाती है बहस कभी,
तो समझो मौन एक साधना।
सभी की प्रकृति को एक जैसा नहीं नापना,
किसी का स्वभाव प्रश्न किसी का जवाब देने का,
यदि प्रश्न है सही तो सही जवाब के लिए,
नहीं पड़ेगा किसी का मुंह ताकना।
निडर होकर करो सभी का सामना,
स्वयं हावी होने का ना करें प्रयास।
फिर भी यदि कोई आक्रामक हो,
तो समझो मौन एक साधना।
सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।
* इसका मायका-उसका मायका*
एक मध्यमवर्गीय परिवार में दो बहूएं थीं।बड़ी बहू एक अच्छे धनी परिवार से थी जबकि छोटी बहू एक साधारण से गरीब परिवार से। परिवार में सभी लोग एक दूसरे से अच्छा व्यवहार करते थे। जैसा कि होता है आज भी कुछ परिवारों में यह रिवाज है कि कुछ त्यौहारों पर उनके मायके से कुछ ना कुछ- मिठाईयां/कपड़े के रूप में- आते हैं।ऐसे ही एक त्यौहार पर छोटी बहू को मालूम हुआ कि बड़ी बहू के मायके से 40 किलो लड्डू आ रहे हैं , तो छोटी बहू ने उत्सुकता वश अपने पिताजी को फोन किया और पूछा कि वे क्या भेज रहे हैं? उसके पिताजी ने कहा कि मैं भी लड्डू ही भेज देता हूं। त्यौहार के दिन छोटी बहू के मायके से सिर्फ 5 किलो ही लड्डू आए। छोटी बहू ने देखा तो उसे बहुत गुस्सा आया उसने पिताजी को फोन करके बोला कि आपने यह क्या किया मेरी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया, मेरी जेठानी की तो वाह-वाह होगी और मेरी बुराई , मैं आपसे बहुत नाराज हूं, यह कहकर उसने फोन बंद कर दिया। त्यौहार का दिन आया तो छोटी बहू ने देखा कि सासूजी अपने रिश्तेदारों को दो बराबर के डिब्बे देती जा रही है यह कहते हुए कि एक बड़ी बहू और एक छोटी बहू के यहां से। छोटी बहू को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह बराबर बराबर के डिब्बे कैसे दिए जा रहे हैं? उसने सासूजी को पूछा कि मेरे पिताजी ने तो सिर्फ 5 किलो ही लड्डू भेजे और इस बात पर मैं पिताजी से बहुत नाराज भी हुई। आप बराबर- बराबर कैसे दिये जा रही हो? तो सासु जी ने कहा कि तुम्हारे मायके की इज्जत हमारी इज्जत है। मैंने उन लड्डुओं में और लड्डू मिला दिए और बराबर से सब कुछ दे रही हूं। बात सीधी है पर तूने समझी नहीं। जिसकी जितनी हैसियत हो, उसे उतना ही करना चाहिए। मैंने यह बात समझी और उसका उपाय करके समाधान निकाल लिया। छोटी बहू को बहुत पश्चाताप हुआ और उसने अपने पिताजी को फोन करके माफी मांगी
ठहरी हुई जिंदगी आखिर कब तक जिएंगे,
कब तक एक ही घेरे में घिरे रहेंगे।
जिंदगी ठहरे पानी सी हो गई है।
चलो अब कहीं बाहर निकलेंगे।
अकेलापन बहुत बोझिल सा लगता है,
चलो इस बोझ को हटा दें।
दिलों में जो आ गई है मलीनता,
कुछ ऐसा करें इसे मिटा दें।
हम ही कहीं बाहर जाएंगे तो रहेगा अकेलापन,
अपने आप से नहीं लगेगा मन।
तो चलो इस अकेलेपन को मिटाने को,
करते हैं कोई नया जतन।
चलो अब निकलते हैं घर से बाहर,
नई नई जगह देखते हैं कहीं जाकर।
हम भी हैं तुम भी हो वो भी हैं,
चलो सफर पर निकलते हैं मिलकर।
वह दूध को पीता रहा ,
मैं व्यस्त रहा मलाई में।
दूसरों को सताने में जो मजा है,
वैसा मजा कहां है भलाई में।
मैं मलाई को चाटता रहा,
वह व्यस्त रहा दूध पिलाई में।
पर दूध में वह मजा कहां,
जो मजा है मलाई में।
कुछ लोग बोतल में डूब जाते हैं,
कुछ ढूंढते रहते हैं कुछ ढक्कन में,
कोई छाछ को ही मुंह में लगाते हैं,
कोई डुबकियाँ लगाते मक्खन में।
हमारी तो फितरत ही अलग है,
नजरें हमारी होती आसमान पर।
हम भरे हुए थैले को नहीं देखते,
हमारी नजर तो होती है सामान पर।
जब हम पूरे के पूरे साबुत खड़े हैं,
फिर लोग क्या ढूंढते हैं हमारी परछाई में।
जब अवगुणों की होती है यहां खूब पूजा,
फिर क्या रखा है यहां अच्छाई में।
दूसरों की चिंता हम क्यों करें ,
हम तो अपने ही ख्वाबों में खोए रहते हैं,
एक आंख से पापों की ओर देखकर,
पुण्य की माला जपते रहते हैं।
अब अपनों ने मुझे अकेला छोड़ दिया,
मैं डूब गया घमंड की गहराई में।
चलते-चलते खोया रहा तन्हाई में,
सामने देखा नहीं जा गिरा मैं खाई में।
हम दुनिया की तरह भेड़ चाल नहीं चलेंगे,
दूसरों का रास्ता अलग हम अपने रास्ते चलेंगे।
चुनेंगे हम उसे नहीं जो धन के पीछे चले,
हम संपत्ति नहीं संस्कार जिएंगे ।
इस दुनिया में आने की किसे थी दरकार,
किसी को यहां बुलाने की किसने की पुकार।
शायद न दरकार हो और न पुकार,
लेकिन हर कोई आ जाता है हर बार।
जिसे नहीं फ़िक्र परिवार या जमाने की,
उसे नहीं होती फिक्र इज्जत कमाने की।
जो अपनों से ही पेश आये बेअदबी से,
उसे सजा दी जाए सताने की।
संस्कारहीन लोगों को बढ़ने को मौका थोड़ा है,
ऐसे लोगों ने अपनों को भी कहां छोड़ा है।
ऐसे ही लोगों के लिए कहा जा सकता है,
कि यह तो 'काणा है और खोड़ा' है।
राह चरित्र की तज जो भी चलेंगे,
उनके संग हम हलाहल नहीं पिएंगे।
धन का लालच नहीं हमें किंचित भी,
हम संपत्ति नहीं संस्कार जिएंगे।
# शब्दों का जाल उलझा हुआ है।
स्वरचित --
सतीश गुप्ता पोरवाल,जयपुर।
शब्द कोई साधारण नहीं,
उनकी महिमा न्यारी है।
कभी कांटों का जाल है ,
कभी सुंदर फूलों की क्यारी है।
शब्द बड़े चंचल हैं,शरारती हैं,
कभी मूक हैं तो कभी वाचाल हैं।
कभी कर देते हैं शांत,
कभी लाते भूचाल हैं।
कभी इधर-उधर बिखर जाते हैं,
इन्हें समेटना इतना आसान नहीं।
कभी आसानी से वश में आ जाते हैं,
अपने ऊपर कोई गुमान नहीं।
कभी शब्द इतने शरीफ होते हैं,
जिसमें घोलना चाहो घुल जाते हैं।
जिस सांचे में ढालना चाहो,
उसी सांचे में ढल जाते हैं।
शब्दों से चाहो तो कहानी बना लो,
चाहो तो लेखों की सरिता बहा लो।
और बहुत ही सलीके से प्यार से,
चाहो तो रसभरी कविता बना लो।
शब्द बहुत ही सरल यदि समझा हुआ है,
वरना शब्दों का जाल उलझा हुआ है।
रे मानव काहे करे तू अभिमान,
जग में क्यों खोता है अपना सम्मान।
सोच धरा पर अपनी रख ले,
कहना मेरा आज तो ले तू मान।
अभिमानी जब कोई हो जाता है,
नहीं जानता क्या खो जाता है।
दूर दूर होते जाते हैं सब,
बस वही अकेला रह जाता है।
जग में क्या लेकर तू आया था सामान,
क्या ले जाएगा इससे नहीं है तू अनजान।
अभिमान त्याग कर छुटकारा पाले,
तभी बनेगी तेरी मानव की पहिचान ।
दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ता है,
कई कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है।
कभी-कभी इंसान दोराहे पर खड़ा होता है,
उसे कोई एक रास्ता तो चुनना ही पड़ता है।
क्या करें क्या ना करें ऐसी स्थिति आती है,
ऐसे ही स्तिथि सामान्य सोच को डगमगाती है।
तब फिर मस्तिष्क में उबाल चला आता है,
और सोच इधर-उधर आती जाती है।
शांत मन से चित्त स्थिर करके सोचना होगा,
अशांत होने से कुछ भी परिणाम नहीं होगा।
इंसान अपने विवेक से काम लेगा तो,
जो भी परिणाम निकलेगा उचित ही होगा।
स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे,
समझ में नहीं आता चाहती क्या है मुझसे।
एक दिन मैं भी आसमान में समा जाऊंगा,
इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा।
जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,
इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।
सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया
मुझे अपनों के द्वारा लाया गया।
अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,
मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।
तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।
वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।
जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी,
उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।
उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,
मेँ जमीं पर हूं तब तक आसमान दूर है मुझसे।
हौसला पस्त ना हो उड़ान पर हो,
नजर अपने पे नहीं सारे जहान पर हो।
मंजिल दूर नजर आती जरूर है,
लगता है जैसे यह बहुत ही दूर है।
लेकिन हौसला हमारा किसी से कम नहीं,
सोच लो अगर तो फिर कोई गम नहीं।
काश!जिंदगी
#दिनांक:23/11/2022
काश!जिंदगी को मैं जी पाता,
जितना चाहा था खुशियां पा जाता।
अंजली भर खुशियों का मैं क्या करूंगा,
दामन में न समाए इतनी देता मेरे दाता।
काश ! मेरी मंजिल का मुझे पता होता,
तो अब तक वहां पहुंच गया होता।
किस राह पर चलूं यह भी मालूम नहीं,
मालूम होता तो यही नहीं खड़ा होता।
ऐ मेरी जिंदगी मुझे कुछ तो बता,
क्या मुझसे हो गई है कोई तो खता।
कोशिश बहुत की पर समझ न आया,
अब तू ही मुझे समझा यदि है पता।
काश! जिंदगी मेरी जिंदगी हो पाती,
मेरे बिखरे ख्वाबों को करीने से सजाती।
खुशी से मैं जिंदगी को अपना बनाता,
मेरे साथ साथ जिंदगी भी मुस्कुराती।
स्वरचित --
सतीश गुप्ता पोरवाल
जरूरी नहीं कि विद्यालय पूर्ण रूप से साधन संपन्न हो । जरूरी यह है कि अध्यापक में अध्यापन के प्रति समर्पण हो और बच्चों में पढ़ने और आगे बढ़ने की ललक।
श्यामपुरा एक छोटा सा गांव । वहां के सरपंच ने जैसे तैसे प्रयत्न करके प्राथमिक विद्यालय के लिए स्वीकृति प्राप्त कर ली।विद्यालय के लिये वहां पर कोई भवन न था।एकमात्र अध्यापक की नियुक्ति गांव से ही की गई और अध्यापक महोदय खुले मैदान में ही हरियाली के बीच , पेड़ों की छांव में बच्चों को पढ़ाने लगे। बच्चे गिनती के ही थे लेकिन शुरुआत के लिए कम नहीं थे।मास्टर जी श्याम पट्ट पर लिखते हुए बच्चों को पढ़ाते और उनसे प्रश्न करके उत्तर प्राप्त करते।
गांव में कुछ शरारती बच्चे भी थे, जिनको पढ़ने में रुचि नहीं थी। वे वहीं मैदान में फुटबॉल खेलते रहते,हालांकि मास्टर जी ने उनके मां-बाप को बहुत समझाया कि बच्चों को पढ़ने भेजा जाए , लेकिन मां-बाप कहते थे- हमें क्या कमी है, हम खेती कर रहे हैं बच्चे भी खेती कर लेंगे और ठीक से जीवन यापन कर लेंगे।
बच्चे क्योंकि शरारती थे इसलिए जानबूझकर पास में ही फुटबॉल खेलते थे और फुटबाल पढ़ने वाले बच्चों की तरफ अक्सर आ जाती थी।
मास्टर जी ने उनको समझाया लेकिन वे नहीं माने।अंततः हुआ यह कि इन पढ़ने वाले बच्चों यानी कि छात्रों ने उन शरारती बच्चों की धुनाई कर दी और फिर उनको समझाया कि तुम पिटाई के ही काबिल हो।यदि तुम्हें वास्तव में काबिल बनना है तो तुम्हें पढ़ना चाहिए। दो-तीन बार पिटाई होने और समझाने के बाद, बच्चों को समझ में आया और फिर उन्होंने भी विद्यालय में प्रवेश ले लिया ,और सभी साथ साथ पढ़ने लगे।
गांव साक्षरता की ओर कदम बढ़ाने लगा।
वे भी क्या दिन थे जब हाथ में हाथ डाले चलते थे,
एक दूसरे के दिल की बातें किया करते थे।
हम एक दूसरे के दिल में समाते थे,
जनम जनम का साथ निभाने की कसमें खाते थे।
न देखूँ तुझे तो न आता था मुझे करार,
तुझे भी नहीं था इस बात से कतई इंकार।
लेकिन अखिर यह क्या हुआ अचानक,
ऐसा क्यों हुआ मंजर भयानक।
तू मुझसे दूर होती चली गई,
मैं याद करता रहा तू मुझे भूल गई।
मुझे याद है जब हमारी मोहब्बत शबाब पर थी,
तेरे हाथों में मेरे लिए डाली गुलाब की थी।
अब जब तूने मुझे सिरे से भुला दिया,
तो हमने भी वह गुलाब जला ही दिया।
अब तू भी देख ले वही जलता हुआ गुलाब,
अब चाहे तू दे या ना दे मुझको कोई जवाब।
हंसता हुआ चेहरा जब भी नजर आता है,
लगता है जैसे खुशी की खबर लाता है।
आतुर रहते हैं सभी उनसे मिलने के लिए,
मिलकर उनसे खुशी से खिलने के लिए।
लोग अक्सर गमों के तले दब जाते हैं,
चेहरे उनके चमकने के बजाय बुझ जाते हैं।
किसी को भी पसंद नहीं होता ऐसा चेहरा,
कोई भी नहीं बांधना चाहता उसके सिर पर सेहरा।
हम तो चाहें किसी के चेहरे पर न चिंता रहे,
मरने की इच्छा कभी ना हो जिंदा रहे।
गम कितने भी आ जाएं जिंदगी में,
जिंदगी ना कटे उनकी शर्मिंदगी में।
गमगीन रहकर गम के तराने ना गुनगुनाये,
, झूम झूम कर खुशी के ही नगमे सुनाये।
जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे,
समझ में नहीं आता चाहती क्या है मुझसे।
एक दिन मैं भी आसमान में समा जाऊंगा,
इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा।
जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,
इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।
सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया
मुझे अपनों के द्वारा लाया गया।
अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,
मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।
तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।
वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।
जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी,
उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।
उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,
मेँ जमीं पर हूं तब तक आसमान दूर है मुझसे।
हौसला पस्त ना हो उड़ान पर हो,
नजर अपने पे नहीं सारे जहान पर हो।
मंजिल दूर नजर आती जरूर है,
लगता है जैसे यह बहुत ही दूर है।
लेकिन हौसला हमारा किसी से कम नहीं,
सोच लो अगर तो फिर कोई गम नहीं।
एक चेहरे पर दूसरा चेहरा नजर आता है यहां,
असली चेहरा नजर आता नहीं यहां।
मुझे है असली चेहरे की तलाश,
असली चेहरा देखने जाऊँ कहां।
हर शख्स की फितरत अलग अलग है,
दिलों में भाव अलग अलग है।
सुषुप्त हैं किसी के भाव,
किसी के मे जगी अलख है।
काया अपना भेष बदल लेती है,
माया उसमें रंग भर देती है।
कितना भी जतन करले इंसान,
लेकिन आँख भेद खोल देती है।
कोई कितना भी कर ले खींचतान,
सुन ले हर कोई खोल कर कान।
कितना भी चेहरे पर रंग लगा ले,
हर चेहरे की है अपनी अपनी पहचान।
बहुत कोशिश की मैंने तुम बिन जीने की,
जीवन के पलों के चिथड़े सीने की।
पर हर कोशिश मेरी नाकाम ही रही,
अब तो आदत हो गई जहर भी पीने की।
मौसम आते रहे मौसम जाते रहे,
गमों के अनेक नगमे गुनगुनाते रहे।
और हम करते भी क्या तुम बिन,
