शनिवार, 29 अप्रैल 2023

धूल तेरी गलियों की- कविता

 धूल मैं तेरी गलियों की इधर-उधर उड़ती फिरूँ, 

 बन गई वह कली जो फूल बन कर न खिलूं।

 चाहा बहुत था मैंने तेरे संग संग चलना ,

 बस तेरे संग जीना तेरे संग ही मरना।

क्या क्या ख्वाब दिल में सजाए थे मैंने,

 हर दिन त्यौहार जैसे मनाए थे मैंने।

   मैं  तो बस इतना ही जान रही हूं,

  तू माने न माने मैं तुझे अपना मान रही हूं।

 क्या करूं क्या ना करूं बन गई अधरझूल हूं मैं,

 बस इतना ही समझ ले तेरी गलियों की धूल हूं मैं।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

पुरवाई-रुसवाई -- कविता

जब-जब भी चली यह सुहानी पुरवाई,

 सच कहता हूं प्रिये तुम्हारी याद आई। 

 तुमको लेकर देखे थे मैंने जो सपने,

 अभी तक नहीं हो पाए वे अपने। 

 मेरा दिल तुम्हारे नाम से ही धड़कता है,

 दिल रह-रह कर बस तुम्हें ही याद करता है।

  मेरे दिल की आवाज नहीं दी तुम्हें सुनाई,

  सह नहीं पा रहा हूं मैं तुम्हारी यह रुसवाई।


स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।

गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

अतीत -- कविता

 अतीत को छोड़ो और, 

 आज और कल की सोचो।

 जो बीत गया सो बीत गया,

 खामखां अपने बाल न नोचो। 

 होना था उसे कोई रोक ना सके,

 कुछ कर ना सके कुछ टोक न सके। 

   कोशिश कितने ही करो रोकने की,

  लेकिन किस्मत थी वही भोगने की।

 बीते हुए कल की चिंता करना है व्यर्थ,

 सोचो कमजोर नहीं है हम हैं  पूर्ण समर्थ।

 आने वाले कल को संभाल लेंगे संवार लेंगे,

अपने आपको उस सदमे से निश्चित ही उबार लेंगे।

लत शराब की- कविता

 यह क्या हालत हो गई जनाब की ,

जबसे लग गई है लत शराब की। 

 अब तो जब देखो झूमते रहते हैं,

 इसी लत ने तो हालत खराब की। 

नशा तो हर कोई करना चाहता है 

 पर जरूरी नहीं कि वह पीना चाहता है।

कोई चाहता है ज्यादा डिग्री हासिल करना, 

 कोई ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहता है। 

किसी को ज्यादा से ज्यादा डींगें हांकना है,

 किसी को हवा में भी बातें करना है।

 हर किसी की अपनी अपनी आदत है 

 किसी काम को शिद्दत से करना ही तो  लत है।

 काम करना है जमाने में तो ऐसा करो, 

 कि असफलता से तुम कभी ना डरो। 

 लत करो तो ऐसी कि जमाने में मिसाल बन जाओ, 

  लेकिन मेरे भाई  लत शराब की कभी न करो। 


बुधवार, 26 अप्रैल 2023

अपना-पराया-- कविता

 यूं ही कोई पराया नहीं हो जाता है ,

प्रेम भाव शून्य में खो जाता है। 

 आखिर कोई तो है जो चलते चलते,

 बीच राह में कांटे बो जाता है ।

दुनिया में जब आए तो सब अपने थे, 

यहां पर पाले कितने ही सपने थे।

जब होश संभाला तो सामने आया,

 इनमें से आखिर अपने कितने थे। 

  प्रेम भाव का यहां अकाल पड़ा हुआ, 

 हर एक जुबां पर प्रश्न खड़ा हुआ। 

मैं हूं बस मैं ही हूं जहाँ मे, 

समभाव पर यहां तमाचा जड़ा हुआ।

 हर कोई यहां एक दूसरे को समझाता है,

 पर समझ में नहीं किसी को आता है। 

 कोई तो बात होती है आखिर, 

यूं ही कोई पराया नहीं हो जाता है। 

ऋषिकेश यात्रा-- संस्मरण

 यह यात्रा वृतांत सन 1977 का है । दूरदर्शन केंद्र मुंबई में सेवा के दौरान , 3 महीने की ट्रेनिंग के लिए मुझे दिल्ली भेजा गया। देश के अन्य शहरों से भी दूरदर्शन एवं आकाशवाणी केंद्रों से इंजीनियर ट्रेनिंग के लिए आए थे।  ट्रेनिंग अवधि के दौरान 3 दिन की छुट्टियों में हमारा 7 लोगों का समूह , एक ट्रैवल कंपनी की बस के द्वारा,  देहरादून,मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार दर्शन के लिए रवाना हुआ ।रास्ते भर रमणीक दृश्य देखते हुए, देहरादून , मसूरी तक यात्रा की। इसके पश्चात वहां से ऋषिकेश पहुंचे। बस के ड्राइवर ने आधे घंटे का समय दिया और कहा कि इस समय अवधि में लक्ष्मण झूला के उस पार जाकर भ्रमण कर आ जाएं। हमारा समूह कुछ मस्ती में था तो समय होने पर एक साथी ने कहा कि समय हो रहा है जल्दी चलें तो दूसरे ने कहा कि हम 7 लोग हैं छोड़कर थोड़े ही जा सकते हैं, और इस तरह आराम से वापस बस स्टैंड पर पहुंचे। 

