बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

ठूंठ

 ठूंठ ,क्यों कर रहा तू मौन तपस्या
  हो ध्यान में लीन ,
लगता है कर रहा इस जग में 
शांति की खोजबीन।
  शांति जिसे चाह रहा 
हर प्राणी हर इंसान ,
मगर पा न सका कोई,
 इसका कभी निदान।
 पुकार रहा यह जग है
 हर पल हर क्षण,
 हर समय समय से जूझ रहा 
सदियों से कर रहा काल से घर्षण।
 राष्ट्र राष्ट्र से टकरा रहा 
मानव मानव से जूझ रहा 
क्यों? केवल एक ही है प्रश्न,
 राष्ट्र औ मानव देख रहे 
शांति का चिर स्वप्न ।
देख रहा तीक्ष्ण दृष्टि से 
बिजली की चमचम में,
गंगा की पवित्र धार में 
यमुना की कलकल में।
मैं बताऊं शांति तो है 
क्षितिज के उस पार,
इसलिये मानव कर न सकेगा 
स्वप्न अपना साकार।
 तो सुन है मौन व्रत सन्यासी 
न रह निर्वस्त्र ,
कर दे बंद शांति की खोज
 क्योंकि रहेगी यहां तो अशांति ही सर्वत्र।
 किंतु फिर भी है तू अडिग
 करने को अपनी पुरातन खोज,
 तो फिर रह अडिग ही
शायद क्षितिज के उस पार
 शांति तू पाकर 
दिखा सके दुनिया को
 अपना ओज ।
द्रढ़वत हो होजा ध्यान में लीन
 ताकि न रहे तपस्या तेरी निराधार ,
निर्विकार हो इस जग में
 कर दे मानव का स्वप्न साकार ।

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