हम पर जो अपनों से बीती सुनाते रहे।
तुम्हारी याद कंपकपाती ठंड सी आती है,
होले होले से कुछ गुनगुनाती है।
सुकून का तो एक तिनका भी नहीं मिलता,
हरदम गमों की महफिल सजाती है।
करूं क्या मैं कुछ समझ ही नहीं आता,
तुम्हारे साथ बीता हुआ पल बहुत ही सताता।
अब जैसे भी हो जीना तो होगा ही,
इन्हीं गमो से जोड़ लिया है अब नाता।
पेट मेरा कितना भी खाली क्यों ना हो,
खाने को कुछ मिले या ना मिले,
पर सच बताऊं मेरे यारों,
चैन तो तभी आए जब नैन मिले।
नैन मिले नैन मिले नैन मिले यही सोचता रहा,
जो मुझ में समाये उसे खोजता रहा।
एक नटखट सी मुझे राह में मिली,
पर चल हट कह कर चल निकली।
जब से नैन मिले मेरी चमेली से,
नैन-नक्श कमतर थे उसकी सहेली से।
फिर भी मैंने उसके दिल से दिल मिला लिया,
मन ही मन उसे अपना मान लिया।
वह भी इसी खोज में थी कि उसे कोई मिले,
जिसके मीठी मीठी बातों से उसका दिल खिले।
मिले जो हम दोनों नजरें झुकाए थे,
दिल के जज्बात हमने छुपाए थे।
जब नजरों से नजरें मिल गईं,
तो दोनों एक साथ खूब खिलखिलाये थे,
अपने दिल के उपवन में,
तरह तरह के फूल खिलाये थे ।
पर जब से देखा उसके बाप को,
बाप रे बाप क्या बताएं आपको।
डील-डोल और शक्ल से राक्षस लगता था,
समझ लो कि प्यार का भक्षक लगता था।
हम दोनों ने जी भर खूब की दिल्लगी,
मैं उसे और वह मुझे चिट्ठी देने लगी।
लेकिन आज रात भर मुझे नींद ना लगी ,
जबसे मेरी चिट्ठी उसके बाप के हाथ लगी।
पथराई आंखों में ख्वाब खोजते हैं,
अश्रुपूरित आंखों के अश्रु पोंछते हैं।
हम कितने भी गाफिल रहे जमाने में,
हर पल तुम्हारे बारे में ही सोचते हैं।
ना सोचो कि ख्वाब हमारे अधूरे रहेंगे,
सपने हमारे कभी ना पूरे होंगे।
उजाले ही भर देंगे हर कहीं ,
आंखों के सामने न घने अंधेरे होंगे।
हमने अपने सपनों में तुम्हें ही समाया है,
हमारे दिल में जब भी देखा तुम्हें ही पाया है।
तुम कितने भी संगदिल हो ए सनम,
हमने तो पत्थरों को भी मुस्कुराना सिखाया है।
#उड़ान
#क्षणिका
स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
होता है जब तुम्हारा जन्मदिन ,
उमड़ पड़ती है मन में भावना।
सदा खुश रहो अपने जीवन में,
हमारी यही है शुभकामना।
गम ना कभी आसपास रहे ,
हमेशा हंसता खिलखिलाता रहे।
हर खुशी तुम्हारे साथ रहे,
हमारा अपना कभी न उदास रहे।
कहना चाहता हूं बहुत कुछ कह नहीं पाता,
सुनना चाहता हूं बहुत कुछ सुन नहीं पाता।
देखना चाहता हूं बहुत कुछ देख नहीं पाता,
कैसी यह बेबसी है समझ भी नहीं पाता।
लगता है जैसे किसी ने जुबां पर ताला लगा दिया,
किसी ने जैसे कानों में रुई का डाटा लगा दिया।
आंखों पर यह कैसा चश्मा लगा दिया,
सभी ने मुझे बेबसी में उलझा दिया।
ऐसे बेबसी से मैं तंग आ गया हूं ,
अब मैं साहस के संग आ गया हूं।
अब तक सही मैंने असहनीय पीड़ा
अब उठा लिया मैंने दुस्साहस का बीड़ा।
मैं जिंदा हूं तब तक आसमां दूर है मुझसे,
जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे।
एक दिन मैं भी आसमां में समा जाऊंगा,
इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा।
जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,
इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।
सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया
मुझे अपनों के द्वारा लाया गया।
अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,
मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।
तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।
वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।
जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी,
उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।
उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,
मेँ जिंदा हूं तब तक आसमां दूर है मुझसे।
मानव मानव के मध्य संबंधों में,
मधुरता होती कुछ कम कुछ ज्यादा।
नमन है उन नर-नारी को,
जो समझे रिश्तो की मर्यादा।
स्वार्थ लोलुपता भरी हुई है,
कलुषित मानसिकता से हैं सरोबार।
नजर आ जाता है सहज ही,
उनका स्वार्थ भरा व्यवहार।
मानव में यदि मानवता नहीं होगी,
तो समझो मानव में पशुता होगी।
ऐसी पशुतावादी मानसिकता से,
कैसे रिश्तो की मर्यादा होगी ।
# दिनांक 15 /11/ 2022
स्वरचित
सतीश गुप्ता पोरवाल
गोलू का परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़ा परिवार था।उसके पिता मकान में पुताई का एवं मां घरों में बर्तन साफ करने का कार्य करती थी,जिससे बस गुजारा हो पाता था।वे मकबरे के पास ही एक छोटी सी झोंपड़ी में रहते थे।गुल्लू का पीछा करते हुए,अल्प समय में ही यानी एक बरस में ही उसको एक बहिन भी मिल गई थी।बहिन काफी चंचल थी तो उसका नाम उसकी मां ने गोली रख दिया था। दोनों भाई बहिन आपस में खेलते ,लेकिन गोली का जी नहीं भरता और वह पड़ोस में ,उसकी मां जहां बर्तन साफ करती थी,उन घरों के बच्चों के साथ खेलने के लिए पहुंच जाती।उन बच्चों को यह अच्छा नहीं लगता था,वे उसको भगा देते थे। गोली रुआँसी होकर वापस घर आ जाती थी। गोलू ने उसे समझाया कि हमारे बचपन और उनके बचपन में अंतर है। वे बड़े लोग हैं,तुझे साथ में नही खिलाएंगे। गोली उदास हो गई और कहा कि हमारे पास तो कोई खिलौने भी नहीं हैं,उनके पास तो ढेरों हैं।तो गोलू ने कहा कि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि बाजार से खिलौने खरीदे सकें।लेकिन तू चिंता मत कर, मैं तेरे लिए खिलौने बनाने की कोशिश करता हूं। उसने अपने पिता की छेनी,हथौड़ी,कीलों आदि से लकड़ी के टुकड़े लेकर एक खिलौना बना दिया। गोली बहुत खुशी हो गई।गोलू ने इस तरह कुछ और खिलौने बनाए। वे आपस में इन खिलौनों से खेलने लगे ।उन्हें अब किसी और के खिलौनों की जरूरत नहीं थी।उसे अपने भाई पर गर्व हुआ और उसने गोलू को बोला- सुन भैया--"भाई हो तो ऐसा"। गोलू ने पलट कर जवाब दिया--"चल पगली"।
#मां शारदे काव्य मंच
#तीन दिवसीय आयोजन
स्वरचित -'
सतीश गुप्ता पोरवाल
अपने क्या अपने होते हैं ,
या फिर सिर्फ सपने होते हैं।
ढूंढते हैं हम अपनों में अपनापन,
पर मिलता है कभी परायापन।
खून के रिश्ते बने बनाए होते हैं,
उनमें कुछ अपने कुछ पराए होते हैं।
बनाए हुए रिश्ते भी अपने हो जाते हैं,
लगता है जैसे सपने सच हो जाते हैं।
हम तो यही कहते हैं कि,
सब को अपना बना दो।
कोई भी पराया न हो जग में,
खुद जियो और सबको जीने दो।
इंसान इस धरा पर आता नहीं,उसे लाया जाता है। जब वह इस धरा पर आता है तो वह नहीं जानता कि खुशी क्या है और दुख क्या है ।लेकिन आने के बाद ही वह , अनजाने में ही, सुख और दुख से रूबरू होने लगता है। लेकिन जब समझने लगता है तब वह ज्यादा से ज्यादा सुख और कम से कम दुख चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि सुख ही खुशी है।