 वहां जाकर देखा तो हमारे होश उड़ गए। हमारी बस वहां नहीं थी।  हमने आसपास पूछा तो उन्होंने बताया कि इस बस को तो गए हुए लगभग 20 मिनट हो चुके हैं। अब करते क्या ? हरिद्वार जाने वाली बस का इंतजार किया, बस आई, तुरंत उसमें बैठे और हरिद्वार पहुंचे। वहां पहुंचकर गंगा नदी के किनारे गए और आसपास  नजर दौड़ाई तो पुल के उस पार बस खड़ी हुई नजर आई ।जल्दी-जल्दी चल कर बस तक पहुंचे और ड्राइवर पर बरसने लगे।लेकिन ड्राइवर ने अन्य यात्रियों को पहले ही समझा दिया था , तो दूसरे यात्री हमारे ऊपर हावी होने लगे। हमारे लिए चुप हो जाने के अलावा और दूसरा रास्ता नहीं था। क्योंकि बस को रवाना होने में कुछ ही समय बचा था , तो ड्राइवर ने में सिर्फ 15 मिनट का समय दिया।इतने कम समय में हम स्नान नहीं कर पाये, सिर्फ हाथ और मुंह पर गंगा जी का पानी लगाया और बस में बैठकर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। सच ही कहा है कि समय की कीमत पहिचाननी चाहिए।


सोमवार, 24 अप्रैल 2023

उम्मीद-- कविता

                                                                                          उम्मीद पर ही दुनियां कायम है, 

 कहते हैं कुछ सयाने लोग।

तो क्या उम्मीद को ही पाले रहूं,

 या निराशा में ही पहुंच जाऊँगा परलोक।  

उम्मीद ही तो पाल रखी है ,

जो जीने को करती है मजबूर।

 फिलहाल तो कुछ भी नहीं,

जिसे पाकर हो जाऊँ मगरूर।

पहले उम्मीद फिर इन्तेजार,

 यही करता हूं बार बार।

 प्रभु अब तो कर दो कृपा,

 हो चुका हूं बहुत बेजार।

रविवार, 23 अप्रैल 2023

  *** पवित्र  धागा  और  वादा***


भा ई बहन का नाता है अटूट,
इसमें न मिलावट न खोट।
इस रिश्ते को नवीनता देने
रक्षा बंधन का आता त्यौहार 
जिसका महत्त्व है इतना,
इन्सां के सोये दायित्व को
दे जाते हैं ये,
एक नई चेतना।
 मिला मुझे और ग्रहण किया
तुम्हारे स्नेह में भीगा
भ्राता  व भगिनी  के बीच
अटूट प्रेम को दृढ बनाने ,
भ्राता  को सर्व -संपन्न करने ,और
चतुर्मुखी उन्नति की कामना लिए
तुम्हारा पवित्र धागा।
मेरे दायित्व को
नई चेतना मिली ,
मैने जानी कच्चे धागे की मजबूती ,
भगिनी , मैं भी करता हूँ
हृदय की गहराईयों से
तुम्हारे प्रति अपना दायित्व,
निभाने का वादा।

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

धरती करे पुकार-- कविता (संशोधित)

