शनिवार, 19 नवंबर 2022

तुम बिन-- कविता

 बहुत कोशिश की मैंने तुम बिन जीने की,

 जीवन के पलों के चिथड़े सीने की। 

 पर हर कोशिश मेरी नाकाम ही रही,

  अब तो आदत हो गई जहर भी पीने की।


 मौसम आते रहे मौसम जाते रहे,

  गमों के अनेक नगमे गुनगुनाते रहे।

  और हम करते भी क्या तुम बिन,

  हम पर जो अपनों से बीती सुनाते रहे।


 तुम्हारी याद कंपकपाती ठंड सी आती है,

 होले होले से कुछ गुनगुनाती है।

  सुकून का तो एक तिनका भी नहीं मिलता,

हरदम गमों की महफिल सजाती है।


 करूं क्या मैं कुछ समझ ही नहीं आता, 

 तुम्हारे साथ बीता हुआ पल बहुत ही सताता।

 अब जैसे भी हो जीना तो होगा ही,

  इन्हीं गमो से जोड़ लिया है अब नाता।

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