सुख दो प्रकार के होते हैं एक भौतिक सुख और दूसरा आत्मिक सुख।कुछ लोग भौतिक सुख को ही वास्तविक सुख समझ लेते हैं और धन और दिखावे के पीछे भागते भागते अपने जीवन का अधिकांश समय बिता देते हैं।यह भौतिक सुख उनके चेहरों पर नजर आता है। कुछ लोग आत्मिक सुख को वरीयता देते हुए जीवन में चलते हैं और खुशी उनके चेहरों पर ही नहीं दिल और आत्मा में भी महसूस होती है।तो मैं तो यही कहूंगा कि सबसे बड़ी खुशी आत्मिक सुख से ही मिलती है।कुछ भी करने से हमें दिली खुशी हो,ऐसा तभी संभव लगता है जब लेने की प्रवृत्ति के बजाय किसी जरूरतमंद को देने की प्रवृत्ति हो।कुछ लोग देने में भी दिखावा करते हैं , मंदिर में बड़ा दान देकर अपना नाम लिखवाते हैं। किसी संस्था को दान देकर प्रमाण पत्र प्राप्त करते हैं या आयकर में छूट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं।
मैंने देखा है कुछ लोग देर रात अपनी गाड़ी में खाने के पैकेट या सर्दियों के मौसम में कंबल लेकर चलते हैं और फुटपाथ पर सोए हुए लोगों को चुपचाप दे आते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जरूरत ना होते हुए भी कामगार को काम देते रहते हैं ताकि वह अतिरिक्त धन का उपार्जन कर सके और परिवार का ठीक से पेट भर सके। मैंने स्वयं जरूरतमंदों को सहायता करके यह आत्मिक सुख महसूस किया है और मैं मानता हूं कि देने का सुख ही सबसे बड़ा सुख है।
यही सबसे बड़ा सुख ही जीवन की सबसे बड़ी सच्ची खुशी है।
देखो बिना टिकट का खेल।
आओ बच्चों चलें चौपाटी पर
वहां खाएंगे भेल।
भांति भांति के लोग यहां पर
देखो बिना टिकट का खेल ।
मम्मी ने भेजा मुझको घी लेने को,
घर घर आकर खोला पैकेट तो,
जमा मिला था तेल ।
देखो बिना टिकट का खेल।
अदालत में देखा एक अजूबा,
झूठा था जो वह बच निकला,
सच्चे को हो गई जेल।
देखो बिना टिकट का खेल।
अच्छा हुआ पटरी से दूर खड़े थे,
अपनी ही धुन में मगन खड़े थे,
धड़धड़ाता निकला फ्रंटियर मेल,
देखो बिना टिकट का खेल।
जब हो जाए झगड़ा दो में,
कोई वकील तो अलग कराए,
और कोई कराए मेल।
देखो बिना टिकट का खेल।
मन रे तू काहे न धीर धरे ।
ह्रदय तुम्हारा निर्मल जल सा,
दुनिया निर्मोही दिल में पीर भरे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।
मन तेरा कितना है दया भरा,
दुनिया घाव गंभीर करे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।
जग में तू धैर्यवान कहलाए,
दुनिया तुझे अधीर करे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।
तू पर घावों पर मरहम लगाए,
दुनिया घाव गंभीर करे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।
तेरी गरीबी का कोई उपहास उड़ाए,
पर तू दुनिया को अमीर करे।
मन रे तू काहे न धीर धरे।
रसिक पिया तू ही बता,
जाऊं मैं किस ओर ।
मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं,
मिला ना अब तक कोई छोर ।
रसिक पिया तू ही बता,
जाऊं मैं किस ओर।
रात रात भर जाग रहा,
नींद न आई हो गई भोर।
रसिक पिया तू ही बता
जाऊं मैं किस ओर।
दिल मेरा पतंग बन डोल रहा,
मिली न कोई डोर।
रसिक पिया तू ही बता,
जाऊं मैं किस ओर।
नाहक ही समझाया दिल को,
दिल पर चले ना कोई जोर।
रसिक पिया तू ही बता,
जाऊं मैं किस ओर।
गुमनाम है कोई नामदार है कोई,
नासमझ है कोई समझदार है कोई।
बुरा करके भी नाम कमाता है कोई,
और भला करके भी बदनाम है कोई।
कुछ करने की इच्छा होना जरूरी है,
लक्ष्य तय करके रवाना होना जरूरी है।
लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने से पहले,
दृढ़ निश्चय का होना जरूरी है।
इंसान न तो आसमां को छू सकता है,
और न ही समुद्र की पूर्ण गहराई तक पहुंच सकता है।
माना कि हौसला हो बहुत हो,
लक्ष्य वही निर्धारित हो जो पा सकता है।
इच्छा हो तो बलवती हो,
फिर निश्चय के साथ मंजिल पा सकता है।
ऐसे ही सभी गुणों का इंसान यदि धारण करता है,
तो यही धारण गुमनाम को नाम और पहचान देता है।
इतना आसान कहां है इस दुनिया में,
अपनी सोच के हिसाब से जीना।
और यदि जीना है अपनी ही सोच से,
तो गरल तो पड़ेगा ही पीना।
शिक्षा हो नौकरी या पहनावा,
आसान नहीं है यह सब पा जाना,
कदम कदम पर मिलेगी रोक,
और अनेकानेक तुमको मारेंगे ताना।
जब सोच ही लिया है आजादी से जीना,
तो समझो तीखी धार पर चलना ही होगा,
दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ कर,
अपना लक्ष्य प्राप्त करना ही होगा।
अपना लक्ष्य प्राप्त करना ही होगा।
इंसान जब नजरें उठाकर ऊपर देखता है,
किसी को कौवा,कबूतर या कोयल दिखती है।
किसी की नजर बादलों में अटक जाती है,
और किसी की आसमान तक पहुंचती है।
किसी गिलास में आधी ऊंचाई तक पानी हो,
किसी को आधा भरा किसी को खाली दिखता है।
गुणवत्ता वाला माल धरा ही रहता है,
घटिया हाथों हाथ बिक जाता है।
किसी के ख्याल उम्दा तो किसी के में खोट है,
किसी को घर में किसी को बाहर का शौक है।
जीवन जीने का नुस्खा ही सही खोज है,
सुन ले भैया अपनी-अपनी सोच है।
सुन लो भैया अपनी-अपनी सोच है।
कितने कितने नाम गिनाऊं ,
किस-किस के किस्से तुम्हें सुनाऊं।
दांतो तले उंगली दबा ही लोगे,
कारनामे उनके जब तुम्हें बताऊं।
सत्य तराजू पर उन्हें बैठाऊं,
असत्य के माप पर उन्हें तुलाऊं।
दूर-दूर बैठे हैं छुप कर,
पास उन्हें मैं अपने बुलाऊं।
हम करें क्या तुम्हें अपनी हालत बयां,
हमने हर एक दर्द दबाया कहां-कहां।
मिल नहीं रहा मुकाम न जाने कहाँ खो गया ।
कोई तो है जो आकर राह में काँटे बो गया।
कब से हूं प्रयासरत मुकाम पा जाने को।
लेकिन लगता है जैसे भाग्य ही मेरा सो गया।
स्वरचित- सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।
पंक्ति : आज जो ना हुआ कल उसे देखिए
आज जो ना हुआ कल उसे देखिए।
छुपकर वार करता हो छुपकर उसे देखिए।।
उसकी हर बात पर हां में हां मिलाईये।
फिर अपनी उंगलियों पर नचा कर उसे देखिए।।
अपनी धुन पर मगन होता उसे देखिए ।
जमाने से बेफिक्र होता उसे देखिए।।
उसकी हर बात से नासाज होकर ।
पागल होता हुआ उसे देखिए।।
निगाहें अब तलक तुझे ढूंढती हैं ,
लापता का अब पता पूछती हैं।
जिंदा कर दिया मुझे तेरी दुआ ने,
वरना इंतकाल हो गया था मेरी जिंदगी का।
खड़े-खड़े बस सोचते रहे ,
न इन्कार कर सके न इजहार कर सके।
दिलों के बीच आ गई थी ऐसी दरार,
हम वह दरार न भर सके।
किसी का दामन छोड़ दें , हम वो नहीं,
बीच राह में छोड़ दें , हम वो नही।
जिंदगी भर साथ निभाने का था वादा,
वह वादा तोड़ दें , हम वो नहीं।
संस्कार की ही तो बात है ,
इंसान करता वही जो ज्ञात है।
संस्कार विहीन इंसान के साथ ,
कभी न कभी होता घात है ।
समय का चक्र चला जब घड़ी की दिशा में,
बिछड़े साथी सब संग हुए ।
फिर समय का चक्र चला विपरीत दिशा में,
तो सारे रिश्ते नाते पल में भंग हुए।
कैसा भी हो परायों का खौफ,
इंसान को अक्सर सहन होता है।
जीवन दाव पर लगा देता है,
अपनों का खौफ इतना गहन होता है।
सुनकर खनक चूड़ियों की और झनकार पायल की,