 जन्म दात्री इस माटी का सम्मान करें,

सर्वप्रिय है जो देश हमें उसका गुणगान करें।

 आजाद हिंद के होंं सिपाही सेवा देश की कर जायें,

 मोह रहे न तन का प्राण न्योछावर कर जायें।

 गुलशन बन जायें हम भी देश में लायें बहार ,

पूर्ण धरा पर हरियाली कर दें धरती करे पुकार।


 मातृभूमि के जन-जन को नूतन जीवन दान करें,

 पाठ पढ़ायें ऐसा उनको भारत पर अभिमान करें।

 हटेंं ना पीछे कभी भी हम काम निराला कर जायें,

 हो जायें चाहे शहीद नाम देश का अमर कर जायें।

  बन जायें हम सब डोली उठाने को कहार,

उठाएं खुशहाली की डोली फिर धरती करे पुकार ।


 सर्वत्र देश का नाम हो ऐसा हम अभियान करें,

  सर्वमुखी प्रतिभा फैले जग में ऐसा हम अरमान करें।

 आभा से हो जाए पूर्ण सेवा ऐसी करते जायें,

सुवासित हो उपवन यह खून से इसे सींचते जायें।

 रोक न सके हमें नदियों की मझधार ,

 नैया देश की पार करें धरती करे पुकार।


वीर शहीदों ने सींचा इसको हम इसकी रखवाली करें,

संपन्नता से हो जाए पूर्ण फिर रोज हम दिवाली करें।

 ना रहे भूख कहीं भी अन्न इतना उपजायें,

 आंख उठाये दुश्मन जो सीमा पर डट जायें ।

गीत गायें और करें खुशहाली की नौका विहार ,

भारत मां के लाल हैं हम धरती करे पुकार।

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

दबी कुचली कलम- कविता

 मेरी कलम की धार थी बहुत ही तेज, 

 इसने अच्छे अच्छों के खोल दिए थे भेद। 

कोई फर्क नहीं पड़ता था कौन क्या है,

 नहीं जानती कौन कर्मचारी और कौन नेता है।

 अन्याय के खिलाफ इसने खूब आवाज उठाई है,

 रिश्वतखोरों,भ्रष्टाचारियों की साख मिट्टी में मिलाई है।

जैसे-जैसे मेरी कलम तेज और तेज चलने लगी 

 तो कुछ लोगों को यही कलम खलने लगी।

  कलम के निशाने पर थे वे करने लगे मंत्रणा,

सब मिलकर देने लगे इसे नाना प्रकार की यंत्रणा। 

 ऐसे सभी लोगों ने आपस में हाथ मिला लिए थे,

और मेरी कलम को दबाने के लिए तैयार हो लिए थे। 

 कुछ लोगों ने कहा दबाने से काम नहीं चलेगा,

 इसको कुचल देना ही बेहतर उपाय रहेगा।

 तब से दबाने और कुचलने का क्रम जारी रहा,

  बेचारी कलम पर चौतरफा दबाव बहुत भारी रहा। 

 बावजूद इसके अभी भी मेरी कलम बोलती है,

 कई सफेदपोशों के छुपे राज खोलती है ।

 चाहे लोगों को यही कलम अभी भी खलती है ,

 लेकिन यही दबी कुचली कलम अभी भी चलती है


मंज़िल तक-- कविता

 कौन कहता है की राह में चलना है आसान,

यहां पर पग पग पर पड़ता है व्यवधान ।

 यहां पर राही कभी गिरता भी है, 

 और फिर गिर कर संभलता भी है। 

 हौसले वाले राह की मुश्किलों से घबराते नहीं,

 घबराकर बीच राह में रुक जाते नहीं। 

वे जिन्हें होती हैं मंजिलों की तलाश, 

 हमेशा पाले रहते हैं मन में पूरी आस। 

 कभी मुसाफिर राह में भटक जाता है,

 उसे कहीं दोराहा या कहीं चौराहा नजर आता है ।

 जो अपनी सोच को दृढ़ निश्चय में बदल पाएगा, 

 वही बाधाओं को पार कर मंजिल तक पहुंच पाएगा। 

रविवार, 16 अप्रैल 2023

मैं चलूंगा मगर- - लघुकथा(संशोधित)

 *मैं  चलूंगा,मगर- -*

         सुभाष को कोई जवाब न देते हुए राम नारायण ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और कुर्ते की छोर से उसे पोंछने लगे ।उन्होंने  सुकेश को कहा कि आओ अंदर बैठते हैं फिर सोचते हैं। अंदर आकर राम नारायण  सोच विचार की ओर बढ़े और सुभाष के साथ हुए घटनाक्रम के दौर में पहुंच गए। 

  सुभाष का बेटा जर्मनी से आया हुआ था, उसने सुभाष को यहां का मकान बेचकर जर्मनी में ही आकर रहने के लिए कहा। सुभाष ने मकान तो नहीं बेचा, लेकिन वे दोनों पति-पत्नि, बेटे के साथ जर्मनी चले गए, लेकिन  ज्यादा समय तक वहां रह नहीं पाये। शुरू में तो उनकी बहू और बच्चों ने खूब आवाभगत की फिर धीरे धीरे उनका अनादर होने लगा। वह तो अच्छा था उन्होंने मकान नहीं बेचा था, तो वापस आकर इसी मकान में शांति से रहने लगे। 

  सहसा, राम नारायण ने अपना मुंह खोला - मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं तुम्हारे साथ जरूर चलूंगा । यह सुनकर कमल प्रसन्न हो गया और बोला, तो पिताजी सारा सामान पैक कर लेते हैं तो पिताजी  बोले-सारा सामान नहीं केवल कुछ ही , मैं सिर्फ 15 दिन वहां रहूँगा और तुम लोगों के साथ हंसी-खुशी यह समय व्यतीत कर वापस यहां आऊंगा। शेष समय यहीं पर बिताऊंगा ,अपने साथियों के साथ। विश्वास के साथ उन्होंने यह कहा, सुकेश उनका चेहरा देखता ही रह गया। 

