सोमवार, 29 दिसंबर 2025

मुक्तक

 सूखी जड़ हरा पेड़, बड़ा अचरज है भाई,

 संभव है, किसी ने मुझे यह बात समझाई।

 जब भी सुखों पर, दुखों की बदली छाई,

 मन को आशा की किरण ने राह सुझाई।


गत को करें नमन, आगत का अभिनंदन,

राह दिखाई हमको, उनका करते हैं वंदन।

जो कुछ हो गया हो गत में, भूल उसे जाएं,

राग-द्वेष न रहे, कलुषित न हो हमारा मन।


नाकाम रहा व्यक्ति तो दोष दूसरे पर मढ़ता है,

संयम रखो, याद रखो, संघर्ष पहचान गढ़ता है।


मैंने तो वह कर दिया है जो मुझे करना था,

हमारे पराधीन देश को आजाद करना था।

खुश हूं कि देश प्रेम की भावना बह रही है, 

नन्हें-मुन्नों के हाथों में भी तिरंगा देखना था।


देश के वास्ते मर जाएंगे,मिट जाएंगे हम,

खून का हर एक कतरा बह जाए,न होगा गम।

देश प्रेम में रंगा मन, कुछ भी करने को तैयार,

सेवा देश की करने को, लेंगे एक और जनम।


खिलौना बनकर रह गया हूं नियति के हाथों में,

शून्य सा हो गया हूं मैं अपने ही जज़्बातों में।

क्या करूं,क्या न करूं, बड़ा असमंजस है,

कुछ भी वज़न नहीं रह गया अब मेरी बातों में।


 दर्द देकर हमदर्द बनते हो, यह तो कोई बात नहीं, 

 अपने वो होते हैं जो संबल बनते हैं, करते घात नहीं।

 ऐसे दिल बस कहने को ही दिल होते हैं,

जिनमें बस शून्य व्याप्त हो,रहते कोई जज़्बात नहीं।


माना कि कंधों की हालत करता खस्ता, 

 बोझ नहीं,ज्ञान का भंडार है यह बस्ता,

महकता भविष्य बना देता है सबका-

यह पुस्तकों से भरा गुलदस्ता।


माना कि भारी भरकम है,कंधों की हालत करता खस्ता, 

 बोझ नहीं मानो इसे,ज्ञान का भंडार है यह बस्ता,

फूलों सा महकता भविष्य बना देता है सबका-

यह,रंग बिरंगी पुस्तकों से भरा हुआ गुलदस्ता।


इस उपवन की एक कली थी ,अब बदल रहे हैं भाग,

पर द्वारे जाकर के , उस घर को बनाऊंगी मैं बाग।


दिल में भक्ति, तन में शक्ति, मन में विश्वास हो,

 तो काहे को, हे मनवा इस जग में निराश हो।

 धर्म कर, कर्म भी संग-संग कर लें -

पग-पग चलता चल, जब तक तन में श्वास हो।






सोमवार, 17 नवंबर 2025

दो कदम और - कविता

 बस दो कदम और चलते तो मंजिल मिल ही जाती,

 यूं मायूसी, बेशर्मी से दिल में घर नहीं कर पाती ।

मगन रहते हैं हम और करते हैं सिर्फ धर्म की बातें, 

प्रयोगिक होने को क्यों नहीं करते हम कर्म की बातें।

अज्ञान से बने रहे, लक्ष्य तो कोई तय किया नहीं,

क्या करना है , कैसे करना है निश्चित किया नहीं।

जीवन नहीं मिला है केवल जीवन जी जाने को, 

जीजिविषा से अग्रसर हों सफलता पा जाने को।

डर-डर कर कदम रखने से मंजिल से दूर रह जाओगे,

फूंक फूंक कर कदम रखे तो, मंजिल तक पहुंच जाओगे।

हौसला बढ़ा कर रखिए कदम दर कदम बढ़ते जाइए,

जिस मंजिल की तलाश है, तब उसे अवश्य ही पाइये।

Mssa

 


शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

 चुरा लूं क्या ,फलक से कुछ सितारों को,

 इन बहारों में सिमटी हुई कुछ फिजाओं को।

मस्ती में झूमती गाती नाच रही हैं जो,

बाहों में भर लूं क्या ,इन हवाओं को।


शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

श्रीराम का आगमन - कविता

 यह कैसी शुभ घड़ी आज आई है, 

 सबके दिलों में उमंग भर आई है।

अति व्यग्रता से सब प्रतीक्षा कर रहे हैं,

अति शीघ्र पधारेंगे राम अपेक्षा कर रहे हैं।

हंस भी पंख फैला कर मधुर ध्वनि कर रहे हैं,

अति प्रसन्न हो सरोवर में जल विहार कर रहे हैं।

चिड़ियों की चहचहाहट अलग ही रंग भर रही है,

अन्य पक्षियों की स्वर लहरी भी संग चल रही है।

बागों में बहार है,वृक्षों के तने और भी तन गये हैं, 

पत्तियों संग डालियों के झूमने को मन बन गए हैं।

अयोध्या वासियों के मन खुशी से झूम रहे हैं,

एक दूसरे से बतियाते पूरे गांव में घूम रहे हैं।

घर आंगन अब खूब सजाये जाएंगे,

ढोल नगाड़े भी खूब बजाये जाएंगे।

स्वागत द्वारों से श्री राम जी का आगमन होगा,

अयोध्या प्रवेश से प्रफुल्लित उनका मन‌ होगा। 

बिना शोर-शराबे आखिर कैसे मने कोई त्यौहार, 

शोरगर भी व्यस्त हो गए हैं करने को पटाखे तैयार।

दीपमालिकाओं से हर घर आज प्रकाशवान होगा, 

अयोध्या तो आज जैसे तारों से सजा आसमान होगा। 

अब श्रीराम जी का राज होगा,हर समस्या का समाधान होगा, 

 लक्ष्मी माता धन-धान्य से भरपूर रखे,ऐसा आव्हान होगा। 

जैसे ही लक्ष्मण जी और सीता जी संग श्रीराम जी पधारेंगे, 

 झूमेंगे,नाचेंगे और दीपों के संग आज दीपावली मनाएंगे।



रविवार, 14 सितंबर 2025

लौट जाएंगे हम तुम्हारे बिना - कविता

 *लौट जाएंगे हम तुम्हारे बिना* 

जिंदगी के साथ आए,

जिंदगी के साथ रहे चार दिना।

आएगा जब अंत समय,

लौट जाएंगे हम तुम्हारे बिना।

ए जिंदगी तू ही तो है,

जिसने नाना खेल खिलाये।

कब कहां कैसे क्या करना,

ये सारे भेद हमें सिखाये।

कभी हमें मुसीबत में डाला, 

कष्टों की  लाई बयार।

 कभी जब चाहा तुमने,

खुशियों की लाई बहार।

हमने तो कभी न चाहा,

आना है इस दुनिया में।

फूल भी हैं और कांटे भी, 

ऐसे ही इस बगिया में।

हमने भी तुझे बहुत कुछ दिया,

 तूने ही दिया,ए जिंदगी यह न गिना। 

तेरा साथ निभाया जिंदगी भर,

अब लौट जाएंगे ए जिंदगी,हम तुम्हारे बिना।


Mssa


बुधवार, 30 जुलाई 2025

मन टूटा हो तो - कविता

 आसमां भी पाताल लगे, जब मन टूटा हो तो, 

पछताना ही विकल्प लगे, जब कुछ छूटा हो तो।

रस्सी टूटे,बंधन छूटे,फिर कश्ती छूट जाये किनारे से,

मन ही जब लड़खड़ा जाये,न चले किसी सहारे से। 

मन आखिर क्यों दुखी रहे, क्यों न यह सुखी रहे,

जैसी परिस्थिति ढलते रहो,जैसे फूल सूरजमुखी रहे।

हल्की बयार हो या हो झंझावात, कभी डगमगाना नहीं,

कश्ती को यूं मझधार में छोड़कर कभी भी भागना नहीं।

गिर-गिर कर गिरना नहीं, गिरकर उठना ही जिंदगी है,

हौसला रखकर आगे बढ़ना ही, जिंदगी की बंदगी है।

अगर कस ली है कमर,दुर्दिनों से दो-दो‌ हाथ करने की,

तो क्यों महसूस हो जरूरत,समझौते की बात करने की।

टूटे हुए दर्पण में झांको तो, स्व छवि मलीन ही दिखाता है,

ले लें जब दृढ सकल्प, तो फिर दुखों से पार पा जाता है।

Mssa

शनिवार, 12 जुलाई 2025

आया सावन झूम के-

 चारों ओर जमीं पर छाई है देखो हरियाली 

मुझे को बता दे तू  किसकी बनेगी घरवाली

बहका --- हो

