*मैं चलूंगा,मगर- -*
सुभाष को कोई जवाब न देते हुए राम नारायण ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और कुर्ते की छोर से उसे पोंछने लगे ।उन्होंने सुकेश को कहा कि आओ अंदर बैठते हैं फिर सोचते हैं। अंदर आकर राम नारायण सोच विचार की ओर बढ़े और सुभाष के साथ हुए घटनाक्रम के दौर में पहुंच गए।
सुभाष का बेटा जर्मनी से आया हुआ था, उसने सुभाष को यहां का मकान बेचकर जर्मनी में ही आकर रहने के लिए कहा। सुभाष ने मकान तो नहीं बेचा, लेकिन वे दोनों पति-पत्नि, बेटे के साथ जर्मनी चले गए, लेकिन ज्यादा समय तक वहां रह नहीं पाये। शुरू में तो उनकी बहू और बच्चों ने खूब आवाभगत की फिर धीरे धीरे उनका अनादर होने लगा। वह तो अच्छा था उन्होंने मकान नहीं बेचा था, तो वापस आकर इसी मकान में शांति से रहने लगे।
सहसा, राम नारायण ने अपना मुंह खोला - मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं तुम्हारे साथ जरूर चलूंगा । यह सुनकर कमल प्रसन्न हो गया और बोला, तो पिताजी सारा सामान पैक कर लेते हैं तो पिताजी बोले-सारा सामान नहीं केवल कुछ ही , मैं सिर्फ 15 दिन वहां रहूँगा और तुम लोगों के साथ हंसी-खुशी यह समय व्यतीत कर वापस यहां आऊंगा। शेष समय यहीं पर बिताऊंगा ,अपने साथियों के साथ। विश्वास के साथ उन्होंने यह कहा, सुकेश उनका चेहरा देखता ही रह गया।
उसे शायद नहीं मालूम था कि दूसरों के अनुभव से भी सबक लिया जा सकता है।
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