 उसे शायद नहीं मालूम था कि दूसरों के अनुभव से भी सबक लिया जा सकता है। 


ismodse@dbcorp.in

शनिवार, 15 अप्रैल 2023

गाँव से शहर- कहानी

 सुभाष को कोई जवाब न देते हुए राम नारायण ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और कुर्ते की छोर से उसे पोंछने लगे,शायद उन्हें कुछ समय चाहिए था सोचने के लिए।उन्होंने सुभाष को आज नहीं जाने के लिए कहा और सुकेश को कहा कि आओ अंदर बैठते हैं फिर सोचते हैं। अंदर आकर उन्होंने  सुकेश को कहा कि जाओ, नहा धोकर तरोताजा हो जाओ, कुछ नाश्ता करेंगे और फिर बातचीत करते हैं ।सुकेश स्नानघर की ओर रवाना हो गया और राम नारायण  सोच विचार की ओर बढ़े और अपने सुभाष के साथ हुए घटनाक्रम के दौर में पहुंच गए। 

  सुभाष के एक बेटा और दो बेटियां थीं। दोनों बेटियों की शादियां,  शिक्षा पूर्ण होने के बाद, हो चुकी थीं और वे अपने परिवार में खुश थीं। सुभाष ने अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलवाई, वह एक कंपनी में इंजीनियर हो गया और 2 साल बाद ही जर्मनी में एक अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर वहां चला गया। पिछले 20 सालों से अपने परिवार के साथ वह वहीं पर था। पिछले वर्ष उनके बेटे ने उन्हें कहा कि आप और माताजी दोनों ही वहां बुढ़ापे में अकेले हैं काफी तकलीफ होती होगी, तो क्यों न आप लोग भी हमारे साथ जर्मनी में ही आकर रहें। वहां का मकान बेच देंगे और यहां पर थोड़ा बड़ा मकान ले लेंगे ताकि आपको और हमें कोई असुविधा ना हो।  बेटे की बात मानकर सुभाष ने  मकान बेचने की कोशिश की लेकिन समय रहते ऐसा नहीं हो पाया,और वे दोनों , बेटे के साथ जर्मनी चले गए। लेकिन  ज्यादा समय तक वहां रह नहीं पाये। शुरू में तो उनकी बहू और बच्चों ने खूब आवाभगत की ,बहुत आदर सत्कार किया। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे उसमें कमी आती गई। कभी-कभी तो किसी बात पर झगड़ते और अनादर कर बैठते। कुछ समय तो सुभाष और उनकी पत्नी ने यह सब बर्दाश्त किया लेकिन जब पानी सर से ऊपर गुजरने लगा तो वे वापस अपने देश लौट आए।  उन्होंने राम  नारायण को सारा वृत्तांत सुनाया। जो आप बीती सुनाई, उसके अनुसार--

  उन्होंने कहा कि शुरू शुरू में तो अतिथि तुम कब आओगे से शुरुआत होती है, फिर अतिथि आइए आपका स्वागत है ,अतिथि कब तक रहोगे ,फिर अतिथि कब जाओगे, फिर अतिथि जाते क्यों नहीं हो की भावना पनपती जाती है।  राम नारायण भाई तुम तो समझ सकते हो कि जो बेलगाम रहे हों, थोड़ा सा भी लगाम उन पर कस दी जाए,  यानी उनकी स्वतंत्रता में थोड़ी सी भी बाधा आ जाए तो वह सहन नहीं होता और धीरे-धीरे तकरार होने लगती है और बढ़ती ही जाती है। वह तो अच्छा था हमने मकान नहीं बेचा था, तो हम वापस आकर इस मकान में शांति से रह रहे हैं। 

 थोड़ी देर में सुकेश स्नानादि से निवृत्त होकर पिताजी के पास आकर बैठ गया। इस बीच पिताजी ने चाय बना ली थी और साथ में बिस्किट रख दिए थे ।चाय की चुस्की लेते हुए फिर से  सुकेश ने पूछा - तो पिताजी सामान पैक कर लें, चलना ही है ।पिताजी ने तसल्ली से कहना  शुरू किया- देखो बेटा तुम लोग वहां शहर में बसे हुए हो,  तुम्हारी मां को गुजरे हुए भी कई साल हो चुके हैं,मैं यहाँ शांतिपूर्वक अपना बुढ़ापा गुजार रहा हूं,  मुझे किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं है घर की सफाई,खाना बनाना ,बर्तन आदि के लिए एक महिला लगा रखी है जो वह यह काम कर जाती है बाकी मेरे हम उम्र साथियों के साथ समय गुजर जाता है। मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं तुम्हारे साथ जरूर चलूंगा । यह सुनकर कमल प्रसन्न हो गया और बोला तो पिताजी सारा सामान पैक कर लेते हैं तो   पिता जी  बोले-सारा सामान नहीं केवल कुछ ही , मैं सिर्फ 15 दिन वहां रहूँगा और तुम लोगों के साथ हंसी-खुशी यह समय व्यतीत कर वापस यहां आऊंगा।   शेष समय यहीं पर बिताऊंगा अपने साथियों के साथ। विश्वास के साथ उन्होंने यह कहा, सुकेश उनका चेहरा देखता ही रह गया। 