 बहका रे मन मेरा डोला रे मन मेरा

बहका कि मंच गई धूम रे

के आया सावन झूम के- 2


काली काली घटा भी देखो घिर‌ आई

तेरे मेरे बदन को छूकर चले पुरवाई 

महका --- हो

महका  रे तन तेरा महका रे मन मेरा

महका के मच गई धूम रे 

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

नैनों में बदरा छाए -- कविता

 दृश्य अदृश्य हुए, मनमोहक थे,अब छितराए,

 न भरोसा करना किसी पर यह मुझे बतलाए।

मैं तो चाहता था गगन के सितारे गिनना,

पर मध्य में नहीं, नैनों में बदरा छाए।


आगत का करता रहा मैं अभिनंदन,

 जाने वाले को भी करता रहा मैं वंदन।

 भला ही करता रहा मैं अब तक सभी का,

फिर भी न जाने क्यों हो जाती है अनबन। 


मैं आसमां तक पहुंचने का ख्वाब नहीं देखता,

 पर मुश्किल को सामने देख घुटने नहीं टेकता।

नहीं है मेरे दिल में किसी से भी नफ़रत,

तीर मेरी नज़र का किसी को नहीं भेदता। 


किसी के ख्वाबों के महल मैंने नहीं ढ़हाए 

कागज की नाव समझ नदिया में नहीं बहाए।

फिर भी पराया समझते हैं मुझे कुछ लोग,

बात यही कि, उनके नैनों में बदरा छाए।


Mssa



शनिवार, 28 जून 2025

मैं धरा की धूल हूं -- कविता

शीर्षक -- मैं धरा की धूल हूं 

कर्ण मेरे सुन रहे धुन तुम्हारे साज की,

दीवानी हुई मैं तुम्हारी आवाज की।

मदमस्त हो थिरक रही‌, अधरझूल हूं,

तुम गगन का तारा,में धरा की धूल हूं।

प्रतीक्षा कर,घड़ी पल-पल निहारती,

त्याग नींद का कर, रात-रात भर जागती।

मुरझा गया जो, मैं अब वो फूल हूं,

तुम गगन का तारा में धरा की धूल हूं।

खिल गया था मन मेरा,मिलन की आस में, 

चाह रही थी कुछ बूंदें भड़कती प्यास में।

मिला न जो अब तक,मैं वह नदी का कूल हूं,

तू गगन का तारा, में धरा की धूल हूं।

कब मिलेगा मुझे ,कब प्रतीक्षा का अंत होगा,

मिलन का वह पल बस एक, या अनंत होगा।

हुई न मुझसे कदाचित, मैं वह भूल हूं,

तू गगन का तारा, में धरा की धूल हूं। 


Mssa - दैनिक



शनिवार, 10 मई 2025

मां, ममता की मूरत - कविता

 तेरे कदमों के तले ओ मां मेरे आसमां और जमीं,

 तेरे आंचल सी छांव तो कहीं और से मिलती नहीं।

 सर पर हों तेरे हाथ तो छत की जरूरत क्या होगी,

 ए मां तेरी जैसी और ममता की मूरत क्या होगी।


शनिवार, 3 मई 2025

दो पंक्तियां

 मैं इधर जाऊं, उधर जाऊं या किधर जाऊं,

 समझ में आए, जब मैं कान्हा के गुण गाऊं।


न झुको,न रुको, कदम आगे ही बढ़ाना है,

गम कितने ही आएं जिंदगी में, बस मुस्कुराना है।


ये आंधी ये तूफां रोक न सकेंगे हमारे कदम,

 हमने तो खाई है आगे ही आगे बढ़ने की कसम।


हौसला है गर, तो मंजिल दूर तो नहीं,

 इंसा इंसा है फतह पायेगा,मजबूर तो नहीं।

 

हर सुबह की शाम,तो हर शाम की सुबह होती है,

 यह देख किस्मत भी अपनी किस्मत पर रोती है।


मैं भी सूरज हूं, डूबता हूं और उगता भी हूं।

 निराश कभी नहीं होता, जाता हूं तो आता भी हूं।


कर दिए जुदा उनके जान औ तन साथियों, 

कर दिया रणबांकुरों ने ऐसा जतन साथियों।


इंसान हो,खूबसूरत हो,लेकिन मजा तो तब है जब विचार खूबसूरत हो,

मूरत तो हो, लेकिन मजा तो तब है जब इंसानियत की मूरत हो।



बुधवार, 26 मार्च 2025

हास्य कविता - ऐसा करने दे

 चल हट हवा आने दे /हलवा पुरी खाने दे/ भैंस के आगे बीन बजाने दें/ जो जाता है उसे जादे दे/ घबराने दे /हर्जाने दे/ कल बुलाने दे /डराने दे/ बुझाने दे /हराने दे/ मनाने दे /ठिकाने दे/जलाने दे/अनजाने दे/सुहाने दे

