गुरुवार, 23 जनवरी 2025

अरे ओ मेघ -- कविता

 अरे ओ रे मेघ,तू इतना क्यों इतराता है,

 कभी आता है,कभी जाता है,कभी छाता है।

क्या तुझको नहीं है बिल्कुल भी खबर,

यहां जो है सूखा तुझे आता नहीं नजर।

बड़ा नटखट है तू , बड़ा चंचल है,

 तू ही जाने शुष्क है या सजल है।

कभी गौर वर्ण है कभी सांवली सूरत है,

 कभी बेढंगा सा कभी ढली हुई मूरत है।

तरस खाकर जो तू थोड़ा पिघल जाए,

 तो निराशा की पीड़ा थोड़ी सहल जाए।

कभी कोई देखता है चातक बनकर,

 दो बूंद तो मिल जाए ऐसी आशा भरकर।

कभी तो तेरा दिल इतना पिघल जाता है,

खूब गरज-गरज कर,खूब बरस जाता है।

न आव देखता है और न ताव देखता है,

बरसते समय अपनी आंखें बंद कर लेता है।

जिस मकान में हवा का बहाव होना चाहिए, 

नहीं ऐसा,जैसा देखा,जल भराव होना चाहिए।

हे इंद्रदेव,अपने पास एक तराजू तो रखो,

ताकि जहां जितना चाहिए, तोल कर बरसो।

तब न कहीं बाढ़ आएगी और न कहीं सूखा होगा, 

तब न कोई ज्यादा खाएगा और न कोई भूखा होगा।


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