बुधवार, 24 जुलाई 2024

रास्ते का पत्थर -- कविता

 इस फरेबी दुनिया में,

 हम प्यार से ठगे गये।

 हमने फूल बिछाए राहों में,

 वो कांटे बिछाकर चले गए।

 अब तो फूलों पर भी ऐतबार न रहा,

 प्यार का अब तो खुमार भी न रहा ।

राह निहारते थे जिनकी पल पल,

 अब तो उनका इंतजार भी न रहा। 

आखिर कहां जाएं, क्या करें ,

राह कोई नजर आती नहीं,

 अनमना, गुमसुम सा हो रहा मन,

बात कोई भी उमंग जगाती नहीं। 

कटी पतंग सा डोल रहा है मन,

 विरह वेदना से भर गया हूं मैं।

तेरी राह में  बिछाए थे फूल,

 लेकिन रास्ते का पत्थर बन गया हूं मैं।

सोमवार, 22 जुलाई 2024

गमों की बरसात - कविता

 खुशियों की कोई सौगत मेरे लिए नहीं थी,

 गमों की पोटली लिए सब मेरे लिए खड़े थे।

 सबकी राहों में बिछ रहे थे फूल,

  मेरी राह में बस कांटे पड़े थे। 

दुनिया में जब आया तो बहुत रो रहा था,

मेरे साथ साथ कोई भी न आंसू न बहा रहे थे।

 कुछ एक दूसरे को दे रहे थे बधाई, 

और कुछ मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

दुनिया के उपवन में गुमसुम खड़ा था,

 खुशियों के फूल मुझे चुनने थे।

 जो हो चुका उसका चोला हटाकर,

  अब तो नए सपने मुझे बुनने थे।

पतझड़ का मौसम बहुत झेल चुका,

 अब तो मुझ पर भी बहार आने दो। 

गमों के बोझ को कांधे से हटाकर, 

खुशियों की कल-कल नदिया बहाने दो। 

आसमान में घनघोर घटा छा गई ,

लेकिन कहीं और जाकर पानी बरसा गई।

बादलों की बारिश में हम अकेले ही थे, 

जब बरसी खुशियां न जाने भीड़ कहां से आ गई।

शनिवार, 20 जुलाई 2024

जो दर्द दिया था तूने- कविता

 चैन खो कर बेचैन हो चला था मैं,

 हर शहर हर गली की धूल फांकता रहा।

 सुकून चाहिए था मुझे कुछ तो,

 इसलिए कभी यहां कभी  वहां भागता रहा। 

तेरे साथ बिताए पल बहुत खूबसूरत थे,

 उन यादों की परछाई मेरे पीछे पड़ी थी।

 पुकार रहे थे मुझे कई कई मेले,

लेकिन तन्हाई बस अपने पर अड़ी थी। 

खत भी तो लिखे थे तूने मुझे,

 इन खतों की स्याही क्यों फीकी हो गई।

आती थी जो तुझसे प्यार की महक,

 वह अब‌ न जाने कहां खो गई।

  तारों की छांव भी कुछ काम न आई,

चंदा की शीतलता भी थक-हार गई।

 एक तसल्ली अक्सर आकर मुझे बहलाती,

 लेकिन वह भी लौट लौट कर हर बार गई। 

दिल मेरा इतना भी नादान नहीं ,

आखिर कब तक इसको समझाऊंगा।

 जो दर्द दिया था तूने मुझको,

 उसको ताजिंदगी कैसे भूल पाऊंगा।


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