गुरुवार, 24 नवंबर 2022

अभिमान-- कविता

 रे मानव काहे करे तू अभिमान,

 जग में क्यों खोता है अपना सम्मान। 

 सोच धरा पर अपनी रख ले,

 कहना मेरा आज तो ले तू मान।


 अभिमानी जब कोई हो जाता है,

 नहीं जानता क्या खो जाता है।

  दूर दूर होते जाते हैं सब,

 बस वही अकेला रह जाता है।


 जग में क्या लेकर तू आया था सामान,

 क्या ले जाएगा इससे नहीं है तू अनजान।

 अभिमान त्याग कर छुटकारा पाले, 

  तभी बनेगी तेरी मानव की पहिचान ।

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