मंगलवार, 22 नवंबर 2022

जलता हुआ गुलाब -- कविता

 वे भी क्या दिन थे जब हाथ में हाथ डाले चलते थे,

एक दूसरे के दिल की बातें किया करते थे।

 हम एक दूसरे के दिल में समाते थे,

  जनम जनम का साथ निभाने की कसमें खाते थे।

 न देखूँ तुझे तो न आता था मुझे करार,

 तुझे भी नहीं था इस बात से कतई इंकार।

 लेकिन अखिर यह क्या हुआ अचानक,

 ऐसा क्यों हुआ मंजर भयानक।

  तू मुझसे दूर होती चली गई,

 मैं याद करता रहा तू मुझे भूल गई।

  मुझे याद है जब हमारी मोहब्बत शबाब पर थी,

 तेरे हाथों में मेरे लिए डाली गुलाब की थी।

अब जब तूने मुझे सिरे से भुला दिया,

 तो हमने भी वह गुलाब जला ही दिया। 

 अब तू भी देख ले वही जलता हुआ गुलाब,

 अब चाहे तू दे या ना दे मुझको कोई जवाब।

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