चल हट ,परे हट, हवा आने तो दे।

 जो रोग नहीं मुझे उसकी दवा लाने तो दे।।

 कोई ऐसी वैसी ऐसी बात तो नहीं कही मैंने।

 लेकिन फिर भी बिना बात के ही पछताने तो दे।।

 अपने घर में बस दाल-रोटी ही मिलती है मुझे।

 लेकिन बनकर मेहमां हलवा पुरी खाने तो दे ।।

मैं जानता हूं मेरी इस दुनिया में कोई नहीं सुनता।

 लेकिन भाई, भैंस के आगे बीन बजाने तो दे।।

 माना कि मैं निर्भीक हूं नहीं डरता किसी से भी।

लेकिन भूत बनकर औरों को डराने तो दे।।

मैं फायर ब्रिगेड का कर्मचारी तो नहीं मेरे भाई।

लेकिन जो आग लगी नहीं उसे बुझाने तो दे।।

 पहलवान को देखकर मेरी सिट्टी-पिट्टी हो जाती है गुम।

लेकिन किसी सींकिया‌ पहलवान को हराने तो दे ।।

किसी से नहीं कोई भी गिला शिकवा मझे।

पर दिलजलों के दिल जलाने तो दे।।

कोई कितने ही गम में डूबा हो, मुझे क्या वस्ता।

 मैं तो खिलंदड़ हूं ,मुझे खिलखिलाने तो दे।।

 कहते हैं मुझे कि इंसान नहीं यह तो लगता गधा है।

  ऐसे इंसान को दो-चार दुलत्ती लगाने तो दे।। 

  समझते हैं कुछ लोग मैं गमगीन हूं, अंतर्मुखी हूं ।

 ऐसे लोगों को बहार के तराने सुनाने तो दे।। 

कुछ लोगों के चेहरे पर कोई भाव ही नजर नहीं आते। 

 ऐसे लोगों को आज तो,हास्य कविता सुनाने तो दे।।

बहुत दिनों बाद वह मिला, मैंने कहा आज कविता तो सुनाने दे।

वह बोला किसी और को सुना देना, कृपया मुझे तो जाने दे।।

Kalkkj

बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

नन्ही का स्वागत -- कविता

 भागीरथ जी अति प्रसन्न हैं बढ़ गया जसोरिया परिवार,

अपने ही आंगन में जैसे बस गया अब संसार।

 कमलेश जी भी अति प्रसन्न हैं, खुशियां आईं अपार,

नतमस्तक हो प्रकट कर रहीं ईश्वर को आभार।

अंकित ने अपने संपर्कों को भेज दिये संदेश,

 मुझको जल्दी बताइए जाना है किस देश।

हर्ष और उल्लास से भरपूर हुई है बिन्नी,

उसके अपने कोष में बढ़ गई एक और गिन्नी।

अनुज अब नन्ही को भी खूब खेल खिलायेगा,

 पहले चाचू था अब चाचू चाचू बन अग्रज हो जायेगा।

दीया सोचती अब मैं भी बड़ी कहलाऊंगी,

 पहले मुझे खिलाते थे, अब मैं इसे खिलाऊंगी ।

 नाना का उमड़ रहा नन्ही पर बहुत ही प्यार,

 आते-जाते रहे उसको तो बारंबार निहार।

 नानी भी कम नहीं, है बड़ी ही सयानी,

 बोली नन्ही पर लिखो कविता या कोई कहानी।

मीनू मौसी वीडियो देख-देख खूब हर्षाती है,