 उसे शायद नहीं मालूम था कि दूसरों के अनुभव से भी सबक लिया जा सकता है।


ismodse@dbcorp.in

बैचेन दिल- कविता

 मेरे बेचैन दिल को कभी तो करार आएगा, 

 वह कभी तो मेरे पास होकर बेकरार आएगा।

 वह पल होगा कितना हसीन सोच रहा हूं मैं,

जब उसके आने से मेरा जीवन संवर जाएगा। 


 कितनी हसरतें जीवन में पाल रखी थी मैंने,

 बड़े जतन से दिल में संभाल रखी थी मैंने।

 उसे शायद अंदेशा भी न हो इस बात का, 

   अपनी हसरतें अभी तलक जवान रखी थी मैंने।

अंधा युग-- कविता

   देखो जी यह कैसा अंधा युग अब आया है, 

 अपराध करे कोई, किसी और को अपराधी दिखलाया है। 

 मंजिल तो सबकी एक सभी यह जानते हैं, 

 लेकिन एक साथ चलना कहां चाहते हैं।

 कुटिल लोगों के मन में भ्रम जाल है बड़ा रचा हुआ, 

  सबके मन में निज स्वार्थ है कूट-कूट कर भरा हुआ। 

 निजी स्वार्थ के खातिर अपनों को तो छोड़ दिया, 

 अपनों से जो नाता था पल भर में तोड़ दिया ।

चलता है जमीन पर देखता है आसमान की ओर, 

 ऐसे लोगों के स्वार्थ का नहीं होता कोई भी छोर।

आंख सजल हो जाए किसी का दुःख दर्द देखकर,

दिल जिनका भर आए  किसी को विपत्ति मे देखकर। 

 इंसानियत जिनमें नजर आ जाए ऐसे लोग मिलेंगे कम,

 हैवानियत का तो बोलबाला है यही है सबसे बड़ा गम। 

 गलत तो नहीं कहते लोग कि यह कैसा अंधायुग आया है,

  सच कहते हैं कि कलयुग आया है, कल युग आया है।

राज श्री का प्रयोग- कविता

 सुना है राज श्री नया आयाम दे रहा है,

  अपने रचनाकारों को पैगाम दे रहा है।

 हर एक कर रहा है यहां अपनी कीर्ति स्थापित,

  और हो रहा है काव्य जगत में आच्छादित ।

 बढ़ाया है कलमकारों को देकर अलग मान,

  सब पा रहे हैं संस्था से भरपूर सम्मान।

राज श्री की है कोशिश मिले सबको खूब पहचान,

  चढ़ते जाएंगे एक के बाद एक कई पायदान। 

 मुश्किल राहें हर एक की  हो रही यहां आसान,

  वह दिन दूर नहीं जब कई  तो छू लेंगे आसमान।

 नई-नई प्रतियोगिता कर, कर रही नया आगाज, 

  रचनाकारों को आगे बढ़ने को दे रही आवाज। 

 राज श्री दैनिक कार्यों से होती शुभ प्रभात, 

  शुभ प्रभात से ही होती दिन की शुरुआत। 

अपने मन की,अपने दिल की रखते यहां सब बात,

कविता ग़ज़ल गीत कहानी से कहते मन के ज़ज्बात।

 राज श्री उमंगों की है बन रही नया सवेरा,

  ये ही उमंगें कर रहीं सबके दिलों में बसेरा।

 दे रहे अपना समय,सभी सदस्य पूर्ण सहयोग,

  खूब सफल रहा है राज श्री का य़ह प्रयोग।

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

कुत्ते जैसी जिन्दगी चाहिए- लघुकथा(संशोधित)

 फटे पुराने कपड़े पहने हुए, बाल पूरी तरह बिखरे हुए, कई दिनों से नहीं नहाया हुआ, वह बालक टकटकी लगाए गाँव में हो रही शादी के   मुख्य दरवाजे के पास खड़ा हुआ था, जहां एक शादी का भोजन चल रहा था।लोग तरह-तरह के पकवान अपनी प्लेट में लेकर स्वाद से खाए जा रहे थे।वह सोच रहा था कोई तो ऐसा हो जो एक प्लेट में सारे नहीं तो कुछ ही,  रख कर मुझे दे जाए ।उसकी सोच भंग हो  गयी , जब दरवाजे पर खड़े गार्ड ने डंडा घुमाते हुए उसको वहां से भाग जाने के लिए कहा । वह वहां से चल दिया लेकिन आगे जाकर रुक गया जहां पर बची हुई जूठन फेंकी जा रही थी । उसने देखा कि एक कुत्ता वहां पर कुछ खा रहा था। बच्चे ने सोचा कि मेरे खाने लायक भी जरूर होगा। मैं भी खा सकता हूं, यह सोचकर वह जूठन में से कुछ उठाकर खाने लगा। वहाँ से गुज़रते हुए कुछ संभ्रांत व्यक्तियों ने जब उस बच्चे को झूठन खाते हुए देखा तो उन्हें लगा कि यह खाकर बच्चा बीमार पड़ सकता है। यह सोच उन्होंने उसको वहां से भगा दिया। बच्चे की आंखों में आंसू आ गए ,रोते हुए उसने भगवान से कहा- हे भगवान तूने मुझे कहां लाकर डाल दिया ,न अंदर  खाने को मिलता है और न बाहर। कुत्ते से बढ़कर क्यों दी मुझे , कम से कम कुत्ते जैसी जिंदगी तो देता, उसके साथ,मैं भी खाता और कोई नहीं भगाता। 

