☺☺थाली में जूठन तो हम भी नहीं छोड़ना चाहते लेकिन क्या करें मजबूरी जो है ।
कुछ महीने पहले हमारे शहर के एक सजातीय ,संभ्रांत और प्रतिष्ठित परिवार में शादी का रिसेप्शन था , बुलावा हमें भी था ,सो हम पत्नी सहित विवाह स्थल पर पहुंचे । उन्होंने निमंत्रण पत्र में एक पंक्ति अंत में छपवा दी थी जिसमें लिखा था कि कृपया कोई भी उपहार न लायें, आपका आना ही हमारे लिए उपहार स्वरूप है (आजकल ऐसा चलन चल पड़ा है )। जैसे ही हमने विवाह स्थल में अंदर प्रवेश किया , दूल्हे के पिताश्री ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया और कहा कि बहुत अच्छा लगा आप आये , आईये अब भोजन का आनंद लीजिए । उनके इस प्रेम भरे स्वागत से हमारा पेट आधा तो वैसे ही भर गया ,सो हमने पहले तो सब व्यंजनों का मात्र नैनोंं से जायजा लिया और फिर कुछ "सेलेक्टेड"व्यंजन ही अपनी थाली में सजाये और शुरु हो गये । सच मानिए हमने जूठन नाममात्र की भी नहीं छोड़ी ।
इसी महीने एक और शादी का रिसेप्शन था । निमंत्रण पत्र में "उस वाली"पंक्ति को स्थान नहीं मिला था ,सो हमने लिफाफा तैयार किया और उसमें अपनी और उनकी हैसियत के हिसाब से, "लक्ष्मीजी"का वास कराया । फिर सावधानी बरतते हुए पेंसिल से ( इसलिए कि यदि लिफाफा बच गया तो- - -) , अपना व उनका नाम लिखा और पहुंचे विवाह स्थल । जैसे ही हमने अंदर प्रवेश किया , दूल्हे के पिताश्री हाथ में "फुल"भरा हुआ बैग लेकर खड़े दिखाई दिए। ऐसा लगा जैसे ट्रेन से उतर कर स्टेशन पर बाहर निकलते हैं तो"टी सी" गेट पर खड़ा मिलता है और हम उसे टिकट देकर ही आगे बढ़ पाते हैं । हमने , हमेशा की तरह , बचकर निकलने की कोशिश की लेकिन कोशिश व्यर्थ रही । उनकी "दिव्य दृष्टि" हम पर पड़ चुकी थी और हमारी ओर , एक हाथ में बैग दबाये हुए और दूसरा हाथ आगे बढ़ाते हुए , बढ़ते हुए बोले आइए आइए सतीश जी , आईये । हम समझ गए थे उनका बढ़ा हुआ खाली हाथ हमें भरना ही पड़ेगा सो ,भारी मन से , लिफाफा जेब से निकाला और उनके हाथ में रखा । लिफाफा पकड़ते हुए , मुस्कुराहट से लिफाफे को उस भरे हुए बैग में ठूंसते हुए उन्होंने कहा, अरे इसकी क्या जरूरत है , आप आये वही बहुत है , आइए और भोजन कीजिए । सच मानिए , लिफाफा देने के बाद हमारी भूख और बढ़ गई थी सो हमने , जैसे वे खाली बेग को भरते जा रहे थे , वैसे ही हमने भी खाली पेट को भरना शुरू किया । शुरू से आखिर तक , जो भी व्यंजन दिखा किसी एक को भी हमने नहीं बख्शा , किसी भी स्टॉल को हम निराश नहीं करना चाहते थे । व्यंजनों की तादाद के हिसाब से प्लेट छोटी पड़ रही थी सो हमने उसे "ओवरलोड" कर दिया । पेट प्रक्रति से लचीला.होता है लेकिन आखिर कितना खींचते , इसको भरना था सो भर ही गया लेकिन हाथ की प्लेट खाली न कर सके और अभी भी उसमें भरपूर व्यंजन विराजमान थे । प्लेट डालने के लिए हम गंतव्य पर पहुंचे और जैसे ही प्लेट को डालने लगे एक महानुभव जो वहां बैठे थे ,चौकीदारी कर रहे थे ,उन्होंने हमारी प्लेट को पकड़ा और बोला कि भाई साहब इतनी जूठन ? कृपया इसको पूरा खाइए ,साथ ही उपदेश देने लगे, कि प्लेट में खाना "लिमिटेड " ही लेना.चाहिये ।हमने कहा , भाई साहब आपको इससे क्या लेना देना हमने कितना खाया और कितना छोड़ा और वैसे भी हमने गेट पर ही एडवान्स पेमेंट कर दिया है तो "अनलिमिटेड" लेंगे ही । अब वह मेरा मुंह ताक रहा था , और मैं उसका ।☺☺