मारे खुशी के दे ताली ,ताली खूब बजाती है।

वरुण मौसाजी के चेहरे पर छाई मौन मधुर मुस्कान,

क्या लाऊं मैं ,बता सके तो बता ए भोली नादान।

शिखा मौसी बोली ताली मैं भी खूब बजाती हूं,

 लेकिन ठहरो, उससे मिलने मैं स्वयं ही आ जाती हूं।

केन्या से अरुण मौसाजी कन्या को दे रहे बधाई,

अफ्रीकन लाऊं या भारत की ही लाऊं मिठाई।

तानी इसके सामने कभी नाचेगी और कभी गायेगी, 

या तो बैडमिंटन या फिर भरतनाट्यम नृत्य सिखाएगी।

तनिश ने दीया को तो खूब खिलाया इसे भी खिलायेगा,

 मस्ती क्या होती है, यह इसको भी सिखलायेगा।

गुरुवार, 23 जनवरी 2025

अरे ओ मेघ -- कविता

 अरे ओ रे मेघ,तू इतना क्यों इतराता है,

 कभी आता है,कभी जाता है,कभी छाता है।

क्या तुझको नहीं है बिल्कुल भी खबर,

यहां जो है सूखा तुझे आता नहीं नजर।

बड़ा नटखट है तू , बड़ा चंचल है,

 तू ही जाने शुष्क है या सजल है।

कभी गौर वर्ण है कभी सांवली सूरत है,

 कभी बेढंगा सा कभी ढली हुई मूरत है।

तरस खाकर जो तू थोड़ा पिघल जाए,

 तो निराशा की पीड़ा थोड़ी सहल जाए।

कभी कोई देखता है चातक बनकर,

 दो बूंद तो मिल जाए ऐसी आशा भरकर।

कभी तो तेरा दिल इतना पिघल जाता है,

खूब गरज-गरज कर,खूब बरस जाता है।

न आव देखता है और न ताव देखता है,

बरसते समय अपनी आंखें बंद कर लेता है।

जिस मकान में हवा का बहाव होना चाहिए, 

नहीं ऐसा,जैसा देखा,जल भराव होना चाहिए।

हे इंद्रदेव,अपने पास एक तराजू तो रखो,

ताकि जहां जितना चाहिए, तोल कर बरसो।

तब न कहीं बाढ़ आएगी और न कहीं सूखा होगा, 

तब न कोई ज्यादा खाएगा और न कोई भूखा होगा।


मंगलवार, 21 जनवरी 2025

कूटने का सुकून -- हास्य-व्यंग्य

 कूटने का सिलसिला तो आदिकाल से चला आ रहा है।देवताओं ने दानवों को खूब कूटा , फिर उनके ज़ख्मों के इलाज के लिए वैद्यों ने जड़ी बूटियों को कूटा।अनाज कूटा जाता है, दालों को कूटा जाता है। एक उनको देखो- स्वामी रामदेव टीवी पर जड़ी बूटियां को कूटते हुए कहते हैं कि बिना कूटे प्रभाव कम और कूटने पर प्रभाव ज्यादा होता है। सही कहा। बचपन में मां-बाप कहते थे खाना खा ले , थोड़ी भी देर की तो बस हो गई कुटाई और फिर कुटाई के प्रभाव से खाना शुरू। आजकल‌ की तरह नहीं कि मां-बाप कहते हैं- ले ले, ले ले बेटा और जब तक न खाए खुशामद करते रहेंगे। हम तो घर पर मां-बाप से कुटते थे और स्कूल में मास्टर जी से। कूटने वाला खुश और कुटने वाला बेचारा, क्या बताएं। घर में स्त्रियों को देखते हैं कि धान, दाल चावल, मसालों को कूटती हैं लेकिन कूटने के बाद को कोई सुकून नहीं मिलता,।और तो और, थकी हुई लगती हैं । 

