इंसान इस धरा पर आता नहीं,उसे लाया जाता है। जब वह इस धरा पर आता है तो वह नहीं जानता कि खुशी क्या है और दुख क्या है ।लेकिन आने के बाद ही वह , अनजाने में ही, सुख और दुख से रूबरू होने लगता है। लेकिन जब समझने लगता है तब वह ज्यादा से ज्यादा सुख और कम से कम दुख चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि सुख ही खुशी है।
सुख दो प्रकार के होते हैं एक भौतिक सुख और दूसरा आत्मिक सुख।कुछ लोग भौतिक सुख को ही वास्तविक सुख समझ लेते हैं और धन और दिखावे के पीछे भागते भागते अपने जीवन का अधिकांश समय बिता देते हैं।यह भौतिक सुख उनके चेहरों पर नजर आता है। कुछ लोग आत्मिक सुख को वरीयता देते हुए जीवन में चलते हैं और खुशी उनके चेहरों पर ही नहीं दिल और आत्मा में भी महसूस होती है।तो मैं तो यही कहूंगा कि सबसे बड़ी खुशी आत्मिक सुख से ही मिलती है।कुछ भी करने से हमें दिली खुशी हो,ऐसा तभी संभव लगता है जब लेने की प्रवृत्ति के बजाय किसी जरूरतमंद को देने की प्रवृत्ति हो।कुछ लोग देने में भी दिखावा करते हैं , मंदिर में बड़ा दान देकर अपना नाम लिखवाते हैं। किसी संस्था को दान देकर प्रमाण पत्र प्राप्त करते हैं या आयकर में छूट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं।
मैंने देखा है कुछ लोग देर रात अपनी गाड़ी में खाने के पैकेट या सर्दियों के मौसम में कंबल लेकर चलते हैं और फुटपाथ पर सोए हुए लोगों को चुपचाप दे आते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जरूरत ना होते हुए भी कामगार को काम देते रहते हैं ताकि वह अतिरिक्त धन का उपार्जन कर सके और परिवार का ठीक से पेट भर सके। मैंने स्वयं जरूरतमंदों को सहायता करके यह आत्मिक सुख महसूस किया है और मैं मानता हूं कि देने का सुख ही सबसे बड़ा सुख है।
यही सबसे बड़ा सुख ही जीवन की सबसे बड़ी सच्ची खुशी है।
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