सागर जैसी आंखों वाली - गाना (संशोधित)

 हो, चेहरा है या चाँद खिला है

ज़ुल्फ़ घनेरी शाम है क्या

सागर जैसी आँखों वाली

ये तो बता तेरा नाम है क्या


चेहरा है या चाँद खिला है

ज़ुल्फ़ घनेरी शाम है क्या

सागर जैसी आँखों वाली

ये तो बता तेरा नाम है क्या


 जब से देखा तुझको जानम,

 क्या-क्या ख्वाब सजे दिल में।

 रातों में तो नींद नहीं 

सपने देख रहे थे दिन में।


 सपनों का तो छोर नहीं है, 

 एक दरिया सा बह जाए।

 दिल में जो फूल खिला है,

 वह एक गुलशन बन जाए।


 दिल तुझ पर आ ही गया,

 अब तू ही बता यह राज है क्या।

 सागर जैसी आंखों वाली यह तो बता तेरा नाम है क्या 

 तेरी खातिर छोड़ दिए अब,

 सब अपने बेगाने हुए ।

दिल में राज छुपे थे जो,

 वो सब अफ़साने हुए।

  सामने आकर नजर मिला ले, 

    मिलने से क्यों डरती है ,

  तेरे लिए तो प्रेम की धारा ,

 झर झर करके बहती है। 

 अब तू ही बता दे मुझको,

 नाम तेरा गुमनाम है क्या

सागर जैसी आंखों वाली यह तो बता तेरा नाम है क्या 

नारियां -- गीत(संशोधित)

 इस धरा के हर कोने पर,

हर क्षेत्र में हैं नारियां।

भूभाग पर ही नहीं ,

अंतरिक्ष में भी नाम लिखाती नारियां। 


 सागर की गहराई या पर्वत की ऊंचाईयां,

हर जगह इतिहास बनाती नारियां। 

घर में मां की सहायक बनतीं, 

पापा को भी राह दिखाती नारियां ।

इस धरा  के हर कोने पर,  हर क्षेत्र में है नारियां। 



माता-पिता से शिक्षा पाकर,

 संस्कारित होती नारियां।

 ससुराल में जाकर भी,

परिवार का मान बढ़ाती नारियां। 

इस धरा के हर कोने पर,हर क्षेत्र में है नारियां।


स्वयं बेटी,मां,दादी,नानी ही नहीं,

 संसार की जननी होती हैं नारियां,

जो न होतीं जगत में नारियां।

 तो नवरात्र में कहां से आती नौ देवियां। 

इस धरा के हर कोने पर ,हर क्षेत्र में है नारियां।


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

बेटा या बेटी- लघु कथा

 सुंदरलाल जी को पूरी आशा थी कि पहली लड़की के बाद अब उनके घर में लड़के का ही आगमन होने वाला है। उनकी पत्नी के पेट का आकार देखते हुए कुछ जानकार महिलाओं का यही कहना था।  लेकिन हुआ वही जो विधाता को मंजूर था, घर में दूसरी लड़की ही आ गई।सुंदर लाल जी को थोड़ी मायूसी तो हुई लेकिन उनकी पत्नी मोहिनी जी ने कहा कि कोई बात नहीं लक्ष्मी ही तो आई है। सब अपना भाग्य अपने साथ लेकर आते हैं। सुंदरलाल जी की एक सरकारी विभाग में साधारण नौकरी थी लेकिन उनकी आय से घर का खर्च आराम से चल जाता था। होनी को कुछ और ही मंजूर था 2 साल बाद ही उनको गंभीर बीमारी हुई और वह चल बसे।  उनकी जगह उनकी पत्नी मोहिनी को विभाग में नौकरी मिल गई और इस तरह घर परिवार का खर्चा चलता रहा। दोनों बेटियां अच्छी पढ़-लिख गई थीं। बड़ी बेटी की शादी एक अच्छे परिवार में हो गई।कुछ वर्षों के बाद छोटी बिटिया के लिए भी रिश्ता आया।  लड़का और उसके माता-पिता उसे देखने आए हुए थे। अन्य औपचारिकताओं के बाद बिटिया से पूछा गया कि तुम क्या चाहती हो, तो उसने कहा कि मेरा स्पष्ट विचार है की शादी के बाद हम लोग यहां, मेरी मां के साथ रहेंगे। ये यहां पर घर जमाई नहीं बल्कि बेटा बन कर और मैं बेटी नहीं बल्कि बहू बनकर मां की सेवा करेंगे और इस तरह से जीवन की गाड़ी आगे बढ़ाएंगे।  किसी के पास भी, ना करने का कोई अवसर नहीं था। 

