उड़ा दिए लाखों महफिल में हमने फकत सुकून पाने को,
मालूम न था मिलेगी बेचैनी बेचारे दिल को तड़पाने को।
वह मंजर क्यों भयानक हुआ हमने तो दर्दे दिल बयां किया,
मालूम न था एक ही चिंगारी काफी है मेरा घर जलाने को।
सपनों को हर पल संजोते रहे ,टूटन से हर पल बचाते रहे,
सपने ही कातिल बन जुट गए मेरे मन को हराने को।
नादान दिल की तमन्ना बढ़ते- बढ़ते हुई हजारों में,
मालूम न था बदल न पायेंगी हकीकत में फसाने को।
क्यों बद्दुआएं दें हम किसी को जमाने भर में ,
मालूम न था अपने ही लगे थे मेरा घर ढ़हाने को।
आती है सदा कहीं से गमगीन न हो ए सतीश,
यहां कुछ और भी बैठे हैं तेरा घर सजाने को।
Mssa