शनिवार, 20 जुलाई 2024

जो दर्द दिया था तूने- कविता

 चैन खो कर बेचैन हो चला था मैं,

 हर शहर हर गली की धूल फांकता रहा।

 सुकून चाहिए था मुझे कुछ तो,

 इसलिए कभी यहां कभी  वहां भागता रहा। 

तेरे साथ बिताए पल बहुत खूबसूरत थे,

 उन यादों की परछाई मेरे पीछे पड़ी थी।

 पुकार रहे थे मुझे कई कई मेले,

लेकिन तन्हाई बस अपने पर अड़ी थी। 

खत भी तो लिखे थे तूने मुझे,

 इन खतों की स्याही क्यों फीकी हो गई।

आती थी जो तुझसे प्यार की महक,

 वह अब‌ न जाने कहां खो गई।

  तारों की छांव भी कुछ काम न आई,

चंदा की शीतलता भी थक-हार गई।

 एक तसल्ली अक्सर आकर मुझे बहलाती,

 लेकिन वह भी लौट लौट कर हर बार गई। 

दिल मेरा इतना भी नादान नहीं ,

आखिर कब तक इसको समझाऊंगा।

 जो दर्द दिया था तूने मुझको,

 उसको ताजिंदगी कैसे भूल पाऊंगा।


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