हम दुनिया की तरह भेड़ चाल नहीं चलेंगे,
दूसरों का रास्ता अलग हम अपने रास्ते चलेंगे।
चुनेंगे हम उसे नहीं जो धन के पीछे चले,
हम संपत्ति नहीं संस्कार जिएंगे ।
इस दुनिया में आने की किसे थी दरकार,
किसी को यहां बुलाने की किसने की पुकार।
शायद न दरकार हो और न पुकार,
लेकिन हर कोई आ जाता है हर बार।
जिसे नहीं फ़िक्र परिवार या जमाने की,
उसे नहीं होती फिक्र इज्जत कमाने की।
जो अपनों से ही पेश आये बेअदबी से,
उसे सजा दी जाए सताने की।
संस्कारहीन लोगों को बढ़ने को मौका थोड़ा है,
ऐसे लोगों ने अपनों को भी कहां छोड़ा है।
ऐसे ही लोगों के लिए कहा जा सकता है,
कि यह तो 'काणा है और खोड़ा' है।
राह चरित्र की तज जो भी चलेंगे,
उनके संग हम हलाहल नहीं पिएंगे।
धन का लालच नहीं हमें किंचित भी,
हम संपत्ति नहीं संस्कार जिएंगे।
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