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

जीने का अंदाज- कविता

 भुला कर हर बात,नई जिंदगी शुरू कीजिए,

 जो कुछ बुरा हुआ उसे बस दफना दीजिए।

 समझ लीजिए वह एक बुरा सपना था,

 वह तो मात्र कल्पना थी कहां अपना था। 

 फिर से अजनबी बन कर, फिर से मिलिए,

 और फिर कदम से कदम मिलाकर साथ चलिए।

  मेरे जीने का अंदाज तुम्हें भी भा जाएगा,

 सुख जो दूर था वह पास आ जाएगा।

 गमों में चूर रहने की जरूरत क्यों है,

 आखिर उनसे रूबरू होने की फ़ुरसत क्यों है।

 कल जो हुआ सो हुआ, जाने दो,

 भूल जाओ , जो हुआ उस फसाने को।

 अब हमें कल को खुशनसीब बनाना है,

 दुखों की काली परछाई को दूर हटाना है।

 आने वाले कल के लिए ताना-बाना बुनना है

  जीवन के विशाल समंदर से हमें मोती चुनना है। 

इंसान बन गया- कविता

  इंसान हूं इंसानियत मुझ में भरपूर है,

 आदमी तो आदमीयत के नशे में चूर है।

 क्या दुनिया में  बस यही है दुनियादारी, 

 नहीं बची है किसी में अब ईमानदारी।

 जमीर तो हर किसी ने जैसे बेच खाया हो,

 दया ,पराया दर्द जैसे अपने से दूर हटाया हो।

 खुदगर्ज इतना कि खुद ही नजर आता है,

 हर दूसरा उसको पराया ही नजर आता है।

 बहुत कोशिश की थी मैंने आदमी से इंसान बनने की,

 ठान लिया था मैंने जो बनना था बनने की। 

 मुश्किलों से भरा सफर था आदमी से इंसान बनने का,

 पर जिंदगी में ध्येय तो यही था कठिन काम करने का। 

 सभी बाधाओं को पार कर आखिर में इंसान बन ही गया,

 आखिर जो बनना था वह मैं बन ही गया। 

सोमवार, 10 अप्रैल 2023

आवाज तो दी होती- कविता

 मुड़ना  फिर पीछे देखना,

यह हमारी फितरत में नहीं।

लेकिन हम अपनी फितरत भी बदल डालते 

 एक बार आवाज तो दी होती। 

 मोहब्बत तो खूब करते हैं हम तुमसे,

 हमारी मोहब्बत का कोई सानी नहीं।

यही मोहब्बत जागती है रात भर,

 पल भर को भी यह नहीं सोती। 

 हम तुम्हें मानते हैं बगिया का एक महकता फूल,

  हवा का झोंका  महका देता है मेरे मन को।

 तुम्हें चाहे कली से बनता फूल कहूं 

 या फिर सीप में पड़ा खूबसूरत मोती। 

अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है मुझे,

 तू चाहे उजाले में विचरण करती रहे। 

 नहीं है मुझे फिर भी कोई भी गम,

मैंने मान लिया तुझे मेरे जीवन की ज्योति।

स्कूल चले हम- कविता

 होता यह गर स्कूल मैं नहीं जाता,  

 समझ लो मैं अनपढ़ ही रह जाता। 

 मम्मी मेरी अल सुबह ही उठ जाती है, 

 उठकर जल्दी ही हमारा टिफिन बनाती है।

 पीली यूनीफॉर्म पहिन कर हम तैयार हो जाते हैं, 

 और पीला ही स्कूल बैग कंधों पर टांगते हैं।

 मम्मी का हाथ पकड़कर हम दोनों चल देते हैं,

 लेकिन आगे-पीछे और दाएं-बाएं भी देखते हैं।

 पढ़-लिख कर हम पढ़े लिखे हो जाएंगे, 

 और छोटे बच्चे से एक दिन ऑफिसर हो जाएंगे। 

 शिक्षा से ही हम इंसान बन पाएंगे,

 वरना तो ऐसे ही गंवार रह जाएंगे।

शनिवार, 8 अप्रैल 2023

डाली से टूटा फ़ूल- कविता

 टूटकर फूल डाली से कुछ परेशान है,

 क्या पड़ा रहेगा वह जहां है,

  इस जहान में उसकी क्या गति होगी,

  गंतव्य उसका आखिर कहां है।


 बड़ा खुशनुमा माहौल था,

 जब वह कली बनकर आया था ।

देखकर यहां का सुहाना मंजर, 

 फूला नहीं समाया था।


