गुरुवार, 17 नवंबर 2022

बेबसी-- कविता

 कहना चाहता हूं बहुत कुछ कह नहीं पाता,

सुनना चाहता हूं बहुत कुछ सुन नहीं पाता।

 देखना चाहता हूं बहुत कुछ देख नहीं पाता,

कैसी यह बेबसी है समझ भी नहीं पाता।


लगता है जैसे किसी ने जुबां पर ताला लगा दिया,

किसी ने जैसे कानों में रुई का डाटा लगा दिया।

 आंखों पर यह कैसा चश्मा लगा दिया,

   सभी ने मुझे बेबसी में उलझा दिया।


ऐसे बेबसी से मैं तंग आ गया हूं ,

अब मैं साहस के संग आ गया हूं।

 अब तक सही मैंने असहनीय पीड़ा

  अब उठा लिया मैंने दुस्साहस का बीड़ा।

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