कोई न जाने हालत मेरे दिल घायल की ।
पर क्या करूं दिल भी मानता ही नहीं ,
न ही सुने वह कोई भी बात इस पागल की।
जमीं खो चुका हूं आसमां की तलाश में हूं।
इस बार हार गया तो क्या फिर जीत की आस में हूं।।
मन में रखता हूं विश्वास और लड़ने का माद्दा।
इसीलिए समझता हूं कि मैं विजय के आस-पास हूं।।
फिसलता हूं कभी-कभी राहों में।
यह फिसलन मुझे कभी रोक नहीं पाएगी।
गिरकर उठने पर मिलती है नई ताकत।
अब नहीं हार में फिर जीत की प्यास में हूं।।
अनेक बार हार कर भी अब जीत की प्रयास में हूं।
जमीं खो चुका हूं आसमां की तलाश में हूं।।
स्वरचित-'
सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर।
गायत्री का जन्म एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। विवाह योग्य उम्र हो जाने पर,उसका विवाह, ऐसे ही एक परिवार में, उमेश से हो गया था। उमेश एक कंपनी में साधारण सी नौकरी में था।जैसे तैसे परिवार का जीवन यापन हो रहा था। कालांतर में उनके दो बच्चे हो गए थे,जिनको सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे थे। गायत्री दिनभर घर का दैनिक कार्य करती और उमेश दिनभर कंपनी की नौकरी करके थका हारा घर पर आता और लगभग आराम ही करता रहता। उमेश को मालूम था कि गायत्री सुबह उसके उठने से पहले ही बिस्तर छोड़ देती थी और दिन भर काम करती हुई रात को बिस्तर पर देरी से ही आती थी। लेकिन वह यही सोचता था कि इसमें मैं क्या कर सकता हूं ।
एक बार हुआ यह कि अगले दिन 'बासोड़ा' का त्यौहार था जिसमें एक दिन पहले ही खाना बना कर तैयार रखना पड़ता है। उमेश के काम से वापस आने के बाद सब कुछ वैसा नहीं हुआ जैसे हमेशा होता था।रात को 10:00 बजे के बाद भी जब गायत्री शयन कक्ष में सोने के लिए नहीं आई तो उमेश ने सोचा कि थोड़ी देर में आ जाएगी और वह सो गया। एक घंटे बाद उसकी नींद खुली और उसने देखा कि 11:00 बज गए हैं और अभी तक नहीं आई। बिजली जा चुकी थी और घर में अंधेरा हो रहा था, उसे यह देखकर और आश्चर्य हुआ कि गायत्री अभी तक नहीं आई उसने सोचा कि आखिर ऐसे अंधेरे में वह कर क्या रही है।उसने अपने मोबाइल की टॉर्च से रोशनी की और रसोईघर में जाकर देखा कि गायत्री आटा गूंध रही है और चूल्हे पर पतीले में सब्जी बन रही है। वह पतीले में चम्मच चलाने लगा। गायत्री ने उसे देखा और आश्चर्य से कहा ,अरे आप सोए नहीं ? उमेश ने भरे दिल से कहा - मेरी नींद एक घंटे में ही खुल गई , शायद मुझे यह दिखाने के लिये कि तुम सुबह से रात तक कितना काम करती हो ,धन्य हो गायत्री तुम ।मुझे लगता है कि मुझे भी तुम्हारे काम में हाथ बटाना चाहिए। गायत्री को लगा कि उमेश के दिल की रोशनी टॉर्च के माध्यम से उसके पास पहुंच रही है।उसने खिड़की से बाहर देखा -चांद पर से बादल का टुकड़ा हट चुका था और चांदनी पूरे शबाब से रसोई घर में प्रवेश करने लगी थी।
जीवन की दौड़,जैसे घुड़दौड़।
कोई रहा जोड़ ,कोई रहा तोड़।।
कोई है पुण्यात्मा,कोई पापी।
एक अकड़ रहा,दूजा मांगे माफी।।
गये हम जीत,सुनो मधुमीत।
मैं हूं गीत, तुम संगीत।।
लगाकर ध्यान, सुने सब गान।
नहीं अज्ञान , सभी संज्ञान।।
पहले तोल , फिर बोल ।
जो हो सही,वही हो कही।।
बजाकर ढोल , न खोल पोल।
मीठे बोल , मिश्री घोल ।।
किसी पहर , होगी सहर ।
तुम्हारी नजर , करेगी असर।।
रख ले धैर्य,न हो अधीर।
तुम्हारी जिंदगी,बनेगी नजीर।।
घनघोर सी बरसती बारिश की बूंदों ने,
आज यह कैसा कहर ढाया है।
बाट जोहती मेरी इन आंखों को,
वह अभी तक नजर नहीं आया है।
बादलों के जमघट ने शोर मचाया है,
सूरज ने घबराकर अपना मुख छुपाया है।
आज उससे शायद मिलन ना हो पाए,
यही सोचकर दिल घबराया है।
ऐ घटाओं यदि वह राह में कहीं पर है ,
तो जमकर बरसो बारिश रुक ना पाए।
वह जहां पर हो वहीं पर रहे ,
वापस वहां से से जा ना पाए।
मैं छाता लेकर जाऊंगी उनसे मिलने,
उधर मौसम मेघ मल्हार गाएगा।
इधर छाते के नीचे मेरा दिल,
अपना प्यार पा जाएगा।
धनवान को ढूंढने निकला था इस जग में,
हर इंसान पर बेहिसाब कर्ज निकला।
किसी इंसान में इंसानियत नजर नहीं आई,
हर इंसान यहां खुदगर्ज निकला।(1)
नजाकत इतनी भरी पड़ी है,
कि कोमल कली को भी शरम आ जाए।
ज़रा जो झुके चरण स्पर्श को,
तो नाजुक कमर में लचक आ जाए।(2)
मिलता तो जरूर है चाहे आज या कल,
बहुत ही मीठा होता है मेरे भाई नेकी का फल।
करता जा इस जग में सभी का भला,
तभी तो होगा जग में तेरा जीवन सफल।(3)
इंसान ही कर सकता है ऐसी हरकत,
अलग-अलग होती है उसकी जरूरत।
गिरगिट को ही क्यों बदनाम किया जाए,
देख ली हमने इंसान की बदलती फितरत।(4)
कभी मन में भाव आते हैं कटी पतंग की तरह,
कविता बन आ जाते है नई उमंग की तरह ।
बस इतना ही काफी होता है,
कविता कागज पर उतर जाती है तरंग की तरह।(5)
होता है कभी-कभी आखिर इंसान ही तो है,
किसी छोटी सी बात से डर ही जाता है ।
यही डर उसको हिम्मत दिलाता है तो,
आगे बढ़कर डर से जीत जाता है।(6)
सर्द मौसम पिया घर तो आओ अभी ,
झूठे वादे करके न तड़पाओ कभी।
अभी नहीं तो आओ जब फुर्सत मिले तभी ,
कुछ बातें बतानी हैं जो हैं दिल में दबी।(7)
दो जून रोटी की खातिर सदा सफर में रहा,
इस तरह सदा ऊँचा अपनों की नजर में रहा।(8)
समय भी किस तरह ढा कहर रहा,
कब से भटकता मैं दर बदर रहा।(9)
प्यार के अफ़साने तो पुराने हुए,
लोग अब नफ़रतों के दीवाने हुए।
आ जाओ ना यार अब तो,
किसी से गले मिले ज़माने हुए।(10)
यह कागज की कश्ती कहीं तो जाकर रुकेगी,
या तो भंवर में फंसेगी या कहीं जाकर डूबेगी।
कितना भी इतरा ले इंसान इस जमाने में
एक दिन तो उसकी राख जमीं को चूमेगी। (11)
कुछ लोग गुजारते हैं जीवन को ऐसे,
मुफ्त में ही मिल गया हो उनको जीवन जैसे।
वे नहीं जानते कितना बहुमूल्य है,
यह जीवन फिर दोबारा नहीं मिलता।
डूब जाती है किसी की कश्ती मझधार में ही,
उस बदनसीब को किनारा नहीं मिलता।
जब सितारे हों किसी के गर्दिश में,
तो डूबते को तिनके का सहारा नहीं मिलता।
स्वरचित --
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
चलते चलते थक गए हो ,
चलो थोड़ा सुस्ता लिया जाए ।
राहों में रुकावट आती हैं तो आएं,
दृढ़ निश्चय से इन्हें पार किया जाए।
आसमान पर नजर टिकाना ठीक नहीं,
नजर को जमीन पर उतार लिया जाए।
क्यों खिंचे-खिंचे रहते हो एक दूसरे से,
एक दूसरे के दिल में समा लिया जाए।
जमाने में जो भी लगे हमें अच्छा,
क्यूं ना उन्हें अपना लिया जाए।
यूं अनजान बनकर किसी भी राह पर चल दिए,
पहले मंजिल को समझ लिया जाए।
गम के फसाने बहुत सुन लिए,
चलो खुशी का तराना गुनगुनाया जाए।
गम तो साथ है ही,
क्यों न थोड़ा मुस्कुरा कर जिया जाए।
#पंक्ति :: लूट पर लूट का अब चलन देखिए
स्वरचित -
सतीश गुप्ता 'पोरवाल', जयपुर।
किसी का बेतरतीब तन न देखिए।
देखना है तो उसका मन देखिए।।
हालात पर उसके तरस खाइए।
उसका उजड़ा हुआ चमन देखिए।।
रोज-रोज मर्यादाओं का हनन देखिए।
कुत्सित विचारों का खनन देखिए।।