 कसूर क्या था आखिर उसका,

वह तो अपनी खुशबू ही बिखेर रहा था।

 अपनी उपस्थिति से इस जहान का,

   अप्रतिम सौंदर्य ही बढ़ा रहा था। 


अब ना जाने उसकी मंजिल क्या होगी, 

 क्या उसका रुप ही बदल दिया जाएगा।

 जैसा कुछ कलियों और फूलों के साथ हुआ,

  क्या उसे भी वैसे ही मसल दिया जाएगा।

 

  क्या किसी माला में गुंथ कर,

  किसी के गले की शोभा बढ़ाऊँगा,

  या फिर ऐसे ही किसी मंदिर में,

  ईश्वर के सम्मुख चढ़ा दिया जाऊंगा।

 

 हो सकता है किसी मैयत पर जाऊं,

 बड़े ही पशोपेश में पड़ा हुआ हूं।

  कितना बैचेन और  असहाय हूं,

   मैं एक फूल डाली से तोड़ा हुआ हूं। 


मुसाफिर हूं- कविता (संशोधित)

 मुसाफिर हूं यारों मुझे चलते रहना होगा,

कई  कई मुश्किलों से लड़ना होगा।

 बाधाएं तो राहों में आएंगी अनेक,

 हौसले से बाधाओं को पार करना होगा।

 मुश्किलों में जो डालना चाहें हमें,

  उन्हें सबक सिखाना होगा।

मंज़िल तक पहुंच गए ग़र,

 तो ध्येय पूर्ण हमारा होगा।

 सपना देखना भला किसे बुरा लगे,

 बुरे सपने से नहीं डरना है,

मन में उत्साह भरा ग़र,

सपना पूरा अपना होगा। 

मंजिल कितनी भी दूर ही सही,

 अनंत तक तो नहीं चलना है।

 चलते रहना है, बस चलते रहना है 

  और अंततः अपनी मंजिल तक पहुंचना है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

कयामत-- कविता

  यूं न सितम ढ़ाओ इन प्यार  के मारों पर,

 तुम्हारी राह में फूल बिछाते इन कुंवारों पर।

 बहुत बेजार हो चुके हैं तुम्हारे इन्तजार  में,

अब तो कुछ तो रहम खाओ हम बेचारों पर।


कली-कली,फूल-फूल चमन में खिल गये,

पर देखे थे जो ख़्वाब वो सब अधूरे रह गये,

तुमने कहा था आज तो आने को,

पर हम फिर राह तकते रह गये।

 

  मैं तो यहां हूं और तुम न जाने कहां,

 ढूंढा था हमने तुम्हें यहां और वहां।

 कर दो अब तो इस इंतजार की इन्तहाँ,

 तभी बस  पाएगा हमारे दिल का जहां।


 न जाने क्यों हमें तुम्हारी याद आती है,

जमीं से आसमांं तक यही फरियाद आती है,

चले आओ अब तो सभी फासले मिटा कर,

अब तो रोज कयामत की रात आती है।


 बड़े जतन से कमाई थी इज्जत  मैंने,

 जाने क्यों वह इसे घटाना चाहता है। 

 बहुत कुछ किया मैंने जमाने के लिए,

 पर जाने क्या मुझसे जमाना चाहता है।

 दिलों में छाया अंधेरा अपनों में ही,

जाने क्यों इसे बढ़ाना चाहता है 

 तिल तिल जलकर घर को रोशन किया।

जाने क्यूँ शमा को बुझाना चाहता है ।

लाख समझा लो तुम किसी को,

 पर वह कहां मानना चाहता है।

 बड़ा बेरहम है यह जालिम जमाना, 

 बस अपनी ही चलाना चाहता है। 


सोमवार, 3 अप्रैल 2023

तूझे छू कर आती हवा- कविता

 छू कर तुम्हें गुजरना हवा का,

 निशब्द कर जाता है मुझे।

 क्या गुजर जाती है तब मुझ पर,

 यह कैसे पता होगा तुझे।

  एक नजर ही तो देखा था तुझे,

 तब से मुझ में जग उठी थी तेरी चाह।

 तेरे दिल तक पहुंचने की ढूंढ रहा था,

  कोई तो होगी बस एक तो राह।

 छोटी सी गुजारिश है तुझ से,

 एक नजर से उठाकर देख ले जरा।

 दिल में मेरे कैसे तूफान उठ रहे,

तुझे तो कैसे मालूम होगा भला।

 तुझे छू कर आती है जो हवा,

 उस हवा की महक मुझे महका जाती है। 

 तुझसे मिलने की जो चाहत है,

 मेरे दिल को वो बहका जाती है