रविवार, 13 नवंबर 2022

मन रे तू काहे न धीर धरे--कविता

 मन रे तू काहे न धीर धरे ।

 ह्रदय तुम्हारा निर्मल जल सा,

 दुनिया निर्मोही दिल में पीर भरे। 

मन रे तू काहे न धीर धरे।

मन तेरा कितना है दया भरा,

  दुनिया घाव गंभीर करे।

  मन रे तू काहे न धीर धरे।

  जग में तू धैर्यवान कहलाए,

  दुनिया तुझे अधीर करे।

  मन रे तू काहे न धीर धरे।

 तू पर घावों पर मरहम लगाए,

 दुनिया घाव गंभीर करे।

  मन रे तू काहे न धीर धरे।

    तेरी गरीबी का कोई उपहास उड़ाए,

   पर तू दुनिया को अमीर करे। 

 मन रे तू काहे न धीर धरे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें