इंसान हूं इंसानियत मुझ में भरपूर है,
आदमी तो आदमीयत के नशे में चूर है।
क्या दुनिया में बस यही है दुनियादारी,
नहीं बची है किसी में अब ईमानदारी।
जमीर तो हर किसी ने जैसे बेच खाया हो,
दया ,पराया दर्द जैसे अपने से दूर हटाया हो।
खुदगर्ज इतना कि खुद ही नजर आता है,
हर दूसरा उसको पराया ही नजर आता है।
बहुत कोशिश की थी मैंने आदमी से इंसान बनने की,
ठान लिया था मैंने जो बनना था बनने की।
मुश्किलों से भरा सफर था आदमी से इंसान बनने का,
पर जिंदगी में ध्येय तो यही था कठिन काम करने का।
सभी बाधाओं को पार कर आखिर में इंसान बन ही गया,
आखिर जो बनना था वह मैं बन ही गया।
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