शनिवार, 29 अप्रैल 2023

धूल तेरी गलियों की- कविता

 धूल मैं तेरी गलियों की इधर-उधर उड़ती फिरूँ, 

 बन गई वह कली जो फूल बन कर न खिलूं।

 चाहा बहुत था मैंने तेरे संग संग चलना ,

 बस तेरे संग जीना तेरे संग ही मरना।

क्या क्या ख्वाब दिल में सजाए थे मैंने,

 हर दिन त्यौहार जैसे मनाए थे मैंने।

   मैं  तो बस इतना ही जान रही हूं,

  तू माने न माने मैं तुझे अपना मान रही हूं।

 क्या करूं क्या ना करूं बन गई अधरझूल हूं मैं,

 बस इतना ही समझ ले तेरी गलियों की धूल हूं मैं।

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