बुधवार, 2 नवंबर 2022

लूट पर लूट का चलन देखिए-- कविता


#पंक्ति :: लूट पर लूट का अब चलन देखिए

 स्वरचित -

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल', जयपुर।


किसी का बेतरतीब तन न देखिए।

 देखना है तो उसका मन देखिए।। 

 हालात पर उसके तरस खाइए।

 उसका उजड़ा हुआ चमन देखिए।।


रोज-रोज मर्यादाओं का हनन देखिए। 

  कुत्सित विचारों का खनन देखिए।।

 हालात तो यह है जमाने की।

 सच पर झूठ का कफन देखिए।।


करते हैं कैसे झूठ को नमन देखिए।

  जो करते नहीं वह कथन देखिए।।

किस किस पर यकीन करें आखिर।

 लूट पर लूट का अब चलन देखिए।।



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