कुछ महीने पहले हमारे शहर के एक सजातीय ,संभ्रांत और प्रतिष्ठित परिवार में शादी का रिसेप्शन था , बुलावा हमें भी था ,सो हम पत्नी सहित विवाह स्थल पर पहुंचे । उन्होंने निमंत्रण पत्र में एक पंक्ति अंत में छपवा दी थी जिसमें लिखा था कि कृपया कोई भी उपहार न लायें, आपका आना ही हमारे लिए उपहार स्वरूप है (आजकल ऐसा चलन चल पड़ा है )। जैसे ही हमने विवाह स्थल में अंदर प्रवेश किया , दूल्हे के पिताश्री ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया और कहा कि बहुत अच्छा लगा आप आये , आईये अब भोजन का आनंद लीजिए । उनके इस प्रेम भरे स्वागत से हमारा पेट आधा तो वैसे ही भर गया ,सो हमने पहले तो सब व्यंजनों का मात्र नैनोंं से जायजा लिया और फिर कुछ "सेलेक्टेड"व्यंजन ही अपनी थाली में सजाये और शुरु हो गये । सच मानिए हमने जूठन नाममात्र की भी नहीं छोड़ी ।
इसी महीने एक और शादी का रिसेप्शन था । निमंत्रण पत्र में "उस वाली"पंक्ति को स्थान नहीं मिला था ,सो हमने लिफाफा तैयार किया और उसमें अपनी और उनकी हैसियत के हिसाब से, "लक्ष्मीजी"का वास कराया । फिर सावधानी बरतते हुए पेंसिल से ( इसलिए कि यदि लिफाफा बच गया तो- - -) , अपना व उनका नाम लिखा और पहुंचे विवाह स्थल । जैसे ही हमने अंदर प्रवेश किया , दूल्हे के पिताश्री हाथ में "फुल"भरा हुआ बैग लेकर खड़े दिखाई दिए। ऐसा लगा जैसे ट्रेन से उतर कर स्टेशन पर बाहर निकलते हैं तो"टी सी" गेट पर खड़ा मिलता है और हम उसे टिकट देकर ही आगे बढ़ पाते हैं । हमने , हमेशा की तरह , बचकर निकलने की कोशिश की लेकिन कोशिश व्यर्थ रही । उनकी "दिव्य दृष्टि" हम पर पड़ चुकी थी और हमारी ओर , एक हाथ में बैग दबाये हुए और दूसरा हाथ आगे बढ़ाते हुए , बढ़ते हुए बोले आइए आइए सतीश जी , आईये । हम समझ गए थे उनका बढ़ा हुआ खाली हाथ हमें भरना ही पड़ेगा सो ,भारी मन से , लिफाफा जेब से निकाला और उनके हाथ में रखा । लिफाफा पकड़ते हुए , मुस्कुराहट से लिफाफे को उस भरे हुए बैग में ठूंसते हुए उन्होंने कहा, अरे इसकी क्या जरूरत है , आप आये वही बहुत है , आइए और भोजन कीजिए । सच मानिए , लिफाफा देने के बाद हमारी भूख और बढ़ गई थी सो हमने , जैसे वे खाली बेग को भरते जा रहे थे , वैसे ही हमने भी खाली पेट को भरना शुरू किया । शुरू से आखिर तक , जो भी व्यंजन दिखा किसी एक को भी हमने नहीं बख्शा , किसी भी स्टॉल को हम निराश नहीं करना चाहते थे । व्यंजनों की तादाद के हिसाब से प्लेट छोटी पड़ रही थी सो हमने उसे "ओवरलोड" कर दिया । पेट प्रक्रति से लचीला.होता है लेकिन आखिर कितना खींचते , इसको भरना था सो भर ही गया लेकिन हाथ की प्लेट खाली न कर सके और अभी भी उसमें भरपूर व्यंजन विराजमान थे । प्लेट डालने के लिए हम गंतव्य पर पहुंचे और जैसे ही प्लेट को डालने लगे एक महानुभव जो वहां बैठे थे ,चौकीदारी कर रहे थे ,उन्होंने हमारी प्लेट को पकड़ा और बोला कि भाई साहब इतनी जूठन ? कृपया इसको पूरा खाइए ,साथ ही उपदेश देने लगे, कि प्लेट में खाना "लिमिटेड " ही लेना.चाहिये ।हमने कहा , भाई साहब आपको इससे क्या लेना देना हमने कितना खाया और कितना छोड़ा और वैसे भी हमने गेट पर ही एडवान्स पेमेंट कर दिया है तो "अनलिमिटेड" लेंगे ही । अब वह मेरा मुंह ताक रहा था , और मैं उसका ।☺☺