हालात तो यह है जमाने की।
सच पर झूठ का कफन देखिए।।
करते हैं कैसे झूठ को नमन देखिए।
जो करते नहीं वह कथन देखिए।।
किस किस पर यकीन करें आखिर।
लूट पर लूट का अब चलन देखिए।।
जिंदगी के हर कदम पर हर मोड़ पर मुस्कुराए जा,
सुन मेरे भाई जीवन की माला में खुशियों के मोती पिरोए जा।
दुनिया यह जाल है उलझ न जाऊंगा,
सामने पहाड़ है टकरा न जाऊंगा।
ऐसा न सोच यह तो बातों का जाल है,
सामने तो तिल है पर लगता पहाड़ है।
अरे सपनों से न डर सपने तो अपने हैं,
तू व्याकुल से दिल में सपनों की महफिल सजाए जा।
सुन मेरे भाई- - - -
पीड़ा का द्वार आए उसे न बंद कर,
बाहों में बल है उससे तू द्वंद कर।
पीड़ा हट जाएगी रास्ता दिख जाएगा,
सपनों की मंजिल को तब ही तू पाएगा।
मुसीबतें तो बहुत हैं जीवन की राहों में,
रुकना न भूलकर उनसे तू टकराए जा।
सुन मेरे भाई- - -
दुनिया की बातों से क्यों तू डर रहा,
अमृत के प्याले को समझ क्यों जहर रहा।
रास्ते अनेक हैं दुनिया के मेले में,
फिर क्यों तू पड़ रहा एक ही झमेले में।
साज़ों के ढेर हैं इन्हें ना देख तू,
अपने ही दिल का साज तू बजाए जा।
सुन मेरे भाई- - - -
समय तेरे साथ है उससे तू प्यार कर,
राह तुझे दिखाएगा उससे न तकरार कर।
बढ़ता ही जा मंजिल को पा जाएगा,
पीछे न देख वरना पिछड़ तू जाएगा।
बढ़ गया है आगे तू राहों को पार कर,
पर पिछड़े हैं जो उन्हें भी गले से लगाए जा।
सुन मेरे भाई- - -
कंचन की दुनिया में व्याकुल हो तू खड़ा,
जान रहा हूं किस मोह में है तू पड़ा।
निर्मोही हो कितने ही पापों कि यह जड़ है,
मानव की राहों में यही तो एक अड़चन है।
निगाहें हटा ले चाहत न इसकी कर,
माया का भाव आये उसे तू ठुकराए जा।
सुन मेरे भाई - - - -
बातों के जाल से हवाई किले न बना
बातों से होता क्या यह मुझे न सुना।
कर्म कर मर्म इसका जान ही ले,
जो अब तक खोया उसे अब पा ही ले।
बहुत कुछ खोया चोट दिल पर आई होगी,
गम न कर चोटिल दिल को होले होले सहलाए जा।
सुन मेरे भाई- - - -,
दुनिया है यह समझ न इसको पाएगा,
सोचेगा जितना उतना ही उलझ तू जाएगा।
दुनिया चाहेगा जैसी बन जाएगी,
तेरे ख्वाबों की झोली खुशियों से भर जाएगी।
गम जो आए अगर गमगीन न हो,
मेरी तरह तराने झूम के सुनाए जा।
सुन मेरे भाई जीवन की माला में, खुशियों के मोती पिरोए जा।
किसी भी चीज के टिके रहने के लिए आधार जरूरी है। आधार जितना मजबूत होगा तो वह चीज उतनी ही स्थिरता, सुगमता से और अधिक से अधिक समय के लिए टिकी रहेगी।
आइए इस चीज को रिश्ता समझ कर , इसी संदर्भ में हम आगे बात करते हैं ।
हम देखते हैं कि रिश्ते कुछ तो होते हैं और कुछ बनाए जाते हैं । रिश्ते जो होते हैं वे हमारे जन्म के साथ जुड़े हुए होते हैं और जो बनाए जाते हैं उनका जन्म के बाद सृजन होता है । सभी रिश्तो में मिठास की अत्यंतआवश्यकता होती है। लेकिन आज के परिवेश में हम देखते हैं कि रिश्ता कोई सा भी हो,कभी न कभी किन्ही के बीच दरार आने लगती है। और अति होते टूट भी जाते हैं। आखिर क्यों होता है ऐसा?
निस्वार्थ भाव से,बिना किसी दंभ
के,दूसरे को सम्मान देते हुए, धैर्य धारण करते हुए , हम चलते चलें तो ये रिश्ते अटूट हो जाते हैं। लेकिन देखा जाता है कि किसी न किसी में , किसी न किसी प्रकार की कमी आ जाती है और और रिश्ते दरकने शुरू हो जाते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि सभी रिश्तो को संभाल कर रखें और किसी भी तरह से न दरकने लगें और टूटन तक न पहुंचे ।
रिश्तो में हिमालय सी ऊंचाई और सागर सी गहराई है।
सही में रिश्ते, हमारे जीवन के आधार हैं।
यूं तो कमल जेंटलमैन दिखाई देता था, पढ़ा लिखा था, नौकरी भी अच्छी थी लेकिन उसका लालन-पालन अच्छे परिवेश में नहीं हुआ था। अतः संस्कार भी उसी प्रकार के मिले थे।
उसका बात करने का लहजा किसी को पसंद नहीं आता था।ऑफिस में भी अपने मातहत से "क्यों रे क्या कर रहा था" इस लहजे में बात करता था। अपनी पत्नी को "तुम्हारे अंदर दिमाग भी है कि नहीं , मैंने तुमसे कहा था कि ऐसे करना है और तुमने कैसे कर दिया, सारा गुड़ गोबर करके रख दिया, थोड़ा दिमाग का उपयोग किया करो"। बच्चों को भी इस कदर डांट लगाता था "खबरदार जो फिर से ऐसा किया , थप्पड़ मार-मार कर गाल लाल कर दूंगा"। उसके इस तरह से बात करने के सलीके से सभी परेशान थे,और यह तथ्य सही है कि परेशान व्यक्ति को वह सम्मान नहीं मिल सकता जो वह चाहता है।सभी कमल से कन्नी काटते थे ।
एक दिन मोहल्ले में एक आयोजन था।वहां पर कमल पहुंचा लेकिन किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, सभी ने उसको नजरअंदाज किया। कमल का मित्र रवि भी वहां मौजूद था। रवि उसके पास आया और उसको लेकर अन्य लोगों की तरफ गया।सबने रवि से तो बात की लेकिन कमल की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया , सबने उसे नजरअंदाज किया। रवि इस बात को भांप गया और कमल से कहा कि तुम्हें कुछ अजीब नहीं लग रहा,कोई भी तुमसे बात नहीं कर रहा है। तो कमल ने कहा कि हां मैं भी देख रहा हूं। मैं चाहता हूं कि लोग मुझसे बात करें लेकिन हर कोई मुझसे दूर होता जा रहा है।तब रवि ने उसको समझाया कि तुम नाम के ही नहीं वैसे भी कमल हो लेकिन तुम कीचड़ में फंसे हुए हो,इससे बाहर निकलोगे तो लोग तुम्हें पसंद करेंगे। जब कमल ने पूछा कि वह कैसे ? तो रवि ने समझाया कि तुम्हारे बात करने का सलीका बहुत गलत है। तुम यह सोचो कि इसी तरह सामने वाला तुमसे बात करेगा तो तुम्हें कैसा लगेगा। यदि तुम यह समझ लोगे तो तुम्हारे व्यवहार में परिवर्तन आ जाएगा।तुम सब से सम्मान से और इस तरह से बात करोगे कि सामने वाले को ठेस ना लगे तो तुम्हें भी सम्मान प्राप्त होगा और कोई भी नजरअंदाज नहीं करेगा।
यह बात याद रखो कमल कि "लफ्जों के बरतने का सलीका जरूरी है।"
कमल को यह बात समझ में आ गई, और रवि को उसमें परिवर्तन के संकेत नजर आने लगे ।
