रविवार, 2 फ़रवरी 2020

श्मशान से नाता

श्मशान है जीवन मेरा
 शमशान  सी नीरवता है मुझमें
मौन उदासी की तपस्या में
 घुट घुट कर में यूं ही जी रहा हूं,
जुग भी  न गिने थे मैंने
 क्षण क्षण अब गिनकर
 जीवन के चिथड़े सी रहा हूं ।
कोहरा मुसीबत का क्यों छाया है मुझ पर
 मैं तो जीवन में ज्योति जला रहा था ,
ज्योति जलाकर जीवन में अपने
 पथ पर उजाला मैं कर रहा था।
 चक्र समय का चला तभी से
 मेरे जीवन का आनंद भंग हुआ,
 सुख के साथी छूटे सब
दुख एक साथी संग हुआ ।
तारे झिलमिलाते रहे गगन में
मैं घुटता रहा अपने ही मन में,
 बादल जो छाये बिजली जो चमकी
तो मुझको सुध आई इस तन की ।
 हां श्मशान नहीं है जीवन मेरा
 श्मशान तो मृत्यु है मेरी ,
उजाला है यहां चेतना का
 रातें नहीं अज्ञान की अंधेरी ।
 कोहरा जो छाया समय का मुझ पर
 चुप क्यों हूं मिटा इसे दूं ,
जूझ पड़ूं जीवन से अपने
 ज्योति जीवन में अपने जला दूं।

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