ठहरी हुई जिंदगी आखिर कब तक जिएंगे,
कब तक एक ही घेरे में घिरे रहेंगे।
जिंदगी ठहरे पानी सी हो गई है।
चलो अब कहीं बाहर निकलेंगे।
अकेलापन बहुत बोझिल सा लगता है,
चलो इस बोझ को हटा दें।
दिलों में जो आ गई है मलीनता,
कुछ ऐसा करें इसे मिटा दें।
हम ही कहीं बाहर जाएंगे तो रहेगा अकेलापन,
अपने आप से नहीं लगेगा मन।
तो चलो इस अकेलेपन को मिटाने को,
करते हैं कोई नया जतन।
चलो अब निकलते हैं घर से बाहर,
नई नई जगह देखते हैं कहीं जाकर।
हम भी हैं तुम भी हो वो भी हैं,
चलो सफर पर निकलते हैं मिलकर।
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