बचपन में कुटते रहने के बाद हमने भी सोच लिया था कि बड़े हो जाएं, थोड़े दम-खम हो जाएं तो बदला जरूर लेंगे। जब हमें लगा कि अब हम 'लायक' हो गए हैं तो फिर मौका ढूंढने लगे और फिर कुटाई का सिलसिला चालू हो गया।

 आपको एक बार का कुटाई का किस्सा सुना देते हैं।हम कहीं जा रहे थे। रास्ते में हमने देखा कि तीन-चार लोग किसी एक को पड़कर झिंझोड़ रहे थे। बस हमने आव देखा न ताव, अंदर घुसे और दे दनादन,दें दनादन।   वहां खड़े सब लोग हमको हैरत से देख‌ रहे थे। जमकर कुटाई करके ऐसा लगा जैसे हमने कोई युद्ध जीत लिया हो। ‌तभी पीछे से उनमें से एक आदमी ने आकर कहा कि तुमने उसको क्यों कूटा ? वह बेचारा तो चलते-चलते गिर गया था, हम उसको उठा रहे थे। खैर हमें उससे क्या और क्या मतलब। हमें तो कुटाई करनी थी और कुटाई करने से थोड़ी ठंडक दिमाग को और और थोड़ी दिल को मिल चुकी थी। जब भी ऐसा मौका मिलता हम अंदर घुस जाते और किसी को भी कूट देते ।

सच में इतना मजा और किसी काम में नहीं ।


Lrks

रविवार, 12 जनवरी 2025

यादें उनकी - कविता

 उनकी यादों से कहो मुझे छोड़कर न जाएं ,

किसी भी हाल में मुख मोड़कर न जाएं।

उनकी यादों का ही तो अब मुझे सहारा है ,

जिनकी यादें साथ हों लगता वही हमारा है।

 क्या बताऊं यादें उनकी होती हैं इतनी खूबसूरत,

आंखें बंद करूं तो नजर आती है उनकी मूरत।

ये ही यादें उनकी, कानों में गीत गुनगुनाती हैं,

 रातें तो बेचैन हों मगर दिन को तो बनाती हैं।

जब भी खो जाता हूं मैं यादों में उनकी,

याद आता है चुलबुलापन बातों में उनकी।

वो यदि आएं तो ठीक और न आयें तो जाने दो,

पर न रोको इनको, यादों की उनकी तो आने दो।


Mssa/ video 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

यूं ही कट जाएगा सफर -- गीत

 कोई भी बाधा हो,कर देंगे नाकाम 

मंजिल तक जाना है, करेंगे अपना नाम 

आगे कदम बढ़ायेंगे,बस चलते ही जायेंगे 

यूं ही कट जायेगा ---

हौसला हो जब मन में मुश्किल हो आसान,

 काम करेंगे कुछ ऐसा जग में हो जाये नाम 

नहीं किसी से डरना है, नहीं राह में रुकना है 

यूं ही कट जायेगा ---


लेखनी रचना / L c a