हरसू गांव का एकलौता कुम्हार था। आस-पास के गांव में और कोई कुम्हार नहीं था,अतः इस के बनाए हुए मिट्टी के घड़े, दीपक आदि खूब बिकते थे।उसका परिवार हंसी-खुशी अपना जीवन यापन कर रहा था।पर यह हंसी-खुशी संपूर्ण नहीं थी।एक कमी थी जो उनको और उसकी पत्नी को बहुत खल रही थी। शादी को 10 वर्ष हो जाने के बावजूद भी उनको कोई औलाद नसीब नहीं हुई थी। बहुत हकीमों के चक्कर लगाए , मंदिरों में मन्नतें मांगी। आखिरकार सफलता मिली और उन्हें एक बच्चे की सौगात मिली। परिवार मैं खुशी का माहौल हो गया था।बच्चे का नाम मनकु रखा गया। उसे बहुत लाड-प्यार से पाला जा रहा था।धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता गया ,उसको उसके पिताजी के मटके, दिए बनाते देख बड़ा आश्चर्य होता था और वह भी उनके साथ काम करने का प्रयत्न करता।उसके कपड़े मिट्टी में सन जाते तो उसकी मां उसे बहुत डांटती , उसने मनकू ने सोचा कि कपड़े नहीं पहनूँगा तो डांट भी नहीं पड़ेगी और वह,वैसे ही,इसी अवस्था में पिता के काम में आनंद लेने लगा। वह अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही,इसी अवस्था में, खेलने लगा । उसके दोस्त उसका मजाक करने लगे तो उसका स्वाभिमान जाग उठा और वह अपने दोस्तों को ललकारने लगा। दोस्त भी कम नहीं थे वे कहते तू क्या है हमारे सामने, चुप रह। तो उसने वहीं पास के मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ ईटें जमाई और इस तरह से बैठ गया जैसे बादशाह हो। दोस्त हंसने लगे और पूछा ,अरे भैया तू है क्या यह तो बता ? तो उसने कहा कि रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं और- - ,बीच में ही बच्चे बोल उठे बस,बस रहने दे ज्यादा डायलॉग मत सुना। मनकु ने फ़िर कहा कि मैं ही बादशाह हूं और तुम्हारी फरियाद सुनना चाहता हूं। उसके आत्मविश्वास के सामने उसके दोस्तों को चुप होना पड़ा और वह खिल खिलाकर हंस पड़ा ,और बार-बार कहने लगा हम बादशाह हैं , हम बादशाह हैं । सच है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आत्मविश्वास हो तो वह सफलता की ओर अग्रसर होगा ही होगा।
जब जब भी मैं किताब पढ़ता हूं,
साथ में चाय की प्याली मुझे बहुत भाती है।
जब भी ऐसा होता है तब मैं किताब पढ़ता हूं,
और कभी किताब मुझे पढ़ाती हैं।
लगातार जब मैं किताब पढ़ता हूं,
तो बहुत जल्दी ऊब जाता हूं।
उसी तरह लगातार चाय पीने से भी,
पीता-पीता ऊब जाता हूं ।
लेकिन जब दोनों का साथ मिल जाए,
तो सोने में सुहागा हो जाता है।
पढ़ने में मन भी लगता है,
और याद भी होता जाता है।
कभी-कभी सर्दी के समय,
अलाव का इंतजाम हो जाए।
इन तीनों का साथ जब भी हो जाए,
तो समझो पढ़ने का मजा कैसा हो जाए।
न बातें निराधार बनाती है,
नाराजगी न दिल में बसाती है।
जो भी कहते हैं करती रहती है,
मकान को घर वही बनाती है।
न जाने इतनी ऊर्जा कहां से लाती है,
कभी कोई बहाना नहीं बनाती है।
कितना भी काम हो घर का
हंसी खुशी से निपटा देती है।
छोटों को प्यार बड़ों को सम्मान देती है,
बदले में इसके न कुछ लेती है।
यदि कुछ अधिक भी करने को कहा जाए,
तो अभी करती हूं यही कहती है।
कभी गम खाती और आंसू पीती है,
कभी भी ना आंखें नम बनाती है।
भागदौड़ वाली जिंदगी आखिर किसे सुहाती है,
लेकिन यही भागदौड़ तो जिंदगी बनाती है।
इंसान जब भी इस दुनिया में आता है,
बिना समझ के नासमझ ही रहता है।
उसे किसी से कोई मतलब नहीं रहता,
बस अपने में ही रमता रहता है।
कुछ बड़ा होने पर उसे लगता है,
दुनिया में आए हैं तो कुछ तो करना ही पड़ेगा।
कुछ पढ़ना पड़ेगा कुछ करना पड़ेगा,
यानी भागना दौड़ना तो करना ही पड़ेगा।
भागदौड़ से ही किसी की जिंदगी बनती है,
भागदौड़ ही सफलता की सीढ़ी बनती है।
#मुझे भी दो मेरा अधिकार
स्वरचित--
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
मुझे नहीं है तुम्हारी हर बात स्वीकार,
तुम समझ नहीं पाते हो कहा बारम्बार।
मैं भी कुछ कहना चाहता हूं तुमसे,
कहने का मुझे भी दो मेरा अधिकार ।
मैं नहीं चाहता आसमां की ऊंचाई नापना,
न चाहता हूं सागर की गहराई जांचना।
लेकिन समझ लो जो मैं जानता हूं,
दुनिया के दिलों में क्या है भावना।
तुम कहां हो और जमाना कहां है ,
तुम वहीं हो तुम जहां थे ।
बीमार मानसिकता से ग्रस्त हो इतना,
समझते हो जैसे खुद शहंशाह हो।
अब तो मेरा मौसम खुशगवार कर दो,
प्यार से प्यार का व्यापार कर दो।
मेरा दिल जो सूना सूना सा है,
उसमें अपना भरपूर प्यार भर दो।
अब मेरे विपरीत विचारों को करो निराधार,
जो नहीं किया अब तक कर दो इस बार।
तुम्हें तुम्हारा अधिकार हो मुबारक,
मुझे भी दो मेरा अधिकार ।
अंतरात्मा से जो आवाज उठती है सुनता हूं मैं भी।
स्वरचित-
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
अपनी सोच विशाल रखता हूं मैं।
अपने प्रश्नों को संभाल रखता हूं मैं।
मेरी सोच से कोई सहमत हो या ना हो।
अपनी सोच कमाल रखता हूं मैं।
किसी की आशाएं तार तार हो जाती हैं।
यूं समझिए कि बेकार हो जाती हैं।
नहीं हो सकती हैं कभी भी पूरी।
जब आशाएं बेशुमार हो जाती हैं।
खोजता हूं मैं कभी ऊंचे पहाड़ों में।
कभी जमीन पर भी तलाशता हूं मैं भी।
कभी समंदर में गोते लगाकर।
बहुमूल्य मोती चुनता हूं मैं भी।
व्यर्थ की बातों में कभी नहीं उलझता।
सही-सही के लिए सिर को धुनता हूं मैं भी।
जीवन के रंगीन धागों से ख्वाबों की चादर बुनता हूं मैं भी।
अंतरात्मा से जो आवाज उठती है सुनता हूं मैं भी।
स्वरचित-
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
सागर की गहराई जैसा दुखों का अंबार है।
या कहिए कि हिमालय जैसा दुखों का पहाड़ है।
बड़ी मुश्किल से मिलती है खुशियां इस जमाने में।
खोना नहीं , खुशियां संभाल कर रखना।
मानव मन की आशाएं आसमां तक पहुंचती हैं ।
मन ही मन बड़े बड़े ख्वाब बुनती हैं।
ये ख्वाब कभी तो पूरे हो सकते हैं।
इन ख्वाबों को संभाल कर रखना।
बड़े महीन और नाजुक होते हैं रिश्ते।
जरा जरा सी बात पर बिगड़ जाते हैं रिश्ते।
थोड़ा गम खा लो थोड़े आंसू पी लो।
लेकिन इन रिश्तों को संभाल कर रखना।
आपस ही आपस में बातें हजार होंगी।
कुछ अच्छी और कुछ नागवार होंगी।
यह जबान ही तो है जो मिठास घोल सकती है।
इस जबान को संभाल कर रखना।
स्वरचित--
सतीश गुप्ता 'पोरवाल' ,जयपुर।
प्रफुल्लित हैं सब हर्षित समाया है सबके हिये,
आ गया है आज पावन त्यौहार सबके लिये।
किसी का न अपना घर रहे सूना,
आओ सजाएं दीपमाला प्रिये ।
अमावस का चांद कितना ही करना चाहे अंधियारा,
पर जनमानस कर दे उतना ही उजियारा।
चांद को अंगूठा दिखाएं हजारों दीये,
आओ सजाएं दीपमाला प्रिये ।
प्रेम के धागों से एक दूसरे से जुड़े रहें ,
एक दूसरे की मुसीबत में साथ खड़े रहें।
हमेशा बने रहें हम एक दूजे के लिये,
आओ सजाएं दीपमाला प्रिये ।
# खुशियों का दीप जलाएं
स्वरचित
सतीश गुप्ता 'पोरवाल',जयपुर।
दुखती रग को सहलायें,
मलिन चेहरों पर मुस्कान लायें,।
भूखे पेट को भोजन दिलाएं
खुशियों का दीप जलाएं।
सबके मन में हो समता का भाव,
स्वच्छ सरल हो सभी का स्वभाव।
आओ हाथ से हाथ मिलाएं ,
खुशियों का दीप जलाएं।
हर घर की देहरी हो खुशहाल,
कोई न हो देश में फटे हाल।
माली हालत सबकी सुधारें,
खुशियों का दीप जलाएं।
स्वस्थ तन और स्वस्थ मन हो,
सभी के हृदय में खुशियां भरी हों।
सभी दिवाली भरपूर मनाएं
खुशियों का दीप जलाएं।
#कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो
स्वरचित--
सतीश गुप्ता 'पोरवाल',जयपुर।
मन में आते भावों को कोई रोक रहा,
सुषुप्त से दिल को कोई झकझोर रहा।
जीवन की खुशियों को जैसे कोई लूट रहा हो,
कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।
जीवन में खुशियां ही खुशियां मांगी,
फिर यह गम कहां से आन पड़ा।
कौन मेरी खुशियों में अवरोध बना है,
अभी तक यह न जान पड़ा।
लगता है जैसे दिल के धन को कोई लूट रहा हो,
कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।
सरोवर में कमल कुंज देख मन खिलता था,
मन मयूर तो जैसे नाच उठता था।
अब तो जीवन में ऐसा ही लगता है,
जीने को अब कुछ भी नहीं बचता है।
लगता है हर शख्स जैसे हम को लूट रहा हो ,
कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।
ऊपर वाले ने यह दुनिया बनाई,
वह है सबसे बड़ा कारीगर ।
तरह-तरह के करतब करवाता इंसानों से,
वह तो है सबसे बड़ा बाजीगर।
कभी-कभी तो अचरज हो जाता,
न होता विश्वास किंचित भी।
देखने वाले हतप्रभ हो जाते
ऐसा जादू दिखाता जादूगर।
कभी-कभी जब हम घिर जाते,
सांसारिक दुखों में पड़ जाते।
तो वही हमें राह दिखाता,
सोचो क्या होता सर्व शक्तिमान नहीं होता अगर।
साथ है अपना जनम जनम का ,
यह जनम यूं ही न जाए बीत।
संग संग जीना है हमको ,
साथ निभाना मीत।
सपने हमने संग संग देखे,
एक दूजे से वादा करके।
जग से हटके हमारी प्रीत,
साथ निभाना मीत।
दिल से दिल की बात हुई,
फिर शुरू मुलाकात हुई ।
यही जगत की रीत,
साथ निभाना में मीत।
जग चाहे दुश्मन हो जाए,
पर अपने तो साथ निभाए।
फिर होती प्यार की जीत,
साथ निभाना मीत।
स्वरचित --
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
इश्क में वादे तो हजार किए ,
मेरे दिल के गुल गुलजार किए,
पर मेरी चाहत नजरअंदाज करके,
वादे नीलाम सरे बाजार किए।
तुझसे मिलने को तरसता था मैं,
जार जार इंतजार करता था मैं।
ए बेवफा तुम्हारा सितम तो देखो,
वादाखिलाफी के दौर बार-बार किए।
आसमा की ओर टकटकी लगाए रहता,
अब अक्सर नहीं होश में मैं रहता।
पर तूने मेरे दिन पतझड़ जैसे
और खुद के तो बहार किए ।
मेरी तो जो हालत होनी थी हो ली,
लगता हूं जैसे बिना कहार के हो डोली।
तूने तो अपने दिन खुशगवार किए,
मेरे ही दिन क्यों सूने त्यौहार किए।
तारीख खुद को फिर दोहराती है।
सीने में तूफान और आंखों में आंसुओं का सैलाब,
तुम्हारे उत्पीड़न की कहानी सुनाती है।
जो करेगा ऐसा उसे मिलेगा वैसा ही
नियति तो हमें यही बताती है।
पूनम की रात में चांदनी में नहाते हो,
फिर अमावस्या तक मलीन हो जाते हो।
ना सताओ किसी को किसी भी तरह,
क्या तुम्हें खुद इस तरह करनी सुहाती है।
समय का चक्र चलता ही रहता है,
नियति किसी के रोके कहां रुकती है।
घड़ी की सुई हो या कर्मों की सजा,
तारीख खुद को फिर दोहराती है।
जब भी देखता हूं सामने खुला आसमान,
मेरे भी दिल में उठता है एक तूफान।
मिलेगी मुझे भी एक दिन तो मंजिल,
या धरे रहेंगे मेरे यूं ही अरमान।
मेरे पंखों में भी है भरपूर जान,
भर सकता हूं मैं भी ऊंची उड़ान।
पर क्या करूं मुझे पिंजरे में कैद कर लिया,
इंसानों ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया।
ए दुनिया के लोगों कुछ तो सोचो,
यूं ही मेरे पंखों को न नोचो ।
अब तुमने सुनकर मेरी फरियाद
मुझे कर ही दिया है आजाद।
अब मैं खुले आसमान में भरुंगा उड़ान,
मेरा भी जीवन होगा उन्मुक्त और आसान।
दीपक जलाओ , दीपक जलाओ,
एक नहीं अनेक जलाओ।
पूर्ण नहीं तो कुछ तो,
आसपास उजियारा फैलाओ।
बेशक दीपक तले अंधेरा होता है,
लेकिन यह औरों के लिए ही तो जलता है।
जलता तो है खुद ही
रोशनी औरों को देता है ।
मानव मात्र को भी,
ऐसा ही समझना होगा।
जैसे दिए से दिल में,
प्रेम की है बाती है,
वैसे ही लोगों को प्रेम की बात
क्यों नहीं सुहाती है।
कर लें हम भी यही निश्चय,
स्वयं को आलोकित करके,
अन्य को आलोकित करेंगे।
सारी दुनियां को प्रेम से भरेंगे।
#स्वरचित --
सतीश गुप्ता 'पोरवाल' ,जयपुर।
सोच समझ कर कोई नहीं आता इस दुनिया में,
लाया जाता है या कहें कि बुलाया जाता है।
क्या है और क्यों है इस दुनिया में,
सोचे तो भी समझ नहीं पाता है।
जो कुछ उसे सिखाया जाता है ,
वह वही सीखता जाता है।
सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ता जाता है,
उम्र की राह में कदम आगे बढ़ाता है।
कुछ अजीब सी कहानी कहती है,
यह दुनिया वैसे भी नहीं जैसी लगती है।
नाजुक से मसले सामने आ जाते हैं,
दिल और दिमाग को उलझा जाते हैं।
रिश्ते नाते एक धुरी पर टिके हुए हैं,
कुछ कम कुछ ज्यादा तुले हुए हैं।
कहीं-कहीं उलझन में उलझ जाता है,
उलझ कर मन को उलझा जाता है।
अब तो बस एक ही विचार मन में आता है,
आकर बार-बार वही दोहराता है।
अपना पराया होकर कहीं रुठ न जाए,
जिंदगी आईने की तरह टूट न जाए।
स्थितियां ऐसी हो जाती है कभी-कभी,
दिल को नहीं भाती कोई भी खुशी।
वेदना से त्रस्त हो जाता है दिल,
हर आंख नजर आती है झुकी झुकी।
कभी-कभी अपना ही कष्ट होता है,
जो अपनी आंखों में आंसू ला देता है।
हां कभी दूसरों का भी कष्ट देखा नहीं जाता,
और वेदना से दिल भर जाता है।
कभी ख़ुशी कभी ग़म का चक्र चलता रहता है,
इसी उहापोह में वक्त गुजरता जाता है।
स्वरचित -सतीश गुप्ता 'पोरवाल' जयपुर।
दुनिया में चाहे कोई साथ दे ना दे,
किसी भी स्थिति में नहीं घबराना है।
अकेले थे अकेले हैं और ,
अकेले ही सफर करना है ।
कोई सोचता है कोई नहीं सोचता,
सोच सोच में फर्क होता है।
पूछ लो गर किसी से कैसा है,
किसी को अच्छा और किसी को बुरा लगता है।
जमाने की बातें है जैसे भूल भुलय्यां,
अच्छा भला इंसान भी घूम जाता है।
दिमाग हो जाता है घनचक्कर ,
करना क्या है समझ नहीं पाता है।
सोच समझकर यदि फैसला किया है,
चल चला चल यही मंत्र काम आएगा।
सही समय पर सही दिशा में चलने वाला,
निश्चित ही दुनिया में नाम कमाएगा।
सोच समझकर जो फैसले पर चल दिया है,
तो तुमने सही में सही जीवन जिया है।
अब तो बस आनंदित हो मौज करना है,
अकेले थे अकेले हैं और अकेले ही सफर करना है।
स्वरचित--
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
सच बताएं आज तो मेरे भाग्य ही खुल गए,
नित्य कर्म तो जैसे आज हिल डुल गए।
श्रीमती ने कहा उठोजी भोर हो गई,
नहीं उठे तो हमें झकझोर गई।
हम हड़बड़ाकर उठे जाने लगे बनाने को चाय,
वह बोली आज तो मैं बनाऊँगी नहीं तो लगेगी हाय।
हमारी उनिंदी आंख तब झपकने लगी,
जब वह पैर छूने के लिए झुकने लगी।
हमने कहा श्रीमती जी आज सूरज कहीं और से उगा है,
जो तुम्हारा सर मेरे कदमों में झुका है।
वह सीरियल की बहू की तरह से मुस्कुराई,
आज करवा चौथ है यह बात धीरे से बोलकर बताई।
हाथ झुके तो उसका कंगना खनका,
उसका बताना था कि हमारा माथा ठनका।
मतलब आज मैं राजा एक दिन का,
और फिर गुलाम रहूंगा हर दिन का।
लेकिन खुशी भी कम नहीं थी मन में
साल में एक दिन तो आता है जीवन में।
आज तो फरमाइशें करेगी सजेगी धजेगी
और हमारी जेब की तो पुंगी बजेगी।
वह बोली पत्नी क्योंकि करवा चौथ का व्रत रखती है,
इसीलिए तो पति की उम्र साल दर साल बढ़ती है।
यह व्रत मैं तुम्हारे लिए ही तो करती हूं,
तुम्हे तो लगता होगा अहसान ही करती हूं।
मुझे मालूम है पुरुष सभी पत्नी का सम्मान करते हैं,
लेकिन फिर भी मजाक मजाक में तो वही कहते हैं।
करवा चौथ रखकर एहसान करती हैं,
उम्र भर फिर हमको परेशान करती हैं।